पद ५०
देवभानुकुल-कमल-रवि,कोटि कंर्दप-छवि,काल-कलि-व्यालमिव वैनतेयं।
प्रबल भुजदंड परचंड-कोदंड-धर तूणवर विशिख बलमप्रमेयं ॥ १ ॥
अरुण राजीवदल-नयन,सुषमा-अयन,श्याम तन-कांति वर वारिदाभं।
तत्प कांचन-वस्त्र,शस्त्र-विद्या-निपुण,सिद्ध-सुर-सेव्य,पाथोजनाभं ॥
अखिल लावण्य-गृह,विश्व-विग्रह,परम प्रौढ,गुणगूढ़,महिमा उदारं।
दुर्धर्ष,दुस्तर,दुर्ग,स्वर्ग-अपवर्ग-पति,भग्न संसार-पादप कुठारं ॥ ३ ॥
शापवश मुनिवधू-मुक्तकृत,विप्रहित,यज्ञ-रक्षण-दक्ष,पक्षकर्ता।
जनक-नृप-सदसि शिवचाप-भंजन,उग्र भार्गवागर्व-गरिमापहर्ता ॥ ४ ॥
गुरु-गिरा-गौरवामर-सुदुस्त्यज राज्य त्यक्त,श्रीसहित सौमित्रि-भ्राता।
संग जनकात्मजा,मनुजमनुसृत्य अज,दुष्ट-वध-निरत,त्रैलोक्यत्राता ॥ ५ ॥
दंडकारण्य कृतपुण्य पावन चरण,हरण मारीच-मायाकुरंगं।
बालि बलमत्त गजराज इव केसरी,सुह्रद-सुग्रीव-दुख-राशि-भंगं ॥ ६ ॥
ऋक्ष,मर्कट विकट सुभट उभ्दट समर,शैल-संकाश रिपु त्रासकारी।
बद्धपाथोधि,सुर-निकर-मोचन,सकुल दलन दससीस-भुजबीस भारी ॥ ७ ॥
दुष्ट विबुधारि-संघात,अपहरण महि-भार,अवतार कारण अनूपं।
अमल,अनवद्य,अद्वैत,निर्गुण,सर्गुण,ब्रह्म सुमिरामि नरभूप-रूपं ॥ ८ ॥
शेष-श्रुति-शारदा-शंभु-नारद-सनक गनत गुन अंत नहीं तव चरित्रं।
सोइ राम कामारि-प्रिय अवधपति सर्वदा दासतुलसी-त्रास-निधि वहित्रं ॥ ९ ॥