पद ४२
श्रीसीता-स्तुति · पद ४२ / २७९
कबहुँ समय सुधि द्ययाबी,मेरी मातु जानकी।
जन कहाइ नाम लेत हौं,किये पन चातक ज्यों,प्यास-प्रेम-पानकी ॥ १ ॥
सरल कहाई प्रकृति आपु जानिए करुना-निधानकी।
निजगुन,अरिकृत अनहितौ,दास-दोष सुरति चित रहत न दिये दानकी ॥
बानि बिसारनसील है मानद अमानकी।
तुलसीदास न बिसारिये,मन करम बचन जाके ,सपनेहुँ गति न आनकी ॥