श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ७४

श्रीराम-स्तुति · राग विभास · पद ७४ / २७९

जानकीसकी कृपा जगावती सुजान जीव,

जागी त्यागि मूढ़ताऽनुरागु श्रीहरे।

करि बिचार,तजि बिकार,भजु उदार रामचंद्र,

भद्रसिंधु दीनबंधु, बेद बदत रे ॥ १ ॥

मोहमय कुहू-निसा बिसाल काल बिपुल सोयो,

खोयो सो अनूप रूप सुपन जू परे।

अब प्रभात प्रगट ग्यान-भानुके प्रकाश,

बासना,सराग मोह-द्वेष निबिड़ तम टरे ॥ २ ॥

भागे मद-मान चोर भोर जानि जातुधान,

काम-कोह-लोभ-छोभ-निकर अपडरे।

देखत रघुबर-प्रताप, बीते संताप-पाप,

ताप त्रिबिध प्रेम-आप दूर ही करे ॥ ३ ॥

श्रवन सुनि गिरा गँभीर, जागे अति धीर बीर,

बर बिराग-तोष सकल संत आदरे।

तुलसिदास प्रभुकृपालु, निरखि जीव जन बिहालु,

भंज्यो भव-जाल परम मंगलाचरे ॥ ४ ॥