श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 34

अति आरत, अति स्वारथी, अति दीन-दुखारी।

इनको बिलगु न मानिये, बोलहिं न बिचारी ॥ 1 ॥

लोक-रीति देखी सुनी, व्याकुल नर-नारी।

अति बरषे अनबरषेहूँ, देहिं दैवहिं गारी ॥ 2 ॥

नाकहि आये नाथसों, साँसति भय भारी।

कहि आयो, कीबी छमा, निज ओर निहारी ॥ 3 ॥

समै साँकरे सुमिरिये, समरथ हितकारी।

सो सब बिधि ऊबर करै, अपराध बिसारी ॥ 4 ॥

बिगरी सेवककी सदा,साहेबहिं सुधारी।

तुलसीपर तेरी कृपा, निरुपाधि निरारी ॥ 5 ॥