माया
माया और उसकी हक़ीक़त ✱ शाम ✱ ( यह सारी कविता कलकत्ते नगर के वृत्तान्त की है और उसे माया के नाम से राम दर्शाते हैं ) गंगा की ठंडी छाती से आती है खुश हवा। है भीने भीने बार का साँस इस में मिल रहा ॥ गंगा के रोम रोम में रचने लगा वह बौहर¹। आया जुवार² ज़ोर का लैहरों पे लहरे लहर ॥ देखो तो कैसे शोक़ से आते जहाज़ हैं। मारे खुशी के सीटी बजाते जहाज़ हैं ॥ Notes: 1 समुद्र, 2 समुद्र में तूफान, ज्वार भाटा, अर्थात् समुद्र में लहरों का चढ़ाव उतार।
शादी ज़िमी की ऐ लो ! फ़लक से हुई हुई। वह सायबान क़नात है जब ही तनी हुई ॥ दुल्हा के सिर पै तारों का सेहरा खिला खिला। दुल्हन के वक्षे-दिल¹ ने चिराग़ां² खिला दिया ॥ [ 350 ] ✱ मुकाम ( कलकत्ते का ईडन बाग़ ) ✱ है क्या सुहाना³ बाग़ में मैदाने-दिलकुशा⁴। और हाशिया है बैंचों का सब्ज़ा पे वाह वा ॥ मजमा⁵ हुजूम लोगों का भर कर लगा है यह। मैदान आदमी से लबालब भरा है यह ॥ बैंचों पै वाक़फ़ बैठे हैं, अक्सर हैं खुश खड़े। वाँके जवान बाग़ में हैं टैहलते पड़े ॥ मैदान पार सड़क पै है बग्गियों की भीड़। घोड़ों की सरकशी⁶ है, लगामों की दे नपीड़ ॥ शौक़ीन कलकत्ता के हैं, मौजूद सब यहाँ। हर रंग ढंग बड़ा के मिलते हैं अब यहाँ। Notes: 1 आकाश, 2 दिल में रहने वाली बिजली, इस जगह अभिप्राय पृथिवी से है, 3 बिजली की रौशनी फैल गयी, 4 दिलको अच्छा लगने वाला, 5 खुले दिल वाला अर्थात् विशाल मैदान, 6 किनारा, 7 गिरोह, भीड़, 8 सिर हिलाना, सिर हिलाकर लगाम तुड़वाना।
[ 351 ] ✱ काम ✱ ( अर्थात् कलकत्ते के बाग़ में लोगों का क्या काम है ? ) हम सब को देखते हैं, पर देखते कहाँ !। आँखें तनी हुई हैं, यह क्या पीर क्या जवां ॥ मर्कज़¹ है सब निगाहों का उजला² चबूतरा। खुश बैंडे³ बाजा गोरों का है जिस में बज रहा ॥ गाते फुला फुला के हैं वह गालें गोरियाँ। क्या रौशनी में सुर्ख दमकती हैं कुरतियाँ ! ॥ ऐ लोगो ! तुम को क्या है ? जो हिलते ज़रा नहीं क्या तुम ने लाल कुरती को देखा कभी नहीं ! ॥ [ 352 ] ✱ परदा ✱ इसरार⁴ इस में क्या है, करो ग़ौर तो सही। इस टिकटिकी में क्या है, करो ग़ौर तो सही ॥ गोरों की कुरतियों को हैं गो तक रहे ज़रूर। लेकिन नज़र से कुरतियाँ गोरे तो सब हैं दूर ॥ लैहरा रहा है परदा सा सब की निगाह पर। इस परदे से पिरोई है हर एक की नज़र ॥ Notes: 1 केन्द्र, 2 रौग़न, चमकीला, 3 अंग्रेज़ी बाजे का नाम है, 4 भेद, गुह्य भेद।
यह परदा तन रहा है, अजब ठाठ बाठ का। जिस में ज़मीनो-ज़मानो-मकान¹ है समा रहा ॥ परदा बला है, छेद कि सीवन² कहीं नहीं। लेकिन मोटाई जो पूछो तो असला³ नहीं नहीं ॥ परदा सितम⁴ है, सैहर⁵ के नक़शो-निगार हैं। हर आँख के लिये यां अलैहदा ही कार⁶ हैं ॥ सब सामयीन⁷ के सामने परदा है यह पड़ा। हर एक की निगाह में नक़शा बना दिया ॥ परदों से राग के है यह परदा अजब पड़ा। गंधर्व शहर का है कि मिराज⁸ का मज़ा ॥ जादू है, पियानोटिज़म⁹ है, परदा सुराब¹⁰ है। क्या सच है रंग ढंग, यह सब नक़शो¹¹-आब है ? ॥ रमिये तो यार परदे में देखें तो कैफ़ीयत¹²। आँखें सिली हैं परदा से क्यों ! क्या है माहीयत¹³ ? ॥ दीदों¹⁴ में और रंगों में क्वा है मुनास्वत ? । [ 353 ] ✱ विवाह ✱ वह नौजवां के रूबरू नूरी लिवास¹⁵ में। दुल्हन खिली है फूल सी फूलों की वास में ॥ Notes: 1 देश, काल वस्तु, 2 सिया हुआ, 3 बिल्कुल, नितान्त, 4 जुल्म, आश्चर्य, 5 जादू, 6 काम, 7 सुनने वाले, श्रोतागण, 8 चढ़ाई, तरक्क़ी, चलंदी ( वहाँ अभिप्राय स्वर्ग लोक से भी हो सकता है ), 9 पियानो बाजे बजाने का नाम है, 10 रेत का मैदान जो धूप में पानी की तरह नज़र आये ( मृगतृष्णा का जल ), 11 पानी के नक़श, 12 हाल, दशा, 13 असलीयत, 14 चक्षु, नेत्रों, 15 प्रकाश की पोशाक या वस्त्र।
शादी के राग रंग में बाजा बदल गया। ऐ लो ! बरात बैठी है, जलसा बदल गया ॥ दुल्हन का रंग हू बहू गोया गुलाब है। और बदमें¹ नीम मस्त² से झड़ता शराब है ॥ क्यों दायें से और वायें से मुड़ जायें न आँखें। जब रंग ही ऐसा हो, तो जुड़ जायें न आँखें ॥ [ 354 ] ✱ यूनीवर्सिटी कौन्वोकेशन। ✱ ऐनक लगाये लड़के को वह इस ही परदे पर। हरकारह दौड़ता हुआ लाया है क्या ख़बर ॥ लेते ही तार हाथ में लड़का उछल पड़ा। "मैं पास हो गया हूँ, लो मैं पास हो गया"॥ "बी० ए० के इमतहान में बढ़ कर रहा हूँ मैं। इंगलिश में और हिसाब में अव्वल रहा हूँ मैं ॥ है चांसलर³ से जलसा में इनाम पा रहा। और फैलो-साहबान⁴ से है इक्राम पा रहा ॥ क्यों दायें से और वायें से मुड़ जायें न आँखें। जब रंग ही ऐसा हो तो जुड़ जायें न आँखें ॥ Notes: 1 आँख, 2 आधी मस्त, 3 यूनीवर्सिटी (विश्वविद्यालय) के भवन में, प्रधान पुरुष (सभापति), 4 यूनीवर्सिटी के सभासद व मददगार, 5 उपाधि इत्यादि।
[ 355 ] ❈ बच्चा पैदा हुआ। ❈ वह देखना ! किसी के लिये इसी परदे पर। पूरी हुई है आज़ू, पैदा हुआ पिसर¹॥ मंगल है, शादियाना² है, खुशियाँ मना रहा। दरवाज़े पर है भाट खड़ा गीत गा रहा॥ नन्हा³ है गोल मोल, कि इक कमल फूल है। नाजु़क है लाल लाल, अचँबा अमूल⁴ है॥ अब तो वहू को चाँदी है घर भर में वन गयी। सास भी जो रूठी थी, लो आज मन गयी॥ क्यों दायें से और वायें से मुड़ जायें न आँखें। जब रंग ही ऐसा हो तु जुड़ जायें न आँखें॥ [ 356 ] ❈ नैशनल कांग्रेस⁵ ❈ वह देखना ? किसी के लिये इसी परदे पर। मण्डप है कांग्रेस का, गज़ब धूम करोफ़र⁶॥ लैक्चर वह दे रहा, ख़ु वाँधार सिह्कार⁷। जो चीर शक्को-शुमा को है जाता जिगर के पार॥ Notes: 1 पुत्र, 2 खुशी के वाजे बज रहे हैं, 3 छोटा सा बच्चा, 4 अनंत मोल वाला अर्थात् अमूल्य, 5 राष्ट्रीय महासभा, 6 शान शौकत, 7 जादू की तरह असर करने वाला।
हक़ोओ-दक सुकूतें में है पड़े हाज़रीन³ तमाम। हरदीदा शोलावारें है! विजली है शासो-आम॥ वह तालियों की गूँज में इक दिल हुये तमाम। वह मोतियों से आँख का छल के पड़ा है जाम॥ "गो आन, गो आन"! कहते हैं सब अहले-ज़िंदगी। हड्डी से खून से लिखेंगे तारीख हिन्द की॥ क्यों दायें से और बायें से मुड़ जायें न आँखें। जब रंग ही ऐसा हो तो जुड़ जायें न आँखें॥ इस परदे पर है, ठेका में, इक लाख की बचत। इस परदे पर है. सेठ को, दो लाख की बचत॥ इस परदे पर है सिंह जवान खूब लड़ रहा। तन्हा है एक फ़ौज से क्या डट के अड़ रहा॥ इस परदे पर जहाज़ हैं आते खुशी खुशी। मक़सदें मुराद दिल की हैं लाते खुशी खुशी॥ इस परदे पर तरक्की है रुतवा बढ़ा बढ़ा। इक दम है मेरे यार का दर्जा बढ़ा चढ़ा॥ इस परदे पर हैं सैरो-तमाशे जहान के। इस परदे पर हैं नक़्शे बहिश्तो-जुनाँ के॥ बिछड़े हुए मिले हैं, मुर्दे भी उठ खड़े हैं॥ क्यों दायें से और बायें से मुड़ जायें न आँखें। जब रंग हो 'दिलख्वाह' तो जुड़ जायें न आँखें॥ Notes: 1 हकदक, आश्चर्य, हैरान्, 2 चुपचाप, 3 श्रोतागण, 4 सब की आँखें लाल हैं, 5 प्याला (मोतियों), 6 आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, 7 जानदार, 8 मुराद, मन्तव्य, 9 सैर और तमाशा, 10 स्वर्ग नरक, 11 दिलपसंद, मनोरंजक।
[ 357 ] सल्तनत हक़ीक़ी अवधूत वाह ! क्या ही प्यारा नक़्शा है, आँखों का फल मिला ॥ उस सोहने नौजवान का जीना सफल हुआ॥ महल उसका, जिस की छत पे हैं हीरे जड़े हुए ! ॥ कौसे-क़ुज़ाहे-वअबरें के परदे तने हुए॥ मसनदें बलन्द तख्त है, पर्वत हरा भरा। और शजरे-देवदारें का है चँवर झुल रहा॥ नग़मे-सुरीले "ओम्" के हैं उसे आ रहे। नदियाँ परिन्दे, वाद् हैं, वह सुर मिला रहे॥ बेहोशो-हिस है गिरे पड़ा ख़ाल की तरह। दुन्या है उसके पैर को फुट-वाल की तरह॥ कैसी यह सल्तनत है, अटू का निशान नहीं। जिस जा न राज मेरा हो ऐसा मक़ान नहीं॥ क्यों दायें से और बायें से मुड़ जायें न आँखें। अय रंग हो दिलख्वाह तो जुड़ जायें न आँखें॥ [ 358 ] माया सर्वरूप माया का परदा फैला है क्या रंग रंग में। और क्या ही फड़ फड़ाता है हर आबो-संग में॥ Notes: 1 इन्द्र धनुप, 2 बादल, 3 बैठने की जगह, ऊँची, 4 देवदार के वृक्ष, 5 आवाज़, शब्द, 6 पक्षी, 7 वायु, 8 पावों से खेलने की गेंद, 9 बादशाह, राज्य, 10 दुरमन, 11 जगह. 12 पानी में, पत्थर में।
इस परदे पर हैं झील¹, जज़ीरें², खलीजो-बैहर³। इस परदे पर हैं कोह⁴-ओ-बियाबां⁵ दियारो-शैहर⁶॥ सब पीर⁷ सब जवान इसी परदे पर तो हैं। वाशिन्दे और मकान इसी परदे पर तो हैं॥ पैग़म्बर और किताब इसी परदे पर तो हैं। सब ख़ाको-अस्मान इसी परदे पर तो हैं॥ पील⁸ अस्प⁹ और गुलाम इसी परदे पर तो हैं। शाहंशाहों के शाह इसी परदे पर तो हैं॥ क्या झिलमिलाता परदा है अनकबूत¹⁰ का। दे है ख्याल (उलझा हुआ) काम सूत का॥ [ 359 ] ❈ नक़्शो-निगार और परदा एक हैं ❈ यह दो नहीं हैं, एक हैं, परदा कहो कि नक़्श। नक़्शो-निगार¹¹ परदा हैं, परदा ही तो है नक़्श॥ यह इस्तआरा¹² था, कि वह माया के रूप हैं। माया कहो कि यूँ कहो यह नाम रूप है॥ "इस्मो-शक़्ल¹³" ही माया है, यह माया है इस्मो-शक़्ल हममानी¹⁴ माया के हैं, यह रंग रूप-शक़्ल॥ Notes: 1 सरोवर, 2 द्वीप, 3 खाड़ी और समुद्र, 4 पर्वत, 5 जंगल, 6 मुल्क और शहर, 7 वृद्ध, बुढ्ढे, 8 हाथी, 9 घोड़े, 10 मकड़ी जो अपने मुँह से तन्तु निकाल कर जाला तनती है, 11 नाना प्रकार के रंग रूप, 12 अभिप्राय, लक्ष्य, दृष्टान्त, तमसील, 13 नाम रूप, 14 एक सम्मान अर्थ।
[ 360 ] ❈ फ़िलसफ़ा ❈ परदा खड़ा है माया का यह किस मुक़ाम पर ? । है यह सबों ऊपर कि हवासे-अवाम पर ? ॥ है भी कहीं कि मवजी है, यह वैह्म-ख़ाम पर। क्या सच है, पस्तादा है, यह मेरे राम पर॥ [ 361 ] ❈ महले-परदा (दृष्टान्त) ❈ है इस तरफ़ तो शोर सरोदों समा का। और उस तरफ है ज़ोर शुनीदन की चाह का॥ इन दोनों ताक़तों का वह टकराना देखिये। पुर ज़ोर शोर लैहरों का चकराना देखिये॥ लैहरें मिलीं मिटीं। ऐ लो ! पैदा हुए हुवाब। यह बुलबुले ही बुक़ों हैं, परदा वक़्फ़-आब॥ मौजों ही का मुक़ाबला परदा का है महल। मौजें है आब, कहते नहीं क्यों महल है जल ? ॥ हां यह तो रास्त है कि सरोद और लामयीं। दोनों मिले मिटे हैं, वह जल रूपे-राम में॥ और राम ही में परदा है नक़्शो-निगार है। यह सब उसी की लैहरों के मौजों के कार है॥ Notes: 1 दर्शन शास्त्र, तत्वज्ञान, 2 सब इन्द्रियमय, 3 सहारा लिये हुए, आश्रित, 4 कच्चा वैह्म अर्थात् कल्पित भ्रम, 5 सीधा खड़ा हुआ, अर्थात् आश्रित, 6 राग रंग (आवाज़), 7 सुनना, 8 बुलबुला वा बुद्बुदे, 9 परदा, 10 पानी के चेहरे पर अर्थात् पानी की तह पर, 11 अधिष्ठाता वा आधार, 12 सच, 13 राग, 14 सुनने वाले, 15 जल रूपी राम में वा राम जो जल रूपी है उस में, 16 लहरें, 17 काम।
[ 362 ] ❈ अहसासे-आम (दाष्टांत)। ❈ महसूस¹ करने वाली इधर से आई लैहर। महसूस होने वाली उधर से आई लैहर॥ दोनों के अक़्दे²-शादी से पैदा हुए हुवाबें। यानी नमूद "शै" हुई पानी में झट शिताव॥ लैहरें भी और बुलबुले सब एक आब हैं। इन सब में राम आप ही रमते जनाब हैं॥ माया तमाम इस की है हर फ़ेल-ओ-क़ौल में। मफ़उल, फ़ेलो-फ़ाइलें हैं हर डील डौल में॥ आबशारों और फ़व्वारों की पुहारों की बहार। चश्मासारों, सब्ज़ाज़ारों, गुलइज़ारों की बहार॥ बैहरो-दरया के झकोले और सबा का खुशख़राम। मुझ में मुत्सव्वर हैं यह सब "ओम्" में जैसे कलाम॥ पसर कर लेटा हूँ जग में सुबह में और शाम में। चाँदनी में रौशनी में, कृष्ण में और राम में॥ Notes: 1 हृन्द्रियगोचर पदार्थों को भान करने वाली वृति वा भोक्ता पुरुष, 2 विवाह वा मेल, 3 बुलबुला, 4 प्रकट, व्यक्त, 5 वस्तु, रूप, 6 जब, 7 काम और वचन, 8 कर्म, करण, और कर्ता, 9 बाग़ इत्यादि, 10 पुष्प के कपोल वाले प्यारे, 11 समुद्र और नदी, 12 प्रातःकाल की वायु, 13 मटक कर चलना, 14 कल्पित, आरोपित है, 15 शब्द, वाक्य, 16 फैलकर।
[ 363 ] ❈ राम सुवाँ। ❈ यह तो सब रास्त है, चले अज़ रूए-ज़ात भी। देखो तो परदा नक़्श वग़ैरा न थे कभी॥ है मौजें ही में रहो-बदलें जिस के बावजूद। क़ायम है ज्यूँ का त्यूँ सदा एक आवें का वजूद॥ अज़ पतवोरे-ज़ात यह कहना पड़ा है अब। पैदा ही कब हुए थे वह अमवाजे और हुबाब॥ अज़ रूए-राम पुछो तो फिर वह निगारो-नक़्श। माया वग़ैरा का कहीं नामो-निशानो-नक़्श॥ हरकत सकून और तग़य्युर का काम क्या ! । नुतक़ो-जुबां की दख़ल, सिफ़ातों का नाम क्या॥ इक़बाल कहाँ, अदबार कहाँ, यां वेशी कमी को वार कहाँ। यां पुण्य कहां, अरु पाप कहाँ, अरु मुझ में जीतो-हार कहाँ॥ इक़रार कहां, इन्कार कहां, तक़रार कहां, इसरार कहाँ। महसूस-हवास अहसास कहां, ख़ाक आव अरु वादो-नार कहाँ॥ सब मर्कज़, मर्कज़ा, मर्कज़ है. इक़तार कहां, परकार कहां। Notes: 1 शुद्ध स्वरूप राम, 2 सच, 3 किन्तु, 4 वस्तुतः भी, 5 लैहर, 6 बदलना इत्यादि, 7 जल, 8 वस्तु के लिहाज़ से कहना पड़ा, 9 लैहरें, 10 बुलबुला, 11 अस्थिरता व स्थिरता, 12 तबदीली विकास, 13 वाणि व नाक इन्द्रिय, 14 गुण, 15 विभूति, महिमा, 16 वोभ, 17 हठ, ज़िद, 18 स्पर्श-इन्द्रिय, पदार्थ, 19 पृथ्वी, 20 जल, 21 वायु और अग्नि, 22 केन्द्र, 23 पंक्तियें, 24 पंक्तियें डालने वाला औज़ार।
[ 364 ] नतीजा। ग़ल्तां है मुहीत बेपायां, यहां वार कहां, अरु पार कहां ? । गंगा है कहां, अरु बाग़ कहां, है सुलह कहां, पैकार कहां ? ॥ यां नाम कहां, अरु रूप कहां, अख़्फ़ा कहां, इज़हार कहां ? । नहीं एक जहां दो चार कहां, अरु मुझ मैं सोच विचार कहां ? ॥ मां बाप कहां, उस्ताद कहां ! गुरु चेलो का यां कार कहां ? । पहसान कहां, आज़ार कहां ? यां ज्ञादिभ और सरदार कहां ॥ न ज़मां न मकां का कभी था निशां, इल्लत मालूल अज़कार कहां। नहीं ज़ोर, ज़बर पस,पेश कहां ? तक़ती और शेर अशआर कहां ॥ इक नूर ही नूर हूँ शोलाफ़िशां, गुलज़ार कहां और ख़ार कहां। लैकचर तक़रीर उपदेश कहां ? तहरीर कहां, प्रचार कहां ? ॥ तप दान और ज्ञान और ध्यान कहां ? दिल बेचल सीनाफ़िगार कहां ॥ नहीं शोख़ो शोख़ी आर कहां ? सिर टोपी या दस्तार कहां ? । नहीं बोली ताना धमकी यहां, सूफ़ार कहां और दार कहां ॥ Notes: 1 पेच खाता हुआ, (ग़र्क़ या मग्न हुआ), 2 वेहद (अनन्त) अहाता, 3 लड़ाई, जंग, 4 पोशीदगी (अव्यक्त), 5 व्यक्त, 6 दुःख. 7 नौकर, 8 काल, 9 देश, 10 कारण, 11 कार्य, 12 ज़िकर, चरचा, 13 नीचे, 14 ऊँचे, 15 पीछे आगे, 16 टुकड़े करना, कविता का वज़न बनाना, 17 कविता, नज़्में, 18 प्रकाश, 19 दमकने वाला, यहाँ दमक मार रहा है, 20 बाग़, 21 कांटा, 22 लेख, 23 सीना फाड़ने वाला वा ज़ख़मी दिल (आशिक़ वा प्रेमासक्त), 24 लज्जा. हया, 25 पगड़ी, 26 तीर का मुँह, 27 मूली।
इक मैं ही मैं ही मैं ही हूँ, ग़ैर का दारो-मदार कहां। आलायशो-क़ैदो-निजात कहां ? अहवामें-रसन और मार कहां॥ घर वार कहां, कोहसार कहां, मैदान कहां, और ग़ार कहां। महर, अंज्ञम, फ़र्श, और अर्श कहां ? यां ख़्वाब कहां वेदार कहां। जब पैरे नहीं, डर ख़ौफ़ कहां, उम्मेद से हालते-ज़ार कहां ? ॥ मैं इक तूफ़ाने-वहद्दत हूँ, कहो मुझ में इस्तफ़सार कहां। इक मैं ही, मैं ही, मैं ही हूँ, यां बन्दे और सरकार कहां॥ [ 365 ] दुन्या की हक़ीक़त क्या है यह ? किस तरह हुए मौजूद ? । इक निगाह पर सब की हस्ती-ओ-बूद॥ हां जगत है,सबूत दीजियेगा। इन्द्रियों पर यक़ीन न कीजियेगा । ( 1 ) बेशक आती नज़र है दुन्या, पर। है कहां, आप ही न देखे गर॥ माहा-माही-व शाहो-ज़र्मीन ताज। अपनी हस्तो को है तेरे मोहताज॥ Notes: 1 दूसरी वस्तु. मिथ्य वस्तु, 2 मुक्ति और बद का लेश, 3 रस्सी की भ्रान्ति, 4 रस्सी, 5 सांप, 6 पर्वत, 7 कन्दरा, गुफा, 8 चाँद, 9 तारे, 10 पृथिवी, 11 आकाश, 12 स्वप्न, 13 जाग्रत, 14 अन्य 15 रोने की दशा, 16 एकता का तूफ़ान, 17 प्रश्न करना वा पूछना, 18 प्रजा, सेवक, 19 राजा, मालिक, 20 स्थिती, होना, 21 चाँद सूर्य ( अथवा चाँद में मछली पर्यंत सब जीव जन्तु )
बक़ मौजूद है समी शै में। गो हवासों के हो न हलक़े में॥ वक़्ते-इज़हार, बक़ें शोख़ी बाज़। ख़ुद ही मुसबत है, ख़ुद ही मनफ़ी नाज़॥ तेरी माया है बक़ें-वश चश्चल। यारों आगे कहां चलें छल बल॥ तू इधर देखता है आँख उठा। तू उधर बन गया कोहो-सहरा॥ ( 2 ) ख़्वाब में हैं ख़्याल की दो शान्। जुज़्वी, कुली "यह एक मैं" ,,यह जहान्" "मैं हूँ इक मर्द" शाने जुज़्वी है॥ "जुमला आ़लम", यह शाने-कुल्ली है॥ ख़्वाबे-पुख़्ता शुद है वेदारी। जाग ! सारी तेरी है गुलकारी॥ तू ही शाहिद बना है, तू मशहूद। शान तेरी है आस्मानो-कबूद॥ ख़्वाब तेरा ख़्याल तेरा है। जो ज़मीनो-ज़मान ने घेरा है॥ जल्वा तेरा यह अम्बसाती है। Notes: 1 बिजली, 2 घेरा, हद, 3 दृश्य, ज़ाहिर होने के समय, 4 हाँ, होने, व्यक्त, 5 नहीं, न होना, अव्यक्त, 6 बिजली की तरह, 7 पर्वत और जंगल, 8 व्यष्टि, 9 समष्टि, 10 संसार, 11 दृढ़ स्वप्न, 12 वाग्, बूटा, 13 गवाह, साक्षी, 14 दृष्ट वा दृश्य, 15 नीला आकाश, 16 देश काल, 17 दर्शन, 18 अज्ञान अथवा माया की विक्षेप शक्ति।
बीज माया ही फैल जाती है॥ क्या यह दुन्या ख़्याल मात्र है। क्या यह सच मुच ख़्याले-ख़तिर है॥ अगर तुझे इसमें शक नज़र आवे। कुछ भी बिन ख़्याल के दिखा तो दे॥ ( चित्त वृत्ति के फुरने बग़ैर कोई भी शै महसूस नहीं हो सकती ) हां यह ख़्वाबो-ख़याले-माया है॥ 'एक' कसरत में आ समाया है॥ ( 3 ) मरना जीना यह आना जाना सब। ठैहरना चलना फिरना गाना सब॥ सब यह करतूत जान माया की। मेह्रे-ताबां की एक छाया की॥ पुर जिया आफ़ताबे-रौशन राये। गंग लैहरों पै नाचता है आये॥ साक्षी सूरज कहीं न हिलता है। आब बहता है, यूँ वह फिरता है॥ छोटी बूँदों पै नूर सूरज का। क्या धनुष बन गया है अचरज़ सा॥ शीश मंदिर में शमा जो रक्खा। क्या समय हो गया चिराग़ां का॥ फ़ितनागर आयीना में चश्मे-निगार। झूट है, गो है यार से दो चार॥ Notes: 1 दिल ( मन ) का ख़याल, 2 भान, प्रतीत, नानत्व, 3 सूर्य, 4 प्रकाश से भरपूर, 5 जल, 6 दीपक, 7 प्रकाश डालने वाला।
यह अविद्या में जो पड़ा आभास । ब्रह्म कहलाया इस से जीव और दास ॥ यूँ जो संसर्ग से हुआ अध्यास । सानी यकता का ला बिठाया पास ॥ माया आयीना कैसी खुसंद है । मज़हरे-राम सच्चिदानन्द है ॥ कुच्छ नहीं काम रात दिन आराम । काम करता है फिर भी सब में राम ॥ क्योंजी जब आप ही की माया है । दिल पै अन्दोहें क्यों यह छाया है ॥ हेच दुन्या के वास्ते फिर क्यों । भाई भाई से तीरह्-ख़ातिरँ हों ? ॥ खटका कैसा ! झिजक ख़ातर क्या है ? । बीमो उम्मेद कैसी ? डर क्या है ! । बादशाह का बुरा जो चाहता है । सख़त जुर्मे-कबीरह करता है । देखियेगा हक़ीक़ी शाहँशाह । राज जिस का है काह से ता माहूँ ॥ तेरे नस में रगों में नाड़ों में । पेहले-सौदागरां है राहों में ॥ जिसका पेहरे-हुकूमते-बर्कत । चैन दे सिर में अक़ल को हर्कत ॥ Notes: 1 अन्दर प्रवेश, 2 दूसरा, 3 खुश, अच्छी, 4 राम के दिखाने वाली, दर्पण होने का स्थान, 5 दुःख, फिर, 6 नाचीज़ तुच्छ, 7 ख़राव दिल, 8 दाग़ भरा चित्त, 9 आशा-डर, 10 बड़ा भारी पाप, 11 तृण से चन्द्रमा तक, 12 अभिप्राय ख़ून दम इत्यादि, 13 राज्याधिकार, प्रभाव, वो प्रताप ।
पहला सुलतां अज़ीमे-शानी जाह । तेरा ही आत्मा है जापे-पनाह ॥ ऐसे सुलतां से जो हुआ ग़ाफ़िल । हाये खुदकुश है, शाहकुश क़ातिल ॥ क्यों जी कुच्छ शर्मो-आर भी है तुम्हें । क्यों यह कंगलों से दाँत खिलके हैं ? ॥ रोंगना क्यों ? कमर यह टूटी क्यों । वाये क़िस्मत तुम्हारी फूटी क्यों ॥ रास्ते के गले छुरे क्यों है ? । हक़ ही जीतेगा, सत की है जे ॥ क्यों ग़ुलामी क़बूल की तुम ने । दर-बदर ख़्वार भीक ली तुमने ॥ थी यह लीला रची अनोखे ढव । खेल में भूल क्यों गये मनसबँ ? ॥ ताजे-नूरी को सिर से फेंक दिया । टोकरा रंजो-ग़म का सिर पै लिया ॥ अब जलालो-जमाले-ज़ातँ सम्भाल । उठो, शव सा ही सब विषय पामाल ॥ नैय्यरे-आज़म हो, तुम तो नूर क़दीमँ । ख़िदमते-माया में न ढूँढ़ो धन ॥ वैद्य का मारे आस्तीन् से खोल । मत फिरो मारे मारे डाँवां डोल ॥ Notes: 1 महान, भारी पदवी वाला, 2 सब का आश्रय व आधार, 3 आत्मघाती, 4 आत्म स्वरूप रूपी बादशाह को मारने वाला, 5 लज्जा, हया, 6 सत्य, 7 पद, 8 दर्जो: स्वरूप का तेज और वैभव, 9 सूर्य, 10 प्रकाश डालने वाले, 11 साँप ।
[ 366 ] * ज़ाते वारी * लैक माया यह आ गयी क्योंकर ? । कये-आलमैं पै छा गयी क्योंकर ? । ज़ाते-वाहिद को क्यों शरीक लगी ? । वे बदल हुस्न को क्यों यह लीक लगी ! ॥ वदरे को गैहनँ यह लगा कैसे ? । ऐसा ज़िल्ले-ज़ामीनँ पड़ा कैसे ? ॥ [ 367 ] * जवाब * (1) ऐ ज़ामीन्दोज़ा चश्मे-दुन्या बों !। तू ही ख़ुद है बनी खसूफ़ वही ॥ चाँद राहू ने जा न पकड़ा है । वैद्य तेरे ने तुझ को जकड़ा है ॥ ज़ाते-वाहिदे सदा है ज्यूँ की त्यूँ । उसमें रहो बदल है यां न यूँ ॥ दायें बायें इधर उधर हूर सू । आप ही आप एक रस है हू ॥ Notes: 1 ईश्वर, असली स्वरूप, 2 जगत, दुनिया, 3 एक अद्वितीय, 4 निर्विकार सौन्दर्य, 5 चौदश का चंद्रमा अर्थात् पूर्णिमा, 6 ग्रहण, 7 परछाई पृथिवी की, 8 पृथिवी से तद्रूप, 9 ऐ संसार को संसार की दृष्टि से देखनेवाली चक्षु वा दृष्टि, 10 ग्रहण वा ग्रहण की छाया, जगत में आसक्त, 11 अद्वैत स्वरूप, 12 विकार, 13 तरफ़, 14 ईश्वर, ब्रह्म ।
इन आन्, चूं, चुगूं, चुनी-ओ चुनां । लौट आते हैं वहां से हो हैरान् ॥ बरतर अज़ फ़हो-अक़लो-होशो-गुमां । लामकां, लाज़मां-निशां-अमकान् ॥ (2) रुये-खुर्शीद पर नक़ाव नहीं । दोपहर को कोई हिजाव नहीं ॥ आव हायल नहीं, सहाव नहीं । देखने की किसी को ताव नहीं ॥ मौज़जन हो रही है ज़्यों नी । तिस पै परदा है तुर्रह् हैरानी ॥ (3) ज्यूँ रसन में पदीदे-सूरते-मार । मुझ में माया-नमूद है तूमार ॥ यह स्वरूपाध्यास है इज़्हार । जान तुझको, रहे न यह पिंदार ॥ और संसर्ग को जो माना था । तब तलक ही था, जब न जाना था ॥ मारे-मौहूम में मोटाई तूल । तो वही है जो थी रसन में मूल ॥ Notes: 1 यह, 2 वह, 3 क्यों, 4 किस तरह, 5 ऐसा, 6 और वैसा, 7 समस्त होश और अक़ल से भी दूर, 8 देश रहित, 9 काल रहित, 10 चिन्ह रहित, निराकार या सम्भवता रहित, 11 सूर्य के मुख पर, 12 परदा, 13 परदा, 14 चमक ढांपे हुये नहीं, 15 बादल, परदा, 16 लहरें लहरा रही है, 17 नंगापन, 18 रस्सो में, 19 सांप की सूरत नज़र आती है, 20 लम्बी गाथा, भ्रम, 21 अपने स्वरूप का भ्रम, 22 घमंड, भ्रम, समझ, 23 आवेश, प्रवेश, 24 कल्पित सांप, 25 लम्बाई ।
यह हक़ीक़ी रसन का तूलो-अर्ज़ । मारे-मौहूम में हो आया फ़र्ज़ ॥ इस तरह गद्दे माया मिथ्या है । उस में संसर्ग सत्त ही का है ॥ दूर रहने हैं मारे दहशत के । नागनी काली से सभी हट के ॥ पर जो आकर क़रीबतर देखा । वेख़तर हो गये, मिटा खटका ॥ माहीयत पर निगाह गर डालो । असले-हस्ती को खूब सम्भालो ॥ कैसी माया ? कहां हुआ संसर्ग ? । कब थी पैदायश-व-कहां है मर्ग ॥ काल वस्तु का देश का मुझ में । नाम होगा न है हुआ मुझ में ॥ कौन तालिब हुआ था, मुर्शिद कौन । किस ने उपदेश करा, पढ़ाया कौन ? ॥ किस को संशय शक्कुक उठठे थे ? । कब दलायल से हल फिर तै हुये ? ॥ हस्ती-ओ-नेस्ती नहीं दोनों । रुस्तगारी-ओ-क़ैद क्योंकर हों ? ॥ क्या ग़ुलामी, कहां की शाही है ? । आली जाही कहां ? तबाही है ॥ Notes: 1 खम्बाई, चौड़ाई, 2 डर, भय, 3 बहुत समीप, 4 निडर, निर्भय, 5 असल वस्तु, हक़ीक़त, 6 मृत्यु, 7 जिज्ञासु, 8 गुरु, 9 साफ़ हल हुये, 10 आज़ादी, मुक्ति, 11 उच्च पद वा पदवी ।
मैं कहां ! तू कहां ! सग़ीर-ओ-कबीर ? । किस का सय्यादो-दाम दाना असीर ? ॥ किस की वहदत और उसमें कसरत क्या ! । क्या खुदाई वहां ? इबादत क्या !॥ किस की तशबीह और मुशब्बाह क्या ! । जैहल क्या और इल्म हो कैसा ! ॥ कैसी गंगा यहां पै राम कहां ! । ज़ाते-मुतलक़ में मेरी नाम कहां ! ॥ कब खिली चांदनी ! है ख़्वाब कहां ! । रात कैसी हो ! आफ़ताब कहां ! ॥ कब रसन था ! यहां पै मार नहीं । कोई दुशमन हुआ न यार नहीं ॥ शख़्स इस जा नहीं है, ऐन नहीं । नुक़ता पैदा नहीं है ग़ैन नहीं ॥ कब जुदा थे, ! न पाई वीनाई । खुद खुदाइ है, वल वे रानाई ॥ कुछ बियान कीजियेगा हाले-ज़ात । हाय कहने में आये क्योंकर बात ! ॥ कब कुंवारी के क़ैहर में आवे । लज्जते-वस्ल कौन बतलावे ! ॥ Notes: 1 छोटा, बड़ा, 2 शिकारी और जाल, 3 क़ैद, 4 एकता, 5 बन्दगी, 6 हमशक्ल, दृष्टांत, 7 जिस पर दृष्टांत दिया जाय, बराबरी वाला, 8 अज्ञान, 9 मेरे वास्तव स्वरूप, 10 दृष्टि, 11 बिना बाहरी सज धज, 12 आत्मा का वर्णन, 13 समझ में आवे, 14 विषयानन्द ।
दस्पना पकड़ता है अशया को । कैसे पकड़े जो उड़ली क़ाबिज़ हो ! ॥ अक़ल बुद्धि हवास मन सारे । मिस्ले चिमटा हैं, दुन्या अंगारे ॥ आत्मा अक़ल बुद्धि मन सव को । काबू रखता है, हाथ चिमटे को ॥ दुन्यवी शै पे अक़ल का वस है । आगे मुझ आत्मा के खुद खस है ॥ अक़ल से ब्रह्म चाहो पहेचाना । हाथ चिमटे के बीच में लाना ॥ गैर मुमकिन, मुहाल ही तो है । दम जो मारे मजाल किस को है ? ॥ जुत्क़ ! मशहूर है तू कार-आरां । राम तक पहुँचने का है यारां ? ॥ जुत्क़ ने ज़ोर जान तक मारा । गिर पड़ा आख़िरश थका हारा । आँख ख़ान से अपने बाहर आ । ढूँढ बैठी है बाग़ वन सेहरां ॥ छान मारा जहान को सारा । कैसे देखियेगा आँख का तारा ! ॥ ऐ जुवां ! मोम तुझ से है खारा । कुछ पता दे कहां पे है दारा ! ॥ Notes: 1 चिमटा, 2 वस्तु, 3 जो उड़ली चिमटे को खुद पकड़े हुए हो, 4 तुच्छ, 5 वाणी, बोलने की शक्ति, 6 काम पूरा करने वाली; 7 बल, 8 घर, 9 जंगल, 10 पत्थर, 11 दारा बादशाह से भी अभिप्रायँ है और अपने घर से वा स्वरूप से भी अभिप्राय है ।
अपना सब कुछ जुवां ने वारा । चढ़ गया उड़ गया वले पारा ॥ खूं रोता क़लम है बेवारा । लिखते लिखते ग़रीव मैं मारा ॥ ऐ क़लम, जुत्क़ ! ऐ जुवां, दीदा ! । जुस्तजू में मरो, है निस्तारा ॥ आँख को आँख, जान की है जान । जुत्क़ का जुत्क़, प्राण का है प्राण ॥ कौन देखे यहां दिखाये कौन ? । कौन समझे यहां सुनाये कौन ? ॥ लद गया अक़लो-होश वनजारा । ओस सां कर मका न नउज़ारा ॥ राम मीठा नहीं, नहीं खारा । राम खुद प्यार है, नहीं प्यारा ॥ राम हलका नहीं, नहीं मारा । राम मिलता नहीं, नहीं न्यारा ॥ खंड टुकड़ा नहीं, नहीं क़यारा । ख़्याले-तक़सीम पर चला आरा ॥ राम है तेग़े-तेज़ की धारा । खेल ले जान् पर तू आ यारा ! ॥ उस को आदिल रहीम ठहराना । उससे दुन्या में बेहतरी चहना ॥ Notes: 1 ढूंढ, 2 छुटकारा, 3 शवनम, ओस, 4 किसी वस्तु का देखना, 5 बांटने के ख़्याल पर, भिन्नता के विचार पर, 6 ऐ प्यारे, 7 मुन्सिफ़, न्यायकारी ।
ख़्वाहिशों का दिलों में भर लाना । उनके वर आने की दुआ गाना ॥ मतलबी यार उसका बन जाना । चल परे हट ! नहीं वह अंजाना ॥ राम जारोब-कश नहीं तेरा । सिर से गुज़रो, विसाल हो मेरा ॥ ख़्वाहिशों की जिगर से धो डालो । हविसे-दुन्या को दिल से रो डालो ॥ आजू को जला के ख़ाक करो । लज्ज़तों को मिटा के पाक करो ॥ बहके फिरना भटक भटक बातिल । छोड़ कर हूजिये अभी कामिल ॥ तू तो मावूद है ज़माने का । देवताओं का देव तू ही था ॥ पहले-इसलाम, हिन्दु, ईसाई ।। गिज़ां, मन्दिर, मस्जित, दुहाई ! ॥ दे के दुहाई राम कहता है । तू ही तो राम, गाड, मौला है ॥ सव मज़ाहब में सब के मोबद में । पूजा तेरी है, नेक में, बद में ॥ ऐ सदा मस्तराज मतवाला !। सतबा औसाफ़ से तेरा बाला ॥ Notes: 1 माफ़ देने वाला (भंगी), 2 मेल, दर्शन, 3 दुनिया के पदार्थों का लालच, 4 झूठमूठ, 5 पूजनीय, 6 ऐ सुसलमानो !, 7 God, ईश्वर, 8 मंदिर, 9 सिफ़तों, गुणों, 10 परे, ऊपर ।
ऐ सदा मस्तराज मतवाला !। अपनी महिमा में मौज कर वाला ॥ एकमेवाद्वितीयं तेरी ज़ात । वाहिदु-लाशरीक मेरी ज़ात ॥ पास तेरे फ़ड़क ले सारीयत । ग़ैरमुमकिन है, वल वे महवीयत ॥ एक ही एक, आप ही हूँ आप । राम ही राम, किस की माला जाप ? ॥ [ 368 ] * आदमी क्या है ! * (1) दाना ख़शख़श का एक बोया था । बावा आदम ने जन्नदां में ला ॥ एक दाना में ज़ोर यह देखा । बढ़ गया इस क़दर, नहीं लेखा ॥ इस क़दर बढ़ गया, फला फैला । जमा करने को न मिला थैला ॥ कुठले कुठली भरे हुए भर पूर । वनिये, सौदागरों के कोठे पूर ॥ एक दाना हक़ीर छोटा सा । अपनी ताक़त में क्या बला निकला ॥ Notes: 1 सिर्फ़ एक ही है, दो नहीं, एक के सिवाय और नहीं, 2 एक, बिना दूसरे साथी के, 3 वहिड लीन वा अभेद होना, 4 हज़रत आदम जिसको ईसाई और मुसलमान अपना पहिला पैग़म्बर सृष्टि रचने वाला मानते हैं, 5 आरम्भ में, 6 तुच्छ ।
आज बोने को दाना लाते हैं । इस की ताक़त भी आज़माते हैं ॥ यह भी खशखश ही का दाना है । यह भी ताक़त में क्या यगाना है ॥ हूबहू है वुही तो इस में भी । शक्ति आदम के वीज में जो थी ॥ सच बतायें, है यह वुही दाना । न यह फैला हुआ न दोगाना ॥ खूब देखो विचार करके ओप । माहीयतँ बीज को क़लीलँ सा नाप ॥ ग़ौर से देखिये हक़ीक़त को । नज़र आता है बोज क्या तुम को ? ॥ असल दाना नज़र न आता है । न वह घटतो है, बढ़ न जाता है ॥ मेरे प्यारे ! तू ज़ाते-वाहिदे है । तेरी क़ुदरत अगिनँ बेअद्दे है ॥ (2) जान नहीं को जब कि सायन्सदां । इम्तिहान् को है काटता यक्सान् ॥ जिस्म गो होगया हो दो टुकड़े । लैक मरते नहीं वह यूं कीड़े ॥ Notes: 1 अकेला, अद्वितीय, 2 दूसरे किस्म का, 3 थसली, 4 थोड़ा सा, 5 अद्वैतस्वरूप, 6 अगणित, बिना गिन्ती के, 7 छोटी सी (कीड़ा जो कि दो बराबर हिस्सों में काटे जाने से मरता नहीं बल्कि एक के वजाय दो कीड़े हो जाते हैं ), 8 सायंस या पदार्थ विद्या का जानने वाला ।
पेशतर काटने के एक ही था । जब दिया काट दो हुए पैदा ॥ दोनों वैसा ही ज़ोर रखते हैं । जैसे वह कीड़ा जिससे काटे हैं ॥ दो को काटें तो चार बनते हैं । चार से आठ बन निकलते हैं ॥ क्या दिखाती है, खोल कर यह बात । काटने में नहीं है शाती ज़ात ॥ गो मनु का शरीर छूट गया । पर करोड़ों हनूद हैं पैदा ॥ हर ऋषि की नसल में है वुही । शक्ति आदि मनु में जो तब थी ॥ हां अगर कुछ कसर है ज़ाहिर में । दुरे यक्ता पड़ा है कीचड़ में ॥ झट निकालो यह हीरा साफ़ करो । ज़िद न कीजियेगा, बल मुआफ़ करो ॥ एक शीशे में एक ही रू था । शीशा टूटा, अदद बड़ा रू का ॥ मुख़्तलिफ़ हो गये बहुत अबदां । इन में ज़ाहिर है एक ही इन्सां ॥ जौद हो बकर हो उमर ही हो । मज़हरे-आदमी है, कोई ही हो ॥ Notes: 1 सरय वस्तु, 2 औलाद, कुल, 3 द्वितीय मोती, 4 चेहरा, मुख, 5 गिन्ती, नमबर, 6 देह, शरीर, 7 मनुष्य के ज़ाहिर होने का स्थान, जतानेवाला ।
गो है नक़रे का मारफ़ों में ज़हूर । नाम रूपों में है, यही मामूर ॥ पर यह नक़रा वज़ाते-खुद क्या है ? । इस में हिस्सों का दख़ल बेजा है ॥ इस्म फ़र्ज़ी, शकल बदलती है । पर जो तू है, सो एक रस ही है ॥ तू ही आदम बना था, तू हव्वा । तू ही लाट साहब, तू ही हौवा ॥ तू ही है राम, तू ही था रावण । तू ही था वह गड़रिया वृन्दावन ॥ झूठ तुम को सनम ! न ख़ोबा है । तू ही मौला है, छोड़ दे है है ॥ सीमबर का वह चाँद सा मुखड़ा । तेरा मज़हर है, नूर का टुकड़ा ॥ दिल जिगर सब का हाथ में है तेरे । नूरे-मौफ़ूर साथ में है तेरे ॥ माहो-खुर्शीद, बर्क़ों-अंजमो-नार । जान करते हैं राम पर ही निसार ॥ Notes: 1 साधारण शब्द जो बोलने व लिखने में आये, 2 गुणवाचक अथवा नामवाचक शब्द, 3 भरपूर, 4 अनुचित, 5 आदम हव्वा मुसलमानों के दो पैग़म्बर हैं जिनसे वह पृथिवी उत्पन्न हुई मानते हैं, 6 कृष्ण से अभिप्राय है, 7 ऐ प्यारे ! 8 उचित, ठीक, 9 चाँदी वाला, 10 बहुत ज़्यादा किया हुआ प्रकाश अर्थात् प्रकाश स्वरूप, 11 चाँद सूर्य, बिजली तारे और अग्नि, 12 न्योछावर, अर्पण । नोट—नं० 1, 2, 3 से अभिप्राय तीन प्रकार ( बीज, कीड़ा, शीशा ) की युक्तियों से है जिनसे स्वामीजी ने सिद्धांत ( आत्मा सदा निर्विकार, अपरिवर्तनशील है, परिवर्तन, विकार केवल वाह्य नाम रूपों में है ) को दर्शाया है—