श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २७५

श्रीराम-स्तुति · पद २७५ / २७९

द्वार द्वार दीनता कही, काढ़ि रद, परि पाहूँ।

हैं दयालु दुनी दस दिसा,दुख-दोष-दलन-छम, कियो न सँभाषन काहूँ ॥ १ ॥

जन्यो

तनु——-कुटिल कीट ज्यों, तज्यों मातु-पिताहूँ।

जनतेऊ

काहेको रोष,दोष काहि धौं,मेरे ही अभाग मोसों सकुचत छुइ सब छाहूँ ॥ २ ॥

दुखित देखि संतन कह्यो, सोचै जनि मन माँहू।

तोसे पसु-पाँवर-पातकी परिहरे न सरन गये, रघुबर ओर बिनाहूँ ॥ ३ ॥

तुलसी तिहारो भये भयो सुखी प्रीती-प्रतीति बिनाहू।

नामकी महिमा,सील नाथको, मेरो भलो बिलोकि अब तें सकुचाहुँ,सिहाहूँ ॥ ४ ॥