पद 85
श्रीराम-स्तुति · राग धनाश्री · पद 85 / 279
मन! माधवको नेकु निहारहि।
सुनु सठ, सदा रंकके धन ज्यो,छिन-छिन प्रभुहिं सँभारहि ॥ 1 ॥
सोभा-सील-ग्यान-गुन-मंदिर, सुंदर परम उदारहि।
रंजन संत, अखिल अघ-गंजन, भंजन बिषय-बिकारहि ॥ 2 ॥
जो बिनु जोग-जग्य-ब्रत-संयम गयो चहै भव-पारहि।
तौ जनि तुलसिदास निसि- बासर हरि-पद कमल बिसारहि ॥ 3 ॥