श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

गुरु-स्तुति

भाग 7-9 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 7-9 · अध्याय 2 / 14

गुरु-स्तुति

[ 12 ] राग पीलू ताल दीप चन्दी तेरी मेरे स्वामी! यह बाँकी अदा है। कहीं दास है तू, कहीं ख़ुद ख़ुदा है॥1॥ कहीं कृष्ण है तू, कहीं राम है तू। कहीं संगी है तू, कहीं तू जुदा है॥2॥ पिलाया है जब से मुझे जाम तू ने। मेरी आँख में क्या नया गुल खिला है॥3॥ तेरे इश्क़ के बहर में मस्त हूँ मैं। यक़ीं में फ़ना है, फ़ना में बक़ा है॥4॥ मुनज़्ज़ह तेरी ज़ात, तशबीहों से फ़ारेग़। मगर रंग तशबीह का तुझ पर चढ़ा है॥5॥ Notes: 1 अंदाज़, नाज़, 2 प्रेम-रस का प्याला, 3 पुष्प अर्थात् दृष्टि, 4 प्रेम-सागर, 5 हस्ती, अस्तित्व, 6 नेस्ती, नाश, 7 तेरा शुद्ध, पवित्र स्वरूप, 8 प्रमाण, दृष्टान्त, 9 रहित।

राम-वर्षा नज़ारे तेरा 'राम' हर जा पै देखूँ। हर एक जगमग ऐ ज़ान! तेरी सदा है॥6॥ [ 13 ] ❀ सवैया राग धनाश्री ❀ आँखी अदा वे देखो, चाँद का सा मुखड़ा भोलो। (टेक) बादल में बहते जल में, वायु में तेरी लटकें। नागों में नागिनी में, मोरों में तेरी मटकें॥1॥ चलना ठुमक ठुमक कर, बालक का रूप धर कर। तू यश अपर उलट कर, हँसना यह बिजली वनकर॥2॥ सावन में गुल और सूरज, चाकर हैं तेरे पद के। यह आनवान लज्जत, ऐ 'राम'! तेरे खड़के॥3॥ [ 14 ] राग सुमन बल्यान नरज़ बलोचां ज्ञालमान् लगूँ पग आपको ऐ अब प्यारे! अविनाशी सब वाचक शब्द तुम्हारे॥ (टेक) जहाँ गति रूप को न नाम को है। वहाँ गति हों हमारे राम को है॥2॥ Notes: 1 रस्य, दर्शन, 2 गीत, राग, ध्वनि, 3 प्रवाह, ध्वनि, 4 नखरे, अखरे, मुद्रियाँ, 6 वादन का यंत्र विशेष, 7 श्वास, 8 पुष्प, 9 न्योछावर।

वही एक रूप से पी प्रेम-शरबत। नदी जंगल में जा देखे हैं परबत॥3॥ वही एक रूप से नगरों में फिरता। किसी के खोज में डगरों में फिरता॥4॥ अजब माया है तेरी शाहे-दुनिया! कि जिससे है मेरी तेरी यह दुनिया॥5॥ न तुझको पा सका कोई जहाँ में। न देखा जिसने तुझको हर मक़ाँ में॥6॥ तुझे समझा किये सौ कोस अब तक। नहीं समझा मगर अक़्लों से अब तक॥7॥ तू ही है 'राम' और तू ही है यादव। तू ही स्वामी तू ही है आप माधव॥8॥ [ 15 ] ❀ [ ईशावास्योपनिषद् के आठवें मन्त्र का भावार्थ ] ❀ है मुहीतो मनज़्ज़हो वे अब़दाँ। रगो-पै है कहाँ? हमारों हमादाँ॥1॥ वह बरी है गुनाहों से, रिन्दे-ज़मां। बदो-नेक का उसमें नहीं है निशां॥2॥ Notes: 1 संसार के स्वामी, ईश्वर, 2 सर्वव्यापक, 3 शुद्ध, 4 देह रहित, 5 नाड़ी, पट्टा, 6 सर्वदृष्टा, 7 सर्वज्ञ, 8 निर्लिप्त, 9 पाप, 10 पूर्ण मस्त, जीवन मुक्त, 11 पुण्य पाप, 12 खेल मात्र।

( 14 ) राम-वर्षा वह वजूदे-वजूदीं है राहते-जाँ। वह है वालों से वाला व नूरे-जहाँ॥3॥ वही ख़ुद है जुनूँ व तू अज़ मियाँ। दिये उसने अज़लों में है रंग-ओ-शां॥4॥ यही 'राम' है दीदों में सब के निहाँ। यही 'राम' है बहर में बर में अयाँ॥5॥ [ 16 ] राग पीलू ताल दीप चन्दी जो तू है, सो मैं हूँ, जो मैं हूँ, सो तू है। न कुछ आरज़ू है, न कुछ जुस्तजू है॥1॥ (टेक) बसा राम मुझ में, मैं अब राम में हूँ। न इक है, न दो है, सदा तू ही तू है॥2॥ उठा जब कि माया का पर्दा यह सारा। किया राम ख़ुशी ने भी मुझ से किनारा॥3॥ जुबाँ को न ताक़त, न मन को रसाई। मिली मुझ को अब अपनी बादशाही॥4॥ Notes: 1 सर्वोपरि श्रेष्ठ, 2 प्राणियों को सुख देनेवाला, 3 ऊँचा से ऊँचा, 4 संसार का प्रकाश, 5 इच्छायें, 6 स्वर्ग, 7 वर्णन से परे, 8 अनादि काल, 9 नाना नामे-रूप, 10 नेत्रों में, 11 छिपा हुआ, 12 समुद्र, 13 पृथ्वी, 14 विद्यमान, प्रकट, 15 इच्छा, 16 जिज्ञासा, 17 पहुँच। नोट—यह कविता स्वर्गवासी राय बहादुर लाला वैजनाथ की है जो उन्होंने अपने गुरु स्वामी रामजी महाराज को एक पत्र के रूप में लिखकर भेजी थी।

गुरु स्तुति ( 15 ) [ 17 ] साखी या सवैया बैठत राम ही, ऊठत राम ही, बोलत राम ही, राम रह्यो है। खावत रामही, पीवत रामही, गावत रामही, राम कह्यो है॥ जागत रामही, सोवत रामही, जोवत रामही, राम लह्यो है। देतहु राम ही, लेतहु राम ही, सुन्दर राम ही राम रह्यो है॥ [ 18 ] ( राग देव गंधारी महला 1 ) माई गुरु चरणी चित्त लाइये (टेक) प्रभु होय कृपाल कमल प्रकाशे, सदा सदा हर ध्याइये॥1॥ अन्तर एको, बाहर एको, सब में एक समाइये। वर्ते-अवघट रविया सब ठाई, हर पूर्ण ब्रह्म दिखाइये॥2॥ सतत करे सेवक मुनि केते, तेरा अंत न कतहूँ पाइये। दुखदाते दुःखमंजन स्वामी, जन नानक सद्बलि जाइये॥3॥ [ 19 ] श्लोक ( महला 1 ) बलिहारी गुरु अपने, ध्योहाड़ी सदवार। जिन मानस से देवते क़ीये, करत न लागी वार॥1॥ Notes: 1 अन्दर, बाहर, 2 जगह, 3 स्तुति, 4 कितने, 5 कहीं भी, कभी भी, 6 सौ बार न्योछावर जाइये, 7 दिन भर, सौ बार, 8 मनुष्य योनि से।

( 16 ) राम-वर्षा जे सौ चन्दा उगवें, सूरज चढ़ें हज़ोर। तेते चानण होंदियां, गुर बिन घोर अंधार॥2॥ [ 20 ] पौड़ी जिन अन्तर हृदय सुधि है, तिस जनको सभी नमस्कारी नमो। जिस अन्दर नाम निधानै है, तिस जनको हौं बलिहारी॥1॥ जिस अन्दर बुद्धि विवेक है, हरि नाम मुरारी। सो सतगुरु सबनों का मित्र है, तब तिसहि प्यारी॥2॥ सब आत्म-राम पसरिया गुरु-बुद्धि विचारी। Notes: 1 आगे, 2 सौ चन्द्रमा, 3 चढ़ें, उदय हों, 4 इतने, 5 प्रकाश, तेज होने पर, 6 अन्दर, 7 राम नाम का ख़ज़ाना, निधि, 8 मैं, 9 सबका।