पद ८२
श्रीराम-स्तुति · पद ८२ / २७९
मोहजनित मल लाग बिबिध बिधि कोटिहु जतन न जाई।
जनम जनम अभ्यास-निरत चित, अधिक अधिक लपटाई ॥ १ ॥
नयन मलिन परनारि निरखि,मन मलिन बिषय सँग लागे।
हृदय मलिन बासना-मान मद, जीव सहज सुख त्यागे ॥ २ ॥
परनिंदा सुनि श्रवन मलिन भे, बचन दोष पर गाये।
सब प्रकार मलभार लाग निज नाथ-चरन बिसराये ॥ ३ ॥
तुलसिदास ब्रत-दान, ग्यान-तप, सुद्धिहेतु श्रुति गावै।
राम-चरन-अनुराग-नीर बिनु मल अति नास न पावै ॥ ४ ॥