श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ९३

श्रीराम-स्तुति · पद ९३ / २७९

कृपा सो धौं कहाँ बिसारी राम।

जेहि करुना सुनि श्रवन दीन-दुख, धावत हौ तजि धाम ॥ १ ॥

नागराज निज बल बिचारि हिय, हारि चरन चित दीन्हों।

आरत गिरा सुनत खगपति तजि, चलत बिलंब न कीन्हों ॥ २ ॥

दितिसुत-त्रास-त्रसित निसिदिन प्रहलाद-प्रतिग्या राखी।

अतुलित बल मृगराज-मनुज-तनु दनुज हत्यो श्रुति साखी ॥ ३ ॥

भूप-सदसि सब नृप बिलोकि प्रभु-राखु कह्यो नर- नारी।

बसन पूरि,अरि-दरप दूरि करि, भूरि कृपा दनुजारी ॥ ४ ॥

एक एक रिपुते त्रासित जन,तुम राखे रघुबीर।

अब मोहिं देत दुसह दुख बहु रिपु कस न हरहु भव-पीर ॥ ५ ॥

लोभ-ग्राह, दनुजेस-क्रोध, कुरुराज-बंधु खल मार।

तुलसिदास प्रभु यह दारुन दुख भंजहु राम उदार ॥ ६ ॥