पद 64
श्रीराम-स्तुति · राग बसन्त · पद 64 / 279
बंदौ रघुपति करुना-निधान। जाते छूटै भव-भेद-ग्यान ॥ 1 ॥
रघुबंस-कुमुद-सुखप्रद निसेस। सेवत पद-पंकज अज महेस ॥ 2 ॥
निज भक्त-ह्रदय-पाथोज-भृंग। लावन्य बपुष अगनित अनंग ॥ 3 ॥
अति प्रबल मोह-तम-मारतंड। अग्यान-गहन-पावक प्रचंड ॥ 4 ॥
अभिमान-सिंधु-कुंभज उदार। सुररंजन,भंजन भूमिभार ॥ 5 ॥
रागादि-सर्पगन-पन्नगारि। कंदर्प-नाग-मृगपति,मुरारि ॥ 6 ॥
भव-जलधि-पोत चरनारबिंद। जानकी-रवन आनंद-कंद ॥ 7 ॥
हनुमंत-प्रेम-बापी-मराल। निष्काम कामधुक गो दयाल ॥ 8 ॥
त्रेलोक-तिलक,गुनगहन राम। कह तुलसिदास बिश्राम-धाम ॥ 9 ॥