श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 91

नाचत ही निसि-दिवस मर्यो।

तब ही ते न भयो हरि थिर जबतें जिव नाम धर्यो ॥ 1 ॥

बहु बासना बिबिध कंचुकि भूषन लोभादि भर्यो।

चर अरु अचर गगन जल थलमें,कौन न स्वाँग कर्यो ॥ 2 ॥

देव-दनुज,मुनि,नाग,मनुज नहिं जाँचत कोउ उबर्यो।

मेरो दुसह दरिद्र, दोष,दुख काहू तौ न हर्यो ॥ 3 ॥

थके नयन, पद, पानि, सुमति, बल, संग सकल बिछुर्यो।

अब रघुनाथ सरन आयो जन,भव,भय बिकल डर्यो ॥ 4 ॥

जेहि गुनतें बस होहु रीझि करि, सो मोहि सब बिसर्यो।

तुलसिदास निज भवन-द्वार प्रभु दीजै रहन पर्यो ॥ 5 ॥