श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ४०

शत्रुघ्न-स्तुति · राग धनाश्री · पद ४० / २७९

जयति जय शत्रु-करि-केसरी शत्रुहन,

शत्रुतम-तुहिनहर किरणकेतू।

देव-महिदेव-महि-धेनु-सेवक सुजनसिद्धि-मुनि-सकल-कल्याण-हेतू ॥ १ ॥

जयति सर्वांगसुदंर सुमित्रा-सुवन,

भुवन-विख्यात-भरतानुगामी।

वर्मचर्मासी-धनु-बाण-तूणीर-धर

शत्रु-संकट-समय यत्प्रणामी ॥ २ ॥

जयति लवणाम्बुनिधि-कुंभसंभव महादनुज-दुर्जनदवन, दुरितहारि।

लक्ष्मणानुज, भरत-राम-सीता-चरणरेणु-भूषित-भाल-तिलकधारी ॥ ३ ॥

जयति श्रुतिकीर्ति-वल्लभ सुदुर्लभ सुलभ

नमत नर्मद भुक्तिमुक्तिदाता।

दासतुलसी चरण-शरण सीदत विभो,

पाहि दीनार्त्त-संताप-हाता ॥ ४ ॥