श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २७६

श्रीराम-स्तुति · पद २७६ / २७९

कहा न कियो,कहाँ न गयो, सीस काहि न नायो ?

राम रावरे बिन भये जन जनमि-जनमि जग दुख दसहू दिसि पायो ॥ १ ॥

आस-बिबस खास दास ह्वे नीच प्रभुनि जनायो।

हा हा करि दीनता कही द्वार-द्वार बार-बार, परी न छार,मुह बायो ॥ २ ॥

असन-बसन बिनु बावरो जहँ-तहँ उठि धायो।

मान

महिमा——प्रिय प्रानते तजि खोलि खलनि आगे, खिनु-खिनु पेट खलायो ॥ ३ ॥

असु

नाथ! हाथ कछु नाहि लग्यो, लालच ललचायो।

साँच कहौं,नाच कौन सो जो, न मोहि लोभ लघु हौं निरलज्ज नचायो ॥ ४ ॥

मन

श्रवन-नयन-मग——लगे, सब थल पतियायो।

अग

मूड़ मारि,हिय हारिकै , हित हेरि हहरि अब चरन-सरन तकि आयो ॥ ५ ॥

दसरथके ! समरथ तुहीं, त्रिभुवन जसु गायो।

तुलसि नमत अवलोकिये,बाँह-बोल बलि दै बिरुदावली बुलायो ॥ ६ ॥