श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 81

दीनबंधु, सुखसिंधु, कृपाकर, कारुनीक रघुराई।

सुनहु नाथ ! मन जरत त्रिबिध जुर, करत फिरत बौराई ॥ 1 ॥

कबहुँ जोगरत, भोग-निरत सठ हठ बियोग-बस होई।

कबहुँ मोहबस द्रोह करत बहु, कबहुँ दया अति सोई ॥ 2 ॥

कबहुँ दीन,मतिहीन, रंकतर,कबहुँ भूप अभिमानी।

कबहुँ मूढ, पंडित बिडंबरत,कबहुँ धर्मरत ग्यानी ॥ 3 ॥

कबहुँ देव! जग धनमय रिपुमय कबहुँ नारिमय भासै।

संसृति-संनिपात दारुन दुख बिनु हरि-कृपा न नासै ॥ 4 ॥

संजम,जप,तप,नेम,धरम, ब्रत,बहु भेषज-समुदाई।

तुलसिदास भव-रोग रामपद-प्रेम-हीन नहिं जाई ॥ 5 ॥