श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

वेदान्त

भाग 7-9 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 7-9 · अध्याय 10 / 14

वेदान्त

* आज़ादी * सोहनी, ताल दीपचन्दी बल बे आज़ादी ! खुशी की रूह¹ ! उम्मीदों की जान। बुलबुला सा दम से तेरे पेच खाता है जहान॥ मुल्के-दुन्या के तेरे बस इक फ़साना² पर लड़े। खून के दरया बहाये, नाम पर तेरे मरे॥ हाय मुक्ति ! रस्तगारी³ ! हाय आज़ादी ! निजात⁴ । मक़सदे-जुमला मज़ाहिब⁵ है फ़क़त तेरी ही ज़ात॥ Notes: 1 आनन्द के स्वरूप, 2 खेल, नख़रा टख़रा, 3 छुटकारा, 4 मुक्ति, 5 सब मतों वा धर्मों का उद्देश्य वा लक्ष्य।

उँगलियों पर बच्चे गिनते रहते हैं हफ़्ते¹ के रोज़। कितने दिन को आयेगा यकशम्बह² आज़ादी-फ़रोज़³॥ रम ब्रांडी के मुक़य्यद⁴ सच्ची आज़ादी से दूर। हो गये नशे पै लट्टू, बहरे-आज़ादी-सरूर⁵॥ साहिबो ! यह नींद भी मीठी न लगती इस क़दर। क़ैदे-तन से दो घड़ी देती न आज़ादी अगर॥ क़ैद में फँस कर तड़पता मुर्ग़ है हैरान हो। काश⁶ ! आज़ादी मिले तन को, नहीं तो जान को। लम्हा⁷ जो लज़्ज़त मज़े का था वह आज़ादी का था। सच कहें, लज़्ज़त मज़ा जो था वह आज़ादी ही था॥ क्या है आज़ादी ? जहाँ जब जैसा जी⁸ चाहे करें। खाना पीना ऐश⁹ गुलछर्रों में सब दिन काट दें॥ राग शादी नाच इशरत¹⁰ जलसे रंगारंग करें। बंगले, वास्ते-ख़ाली यौरोपियन¹¹ ढंग के ?॥ क़त्अ¹² टोपी की नयी, फ़ैशन निराला बूट का। दिलकश¹³-बेदाग़ खिलना बदन पर वह सूट का ?॥ दिलको रंगत जिस की भाये शादी¹⁴ बेखटके करें। धर्म की आयतें¹⁵ चुपके ताक पर तो कर धरें ?॥ खच्चरें फ़िटन के आगे कोचवान का पोशपोश। अबलक़ों¹⁶ का बढ़ निकलना, हिनहिनाना जोश जोश॥ Notes: 1 सप्ताह के दिन, 2 रवि-वार, 3 आज़ादी देने वाला, 4 आसक्त कैदी, 5 आज़ादी के आनन्द की ख़ातिर, 6 ईश्वर करे, 7 काव, घड़ी, पल, 8 चित्त, 9 विषय भोग, 10 विषयानन्द, 11 अंग्रेज़ों की तर्ज़ के मकान, 12 वज़ा, तर्ज़ें, 13 चित्ताकर्षक, 14 खुशी, 15 नियम, शास्त्र, 16 घोड़े।

वेदान्त ( 373 ) कोट पैहनाता है नौकर, जूता पैहनाये ग़ुलाम। नाक चढ़ाता है आक़ा, जल्द वेनुतफ़ा हराम !॥ मुँह में पग-पग सोडावाटर और सिगारों का धूँवा। ज़ोफ़ों की दिल में शिकायत, राम की अब जो कहां !॥ क्या यह आज़ादी है ! हाय ! यह तो आज़ादी नहीं। गोयें³-चौगाँ की परेशानी है, आज़ादी नहीं॥ अस्पँ हो आज़ाद सरपट, क़ैद होता है सवार। अस्प हो मुतलक़⁴ इनां, हैरान रोता है सवार॥ इंद्रियों के घोड़े छूटे बाग डोरी तोड़ कर। वह मरा वह गिर पड़ा, अस्वार सिर मुँह फोड़ कर॥ ताज़ी तौसन तुन्दख़ू पर दस्तो-पा जकड़े कड़े। ले उड़ा घोड़ा मिज़ाज, जान के लाले पड़े॥ जानेमन ! आज़ाद करना चाहते हो आप को। कर रहे आज़ाद क्यों हो आस्तीं के साँप को ?॥ हाँ वह है आज़ाद जो क़ादिर है दिल पर जिस्म पर। जिसका मन क़ाबू में है, क़ुदरत है शक़्लो-इस्म पर॥ ज्ञान से मिलती है आज़ादी यह राहत सर बसर। वार के फेंकूं मैं इस पर दो जहां का माल-ओ-ज़र॥ Notes: 1 कमज़ोरी, 2 स्थान, जगह, 3 खेलने वाले गेंद, 4 घोड़ा, 5 पूरा, बिलकुल, 6 अपने वश में अर्थात् लगाम डोरी से क़ाबू किया हुवा, 7 अरबी घोड़ा, 8 बदमिज़ाज, तेज़, 9 हाथ पाँव जकड़े हुए, 10 नाम है, 11 ऐ मेरी जान (प्यारे), 12 बग़ल के साँप को, 13 बलवान, ज़ोरावर, 14 ताक़त, बल, 15 आराम, 16 लगातार, 17 धन, दौलत।

राम-वर्षा ( 374 ) * वेदान्त आलमगीर * [ 327 ] (1) गर कमिशनर हो लाट साहब हो। या¹ कोई और ग़ैर साहब हो॥ हर कोई उस तलक़ नहीं जाता। अधिकारी ही है दख़ल पाता॥ लेकिन जब अपने घर में आना हो। कौन है उस वक़्त जो मानै² हो॥ जब कोई अपने घर को आता है। अफ़्सोस³ उस पर है, रोकता जो है॥ हो जो वेदान्त, ग़ैर से यारी। तब तो कहना बजा था अधिकारी॥ यह तो जी ! अपने घर की विद्या है। पाना इस को फ़र्ज़ सब का है॥ "मैं हूँ ख़ुद ब्रह्म" यह करो अभ्यास। मैं नहीं जिस्मो-इस्मो—नौकर, दास॥ "मैं हूँ बेलौस, पाक, ख़ाला ज़ात"। जैहल⁴ की हो कभी न जिस में रात॥ मैं हूँ ख़ुर्शेद⁵ तेज़ अन्वर⁶ आप। मैं था ब्रह्मा का बाप सब का बाप॥ Notes: 1 किन्तु, 2 मना करने वाला, रोकने वाला, 3 अफ़सोस, शोक, 4 नासीर और नाम, 5 निष्कलंक, केवल, शुद्ध, पवित्र, निर्लिप्त, 6 परम स्वरूप, 7 अविद्या-अज्ञान = सूर्य, 8 प्रकाश स्वरूप।

वेदान्त ( 375 ) देह है मेरा एक ख़राबा। भेद दुन्या का मेरा ख़राबा॥ राम कहता नहीं है सैकिंडहैंड¹। वह तो ख़ुद है श्रुति, न सैकिंडहैंड॥ वह जो कमज़ोर आप होते हैं। लुक्मायें-तीन ताप होते हैं॥ हों न पढ़ाने के जो अधिकारी। उन को मिलता नहीं है अधिकारी॥ (2) एक दफ़ा देव-ऋषि नारद ने। रहम कर खूक² से कहा उस ने॥ "चल, तुझे ले चलेंगे हम बैकुण्ठ। लीला अद्भुत विचित्र है बैकुण्ठ॥ खूक बोला ग़ज़ब से तब नादाँ। क्या मुझे मिल सकेगा कीचड़ वाँ ?॥ जब ऋषी ने कहा "नहीं यह तो"। खूक बोला "मैं जाऊं काहे को !"॥ यह न समझा वहां जो जाऊँगा। जिस्म भी तो नया ही पाऊँगा॥ हविसे-दुन्या³ के प्यारे शहतीरां !। ऐ सतूनहाये दुन्या या बोहतान !॥ तुम न जी में ज़रा भी घबराओ। खटका मुतलक़ न दिल में तुम लाओ॥ Notes: 1 दूसरे से सुनी सुनाई, 2 ग्राम, 3 बराह, सूवर, 4 वहाँ से मुराद है, 5 दुन्या का लालच, 6 भूटे, 7 चित्त।

राम-वर्षा ( 376 ) "हाय ! वेदान्त क्या ही कर देगा। ज़ोर¹ कर देगा, ज़बर² कर देगा॥ तुम रखो अपने जी में इतमीनान³। शक नहीं इस में रत्ती भर तू जान॥ गर अवाज़ तेरे बदल देगा। साथ तुम को भी और कर देगा॥ लोटना छोड़ियेगा कीचड़ में। जालसाज़ी में, झूठ की जड़ में॥ ख़ाक दुन्या की मत उड़ाइयेगा। असल अपना न भूल जाइयेगा॥ "मैं हूँ यह जिस्म", फ़्रोश बोली है। स्वांग छोड़ो, सितम⁴ यह होली है॥ (3) मिस्र की खोद लीं जो मीनारें। हाय ! मुर्दों भरी वह मीनारें॥ ममी मुर्दे उन्हीं में रक्खे थे। ऐसी तरकीबो-अक़्लमन्दी से॥ गो हज़ारों बरस भी हो वीते। मुर्दे आते नज़र हैं ज्यूं जीते॥ प्यारे भारत के हिन्दू वाशिन्दो !। गुस्सा मत करना ज़ाहिदो ! ज़िन्दो !॥ जी रहे हो कि मर गये हो तुम ?। ममी मीनार बन गये हो तुम ? ॥ Notes: 1 नीचा, 2 ऊंचा, 3 धैर्य, हौसला, तसल्ली, 4 ईंट सिंह, अठोस-अठोह, 5 राजन की होली, 6 कर्मकाण्डी, 7 मस्त।

वेदान्त ( 377 ) जीते तुम थे ऋषी मुनी थे जब। ममी क्यों हो हज़ार साल के अब ?॥ क्यों हो ज़िन्दा बदस्ते-मुर्दा आप। नाम रौशन डबोया उन का आप॥ वह तो जीते थे, तुम भी जी उठ्ठो। मुर्दा वस्चे न उन के हो बैठो॥ नाम तो ले रहे हो व्यास का तुम। काम करते हो अदना दास का तुम॥ बेटा वही सपूत होता है। बाप से बढ़ के जो पूत होता है॥ छोड़ दो नाम लेना ऋषियों का। खुद ऋषी हो अगर न अब बनना॥ जब यह कहता है एक नालायक़। "भृगू मेरा बुज़ुर्ग था लायक़"॥ भृगू मनसुबे उस से होता है। शर्म से अश्रु-अश्रु रोता है॥ दुःख मत दो उन्हें सताओ मत। शर्म से सर नगू बनाओ मत॥ नाम-लेवे, अज़व मिले ऐसे। धब्बे यह नाम को लगे कैसे ?॥ मूँछ दाढ़ी लगा के बुढ्ढे की। वरछा बूढ़ा नहीं कभी होगा॥ Notes: 1 जीते जी मौत के हाथ होना, 2 तुच्छ दास, 3 सम्बन्धी, 4 पसीना पसीना रोना, 5 नीचे सिर वाला, 6 नाम लेने वाले।

राम-वर्षा ( 378 ) बस को वाजिब है तरवीयत पाये। वक़्त पर यूँ बुज़ुर्ग ही होगा॥ उनकी डाढ़ी लगाया चाहते हों। तरवीयत से गुरेज़ करते हो॥ है मुनासिब बुज़ुर्ग की ताज़ीम। ख़ेंदावर न चाहिये तकरीम॥ बूढ़ा खाता है खिचड़ी पतली रोटा। नक़ल से कब जवान हो पीरोज़ ॥ प्यारे ! बनियेगा आप ज़िन्दा पीर। उन बुज़ुर्गों की मत बनो तस्वीर॥ नक़्श जब है उतारता नक़्क़ाशी। तकता रहता है असल को नक़्क़ाश॥ नक़्श यह ग़रचे बादशाह का हो। फिर मां मुर्दा है, ख़्वाह किसी का हो॥ फ़ेल अतवार ऋषियों मुनीयों के। ऋषी तुम को नहीं बना सकते॥ अमल ज़ाहिर जो उन को जोश थे। वक़्त था और, और ही दिन थे॥ जिस्म उन के थे जो, उन्हीं के थे। वह तुम्हारे नहीं कभी होंगे॥ करके तक़लीद तुम बना ही हो। सूरते-शेर, नारह क्योंकर हो ?॥ Notes: 1 पालन पोषन, शिक्षा पाना, 2 भागना, 3 हंसते सुख से, 4 दृढ़, 5 बुड्ढा, 6 चित्रकार, 7 कर्म, 8 विधियाँ, 9 और की देखा देखी, बिना विवेचना के किसी की पैरवी करना, या नक़ल करना, 10 गर्ज़।

वेदान्त ( 379 ) आओ तज़वीदा एक बतलायें। ऋषी बनने की बात जतलायें॥ देह सूक्ष्म को और कारण को। चीर कर चढ़िये मेहरे-रौशन को॥ चढ़िये ऊपर को असल अपने को। ज़िंदगी तुम में भी ऋषी की हो॥ मेहरे-रौशन जो आत्मा है तेरा। यह ही वासिष्ठ कृष्ण राम का था॥ उस में निष्ठा, नशस्त कर मुख़्तार। छोड़िये ज़िक्रो-फ़िक्र सब बेकार॥ नक़ल मत कीजिये फ़ेल-वेरूनी। आत्मा एक ही है अन्दरूनी॥ ब्राह्मणो ! आप सीख लो विद्या। फिर यह घर-घर फिरो पढ़ाते जा॥ और क़ौमें तुम्हारे बच्चे हैं। गर शिकायत करें, वह सच्चे हैं॥ ज़बर से, क़ैद से, मुहब्बत से। ज्ञान दीजे उन्हें मुरव्वत से॥ वक़्त उपदेश को अगर दोगे। तो ही क़ायम स्वरूप में होगे॥ गंगा हर वक़्त बहती रहती है। साफ़ निर्मल जभी तो रहती है॥ Notes: 1 प्रकाश स्वरूप सूर्य (आत्मा), 2 बाहर से कर्मों की, 3 सद्भावी या ग़ुस्से से, 4 लिहाज़ से।

काटे बोता है, झूठ हो जिस में। याद रखना है मौत ही उस में॥ * ज्ञान के बिना शुद्धि नामुमकिन * [ 328 ] पिदरे-मजनूँ ने पिदरे-लैली से। गिरया-ज़ारी से आ कहा उसने॥ मेरी सारी रियास्तें लीजे। उमर भर तक ग़ुलाम कर लीजे॥ मेरे लड़के को लैली जादू-चश्म। दीजे, छोड़ दीजे, आख़िर ख़ुशमें॥ पिदरे-लैली ने फिर मुहब्बत से। यूं कहो प्यार ही का दम भर के॥ मैं तो हाज़िर हूँ लैली देने को। उज़ार कोई भी है नहीं मुझ को॥ पर वह आख़िर जिगर का टुकड़ा है। न वह पत्थर शजर का टुकड़ा है॥ वह भी इन्सां-ए-हुक्म से आयी है। आस्मां से न आगिर न आयी है॥ क़ैस तुम को अज़ीज़ा बेशक है। पर वह मजनूँ है, इस में क्या शक है॥ Notes: 1 मजनू (एक प्यारे या आशिक़) का पिता, 2 लैली (प्रिया वा माशूक़ा) का पिता, 3 रोते रोते, 4 जादूभरे नेत्र वाली, 5 गुस्सा, दफ़्तानी, 6 वृक्ष, दरख़्त, 7 मनुष्य के पेट, 8 मजनूँ, 9 पागल।

वेदान्त ( 381 ) ऐसी हालत में लड़की क्योंकर दूँ ?। इक जनूनी के मैं गले मढ़ दूँ ?॥ मज़-मजनूँ का पहले दूर करो। सिर से सौदा अगर काफ़ूर करो॥ शौक़ से लीजे, तब तुम्हारी है। लैली दौलत यह सब तुम्हारी है॥ हाय ज़ालिम, सितमगर ! चे रहा !। वाये नादाँ ग़रूर सूरते-जौश !॥ देता लैली को वाये आज नहीं। और मज़नूँ का तो इलाज नहीं॥ और तो सब इलाज कर हारा। बचता मज़नूँ नहीं वह बेचारा॥ मारा मज़नूँ बग़ैर लैली के। था न चारा बग़ैर लैली के॥ हिन्दू पंडित महात्मा साधो !। जी कड़ा क्यों है ! रहम को राह दो॥ जीव मज़नूँ बना है दीवाना। दश्ते-राह छानता है वीराना॥ दश्ते-दुन्या में बेहुशी आवारह। लैली "आनन्द" के लिये पारह॥ लैली समझे गुलों को चुनता है। फिर पड़ा सिर को अपने धुनता है॥ सर्फ़ को जान कर यह लैली है। Notes: 1 पागलपन, 2 दुःख रूप (तकलीफ़ देने की सूरत वाला), 3 इलाज़, 4 दुन्या के जंगल, 5 बेक़रार, अशान्त, अस्थिर, 6 एक वृक्ष का नाम है।

वैश्ला से जान, अपनी खो दी है॥ चश्मे-आहू' को चश्मे-लैली मान। पीछे भटका फिरे है हो हैरान॥ असली आनन्दे-ज़ात से महरूम। ख़ारो-ख़स में मचा रहा है धूम॥ गाह' आनन्द ज़ार को माने है। बौल' में गाह ख़ाक छाने है॥ लोग कहते न हो बुरा मुझ को। नंग रह जावे, नाक हाथी को॥ राये लोगों की, अहो मुतग़य्यर। इस के पीछे फिरे है मुतहय्यर॥ सारी वहशत, यह वादिया-गर्दी। लैली ख़ातिर है, जुमला सिरदर्दी॥ लैली मिलती जुनूं जायेगा। ब्रह्म-विद्या बिदूं न जायेगा॥ शम दम आयेंगे ब्रह्म-विद्या से। फ़िकर जायेंगे ब्रह्म विद्या से॥ शम हो पहले, ज्ञान पीछे हो। सेर हो लें, तुआम पीछे हो॥ हाये पंडित! अजब यह ढ़ाते हो। उलटी गंगा पड़े बहाते हो॥ Notes: 1 मृगनयन, मृग की आँख, 2 लैली का नेत्र, 3 रहित, बिहीन, बेख़बर, 4 ख़ाक मिट्टी में, 5 कभी, 6 मूत, पेशाब (अभिप्राय विषय भोग), 7 बहकने वाली, 8 आश्चर्यवान, हैरान हुए, 9 पशुपन, 10 जंगलों में घूमना, 11 सब, कुल, 12 पागलपन, 13 बिना, और, 14 तख़्त, सन्तत, 15 भोजन ख़ाना।

यह इसी' पाप का नतीजा है। डूबे दुःखों में आज जाते हो॥ वेद-दानो! यह मौत मत रखना। धीः' को, बुद्धि को घर में मन रखना॥ लड़की घर में न शोवे' देती है। धन पराया फ़रेब देती है॥ ब्रह्म-विद्या का दान अब कर दो। वरना इज़्ज़त से हाथ धो बैठो॥ वक़्त देखो, समय को संभालो। ज़ात क़ायम हो, राय' पलट लो॥ नंगो-नामूस अब इसी में है। बचना ज़िल्लत से बल इसी में है॥ डूबा तारा तुम्हारा पूरब को। ब्रह्म-विद्या चली है यूरप को॥ हिंद मजनूं बना है दीवाना'। तलमलाता है मिसले-परवाना'॥ मुज़दहे-वसल' अब सुना देना। ख़ुशो-ख़ुर्रम' अदा से गा देना॥ वेद का क़र्ज़ यह चुका देना। क़र्ज़ अपना यह कर अदा देना॥ Notes: 1 लड़की रूपी बुद्धि, 2 अच्छी लगती है, 3 शरीर, 4 पागल, 5 पतंग का परवाना, 6 अभेदता (ब्रह्म-साक्षात्कार) की खुश ख़बरी, 7 प्रसन्न मुखड़े से।

[ 329 ] ❋ गुनाह ❋ पाप क्या है? गुनाह कितने हैं। दाख़िले-जैहल' सारे क़ितने' हैं॥ आत्मा जिस्म ही को ठैहराना। भूठा पापों का यह है लगवाना॥ आत्मा पाक', हस्त', बरतर' है। हद्दम-वाहिद', सक़रो-अकबर' है॥ जिस्म' को शाने-आत्मा' देना। रात को आफ़ताब' कह देना॥ किज़बे-बुतलां' यही है पाप की जड़। एक ही जैहल तीन ताप की जड़॥ क्या तकब्बुर' है? किबरयाई'-ऐ-ज़ात (को)। बेच देना द्रोह' जिस्म के हात॥ क्रोध क्या है? जलाले'-वाहिदे-ज़ात (को)। बेच देना द्रोह-जिस्म के हात'॥ क्या है शहवत'? सरूरे-पाके-ज़ात'। बेच देना हक़ीर' जिस्म के हात॥ Notes: 1 अज्ञान में प्रविष्ट, 2 फ़िसाद, झगड़े, 3 शुद्ध, पवित्र, 4 सत्ता मात्र, वास्तविक वस्तु, 5 परम, सर्वोपरि, 6 अद्वैत ज्ञान, 7 घनानन्द, 8 शरीर, देह, 9 आत्मा का पद, 10 सूर्य, 11 झूट मूठ, व्यर्थ झूठ, तुच्छ झूठ, 12 अभिमान, अहंकार, 13 निज स्वरूप की बड़ाई, 14 झूटा शरीर, 15 अद्वैत स्वरूप की महिमा वा रौनक़, 16 हाथ, कर, 17 विषयानन्द, 18 शुद्ध स्वरूप आत्मा का आनन्द, 19 तुच्छ।

क्या अदावत है? पाक वहदते-ज़ात। बेच देना हक़ीर जिस्म के हात॥ हिर्स' क्या! सब पे कब्ज़ा-ए-कुल्ली'-ए-ज़ात। बेचा देना हक़ीर जिस्म के हात॥ मोह क्या है? क्याम-ए-यक़सां' ज़ात। बेच देना हक़ीर जिस्म के हात॥ बल गुनाह क्या है? आत्मा का हक़्क़। जहूल' को छीन देना हक़्क़ नाहक़्क़॥ हस्ते-मुतलक़ का जैहल में संसर्ग'। तोशा' है पाप का, गुनाह का वर्ग'॥ [ 330 ] ❋ कलियुग ❋ सच्चे दिल से विचार कर देखो। तुम ने पैदा किया है कलियुग को॥ "मैं नहीं हूँ ख़ुदा" यह कलियुग है। "जिस्म ही हूँ, यक़ीन यह कलियुग है॥ "जिस्म है आत्मा" यह कलियुग है। चारवाकों का मत, यह कलियुग है॥ Notes: 1 शत्रुता, दुश्मनी, 2 अद्वैत स्वरूप आत्मा, 3 लालच, 4 सर्व व्यापक की मालिकीयत (सर्वव्यापकता) का क़ब्ज़ा वा अधिकार, 5 एक रस स्वरूप की स्थिरता, 6 अधिकार, 7 अविद्या, अज्ञान, 8 व्यर्थ, विषा प्रयोजन, 9 सत-स्वरूप, 10 प्रवेश, दख़ल, 11 भार, अवशेष, बाक़ी, 12 पंथ, फ़िर्क़ा।

खाऊँ, पीऊँ, मज़े उड़ाऊँगा। हाँ विरोचन का मत, यह कलियुग है॥ वंदा-ए-जिस्मैं ही बने रहना। सब गुनाहों का घर, यह कलियुग है॥ जिस्म से घर निशस्त' अपनी दूर। हो जीये' आत्मा में ख़ुद मसरूर॥ जिस्म में गर निवास रक्खोगे। ज्ञान से गर हिरास' रक्खोगे॥ पाप हरगिज़ न छोड़ेंगे, हरगिज़। ताप हरगिज़ न छोड़ेंगे, हरगिज़॥ दूर कलियुग अभी से कीजिएगा। दान दीजिएगा, दान दीजिएगा॥ ठीक कर युग है, यह नहीं कलियुग। दान कर दूर, कीजीये कलियुग॥ हिंद पर गहनें लग गया काला। दाग़ इने से धोल हो चाला॥ [ 331 ] ❋ दान ❋ दान होता है तीन क़िस्मों का। अन्न का, इल्म का, व इरफ़ां' का॥ Notes: 1 असुरों के राजा का नाम है, जो केवल शरीर को आत्मा कर के मानता और पूजता था, 2 शरीर का सहचर, दास, ग़ुलाम वा देहासक्त बने रहना, 3 निष्ठा, स्थिति, 4 हो चाहिये, या हो बैठिये, 5 ज्ञानन्द, मस्त, 6 भय, 7 ग्रहण, 8 आत्म ज्ञान (ब्रह्मविद्या)।

अन्न का दान एक दिन के लिये। जिस्मे-बेहू' को तक़वीयत' देवे॥ इल्म का दान उमर भर के लिये। जिस्मे-रोहम' को कर धनी देवे॥ दान इर्फ़ां का ता अबद' दायम। कर सक़ूरे-अज़ल' में दे क़ायम॥ सब से बढ़ कर तो तीसरा है दान। दान इर्फ़ां का, ज्ञान ही का दान॥ पंडितो! ज्ञान दान दीजिएगा। हिंद में शाम दान दीजिएगा॥ गर यह कलियुग का गहना है चाक़ी। कसर है ज्ञानदान देने की॥ हो बड़ा टल गयी है, वाह वाह वा। हिंद रौशन हुआ है, आहाहा हा॥ जाओ कलियुग, यहीं से जाओ तुम। भागो भारत से, फिर न आओ तुम॥ हुक्मे-नातिक़' है राम का तुम पर। बंधिये बिस्तर को अब उठाओ तुम॥ हिंद ही रह गया है क्या तुम को? आग में, ख़ल में, सिर छिपाओ तुम॥ Notes: 1 नाश (स्थूल) शरीर, 2 पुष्टि, 3 यहाँ अभिप्राय सूक्ष्म शरीर से हैं, 4 नित्य सदा के लिये, 5 अनादि निरानन्द, 6 मदि, आगर, 7 ग्रहण, 8 अटल आज्ञा अर्थात् न टूटने वाला हुक्म।

[ 332 ] ❋ नै ❋ ख़ाली बिलकुल है बांस को यह नै'। चन्द सूराख़दार वेशक़ है॥ बोसा' देता है उस को जब नाई'। निकस छह नै से सात सुर आई॥ रागनी राग सब हुए ज़ाहिर। मुखतलिफ़ भाग सब हुए ज़ाहिर॥ एक ही दम' ने यह सितम ढाया। कलेजा अब वल्लियों' उछल आया॥ सब सुरों में जो मौज मारे है। दम वह तेरा ही कुण प्यारे है॥ दम तो फूँके था एक मुरलीधर। मुखतलिफ़ ज़मज़मे' बने क्योंकर!॥ सामया', वासरां', ख़्यालो-अक़ल। सब में वासिल' हुआ, करे है नक़ल॥ मर्द, औरत, गदा' में, शहों में। कैवकहों, चैहचहों में आहों में॥ क़ुतब' तारे में, मेहर' में, माह' में। झोंपड़े में, महलसरा, राह में॥ Notes: 1 बांसुरी, 2 चुम्बन, चूमना, 3 बांसुरी बजानेवाला, 4 श्वास, फूँकना, 5 कलेजा आनन्द से इतना लहराने लगा कि प्रसन्नता अन्दर न समा सकी, 6 राग, गीत, सुरें, 7 सुनने की शक्ति, 8 देखने की शक्ति, 9 अभेद हुभा, 10 साधु, फ़क़ीर, 11 ध्रुव तारा, 12 सूर्य, 13 चाँद।

एक ही दम का यह पसारा है। सब में वासिल है, सब से न्यारा है॥ दारे-दुन्या' की एक तिही' में। प्राण तेरे ने राग फूँके हैं॥ तू ही नाई है, कुण प्यारा है। सारी दुन्या तेरा पसारा है॥ [ 333 ] ❋ शीश मन्दिर ❋ शीश मन्दिर में एक दफ़ा बुल'-डाग। आ फँसा तो हुआ बगूला आग॥ जौक़ दर जौक़' पलटनें सग' थे। ठट के ठट' लग रहे थे कुत्तों के॥ सख़्त झुँझलाया यह, वह झुँझलाये। चार जानिब' से तैश' में आये॥ बिगड़ा मुँह इस का, वह भी सब बिगड़े। जब यह उछला, वह सब के सब कूदे॥ जब यह भौंका, सदाये-गुम्बज़' से। क्या ही औसां' ख़ता हुए इस के॥ "मैं मरा, मैं मरा" समझ कर वाये। मर गया डाग, सिर को धुन कर वाये॥ Notes: 1 दुन्या का घर, 2 ख़ाली (खोखली) बांसुरी, 3 एक प्रकार का कुत्ता, 4 गिरोह के गिरोह, 5 कुत्ते, 6 झुण्ड के झुण्ड, 7 चारों ओर से, 8 ग़ुस्सा, 9 गुम्बज़ की आवाज़, 10 आश्चर्यमय, घबराहट युक्त से चित्त।

शीश मन्दिर में आ के दुन्या के। दाख़िले-ग़ैर-दान' मरा भौंके॥ वैश्म में क्यों भरमता जाता है। अपने आपे में क्यों न आता है॥ [ 334 ] ❋ दृष्टान्त ❋ गौड़' मालिक मकान का आया। मर्दे-दाना' ने ज़ब्वा' फ़रमाया॥ कर्ये-ज़ोबा' को हर तरफ़ पाया। फ़ुतें-शादी' से सीना भर आया॥ फ़र्शे-अतलस नफ़ीस ख़ाल-दवार। अतरो-अंबर लतीफ़ ख़ुशबूदार॥ तख़्ते-ज़री' पे रेशमी तकिये हैं। गद्दे-मख़मल के जोब देते हैं॥ बैठा तख़्त से जीनते-ख़ाना'। गुद गुदी दिल में, झूमता शाना'॥ जब नज़र चार सू' उठा देखा। कुछ न अपने से मासिवा' देखा॥ गरचे वाहिद' था, पर हज़ारों जा'। जब्वा अफ़ग़न' रुये-सफा' देखा॥ Notes: 1 द्वैत देखने वाला मूर्ख वा अज्ञानी, 2 ईश्वर, 3 ज्ञानी पुरुष, 4 दर्शन दिया, 5 सुन्दर स्वरूप, 6 ज्ञानन्द की अधिकता से, 7 झुनैरी तख़्त, 8 घर को झलक देने वाला स्वस्वरूप, 9 कंधे, 10 तरफ़, 11 इतर, प्रतिरिक्त, 12 अद्वैत, 13 स्थान, 14 प्रकाशमान, 15 शुद्ध स्वरूप।

गाह' मूछों को ताओ दे दे कर। सूरते-वीर-रस' में आ देखा॥ करके शृंगार कंघी पट्टी का। पान होंटों तले दवा देखा॥ तेब' मिसरी के देखने के लिये। प्यारी प्यारी भवें चढ़ा देखा॥ खंदह-गुलों' की दीदे' की ख़ातिर। क्या तहे-दिलें से खिलखिला देखा॥ अग्रे-नैसां' का लुत्फ़ लेने को। तार आंचूं फा भी लगा देखा॥ फेर देखे है जैसे इस तन को। इस तरह उस से ही जुदा देखा॥ अक्सर एक छोड़ असल को आये। सब वजूदों' में फिर समा देखा॥ गोलियां पीली काली सुर्ख़ और सब्ज़। मुँह से अपने निकाल वाज़ीगर॥ आप ही देखता है अपने रंग। आप ही हो रहा है मुतहय्यर'॥ बैठ हर तरह शीश मन्दिर में। ठाठी पट्ठे ने बन बना देखा॥ (सुषुप्ति) मस्त कारण शरीर बन लेटा। चार कुंजों में लेटता देखा॥ Notes: 1 कभी, 2 वीर पुरुष के रूप में, 3 तलवार, 4 खिला हुआ पुष्प, 5 दृष्टि, 6 दिल भर कर, 7 वर्षा ऋतु का बादल, 8 प्रतिबिंब, 9 वस्तुओं (शरीरों) में, 10 आश्चर्य, हैरान।

(स्वपन) ख़ुद जो जिस्मे-ख़्याल को धारा। जुमला आलमे ख़्याल का देखा॥ (जाग्रत) जागी सूरत क़बूल की जब ख़ुद। सब को फिर आगता हुआ देखा॥ तुझ से बढ़ कर हूँ, तेरा अपना आप। मुझ को अपने से क्यों जुदा देखा॥ एक ही एक ज़ाते-वाहिद' रामैं। जुमला सूरत में जा बजा देखा॥ गद्दी, तकिये से मैं नहीं हिलता। हिलता किस ने सुना है या देखा॥ क्यों ख़ुशामद की बात करते हो। शीरो मसनद' मकान ही कब था॥ यह तो सब एक ख़्याली लीला थी। मौज में अपनी आप ज़ाहिर था॥ मौज भी आप, लीला घीला' आप। लाल मुतक़ों'-ज़ुबां, यां पर था॥ मुतक़ में और शब्द में मौजूद। एक वाहिद सफ़ोद रौशन था॥ [ 335 ] ❋ कोहे-नूर का खोना ❋ दोरे-नादिर' हुआ मुहम्मद शाह। देहली उजड़ी ज़लील अवतर-आई॥ Notes: 1 समस्त संसार, 2 अद्वैत तत्त्व, 3 कवि का नाम और ईश्वर से भी मुराद है, 4 गद्दी, तख़्त, 5 खेद इत्यादि, 6 बोलने की शक्ति, जिह्वा, 7 हीरे का नाम, 8 नादिर बादशाह के अधीन, 9 बहुत बुरा।

गर्वे नादिर ने खूब ही ढूँढा। न मिला कोहे-नूर का हीरा॥ कह दिया इक हरीस¹ लौंडी ने। है छिपाया कहाँ मुहम्मद ने॥ "उस को पगड़ी में सी के रखता था। जुदा उस को कभी न करता था"॥ फिर तो बेहद तपाक से आकर। बोला नरमी से, प्यार से नादिर॥ "ऐ शाहे-मेहवाँन् मुहम्मद शाह!। यार भाई है तेरा नादिर शाह॥ पगड़ियाँ आज तो बदल लेंगे। दिल मुहब्बत से खूब भर लेंगे॥ रस्मे-उल्फ़त² अदा³ करो हमसे। यह मुहब्बत वफ़ा करो हम से॥ छुट गयीं गो हवाइयाँ मुँह पर। ज़ाहिर खँदा⁴ से बोला "हां हां" कर॥ "शौक़ से पगड़ी बदलियेगा शाह"!। मारा बेवस रंगीला देहली-शाह॥ थी मुहम्मद को ज़ाहरी इज़्ज़त। यह तबदल⁵ था असल में ज़िल्लत⁶॥ क़ीमते-ममलक़त⁷ से बढ़ कर था। हीरा पगड़ी में उस को खो बैठा॥ Notes: 1 ख्वाहिशी, 2 प्रेम की रीति, रस्म, 3 पूरी करो, 4 ऊपर-से हँस कर, 5 बदलना, 6 खुवारी, 7 सारे राज्य की क़ीमत।

ऐ अज़ीज़ों! यह इज़्ज़तो दौलत। नफ़्स नादिर है, बर सरे-उल्फ़त॥ दामे-तज़वीर¹ में न आ जाना। जाँ न भर में फंस फंसो जाना॥ खिलअते-फ़ाखरा² से हो खुर्सन्द³। खो के हीरा बने हो दौलतमंद॥ चैन पड़ने का है नहीं हरगिज़। अमल हीरे बिना नहीं हरगिज़॥ ज़ाती⁴ जौहर से ज़ाती इज़्ज़त है। शक़्ती माओं-मनी⁵ की हश्त है॥ जब तू फ़ख़रे-खिताब लेता है। आत्मा को अताब⁶ देता है॥ तू क़ीमे-जहाँ है, दाता⁸ है। छोटा अपने को क्यों बनाता है॥ सब को रौनक़ है तेरे अहबे⁷ से। तुझ को इज़्ज़त भला मिले किस से॥ सनद सटीफ़िकेट डिगरी की। आज़ू⁹ में है खेदे-ग़म तन की॥ तू तो माबूद¹⁰ है ज़माने का। खेद मत हो किसी बहाने का॥ Notes: 1 दग़ा, फ़रेब का जाल, 2 गर्व वा मान का हेतु रूप वस्त्र वा पहरावा, 3 प्रसन्न, 4 ज़ाती रत्न, 5 अहंकार और धन इत्यादि, 6 बीज, कारण, 7 हरफ़गी, गुस्सा, क्रोध, 8 संसार का सखी (दाता), 9 प्रकाश, 10 पूजने योग्य, पूजनीय।

[ 335 ] खिताब व नपोलियन बाह रे नपोलियन! नहर शाहे-मर्दें। टिड्डी दल फ़ौज तेरे आगे गर्दें॥ "हालटैं!" कहकर सिपाहे-दुश्मन को। लज़ों कर दे अकेला बशकर को॥ जाँ-बाज़ी में, शेरे-मर्दी में। खुश खुशां वहशते-रामनवर्दी में॥ रोब¹ से और ग़ज़ब की सौलत² से। तू बराबर था हिन्दू औरतें के॥ राजपूतों की औरतों का दिल। न हिले, गरचे कोह³ जाये हिल॥ उन की जानब से शोर को खैलञ्ज⁴। लौक शोहरत के नाम से है रंज॥ पुश्ते-कुशतों⁵ के कर दिये हर सू⁶। खूँ के जूए⁷ भर दिये हर सू॥ मुलक पर मुलक तू ने मार लिया। पर कहो, इस से क्या सँवार लिया!॥ देना चाहता था राज को वुसअत⁸। पर मिली हिस्सो-आज़⁹ को वुसअत॥ Notes: 1 नपोलियन बादशाह के नाम खिताब अर्थात मान पद, 2 खड़े हो जावो, 3 कृपा-देना, 4 ग़म दूर करने के जंगल में, 5 प्रभाव, 6 वृथदवा, डर, 7 स्त्री, 8 पर्वत, 9 बुलावा मुक़ाबल करने वास्ते, 10 सरे हुयों के ढेर, 11 हर तरफ, 12 नदियें, नैहरें, 13 विस्तार, विशालता, 14 लाभच, लोभ, आशा।

दिल तो वैसा ही रह गया प्यासा। जैसा जंगे-जदल¹ से पहिले था॥ [ 337 ] सीज़र ऐ शहनशाहे-जूलयस सीज़र!। सारी दुन्या का तू बना अफ़सर॥ इतना क़िस्से को तूल क्यों खींचा। दिल ज़िमीं में फ़ज़ूल क्यों खींचा?॥ ऐसा दिल में रहा तअज्जुब² खेदा। खदशा³ पेहलू में, मौजे-दर्दे-अंगेज़⁴॥ आ! तेरी मंज़लत⁵ को बढ़ायें। हिन्दू-ए-कैवान्⁶ से भी परे जायें॥ क्यों न इतना भी तुम को सूझ पड़ा। जिस में शै⁷ आये वह है शै से बड़ा॥ जुज़्व⁸ कुल⁹ से हमेशा छोटा है। छोटा कमरे से बक्स-व-लोटा है॥ जबकि तुझ में जहान आता है। आँख में बहरो-बर¹⁰ समाता है॥ कोहो दरया-ओ-शहरो स्वहरा¹¹ वाग़। बादशाहो-गदा-ओ-बुलबुलो-ज़ाग़¹² ॥ Notes: 1 लड़ाई, 2 रूम के बादशाह का नाम, 3 अश्वयं बढ़ाने वाला, 4 दर, 5 दर्द देने वाली छैहर, 6 पद, 7 शनी तारे के सिरे से भी दूर, 8 वस्तु, 9 टुकड़ा, अंश, 10 अंश, सालम, 11 पृथ्वी और समुद्र, 12 जंगल, 13 कौवा, काक।

हम में और शाकुर¹ में तेरे। ज़र्रे से चमकते हैं बहुतेरे॥ खुद को महदूद² क्यों बनाते हो। मंज़ल अपनी पड़े घटाते हो?॥ तुझ में छोटे बड़े समाये हैं॥ तू बड़ा है, यह जिस में आये हैं॥ मुलके-सरसब्ज़ और ज़मीं शादाब³। हैं, शुआ⁴ में तेरी सुरावो-आब⁵॥ शम्स⁶ मर्कज़⁷ नज़ामे-शमसी⁸ का। है नहीं, तू है आधा सब का॥ नूर तेरे ही से जिया लेकर। मिहर⁹ आता है, रोज़ चढ़ चढ़ कर॥ अपनी किरणों के आब में खुद ही। डूब मत मर सुराब में खुद ही॥ जान अपने को गर लिया होता। क़ब्ज़ा आलम पै झट किया होता॥ सल्तनत में मती¹⁰ चरिन्द व परिन्द। राजे महाराजे होते जाहद-वग़रिंद¹¹॥ ज़ात में हल¹² दिल किया होता। हल उक़द्दह¹³ को यूं¹⁴ किया होता॥ Notes: 1 समझ, ज्ञान, 2 परिच्छिन्न, 3 खुश, आनन्ददायक पृथिवी, 4 किरण, 5 मृगतृष्णा का जल, 6 सूर्य, 7 केन्द्र, 8 आकाश के तारे आदि का इन्तज़ाम, 9 प्रकाश, 10 सूर्य, 11 अधीन, सेवक, 12 परहेज़गार और मरस अथवा कर्मकाण्डी और विरक्त, 13 एकाग्र, तीन, 14 गुप्त भेद, गुप्त रहस्य।

हाथ में खड़्ग हो कि खण्डा हो। कलम हो या वलन्द¹ खण्डा हो॥ खुदा अपने को इन से जानते हैं। इन के टूटे रज़ न मानते हैं॥ आप का शूरवीर इस तन से। जुदा माने हैं जैसे आवन² से॥ गर बढ़ा से यह जिस्म छूट गया। क्या हुआ गर क़लम यह टूट गया॥ तू है आज़ाद, है सदा आज़ाद। रंजो-ग़म कैसा? असल को कर याद॥ ऐ ज़मां³? क्या यह तुम में ताक़त है!। ऐ मकां! तुझ ही में लियाक़त है?॥ कर सका क़ैद मुझ को, मुझ का क़ैद। पड़क से तुम हो कलज़दम⁴ नापैद⁵॥ फ़िक्र के पाप के, बड़े धूप⁶। गर कभी हम से आन कर उलझे॥ पुर्जों पुर्जों अलग हुए दर के। धज्जियाँ जिह्ल⁷ की उड़ीं दर से॥ [ 339 ] शाहे-ज़मां को वरदान क़ैसरे-हिन्द! बादशाह दाबर। आगता है सदा शाहे-अख़बर¹॥ Notes: 1 सोहा, 2 काल, 3 देश, 4 नाश, 5 झूठा, मिथ्या, 6 भ्रज्ञान, 7 ज्ञाने अर्थात् वर्तमान समय के बादशाहों को वरदान, 8 मुनसफ़, न्याय कारी, 9 सूर्य का बादशाह अर्थात् सूर्य।

राज पर तेरे मघरखो-मशरक़¹। चमकता है सदा शाहे-मशरक़॥ शाहे-मशरक़ की प्रभु विद्या है। रानी विद्याओं की यह विद्या है॥ जाहे-ज़ाती² रहे क़रीब तुम्हें। शाह हुक्मों का हो नसीब तुम्हें॥ नूर³ का कोह⁴ दमाग में हमके। हिंद का नूर ताज पर चमके॥ तेरे फ़िक्रो-ख़याल के पीछे। शीरीं चश्मा⁵ अजीब बहता है॥ यह ही चश्मा था व्यास के अन्दर। ऐसा अहमद इसी में रहता है॥ इस ही चश्मे से वेद निकले हैं। इल ही चश्मे से कृष्ण कहता है॥ चलिये आबे-हयात⁶ वहां पीजे। दुःख काहे को पार सहता है?॥ पिछले ॠषियों ने इसी चश्मे से। बढ़े भर भर के आब⁷ के रफ्ते॥ दुन्या पलटे, ज़माना बदलेगा। पर यह चशमा सदा हरा होगा॥ मिहर⁸ डूबेगा, कुतुब⁹ टूटेगा। पर यह चशमा सदा हरा होगा॥ Notes: 1 सूर्य, 2 स्वरूप की विभूति वा पदवी, 3 प्रकाश, 4 पर्वत, यहां कोहेनूर (ज्ञान के हीरे) से अभिप्राय है, 5 मीठा सरोवर, 6 अमृत, 7 जल, यहां अमृत से अभिप्राय है, 8 सूर्य, 9 ध्रुव तारा।

रस्मो-मिल्अत¹ तो होंगे मलिया मेर। पर यह चशमा सदा हरा होगा॥ ऐसे चशमे से भागते फिरना। बासी पानी को ताकते फिरना॥ तिशनह² रखेगा बहरे-खातरे-आब³। जा बुझा आग तापते फिरना॥ राम को मानना नहीं काफ़ी। जानना उसका है फ़क़त शाफ़ी⁴॥ वर्कले, कैंट, मिल्ल, हैमिलटान्। जुस्तजू में तिरी है सरगर्दान्॥ बाईबल, वेद, शास्त्र, कुरआन। भाट तेरे हैं, ऐ शाहे-रह्मान!॥ अपनी अपनी लियाक़तें ले कर। तर ज़ुवानों गा रहे हैं तेरी शान॥ मदाह⁵ हज़ां⁶ शायरों को दो इनआम्। वक्षे-दरवारे-खासो-जलसा-ए-आम॥ [ 336 ] आनन्द अन्दर है सग⁷ ने हड्डी कहीं से इक पाई। शोरे-नर देख फिकर यह आई॥ Notes: 1 रस्म रिवाज, 2 प्यासा, 3 जब अर्थात् अमृत के लिये, 4 आराम देने वाला, पाप से मुक्त करनेवाला, 5 यह सब यूरप के फ़िलास्फ़रों (तत्व वेत्ताओं) के नाम हैं, 6 तालाश, 7 भटकते फिरते, 8 कृपालु महाराजा, 9 मीठी वाणी से, 10 स्तुति करने वाले, 11 कुत्ता।

कि कहीं मुझ से शोर छीन न ले। हड्डी इक उस से शोर छीन न ले॥ लेके मुँह में उसे छुपा कर वह। भागा खाई¹ को दुम दबा कर वह॥ अज़म² चुमती थी मुँह में जब रग को! खून लगता लंज़ीज़ था सग को। मज़ा अपने लहू का आता था। पर वह समझा मज़ा है हड्डी का॥ शोरे-नर, बादशाहे तन्हा-रो³। हड्डी मुर्दे हों हर तरफ सौ सौ॥ वह तो न आँख भर के तकता है। सगे-नादों⁴ का दिल धड़कता है॥ स्वर्गं की नेमतें हों, दुन्या की। हैं तो यह हड्डियाँ ही मुर्दे की॥ इन में लज़्ज़त जो तुम को आती है। दर असल एक आत्मा की है॥ ऐ शहनशाहे-मुलक! ऐ इन्दर!। छीनता वह नहीं यह जगे-गौहर⁵॥ राज दुन्या का और स्वर्गं-बहिश्त। बापो-गुलज़ारो-संगमरमरे-खिश्त⁶॥ नेमतें यह तुम्हें मुबारक हों। बारे-ग़म⁷, यह तुम्हें मुबारक हों॥ Notes: 1 खंदक़, 2 हड्डी, 3 अकेला चलने वाला राजा, 4 सूने कुत्ते, 5 स्वर्ण (धन) और मोती, 6 संगमरमर की ईंटें, 7 ग़म का भार।

देखना यह तुम्हारे मकबूज़ात¹। कवदा करते हैं क्या तुम्हारी ज़ात॥ जाने-मन! नूरे-ज़ात ही का नाथ²। फ़ौज रखता नहीं है सूरज साथ॥ जो ग़नी³ ज़ात में हैं हीरो-वीर। जल्वागर दर वजूदे-वर⁴ ना पीर॥ सब दहानों⁵ से वह ही खाता है। स्वाद खाने भी बन के आता है॥ "यह हूँ मैं", "यह हो तुम", यह असलीयत। मोजज़ह⁶ है तिरा, न असलीयत॥ सुबरो-अशकाल⁷ सब करामत⁸ है। मेरी क़ुदरत की यह अलामत⁹ है॥ [ 340 ] सकन्दर को अवधूत के दर्शन क्या सकन्दर ने भी कमाल किया। गुलगुला¹⁰ शोरो-शर का हाल दिया॥ वर लबे-आब¹¹ सिन्ध जब आया। डट गया फ़ौज लेके, शिह्लाया॥ उन दिनों एक सालिके-मालिक¹³। से मुलाक़ी¹⁴ हुआ, रहा हक्दक्॥ Notes: 1 मालिक, 2 अमीर, 3 बहादर योधा, 4 युवक, 5 मुँहों, 6 द्वैत, 7 क़रामाव, 8 शक्लें, सूरतें, नाम रूप, 9 महिमा, विभूति, 10 चिह्न, पता, निशां, 11 वलवला, शोर इत्यादि, 12 दरिया सिन्ध के किनारे, 13 ईश्वर-भक्त, विरक्तात्मा वा मस्त पुरुष, 14 मिला, दर्शन किये।

क्या अज़ब था फ़क़ीर आलमगीर। क़लब¹ साफ़ी मिसाले-गंगानीर²॥ उस की सूरत जमाले-सुरयानी³। गुफ्तगू में जलोए-उरयानी⁴॥ बस स्वामी ने कुछ न गिरदाना⁵। ज़ोरो-ज़ारी-ओ-ज़र से फुसलाना॥ शीशा आयीनागर⁶ को दिखलाया। दंग जूँ आयीना वह हो आया॥ रह के शहंदर वह बादशाहे-जहाँ। बोला साधू से सूरते-हैरान्॥ हिंद में क़दर न परखते हैं। हीरे को लीथड़ों में रखते हैं॥ चलियेगा साथ मेरे यूनां को। क़दम रंजा⁷ करो मेरे हां को॥ [ 341 ] अवधूत का जवाब क्या ही मीठी ज़ुबान से बोला। रास्ती⁸ पर कलाम को तोला॥ कोई मुझसे नहीं है ख़ाली जा⁹। पूर पूरण, ज़रा नहीं हिलता॥ Notes: 1 शुद्ध अन्तःकरण, 2 गंगा जल के समान, 3 अत्यन्त सुन्दर भरी, 4 वैभव स्पष्ट हो रहा था, महिमा फूट रही थी, 5 समझा, 6 ज़बरदस्ती, बहलाना, भय और धन का लालच, 7 सकन्दर की उपाधि है, 8 देश का नाम, 9 पधारियेगा, चलियेगा, 10 सच्चाई, 11 जगह, स्थान।

जाऊँ आऊँ कहाँ किधर को मैं ?। हर मक़ाँ¹ मुझ में, हर मक़ाँ में मैं ॥ यह जो लाहूत² से निदा³ आई। यवन⁴ बेचारे को नहीं भाई ॥ फिर लगा सिर झुका के यूँ कहने। इस के समझा नहीं हूँ मैं मयने⁵ ॥ "मुशको-काफ़ूर, अतरो-अम्बर चू। अस्पो⁶-गुलज़ार, नाज़नी⁷-खुशरू ॥ सीमो-ज़र⁸, ख़िलअतों⁹-समा¹⁰-ओ-ख़ोद। मेवे हर नौ¹¹ के, आबशारो-रवद¹² ॥ यह मैं सब दूंगा आप को दौलत। हर तरह होगी आप की ख़िदमत ॥ चलियेगा साथ मेरे यूनाँ को। "चल मुबारक करो मेरे हाँ को" ॥ मस्त मौला से तब यह नूर झड़ा। आस्मां से सितारह टूट पड़ा ॥ "झूठ झूठों ही को मुबारक हो। जैहल¹³ नीचे दबे जो तारक¹⁴ हो ॥ मैं तो गुलशन हूँ, आप खुद गुलरेज़¹⁵। खुद ही काफ़ूर, खुद ही अम्बर¹⁶-रेज़ ॥ Notes: 1 देश, 2 वज़ धाम, मस्त स्वरूप, 3 आवाज़, 4 सकन्दर से अभिप्राय है, 5 अर्थ, तात्पर्य, 6 घोड़े और वग़ा, 7 सुन्दर स्त्री, प्रिया, 8 चाँदी सोना, 9 उत्तम वस्त्र, 10 राग रंग, 11 हर प्रकार, 12 बहते हुए झरने, 13 मस्त फ़क़ीर फिर यूँ बोला, 14 अज्ञान, अविद्या, 15 अन्धकार अथवा भ्रान्ति, 16 फूल भरी, पुष्पों के गिरानेवाला, 17 अम्बर सजानेवाला अर्थात् खुशबू वाला।

सोने चांदी की आबो-ताब¹ हूँ मैं। गुल की बू मस्ती-ए-शराब हूँ मैं ॥ राग की मीठी मीठी सुर मैं हूँ। दमक हीरे की, आबे-दुर मैं हूँ ॥ खुश मज़ा सब तआम² में है मुझ से। अस्प की खुश ख़राम³ है मुझ से ॥ रक्स⁴ है आबशार⁵ का मेरा। नाज़ो-दुशवह⁶ है यार का मेरा ॥ ज़ुल्फ़े वक्र सुनैहरी ताज तेरा। मेरा मोहताज है, मोहताज मेरा ॥ चान्दनी मुस्तआर⁷ है मुझ से। सोना सूरज उधार ले मुझ से ॥ कोई भी शै⁸ जो तेरे मन भाई। मैंने लज़्ज़त अता⁹ है फ़रमाई ॥ दे दिया जब फिर बस का लेना क्या। शाहे-शाहां को यह नहीं ज़ेबा¹⁰ ॥ करके बख़्शिश मैं वापस¹¹ क्यों लूंगा ?। फेंक कर थूक चाट क्यों लूंगा ॥ प्रकृति को तो ईद¹² मुझ से है। मांगू अब मैं, बईद¹³ मुझ से है ॥ Notes: 1 चमक दमक, 2 खुराक, भोजन, 3 उत्तम चाल, 4 नृत्य, 5 पानी का झरना, 6 नाज़ नखरे, 7 मांगी हुई आरोपित, 8 वस्तु, 9 बख्शिशी, 10 ठीक उचित, 11 फिर वापस, 12 आनन्द मंगल वा बड़ाई, 13 दूर, अनुचित।

खुद खुदा हूँ, सफ़रे-पाक हूँ मैं। खुद खुदा हूँ, गफ़ूरे-पाक हूँ मैं ॥ ऐसा वैसा जवाब यह सुन कर। भड़क उठा राजव से असकन्दर ॥ चेहरा गुस्से से तमतमा आया। खूने-रग जोश मारता आया ॥ खैंच तलवार तान ली झट पट। "जानता है मुझे तू ऐ नट खट !" ॥ शाहे-जी, शाहे-मुल्के-दारा जम¹। मैं हूँ शाह सकन्दरे-आज़म² ॥ मुझ से गुस्ताख़ गुफ्तगू करना। भूल बैठा है क्यों अभी मरना ? ॥ काट डालूं सिर तेरा तन से। ज़रबे शमशेर से अभी दन से ॥ देख कर हाल यह सिकन्दर का। साधु आज़ाद खिलखिल के हँसा ॥ "किज़ब³ ऐसा तू ऐ शहनशाह !। उमर भर में कभी न बोला था ॥ मुझ को काटे ! कहां है वह तलवार ?। दोग़ दे मुझ को ! है कहां वह नार⁴ ?॥ हां गलायेगा मुझे ! कहां पानी ?। बाद⁵ सुखा ही ले ! मरे नानी ॥" Notes: 1 शुद्ध आनन्द, 2 शुद्ध अहंकार वा शुद्ध आत्मा, 3 जमशेद और दारा के मुल्कों का बड़े भारी वा मान वाला बादशाह, 4 सब से बड़ा, 5 तुरन्त, 6 झूठ, 7 अग्नि, 8 वायू।

मौत को मौत आ न जायेगी। इरदा¹ मेरा जो करके आयेगी ॥ बैठ बालू में बच्चे गंगा तीर। घर बनाते हैं शाद या दिलगीर ॥ फ़र्ज़ो करते हैं रेत में खुद घर। यह रहा गुम्बज़-व-इधर है दर² ॥ खुद तसव्वर³ को फिर मिटाते हैं। खाना⁴ आपना वह आप ढाते हैं ॥ बच्चा का घर बना था बच्चा मित्रा। बालू था बाद⁵ में जो पैहिले था ॥ रेग सुघरा था, नौ ख़राब हुआ। फ़र्ज़ो पैदा हुआ था खुद बिगड़ा ॥ राफ़्त तू उस जुवान् से सुनता है। पर पड़ा आप जाल बुनता है ॥ तू जो समझा यह जिस्म मेरा है। फ़र्ज़ो तेरा है, फ़र्ज़ो तेरा है ॥ सिर यह तन से अगर उड़ा देगा। फ़र्ज़ो अपने ही को तू गिरा देगा ॥ रेत का तो न⁶ कुछ बुरा होगा। खाना⁷ तेरा खराब ही होगा ॥ मेरी वुसअत⁸ को कौन पाता है। मुझ में अर्ज़ो-समा⁹ समाता है ॥ Notes: 1 इरादा, 2 द्वार, 3 कल्पना वा काल्पित, 4 घर, 5 पीछे, 6 नहीं, 7 घर, 8 सीमा, विशालता, 9 पृथ्वी-आकाश।

ताज जूते के दरम्यान् चाक्या। मैं नहीं हूँ, न तू है जां ! वाक्या ॥ इतना थोड़ा नहीं हदूद-अवां¹। पगड़ी जोड़ा नहीं हदूद-अवां ॥ अपनी हस्तक यह क्यों करी तुमने ?। बात मानी मेरी बुरी तुम ने ? ॥ क्यों तनक² कर दिया है आत्म को। एक जौहड़³ बनाया कुलज़म⁴ को ॥ खुद तो मग़लूब⁵ तुम राजव के हो। शाहे-ग़ज़ब⁶ से भी अड़ते हो ॥ गुस्सा मेरा गुलाम तुम उसके। बन्दा-ए-बन्दगां⁸, रहो बच के" ॥ गिर पड़ी शाह के हाथ से शमशेर। निगाहे-आरफ़ी⁹ से हो गया वह ज़ेर ॥ क्या अज़ब ! यह तो ज़ेरे-आख़तह¹⁰ तेग़¹¹। गरजता था साहो बारां मेघ¹² ॥ शाह के दीदा-ग़ज़ब¹³ को जूं मादर¹⁴। नाज़ तिफ़लक¹⁵ का जानता था गर ॥ और वह शाह सकन्दरे-रूमी। बात छोटी से हो गया ज़ख़्मी ॥ Notes: 1 सीमा, चौहद्दी, 2 तुच्छ, छोटा, नाचीज़, 3 तालाब, छप्पर, 4 समुद्र, 5 अधीन, वश में आये हुये, 6 गुस्सा, भारी, 7 काभ क्रोधादि को वश में रखने वाला बादशा, 8 नोकरो के नौकर, 9 ज्ञानवान् की दृष्टि से, 10 अधीन, नीचे, शर्मिन्दा, 11 खैंची हुई तलवार के तले, 12 बर्षा वाले बादल के समान, 13 गुस्से, क्रोध को, 14 माता के समान, 15 बच्चे का खेल, नखरा।

पास उस वक़्त अपनी इज़्ज़त का। हर दो जानब को एक जैसा था ॥ लैक¹ शाह को थी जिस्म में आनर²। शाहे-शाह³ का था आत्मो में घर ॥ क़िला मज़बूत उस का ऐसा था। ऊँचे सूरज से भी परे ही था ॥ कर सके कुच्छ न तीर की बूछार। खाली जाये बन्दूक़ की भर मार ॥ इस जगह ग़ैर⁴ आ नहीं सकता। यहां से कोई भी जा नहीं सकता ॥ इस बलन्दी से सरफ़राज़ी से। क़िला ए-मज़बूत शेरे-ग़ाज़ी से ॥ यह ज़मीन और इस के सब शाहान्। तोरा सां, ज़र्रइ⁵ सां, कि नुक्ता सां ॥ नुक्ता मौहूम⁶ वन, हुये नाबूद⁷। एक वहदत⁸ हूँ, हस्तो-नाशदो-बूद⁹ ॥ उड़ गये जू सपाहे-तारीकी¹⁰। ताब किस को है एक झांकी की ! ॥ हर-आलम¹¹ पै जम गया सिक्का। शाहे-शाहां हूँ, शाहे-शाहां शाह ॥ Notes: 1 परन्तु, लेकिन, 2 इज़्ज़त, 3 यहां मुराद है फ़क़ीर से, 4 अन्य, दूसरा, 5 परमाणु, 6 कल्पित, 7 मिथ्या, अस्त, 8 अद्वैत, 9 है, होगा, था, वर्तमान भविष्य, भूत, 10 अनन्तकार की सेना ( अर्थात् तारों ) के समान, 11 समस्त संसार।

पहले हैयत¹ ने भी पढ़ा होगा। नुक्ता क्या खूब यह रियाज़ो² का ॥ जबकि लाजुब एक सिनारे का। बेहत में हो हसाब या लेखा ॥ सिफ़र सां यह ज़मीने-पेचां-पेच³। हेच⁴ गिन्ते हैं, हेच मुतलक⁵ हेच⁶ ॥ अब कहो जाते-बैहत के होते। क्यों ना अजसाम⁷ जान को रोते ? ॥ [ 342 ] ❀ जिस्म से बैतऽल्लुक़ी ❀ ( देहाध्यास रहित अवस्था ) बादशाह एक कहीं को जाता था। उस तरफ़ से फ़क़ीर एक आता था ॥ बादशाह को घमंड ताज का था। मस्त को अपनी ज़ात⁸ का था ॥ मस्त चलता था चाल मस्ती की। राह न छोड़ा सलाम तक न की ॥ बादशाह तुर्श⁹ होके यूं बोला। "सख़्त मग़रूर शोख़ गुस्ताख़ !॥" Notes: 1 नजूमी, ज्योतिष के जानने वाले, 2 अभ्यास, 3 पेचदार पृथिवी, 4 तुच्छ, 5 नितान्त, 6 शुद्ध स्वरूप, 7 शरीर, नाम रूप, 8 निजात्मा, 9 कड़वा होकर।

बादशाह हूँ, तुझे सज़ा दूंगा। जिस्म तेरा अभी जलवाऊंगा" ॥ तिस पै मौला कर्बीरे¹ आलीजाह²। शाहे-शाहां फ़क़ीर लापरवाह ॥ जिस का मुवद्दा-ओ-कुतब्र³ आत्म था। महवरे-गुफ्तगू⁴ भी आत्म था ॥ जिस्म पोयन्ट⁵ से कुछ न करता था। आत्मा ही था, नूर झरना था ॥ पास धक धक जले थी इक भट्टी। रांग उसमें फ़क़ीर ने धर दी ॥ तब मुख़ातब⁶ हो शाह से बोला। नक्शो-तस्वीर ! शेरे-क़ितआसा⁷ !॥ मैं हूँ क़ितआस⁸, उस पै तू तस्वीर। ज़ाते-असली हूँ, फ़र्ज़ी है तस्वीर ॥ नक्श दावा करे, तकव्यर⁹ है। ज़िबराई मेरी तो अज़हर¹¹ है ॥ जिस्म के इतवार ही से सही। मैं हूँ आज़ाद उस तरह से भी ॥ क़तल करने का इख़्तियार है तेरा। झिड़कना इख़्तियार है मेरा ॥ Notes: 1 महान्, 2 बड़े पद वा रुतबे वाला, परम पूज्य, 3 शुद्ध और आश्रय, अथवा आदि और अन्त, 4 धुरा अर्थात् वार्ता का आधार, 5 शरीर के लिहाज़ या दृष्टि से, 6 सन्मुख मुँह करके, 7 ऐ काग़ज़ के शेर ! दकाग़ज़, 8 अहंकार, 9 बड़ाई, महत्व, 11 स्पष्ट, ज़ाहर, विद्यमान, प्रकट।

क़तलो-धमकी¹ का गर्म है बाज़ार। सौदा मेरा है, मैं हूँ ख़ुतमुख़तार ॥ जान लेना नहीं तेरे बस में। तेरी तस्बीह² है मेरे बस में ॥ तू जलायेगा, दर्द क्या होगा ?। देख ले, पैर जल गया सारा ॥ इस से बढ़ कर तू सज़ा³ क्या देगा। मेरा इक बाल भी न हो वींका ॥ आग में डाल दे, तू इस⁴ तन को। ख़्वाह शोलों में डाल उस⁵ तत को ॥ दोनों हालत में मुझ को यक्सान् है। कुच्छ न बिगड़ा न बिगड़ सकता है ॥ तुम से बढ़ कर तुम्हारा अपना आप। मैं हां तुम हूँ, न तुम हो अपना आप ॥ आग मेरा ही इक तजल्ला⁶ है। रोब⁷ तेरा भी ज़ोर मेरा है ॥ मुझ में सब जिस्म बुलबुले से हैं। एक टूटेगा और क़ायम⁸ हैं ॥ साधू जब कर रहा था यह तक़रीर। शाह का दिल होगया वहीं नखचीर⁹ ॥ दस्त बस्ता¹⁰ खड़ा हुआ आगे। सायीं ! आरफ़¹¹ है आप अल्ला के ॥ Notes: 1 सज़ा देना, कैद करना, 2 फ़क़ीर के शरीर से अभिप्राय है, 3 अग्नि की ज्वाला, 4 बादशाह के शरीर से अभिप्राय है, 5 तेज, प्रकाश, 6 भय, डर, 7 स्थिर, 8 वक्तृता, 9 शिकार गाह, घायल, 10 हाथ जोड़ कर, 11 आत्मवित्।

तर्क दुन्या की, आख़रत¹ की तर्क। तर्क मौला की, तर्क की भी तर्क ॥ दर्जे अव्वल के आप त्यागी हैं। वारे² दर्शन के हम भी भागी हैं ॥ [ 343 ] ❀ फ़क़ीर का कलाम ❀ क़दम-बोसी³ को शाह झुका ही था। कल्मा बेसाख़ता⁴ यह तब निकला ॥ ऐ शहनशाह ! तुम मुबारक हो। तुम ही सब से बड़े तो तारक⁵ हो ॥ अपनी कीजियेगा क़दम-बोसी ख़ुद। तुम ही त्यागी हो, तुम ही जोगी ख़ुद ॥ कुछ नहीं इस फ़क़ीर ने त्यागा। ज़ात के राज पाठ में जागा ॥ ख़ाक⁶ ऊपर से जब हटा बैठा। मादने-बेवहा⁷ को पा बैठा ॥ कूड़ा करकट उठा दिया इसने। महल सुथरा बना लिया इसने ॥ जौहलत⁸ को त्याग आप हो बैठा। ज़ात तेरी तरह न खो बैठा ॥ Notes: 1 परलोक, 2 एक बार, 3 चरण वन्दना को, 4 तत्काल, बिना सोचे समझे, बाधड़क, 5 त्यागी, 6 यहां शरीर के देहाध्यास से अभिप्राय है, 7 अनन्त, दाम की, अर्थात् असंख्य ख़ान (ख़ज़ाना) वा आत्म तत्व, 8 अज्ञान, अविद्या।

लैक¹ तुम ने स्वराज्य छोड़ा है। कूड़ा रक्खा है, महल छोड़ा है ॥ राज्व को तुम अज़ीज़² रखते हो। असल मादन³ को तुम न तकते हो ॥ ख़ाक सारे लपेट ली तुमने। क्या रमाई भभूत⁴ है तुमने ॥ जुड़ गये हो अविद्या से आप। जोगी कैसे जुड़े बला के आप ॥ तुम ही जोगी हो, मैं न जोगी हूँ ॥ ज़ाते-तन्हा⁵ हूँ, मैं वियोगी⁶ हूँ ॥ सुन के शाह, यह फ़क़ीर की तक़रीर। सक़ता ग़श कर गया, बना तस्वीर ॥ [ 345 ] ❀ गार्गी ❀ जनक राजा की हुकमरानी में। उस विदेहों⁷ की राजधानी में ॥ नंगी फिरती थी गार्गी लड़की। नूर चितवन में था जलाल भरी ॥ चिहरे से रोब दाब बरसे था। हुसन को माहताब⁸ तरसे था ॥ Notes: 1 लेकिन, किन्तु, 2 प्रिय, 3 खान, चश्मा वा तत्व, 4 अद्वैत तत्व, 5 अलग, पृथक् वा असंगात्मा, 6 बेहोश, आश्चर्यमय, 7 विदेह मुक्त, 8 चाँद।

ज्ञान की असल ज़ान की गुफ़ी। उस के हर रोम से चमकती थी॥ तक सके आँख भर के उस दु' को। मारे दहशत' से ताबे' थी किस को ?॥ पारुयाज़ों' का वह मुनज़्ज़म नूर। शप्पर' चशन को भगाना दूर॥ एक दफ़ा मार्फ़त' को पुतली पर। फिरती शक थी निगाहे-पर्व' निगर॥ दफ़ातन मार्ग' यह भाषे गयी। ज्ञान ख्ज़ालय' में सब को कॉँप गयी॥ ऐव-यनों' का कुफ़र तोड़ दिया। कर अज़साम-वान्' को मोड़ दिया॥ ज्ञान से पुर द्वार' यूं खोला। नाफ़ए-नातार था, कि अग्नि था॥ मैं यह ख़ंजर हूँ, तेज़ दम ज़ालिम। लोहा माने है मिहरो'-माह अज़म'॥ तीन जामों' में, या मियानों' में। छिप के बैठी हूँ तीन खानों में॥ Notes: 1 मुख, 2 मारे भय के, 3 शक्ति, 4 पवित्रता, 5 प्रकाश का शरीर अर्थात अकाशस्वरूप, 6 चमकीशुद, 7 आत्मज्ञान वा ज्ञान-स्वरूप, 8 चुराई देखने वाले की दृष्टि, 9 ताड़ गयी, समझ गयी, 10 तन, 11 दीप देखने वालों का, 12 पृथिवी के पदार्थ (रूप) देखने वाले अर्थात् वाह्य वस्तु वाले के मुख को, 13 मुँह, 14 सूर्य-चन्द्रमा, 15 चितारे, 16 पड़ों (वपड़ों अर्थात शरीरों), 17 कोष, दुकनों में।

दूर कर परदा-ए-हृया' कर दूँ। फ़ितनइ' मैदशर अभी वपा' करदूँ॥ शम्सो' कब ताब' झलक की लाये। चकाचूँदी सी आँख में आये॥ देख मुझ को फ़लक' के सब अज़राम - मिसले शबनम' उड़ें, करें आराम॥ कोहर' ऐसे यह दुन्या उड़ जाये। देखने की मुझे लज़ा पाये॥ काश'' ! देखो मुझे, मुझे देखो। हर सरे-मू से'' चशमे-हैरत'' हो॥ मैं ब्रह्ना'3 थी तुम ने समझा क्यों ?। खाक इस समझ पर, यह समझा क्यों?। जिस्म मैं हूँ, यह कैसे मान लिया?। हाय ! कपड़ों को ज़ान ठान लिया॥ खप गया जिस के दिल में हुसन'' मेरा। दंग सकते'' का एक आलम'' था। जान जय हो चुकी हो नोछावर। बोलो, वह फिर कहाँ रहा नाज़र'' ?॥ नाज़ारो-नज़र'' आप खुद मंज़ूर''। वसल कैसे कहाँ हुआ महज़ूर''॥ Notes: 1 लज्जा का पर्दो, 2 क्रियामत (प्रलय) का समय, 3 अभी पैदा कर दूँ, 4 सूर्य, 5 शक्ति, तेज, 6 आकाश, 7 तारे इत्यादि, 8 ओस के समान, 9 धूँवा या ओस के समान, 10 ईश्वरकरे, 11 बाल के सिरेसे, 12 हैरानी की निगाह, आश्चर्यमय दृष्टि, 13 रंगी, 14 सौंदर्य, 15 आश्चर्य, 16 हालत, अवस्था, 17 द्रष्टा, 18 द्रष्टा और दृष्टि, 19 दर्शन किया गया वा दृश्य, 20 जुदा, पृथक।

टूटे पड़ता है, हाय हुसन मिरा। पर न गाहक कोई मिला उसका॥ खुद ही माशूक़ आप आशक़ हूँ। नैं, ग़लत; मैं तो इश्क़े-सादक़ हूँ॥ तारे कब रोशनी से न्यारे हैं। तुम हमारे हो, हम तुम्हारे हैं॥ ऐ अदू'! ऐंठ ले, विगड़ तन ले। सख्त कह दे, कि सुस्त ही कह ले। जोशे-गुस्सा निकाल ले दिल से। ताक़ते-तेशे आज़मा तू ले॥ मुझे भी इन तेरी बातों से रोक थाम नहीं। जिगर में धाम न करलूँ, तो राम नाम नहीं॥ [ 345 ] * गार्गी से दो दो बातें * राम भी एक बात जड़ता है। खंजरे-तेज़ दम से लड़ता है॥ हुसन की वैहर, गैरते-ख़ूबी'!। एक नज़र हो ज़री इधर तो भी॥ माना, दीदों में है तेरे लाली। जोत आँखों में है कपिल वाली॥ Notes: 1 नहीं नहीं, यह ग़लत है, 2 सच्चा असली इश्क़, अथवा प्रेम मैं हूँ, 3 पृथक, जुदा, 4 शत्रु, हुरयान, 5 गुस्से का बल, 6 समुद्र, 7 दूसरे को लज्जा देने वाली सुन्दरता, 8 नेत्रों, 9 कपिल मुनी का नाम।

भसम करता है तू हज़ारों को कौन रोके भला अंगारों को॥ लैक' मैं एक हूँ, हज़ार नहीं। राम पर तेरा इख्त्यार नहीं॥ शांक आर्थीनें में दिल के देखले। तू ज़रा गर्दन झुका कर पेख ले॥ झलक' किसमें तेरा मुनव्वर है। जलवागर' कौन उसके अन्दर है॥ चीं जबीं हो के कुटिल कर भृकुटी। तिछे चितवन नज़र कीये टेढ़ो॥ कदों गज़ब तीर पास रखता है। राम भृकुटि में बास रखता है॥ छोड़ दो घूरकर दिखानी आँख। राम बैठा है तेरी दाहनी आँख॥ तलख़कामों'' से किसको दी दुशनामें?॥ शाहे-रग और कंठ में हैं राम॥ चल करो गर दिमाग़ में तकरार। राम बैठा है तेरे दसवें द्वार॥ हर तरह राम से गुरेज़' नहीं। जुदा आहन'' से तेगे-तेज़'' नहीं॥ Notes: 1 किन्तु, 2 शीशा, 3 अन्तःकरण, 4 प्रकाशित, 5 प्रकाशमान, व प्रकाश देने वाला, 6 क्रोध होकर, माथे पर बल डालकर, 7 गुस्सा हो खराब बोली बोलना, 8 गाली, अपशब्द, 9 गले के भीतर बड़ी रग (नाड़ी), 10 भागना, 11 लोहा, 12 तेज़ तलवार।

ऐ मुद्दते-किनार' ना पैदा।। हुस्नो-ख़ूबी पे मेरी खुदा शैदा॥ बंदरे-मव्वाज़' है तलातम' में। हुस्न तूफ़ां है तेरा आलम में॥ "मैं ऐदना' नहीं" यह क्यों वाला। सामने मेरे कुफ़र क्यों तोला?॥ पॉहन कर आज मौज की चादर। नज़रे टखरे हमों से यह नादर!॥ "मैं ऐदन नहीं" यह क्या मानीं?। बुल्ती' ओढ़ा हुयाब' छायानिं!॥ तिनका भर, कितनी भर, जहाज़ सही। कोई' भर, बहर भर, यह नाज़ सही॥ हाय तुम ने तो क्या सितम' ढाया। जुमला'' आलम द्रोह'' वह आया। नून आँखों में कर दिया तुम ने। झूठ सब कर दिखा दिया तुम ने॥ सितर'' पर्दे सभी उठा दूँगा। झूठ बोले की मैं सज़ा दूँगा॥ नाम रूपों की चू उठा दूँगा। हू हीं'' हू हूगहू दिखादूँगा॥ Notes: 1 ऐ अनन्त सीमा, अहाता वा विशालता रखने वाली, 2 आशक़, कुरवान, 3 लहरों वाला समुद, 4 तूफ़ान (लहराना), 5 नंगा, 6 मतलव, 7 पर्दे, 8 बुलबुला, 9 बग़ैर मतलब के, व्यर्थ, 10 पर्वत सम, 11 अन्याय, 12 समस्त, 13 झूठा (असत्य), 14 आवरण, 15 ईश्वर ही ईश्वर यह सब है (सर्वं खल्विदं ब्रह्म)।

हाय ! इज़हार' आज लूँ किस से !। रूबरू हो खड़ा बने किस से ?॥ आप ही गार्गी हूँ, आप ही हूँ राम। कुच्छ नहीं काम, रात दिन आराम॥ [ 346 ] * चाँद की करतूत * अजब घूमते घूमते राम को। मिला इक तालाब सरे-शाम' को॥ जुलाहे की थी पास इक झोंपड़ी। थी लड़की वहाँ खेलती इक पड़ी॥ हवा चुपके से सरसराने लगी। उधर चाँदनी दम दमाने लगी॥ मैं क्या देखता हूँ कि लड़की वही। है वुत बन रही और हिलती नहीं॥ खुला मुँह है भोले से मुसका' रही। है आँखों से क्या चाँद को गा रही॥ उतर आँख से दिल में दाखिल हुआ। दिले-साफ़ में चाँद सब घुल गया॥ कहो तो अरे चाँद ! क्या बात है ?। यह क्या कर रहे हो, यह क्या घात है॥ Notes: 1 बयान, 2 सायंकाल के समय, 3 मुसक्राना, धीमे धीमे हँसना।

पड़ा अक्स' ही तेरा तालाव पर। पै लड़की के दिल में किया तू ने घर॥ दिया ज़ालिमों' को न जिस राज़' को, दिखाया न जो दूरबीन-वाज़' को॥ रियाज़ी का माहिर' न जो पा सका। न हैयत' से जो भेद कुछ आ सका॥ जुलाहे के घर में दिया सब बता। अरे चाँद ! क्यों जी ! हुआ तुझ को क्या ?। वह नखत' से दिल में यह आराम क्या। गरीबों के घर में तेरा काम क्या !॥ [ 347 ] * आरसी * दुलहन को जां से बढ़ कर भाती है आरसी'। मुख साफ़ चाँद का सा दिखाती है आरसी॥ हस्ती-इल्म-सकर', का मज़हर' तो खूब है। हाँ इस से आवरु'' को सजाती है आरसी॥ हम को बुरी बला से यह लगती है इसलिये। वाहद'' को कैदे-दुई'' में लाती है आरसी॥ Notes: 1 प्रतिविम्ब, 2 बुद्धिमानों, ज्ञानियों को, 3 भेद, गुझ, रहस्य, 4 दूरदृष्टा वा त्रिकाल दर्शी, 5 गणित शास्त्र में निपुण, 6 शकल का इल्म, तस्वीर वा रूप की विद्या वा ज्योतिष शास्त्र, 7 छोटे से, 8 श्रृंगूठे में डालने का जेवर जिस में शीशा लगा होता है, 9 सत्चिदानन्द, 10 ज़ाहिर होने का स्थान, 11 शान, इज़्ज़त, महिमा, 12 ऐकता, 13 द्वैत के बंधन में।

अज़ बस रानो' है हुरुन में वह अपने माहरू'। हैगत है उस के सामने आती है आरसी॥ खूबी है रूये-खूब में, शीशो में कुच्छ नहीं। हाथों में रूनुमाई' को जाती है आरसी॥ ज़ाहर में भोली भाली, हैराँ शक्ल वले'। क्या झूठ को यह रास्त' बताती है आरसी॥ गैहनों में टुकड़ा आयीना का है हक़ीरतर'। सतवा' वले सफ़ाई से पाती है आरसी॥ देखू मैं या न देखूं, हूँ आफ़ताब रू'। ताहम हमारे दिल को लुभाती है आरसी॥ गंगा सुमेरू'' अवर'' सही, मिह्रो-माह'' सही। मुखड़े का अपने दर्श'' कराती है आरसी॥ है शौक़े-दीद'' चेहरा-ए-तावों'' का राम को। यकसू-दिली'' हर आन'' बनाती है आरसी॥ [ 348 ] * सदाये-आस्मानी ( आकाशवाणी ) * हाये चेचक'' ने चाये चेचक ने। इस अबिचा के हाये चेचक ने॥ Notes: 1 सौन्दर्य में अत्यन्त धनी अर्थात् अत्यन्त सुन्दर, 2 चाँद के सुखड़े वाला (प्यारा), 3 सुन्दर रूप वा मुख, 4 रूप को दिखाने को, 5 लेकिन, 6 सच, 7 तुच्छ, 8 दर्जा, पद, 9 सूर्य सुत (प्रकाश रूप वाला), 10 मोह लेती है, 11 पवंत, 12 बादल, 13 सूर्य और चाँद, 14 दर्शन, 15 देखने का शौक़, 16 प्रकाशस्वरूप, 17 एकाग्रता, 18 प्रत्येक क्षण, 19 माता नाम की बीमारी (Small Pox), को कहते है यहाँ द्वैत रूपी बीमारी से अभिप्राय है।

कर दिया आत्मा क़रीबुल-मर्ग'। क़ैदे-कसरत' में हो गया संलग्न'॥ चेहरा रौशन था साफ़ शीशा सा। हो गया दाग़ दाग़ यह कैसा ?॥ मिहरे-तलअतन' पे दाग़ आन पड़े। तारे सूरज पे कैसे आग चढ़े ?॥ एक रस साफ़ थ्ये-ज़ोवा' था। दाग़े कसरत का लग गया धब्बा॥ हो गया पुष्प माल माता' का। यानि वाहनँ यह शीतला का हुआ॥ मर्ज़ ऐसा बढ़ा यह मुतअद्दी'। हिन्द सारे की खवर इसने ली॥ वह दवा जिस से मर्ज़ जायेगा। गौ-माता' के थन से आयेगा॥ पुर ज़हूरी है वैक्सीनेशन'। वरना मरती है यह अभी नेशन''॥ छोड़ दो तुम ज़री तअस्सुव'' को॥ टीका लगवाइयेगा अब सब को॥ Notes: 1 मृत्यु के समीपतस, 2 नानत्व के बन्धन में, 3 आवेश, प्रवेश, 4 सूर्य जैसे सुन्दर मुख पर, 5 सुन्दर रूप, 6 शीतला देवी की सवारी, 7 सवारी अर्थात गधा, क्योंकि शीतला देवी का वाहन गधा होता है, 8 बढ़ जाने वा फैल जाने वाला, 9 यहाँ उपनिषद् से अभिप्राय है, 10 (अद्वैत का) टीका लगाना, 11 जाति, राष्ट्, नसल, क़ौम, 12 तरफ़दारी, पक्ष, संकुचित ख़याल।

गाये के थन से अलफ' की नशतर। ला रही है इलाज, लीजे कर॥ शहर हर इक में हर गली घर घर। टीका अद्वैत का लगा देना॥ बच्चे लड़कं बड़े हों या छोटे। यह सराअत' भरा दवा देना॥ गर न मानें तो पकड़ कर वाज़ू। टीका यह तीन' जा लगा देना॥ दर्द भी होगा पीड़ भी होगी। डर का नोटस' न तुम ज़रा लेना॥ "शुद्ध तू है" "निरंजनोऽसि' त्वम्"। लोरी रोते समय यह गा देना॥ फिर जो चेचक के ज़ग़्म भर आयें। शीतला भी खुदा मना देना॥ मेर'-चीनी-ओ-मेर दानों' को। मार कर फूँक इक उड़ा देना॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम्॥ प्यारे हिन्दुस्तान् ! फलो फूलो। पौदे पौदे को ब्रह्म विद्या दो॥ Notes: 1 अलफ से अभिप्राय यहां वह मासिक पत्र है, जिसके सम्पादक वास्तव में स्वामी रामजी महाराज थे, और जिस पत्र के अन्त में यह कविता दर्ज है, 2 जल्दी अन्दर घुस जाने वाला वा शीघ्र प्रभाव डालने वाला, 3 तीन जगह (यहां तीन शरीरों से मुराद है. कारण, सूक्ष्म, स्थूल), 4 ख्याल, ध्यान, 5 तू कल्याण रूप है, 6 द्वैत दृष्टि, 7 भेद बुद्धि, 8 बूटे बूटे को, प्रत्येक बूटे को।

गह है वह आवे-गंग' मदुमें-खेज़। बूटे बूटे को कर जो दे ज़र-रेज़'॥ घन है या वारे-खूव सूरत है। सब को इस आव' की ज़रूरत है॥ रौशनी यह सदा मुवारक है। जान सब की है, यह मुवारक है॥ सब्ज़' हो, गुल, ग्याह', गन्दुम' हो। रौशनी बिन तो नाक में दम हो॥ सिफ़लापन', दासपन, कमीनापन।। छोड़ दे हिन्द और चलता वन॥ काशी, मक्का, युरुशलम', पैरिस। रुस, अफ़रीका अमरीका फ़ारस॥ बैहरो-बर'', तूल वल्दो-अर्ज़ो-बल्द''। और मरीखे-सुलों'' माहे-सद्द''॥ कुतब-तारा'', फ़लक'' के कुल अंजम'। काले अज़राम'' जो न जानें हम॥ यह जगह वह जगह कहीं हर जा''। वह जो था, और है, कभी होगा॥ Notes: 1 गंगाजल, 2 आँख जगाने वाला, अथवा आँख खोलने वाला वा पुरुषों को जगाने वाला, 3 मालदार, ुहरा भरा, 4 पानी, 5 सरु वृक्ष का नाम है, 6 घास, 7 गेहूँ, अनाज, 8 कमीनापन, कंजूसी, 9 ईसाइयों का तीर्थ, 10 खुश्की और तरी (पृथ्वी समुद्र), 11 समस्त लम्बाई, और समस्त चौड़ाई, 12 मंगल तारा, 13 वसन्त ऋतु का मास, 14 ध्रुव, 15 आकाश, 16 सारे तारे, 17 आकाश के पदार्थ, 18 स्थान।

मुझ में सब कुछ है, सब मुझी में है। मैं ही सब कुछ हूँ, ग़ैरे-मन ला शै¹ ॥ ऐ शिखर सीम-तन² हिमालय की !। ब्रह्म विद्या की तू ही माता थी ! ॥ गोद तेरी हरी रहे हर दम। गिरजा³ पैहलू में खेलती हरदम ॥ मौनसूनों⁴ को यह बता देना। इन्द्र और वर्ण को सुझा देना ॥ वर्षा जब देश में करने जा। नाज़ में यह असर खपा देना ॥ चाख भी ले जो नाज़ मेवों को। नशा वहदत⁵ में मस्त फ़ौरन हो ॥ खुद बखुद उस से यह कहा देना। शक शुभह एक दम मिटा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ ऐ सबा⁶ ! जा गुलों की महफ़िल में। शोर मद्दों के दल में बादल में ॥ चौंक उट्ठें जो तेरी आहट से। कान में उन के सरसराहट⁷ से ॥ Notes: 1 मेरे बिना सब तुच्छ है अर्थात् मेरे बिना कुछ नहीं, 2 चांदी के तन वाली अर्थात् बर्फ़ से ढकी हुई हिमालय की चोटी, 3 पार्वती, ब्रह्मविद्या से अभिप्राय है, 4 ग्रीष्म ऋतु में जो तूफ़ान वायु का होता है मेघकाल की वायु (monsoons), 5 अद्वैत, 6 पर्वो वायु (प्रातःकाल की वायु), 7 आवाज़।

चुपके से राज़¹ यह सुना देना। शक शुभह एक दम मिटा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ बिजली ! जा कर जहान पर कौंदो। तीराखानों² को जगमगा तुम दा ॥ दमक कर फिर यह तुम दिखा देना। शक शुभह एकदम मिटा देना देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ द्वैत के, पक्षपात के, भ्रम के। कड़क कर राड़³ ! दो छुड़ा छके ॥ गर्ज कर फिर यह तुम सुना देना। शक शुभह एकदम मिटा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ जाओ जुगों⁴ जुग जीयो गंगाजी। ले अगर घूँट कोई जल का पी ॥ उसके हर रोम में धसा देना। शक शुभह एकदम मिटा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ Notes: 1 गुह्य भेद, 2 अंधेरी कोठी में रहनेवालों को, 3 बिजली, 4 युग से अभिप्राय है।

गाओ वेदो ! सनों मेरी गाओ। जाओ जीते रहो, सदा जाओ ॥ पेहले-टिटविटें हो, कोई पंडित हो। भक्ति तुमरी सदा अखंडित हो॥ खैंच कर कान यह पढ़ा देना। शक शुभह एकदम मिटा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ पेहले-अखबार ! अपने पेपर्स पर। कूक कैलास की छपा देना ॥ पेहलो-तालीम ! मदरस्सों में तुम। बच्चों कच्चों को यह पिला देना ॥ नाज़रीन! हिन्दुओं के जलसों पर। कूक से सब के सब जगा देना ॥ चौंक, मन्दिर में रेल में जाकर। ऊँचे पंचम की सुर से गा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ रिश्ता, नाता, कोई समझी सब। शादी, जलसे पै हों इकट्ठे जब ॥ शादी जोयों हों, हेच दुन्या में। भूल बैठे हों यह कि "हूँ क्या मैं"॥ Notes: 1 महिमा, तारीफ़, 2 वर्तमान काल का पढ़ा हुआ प्यारा, 3 अख़बारों में, 4 द्रष्टा लोग, ऐ देखनेवालों, 5 व्याह करनेवाले, आनन्द ढूँढनेवाले।

चोट नक्कारे पर लगा देना। शक शुभह एकदम मिटा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ जाने-मन ! वक्ते-नज़ा¹, वालिदैं को। पाठ गीता का यह सुना देना ॥ "तत्त्वमसि³" फूँक कान में देना। "तो खुदाई⁴" का दम लगा देना ॥ बैठ पैहलू में बाअदव⁵ यह कूक। आह में खूब पिस पिसा देना ॥ हल आँसू में करके फिर इस को। सीने पर बाप² के गिरा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ मौत पर यह सबक सुना देना। मातमी सुदा दिल जला देना ॥ लाधड़क शंख यह बजा देना। शक शुभह एकदम मिटा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ मरने लड़ने को फौज जाती हो। सामने मौत नज़र आती हो ॥ Notes: 1 मृत्यु काल, 2 पिता, 3 (तू ही वह ब्रह्म है), 4 तू खुदा है, 5 इज़्ज़त के साथ, सत्कार पूर्वक।

मिसल अर्जुन के दिल बढ़ा देना। मरु वाजे में गीत गा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ घुड़की तुम को जो दे कभी नाफ़ैज़¹। तुम ने हरारगज़ भी छोड़ना मत रैह ॥ धमकी गाली गलोच और अनबन। प्यारे ! खुद तू है, तू ही है दुश्मन ॥ रमज़ आँखों से यह बता देना। हाथ में हाथ फिर मिला देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ गर अदालत में तुम को लेजायें। ऐसा सुकरात तुम को ठहरायें ॥ तुम तो खुद मस्तोये-मुज़स्सम² हो। दावा, अर्ज़ी, कसूर, कैसे हो ? ॥ चीफ जस्टिस का दिल हिला देना। हाँ ! गला फाड़ कर यह गा देना ॥ कूक कैलास से उठा है ओम्। ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ नीज़ मक़तल³ में खुश खड़े होकर। हाज़री⁴ के दिलों में घर कर कर ॥ Notes: 1 नासमझ, कमज़र्फ़, मूर्ख, 2 आनन्द स्वरूप, 3 क़तल (फाँसी) की जगह, 4 उपस्थित लोग।

उछलियाँ उठ रहीं हों चारों तरफ। हर कोई रख रहा हो तुम पर हरफ¹ ॥ कातलों का भरम मिटा देना। "ग़ैर फ़ानी² हूँ मैं" दिखा देना ॥ काटा जाने को सिर झुका देना। नाराह़ से गूँज इक उठा देना ॥ शक शुभह एकदम मिटा देना। कूक कैलास से उठा है ओम् ओम् तत् सत् है, ओम् तत् सत् ओम् ॥ Notes: 1 नुक़्ता-चीनी, इल्ज़ाम, दोष, 2 न मरनेवाला, अमर, 3 गान।