पद ७३
श्रीराम-स्तुति · पद ७३ / २७९
जागु,जागु,जीव जड़! जोहै जग-जामिनी।
देह-गेह-नेह जानि जैसे घन-दामिनी ॥ १ ॥
सोवत सपनेहूँ सहै संसृति-संताप रे।
बूड्यो मृग-बारि खायो जेवरीको साँप रे ॥ २ ॥
कहैं बेद-बुध,तू तो बूझि मनमाहिं रे।
दोष-दुख सपनेके जागे ही पै जाहिं रे ॥ ३ ॥
तुलसी जागेते जाय ताप तिहुँ ताय रे।
राम-नाम सुचि रुचि सहज सुभाय रे ॥ ४ ॥