श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ८९

श्रीराम-स्तुति · पद ८९ / २७९

मेरो मन हरिजू! हठ न तजै।

निसिदिन नाथ देउँ सिख बहु बिधि, करत सुभाउ निजै ॥ १ ॥

ज्यो जुवती अनुभवति प्रसव अति दारुन दुख उपजै।

ह्वे अनुकूल बिसारि सूल सठ पुनि खल पतिहिं भजै ॥ २ ॥

लोलुप भ्रम गृहपसु ज्यौं जहँ तहँ सिर पदत्रान बजै।

तदपि अधम बिचरत तेहि मारग कबहुँ न मूढ़ लजै ॥ ३ ॥

हौं हार्यौ करि जतन बिबिध बिधि अतिसै प्रबल अजै।

तुलसिदास बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै ॥ ४ ॥