श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 71

ऐसेहू साहबकी सेवा सों होत चोरु रे।

आपनी न बुझ, न कहै को राँडरोरु रे ॥ 1 ॥

मुनि-मन-अगम,सुगम माइ-बापु सों।

कृपासिंधु,सहज सखा, सनेही आपु सों ॥ 2 ॥

लोक-बेद-बिदित बड़ो न रघुनाथ सों।

सब दिन दब देस, सबहिके साथ सों ॥ 3 ॥

स्वामी सरबग्य सों चलै न चोरी चारकी।

प्रीति पहिचानि यह रीति दरबारकी ॥ 4 ॥

काय न कलेस-लेस, लेत मान मनकी।

सुमिरे सकुचि रुचि जोगवत जनकी ॥ 5 ॥

रीझे बस होत,खीझे देत निज धाम रे।

फलत सकल फल कामतरु नाम रे ॥ 6 ॥

बेंचे खोटो दाम न मिलै, न राखे काम रे।

सोऊ तुलसी निवाज्यो ऐसो राजाराम रे ॥ 7 ॥