श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 76

रामको गुलाम,नाम रामबोला राख्यौ राम,

काम यहै, नाम द्वै हौ कबहूँ कहत हौं।

रोटी-लूगा नीके राखै,आगेहूकी बेद भाखै,

भलो ह्वेहै तेरो,ताते आनँद लहत हौं ॥ 1 ॥

बाँध्यौ हौं करम जड़ गरब गूढ़ निगड़,

सुनत दुसह हौं तौ साँसति सहत हौं।

आरत-अनाथ-नाथ,कौसलपाल कृपाल,

लीन्हौ छीन दीन देख्यो दुरित दहत हौं ॥ 2 ॥

बूझ्यौ ज्यौं ही,कह्यो,मैं हूँ चेरो ह्वेहौ रावरो जू

मेरो कोऊ कहूँ नाहिं, चरन गहत हौं।

मींजो गुरु पीठ,अपनाइ गहि बाँह,बोलि

सेवक-सुखद,सदा बिरद बहत हौं ॥ 3 ॥

लोग कहै पोच,सो न सोच न सँकोच मेरे

ब्याह न बरेखी,जाति-पाँति न चहत हौं।

तुलसी अकाज-काज राम ही के रीझे-खीझे,

प्रीतिकी प्रतीति मन मुदित रहत हौं ॥ 4 ॥