श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 272

तुम जनि मन मैलो करो, लोचन जनि फेरो।

सुनहु राम! बिनु रावरे लोकहु परलोकहु कोउ न कहूँ हितु मेरो ॥ 1 ॥

अधम

अगुन-अलायक-आलसी जानि——-अनेरो।

अधनु

स्वारथके साथिन्ह तज्यो तिजराको- सो टोटक,औचट उलटि न हेरो ॥ 2 ॥

भगतिहीन, बेद-बाहिरो लखि कलिमल घेरो।

देवनिहू देव! परिहरयो, अन्याव नतिनको हौं अपराधीसब केरो ॥ 3 ॥

नामकी ओट पेट भरत हौं, पै कहावत चेरो।

जगत-बिदित बात ह्वे परी, समुझिये धौं अपने, लोक कि बेद बड़ेरो ॥ 4 ॥

ह्वेहै जब-जब तुमहिं तें तुलसीको भलेरो।

देव

दिन-हू-दिन—–बिगरि है,बलि जाउँ, बिलंब किये,अपनाइये सबेरो ॥ 5 ॥

दीन