श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 92

माधवजू,मोसम मंद न कोऊ।

जद्यपि मीन-पतंग हीनमति, मोहि नहिं पूजैं ओऊ ॥ 1 ॥

रुचिर रुप-आहार-बस्य उन्ह, पावक लोह न जान्यो।

देखत बिपति बिषय न तजत हौं, ताते अधिक अयान्यो ॥ 2 ॥

महामोह-सरिता अपार महँ, संतत फिरत बह्यो।

श्रीहरि- चरन-कमल-नौका तजि,फिरि फिरि फेन गह्यो ॥ 3 ॥

अस्थि पुरातन छुधित स्वान अति ज्यौं भरि मुख पकरै।

निज तालूगत रुधिर पान करि,मन संतोष धरै ॥ 4 ॥

परम कठिन भव-ब्याल-ग्रसित भयो अति भारी।

चाहत अभय भेक सरनागत, खगपति-नाथ बिसारी ॥ 5 ॥

जलचर-बृंद जाल-अंतरगत होत सिमिटि इक पासा।

एकहि एक खात लालच-बस, नहिं देखत निज नासा ॥ 6 ॥

मेरे अघ सारद अनेक जुग, गनत पार नहिं पावै।

तुलसिदास पतित-पावन प्रभु यह भरोस जिय आवै ॥ 7 ॥