पद 83
श्रीराम-स्तुति · राग जैतश्री · पद 83 / 279
कछु ह्वे न आई गयो जनम जाय।
अति दुरलभ तनु पाइ कपट तजि भजे न राम मन बचन- काय ॥ 1 ॥
लरिकाई बीती अचेत चित, चंचलता चौगुने चाय।
जोबन-जुर जुबती कुपथ्य करि, भयो त्रिदोष भरि मदन बाय ॥ 2 ॥
मध्य बयस धन हेतु गँवाई, कृषी बनिज नाना उपाय।
राम-बिमुख सुख लह्यो न सपनेहुँ, निसिबासर तयौ तिहूँ ताय ॥ 3 ॥
सेये नहिं सीतापति-सेवक, साधु सुमति भलि भगति भाय।
सुने न पुलकि तनु, कहे न मुदित मन किये जे चरित रघुबंसराय ॥ 4 ॥
अब सोचत मनि बिनु भुअंग ज्यो, बिकल अंग दले जरा धाय।
सिर धुनि-धुनि पछिताय मींजि कर कोउ न मीत हित दुसह दाय ॥ 5 ॥
जिन्ह लगि निज परलोक बिगार्यौ, ते लजात होत ठाढ़े ठाँय।
तुलसी अजहुँ सुमिरि रघुनाथहिं,तर्यौ गयँद जाके एक नाँय ॥ 6 ॥