पद ४३
जयति
सच्चिदव्यापकानंद परब्रह्म-पद विग्रह-व्यक्त लीलावतारी।
विकल ब्रह्मादि,सुर,सिद्ध,संकोचवश,विमल गुण-गेह नर-देह-धारी। १।
जयति
कोशलाधीश कल्याण कोशलसुता,कुशल कैवल्य-फल चारु चारी।
वेद-बोधित करम-धरम-धरनीधेनु,विप्र-सेवक साधु-मोदकारी ॥ २ ॥
जयति ऋषि-मखपाल,शमन-सज्जन-साल,शापवश मुनिवधू-पापहारी।
भंजि भवचाप,दलि दाप भूपावली,सहित भृगुनाथ नतमाथ भारी ॥ ३ ॥
जयति धारमिक-धुर,धीर रघुवीर गुर-मातु-पितु-बंधु-वचनानुसारी।
चित्रकूटाद्रि विन्ध्याद्रि दंडकविपिन,धन्यकृत पुन्यकानन-विहारी ॥ ४ ॥
जयति पाकारिसुत-काक-करतूति-फलदानि खनि गर्त गोपित विराधा।
दिव्य देवी वेश देखि लखि निशिचरी जनु विडंबित करी विश्वबाधा ॥ ५ ॥
जयति खर-त्रिशिर-दूषण चतुर्दश-सहस-सुभट-मारीच-संहारकर्ता।
गृध्र-शबरी-भक्ति-विवश करुणासिंधु,चरित निरुपाधि,त्रिविधार्तिहर्ता ॥ ६ ॥
जयति मद-अंध कुकबंध बधि,बालि बलशालि बधि,करन सुग्रीव राजा।
सुभट मर्कट-भालु-कटक-संघट सजत,नमत पद रावणानुज निवाजा ॥ ७ ॥
जयति पाथोधि-कृत-सेतु कौतुक हेतु,काल-मन अगम लई ललकि लंका।
सकुल,सानुज,सदल दलित दशकंठ रण,लोक-लोकप किये रहित-शंका ॥ ८ ॥
जयति सौमित्रि-सीता-सचिव-सहित चले पुष्पकारुढ निज राजधानी।
दासतुलसी मुदित अवधवासी सकल,राम भे भूप वैदेहि रानी ॥ ९ ॥