श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 5

बावरो रावरो नाह भवानी।

दानि बड़ो दिन देत दये बिनु,बेद-बडाई भानी ॥ 1 ॥

निज घरकी बरबात बिलोकहु,हौ तुम परम सयानी।

सिवकी दई संपदा देखत, श्री-सारदा सिहानी ॥ 2 ॥

जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुखकी नहीं निसानी।

तिन रंकनकौ नाक सँवारत,हौं आयो नकबानी ॥ 3 ॥

दुख-दीनता दुखी इनके दुख,जाचकता अकुलानी।

यह अधिकार सौपिये औरहिं,भीख भली मैं जानी ॥ 4 ॥

प्रेम-प्रसंसा-बिनय-ब्यंगजुत,सुनि बिधिकी बर बानी।

तुलसी मुदित महेस मनहिं मन,जगत-मातु मुसुकानी ॥ 5 ॥