श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 84

तौ तू पछितैहै मन मींजि हाथ।

भयो है सुगम तोको अमर-अगम तन,समुझिधौं कत खोवत अकाथ ॥ 1 ॥

सुख-साधन हरिबिमुख बृथा जैसे श्रम फल घृतहित मथे पाथ।

यह बिचारि, तजि कुपथ-कुसंगति चलि सुपंथ मिलि भले साथ ॥ 2 ॥

देखु-राम-सेवक, सुनि कीरति, रटहि नाम करि गान गाथ।

हृदय आनु धनुबान-पानि प्रभु,लसे मुनिपट, कटि कसे भाथ ॥ 3 ॥

तुलसिदास परिहरि प्रपंच सब, नाउ रामपद-कमल माथ।

जनि डरपहि तोसे अनेक खल, अपनाये जानकीनाथ ॥ 4 ॥