पद 76
श्रीराम-स्तुति · पद 76 / 279
रामको गुलाम,नाम रामबोला राख्यौ राम,
काम यहै, नाम द्वै हौ कबहूँ कहत हौं।
रोटी-लूगा नीके राखै,आगेहूकी बेद भाखै,
भलो ह्वेहै तेरो,ताते आनँद लहत हौं ॥ 1 ॥
बाँध्यौ हौं करम जड़ गरब गूढ़ निगड़,
सुनत दुसह हौं तौ साँसति सहत हौं।
आरत-अनाथ-नाथ,कौसलपाल कृपाल,
लीन्हौ छीन दीन देख्यो दुरित दहत हौं ॥ 2 ॥
बूझ्यौ ज्यौं ही,कह्यो,मैं हूँ चेरो ह्वेहौ रावरो जू
मेरो कोऊ कहूँ नाहिं, चरन गहत हौं।
मींजो गुरु पीठ,अपनाइ गहि बाँह,बोलि
सेवक-सुखद,सदा बिरद बहत हौं ॥ 3 ॥
लोग कहै पोच,सो न सोच न सँकोच मेरे
ब्याह न बरेखी,जाति-पाँति न चहत हौं।
तुलसी अकाज-काज राम ही के रीझे-खीझे,
प्रीतिकी प्रतीति मन मुदित रहत हौं ॥ 4 ॥