पद ३५
हनुमत-स्तुति · पद ३५ / २७९
कटु कहिये गाढे परे, सुनि समुझि सुसाईं।
करहिं अनभलेउ को भलो, आपनी भलाई ॥ १ ॥
समरथ सुभ जो पाइये, बीर पीर पराई।
ताहि तकैं सब ज्यों नदी बारिधि न बुलाई ॥ २ ॥
अपने अपनेको भलो, चहैं लोग लुगाई।
भावै जो जेहि तेहि भजै, सुभ असुभ सगाई ॥ ३ ॥
बाँह बोलि दै थापिये, जो निज बरिआई।
बिन सेवा सों पालिये, सेवककी नाईं ॥ ४ ॥
चूक-चपलता मेरियै, तू बड़ो बड़ाई।
होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई ॥ ५ ॥
बंदिछोर बिरुदावली, निगमागम गाई।
नीको तुलसीदासको, तेरियै निकाई ॥ ६ ॥