पद 41
श्रीसीता-स्तुति · राग केदारा · पद 41 / 279
कबहुँक अंब, अवसर पाइ।
मेरिऔ सुधि द्याइबी,कछु करुन-कथा चलाइ ॥ 1 ॥
दीन, सब अँगहीन,छीन,मलीन,अघी अघाइ।
नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ॥ 2 ॥
बूझिहैं ’सो है कोन’, कहिबी नाम दसा जनाइ।
सुनत राम कृपालुके मेरी बिगरीऔ बनि जाइ ॥ 3 ॥
जानकी जगजननि जनकी किये बचन सहाइ।
तरै तुलसीदास भव तव नाथ-गुन-गन गाइ ॥ 4 ॥