श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 86

इहै कह्यो सुत! बेद चहूँ।

श्रीरघुबीर-चरन-चिंतन तजि नाहिन ठौर कहूँ ॥ 1 ॥

जाके चरन बिरंचि सेइ सिधि पाई संकरहूँ।

सुक-सनकादि मुकुत बिचरत तेउ भजन करत अजहूँ ॥ 2 ॥

जद्यपि परम चपल श्री संतत, थिर न रहति कतहूँ।

हरि-पद-पंकज पाइ अचल भइ,करम-बचन-मनहूँ ॥ 3 ॥

करुनासिंधु,भगत-चिंतामनि,सोभा सेवतहूँ।

और सकल सुर,असुर-ईस सब खाये उरग छहूँ ॥ 4 ॥

सुरुचि कह्यो सोइ सत्य तात अति परुष बचन जबहूँ।

तुलसिदास रघुनाथ-बिमुख नहिं मिटइ बिपति कबहूँ ॥ 5 ॥