पद ७१
श्रीराम-स्तुति · पद ७१ / २७९
ऐसेहू साहबकी सेवा सों होत चोरु रे।
आपनी न बुझ, न कहै को राँडरोरु रे ॥ १ ॥
मुनि-मन-अगम,सुगम माइ-बापु सों।
कृपासिंधु,सहज सखा, सनेही आपु सों ॥ २ ॥
लोक-बेद-बिदित बड़ो न रघुनाथ सों।
सब दिन दब देस, सबहिके साथ सों ॥ ३ ॥
स्वामी सरबग्य सों चलै न चोरी चारकी।
प्रीति पहिचानि यह रीति दरबारकी ॥ ४ ॥
काय न कलेस-लेस, लेत मान मनकी।
सुमिरे सकुचि रुचि जोगवत जनकी ॥ ५ ॥
रीझे बस होत,खीझे देत निज धाम रे।
फलत सकल फल कामतरु नाम रे ॥ ६ ॥
बेंचे खोटो दाम न मिलै, न राखे काम रे।
सोऊ तुलसी निवाज्यो ऐसो राजाराम रे ॥ ७ ॥