श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ४७

श्रीराम-स्तुति · पद ४७ / २७९

ऐसी आरती राम रघुबीरकी करहि मन।

हरन दुखदुंद गोबिंद आनन्दघन ॥ १ ॥

अचरचर रूप हरि,सरबगत,सरबदा बसत,इति बासना धूप दीजै।

दीप निजबोधगत-कोह-मद-मोह-तम,प्रौढऽभिमान चितबृति छीजै। २।

भाव अतिशय विशद प्रवर नैवेद्य शुभ श्रीरमण परम संतोषकारी।

प्रेम-तांबूल गत शूल संशय सकल,विपुल भव-बासना-बीजहारी। ३।

अशुभ-शुभकर्म-घृतपूर्ण दश वर्तिका,त्याग पावक, सतोगुण प्रकासं।

भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली,अर्पि नीराजनं जगनिवासं ॥ ४ ॥

बिमल ह्रदि-भवन कृत शांति-पर्यक शुभ,शयन विश्राम श्रीरामराया।

क्षमा-करुणा प्रमुख तत्र परिचारिका,यत्र हरि तत्र नहिं भेद-माया। ५।

एहि

आरती-निरत सनकादि,श्रुति,शेष,शिव,देवरिषि,अखिलमुनि तत्त्व-दरसी

करै सोइ तरै,परिहरै कामादि मल,वदति इति अमलमति-दास तुलसी ॥ ६ ॥