श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ८८

श्रीराम-स्तुति · पद ८८ / २७९

कबहूँ मन बिश्राम न मान्यो।

निसिदिन भ्रमत बिसारि सहज सुख, जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो ॥ १ ॥

जदपि बिषय-सँग सह्यो दुसह दुख, बिषम जाल अरुझान्यो।

तदपि न तजत मूढ़ ममताबस,जानतहूँ नहिं जान्यो ॥ २ ॥

जनम अनेक किये नाना बिधि करम-कीच चित सान्यो।

होइ न बिमल बिबेक-नीर बिनु, बेद पुरान बखान्यो ॥ ३ ॥

निज हित नाथ पिता गुरु हरिसों हरषि हदै नहि आन्यो।

तुलसिदास कब तृषा जाय सर खनतहि जनम सिरान्यो ॥ ४ ॥