श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 73

जागु,जागु,जीव जड़! जोहै जग-जामिनी।

देह-गेह-नेह जानि जैसे घन-दामिनी ॥ 1 ॥

सोवत सपनेहूँ सहै संसृति-संताप रे।

बूड्यो मृग-बारि खायो जेवरीको साँप रे ॥ 2 ॥

कहैं बेद-बुध,तू तो बूझि मनमाहिं रे।

दोष-दुख सपनेके जागे ही पै जाहिं रे ॥ 3 ॥

तुलसी जागेते जाय ताप तिहुँ ताय रे।

राम-नाम सुचि रुचि सहज सुभाय रे ॥ 4 ॥