पद २७२
श्रीराम-स्तुति · पद २७२ / २७९
तुम जनि मन मैलो करो, लोचन जनि फेरो।
सुनहु राम! बिनु रावरे लोकहु परलोकहु कोउ न कहूँ हितु मेरो ॥ १ ॥
अधम
अगुन-अलायक-आलसी जानि——-अनेरो।
अधनु
स्वारथके साथिन्ह तज्यो तिजराको- सो टोटक,औचट उलटि न हेरो ॥ २ ॥
भगतिहीन, बेद-बाहिरो लखि कलिमल घेरो।
देवनिहू देव! परिहरयो, अन्याव नतिनको हौं अपराधीसब केरो ॥ ३ ॥
नामकी ओट पेट भरत हौं, पै कहावत चेरो।
जगत-बिदित बात ह्वे परी, समुझिये धौं अपने, लोक कि बेद बड़ेरो ॥ ४ ॥
ह्वेहै जब-जब तुमहिं तें तुलसीको भलेरो।
देव
दिन-हू-दिन—–बिगरि है,बलि जाउँ, बिलंब किये,अपनाइये सबेरो ॥ ५ ॥
दीन