श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ६७

श्रीराम-स्तुति · पद ६७ / २७९

राम राम जपु जिय सदा सानुराग रे।

कलि न बिराग,जोग,जाग,तप,त्याग रे ॥ १ ॥

राम सुमिरत सब बिधि ही को राज रे।

रामको बिसारिबो निषेध-सिरताज रे ॥ २ ॥

राम-नाम महामनि,फनि जगजाल रे।

मनि लिये,फनि जियै,ब्याकुल बिहाल रे ॥ ३ ॥

राम-नाम कामतरु देत फल चारि रे।

कहत पुरान,बेद,पंडित,पुरारि रे ॥ ४ ॥

राम-नाम प्रेम-परमारथको सार रे।

राम-नाम तुलसीको जीवन-अधार रे ॥ ५ ॥