पद ९०
श्रीराम-स्तुति · पद ९० / २७९
ऐसी मूढ़ता या मनकी।
परिहरि राम-भगति-सुरसरिता,आस करत ओसकनकी ॥ १ ॥
धूम-समूह निरखि चातक ज्यो, तृषित जानि मति घनकी।
नहिं तहँ सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचनकी ॥ २ ॥
ज्यो गच-काँच बिलोकि सेन जड छाँह आपने तनकी।
टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आननकी ॥ ३ ॥
कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि! जानत हौ गति जनकी।
तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पनकी ॥ ४ ॥