श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ३४

हनुमत-स्तुति · पद ३४ / २७९

अति आरत, अति स्वारथी, अति दीन-दुखारी।

इनको बिलगु न मानिये, बोलहिं न बिचारी ॥ १ ॥

लोक-रीति देखी सुनी, व्याकुल नर-नारी।

अति बरषे अनबरषेहूँ, देहिं दैवहिं गारी ॥ २ ॥

नाकहि आये नाथसों, साँसति भय भारी।

कहि आयो, कीबी छमा, निज ओर निहारी ॥ ३ ॥

समै साँकरे सुमिरिये, समरथ हितकारी।

सो सब बिधि ऊबर करै, अपराध बिसारी ॥ ४ ॥

बिगरी सेवककी सदा,साहेबहिं सुधारी।

तुलसीपर तेरी कृपा, निरुपाधि निरारी ॥ ५ ॥