पद 5
शिव स्तुति · पद 5 / 279
बावरो रावरो नाह भवानी।
दानि बड़ो दिन देत दये बिनु,बेद-बडाई भानी ॥ 1 ॥
निज घरकी बरबात बिलोकहु,हौ तुम परम सयानी।
सिवकी दई संपदा देखत, श्री-सारदा सिहानी ॥ 2 ॥
जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुखकी नहीं निसानी।
तिन रंकनकौ नाक सँवारत,हौं आयो नकबानी ॥ 3 ॥
दुख-दीनता दुखी इनके दुख,जाचकता अकुलानी।
यह अधिकार सौपिये औरहिं,भीख भली मैं जानी ॥ 4 ॥
प्रेम-प्रसंसा-बिनय-ब्यंगजुत,सुनि बिधिकी बर बानी।
तुलसी मुदित महेस मनहिं मन,जगत-मातु मुसुकानी ॥ 5 ॥