श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 87

सुनु मन मूढ सिखावन मेरो।

हरि-पद-बिमुख लह्यो न काहु सुख सठ ! यह समुझ सबेरो ॥ 1 ॥

बिछुरे ससि-रबि मन-नैननितें, पावत दुख बहुतेरो।

भ्रमत श्रमित निसि-दिवस गगन महँ,तहँ रिपु राहु बडेरो ॥ 2 ॥

जद्यपि अति पुनित सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो।

तजे चरन अजहूँ न मिटत नित,बहिबो ताहू केरो ॥ 3 ॥

छुटै न बिपति भजे बिनु रघुपति, श्रुति संदेहु निबेरो।

तुलसिदास सब आस छाँडि करि, होहु रामको चेरो ॥ 4 ॥