श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 4

शिव स्तुति · राग धनाश्री · पद 4 / 279

दानी कहुँ संकर-सम नाहीं।

दीन-दयालु दिबोई भावै,जाचक सदा सोहाहीं ॥ 1 ॥

मारिकै मार थप्यौ जगमें,जाकी प्रथम रेख भट माहीं।

ता ठाकुरकौ रीझि निवाजिबौ,कह्यौ क्यों परत मो पाहीं ॥ 2 ॥

जोग कोटि करि जो गति हरिसों,मुनि माँगत सकुचाहीं।

बेद-बिदित तेहि पद पुरारि-पुर,कीट पंतग समाहीं ॥ 3 ॥

ईस उदार उमापति परिहरि,अनत जे जाचन जाहीं।

तुलसिदास ते मूढ़ माँगने,कबहुँ न पेट अघाहीं ॥ 4 ॥