श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 65

श्रीराम-स्तुति · राग भैरव · पद 65 / 279

राम राम रमु,राम राम रटु, राम राम जपु जीहा।

रामनाम-नवनेह-मेहको,मन! हठि होहि पपीहा ॥ 1 ॥

सब साधन-फल कूप-सरित-सर,सागर-सलिल-निरासा।

रामनाम-रति-स्वाति-सुधा-सुभ-सीकर प्रेमपियासा ॥ 2 ॥

गरजि,तरजि,पाषान बरषि पवि,प्रीति परखि जिय जानै।

अधिक अधिक अनुराग उमँग उर, पर परमिति पहिचानै ॥ 3 ॥

रामनाम-गति, रामनाम-मति, राम-नाम-अनुरागी।

ल्है गये,है,जे होहिंगे, तेइ त्रिभुवन गनियत बड़भागी ॥ 4 ॥

एक अंग मग अगमु गवन कर, बिलमु न छिन छिन छाहैं।

तुलसी हित अपनो अपनी दिसि,निरुपधि नेम निबाहैं ॥ 5 ॥