श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ७५

श्रीराम-स्तुति · राग ललित · पद ७५ / २७९

खोटो खरो रावरो हौं,रावरी सौं, रावरेसों झूठ क्यों कहौंगो,

जानो सब ही के मनकी।

करम-बचन-हिये,कहौं न कपट किये, ऐसी हठ जैसी गाँठि

पानी परे सनकी ॥ १ ॥

दूसरो,भरोसो नाहिं बासना उपासनाकी, बासव,बिरंचि

सुर-नर-मुनिगनकी।

स्वारथ के साथी मेरे,हाथी स्वान लेवा देई,काहू तो न पीर

रघुबीर! दीन जनकी ॥ २ ॥

साँप-सभा साबर लबार भये देव दिब्य,दुसह साँसति कीजै

आगे ही या तनकी।

साँचे परौं,पाँऊ पान,पंचमें पन प्रमान,तुलसी चातक आस

राम स्यामघनकी ॥ ३ ॥