श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

निजानन्द

भाग 7-9 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 7-9 · अध्याय 9 / 14

निजानन्द

[ 286 ] राग भांड, ताल दादरा आप में यार देख कर, आईना¹ पुर सफा कि यूं। मारे खुशी के क्या कहें, शशदर² सा रह गया कि यूं॥1॥ (1) (1) जैसे साफ पानी में वस्तु पूरी तरह नज़र आती है, इस तरह अपने भीतर अपना प्यारा (प्रियात्मा) देख कर मैं ऐसा चकित हो गया कि खुशी के मारे मुख से कुछ बोल न सका। Notes: 1 साफ दर्पण, 2 आश्चर्य।

रो के जो इल्तमास¹ की, दिल से न भूलयो कभी। पर्दा हटा दुई मिट्रा, उसने भुला दिया कि यूं॥2॥ मैं ने कहा कि रंजो-ग़म², मिटते हैं किस तरह कहो। सोना लगा के सीने से, माह ने बता दिया कि यूं॥3॥ गरमी हो इस बला की हाय, भुनते हों जिससे मर्दे-ज़न⁵। अपनी ही आंच-ताब⁶ है, खुद ही हुं देखता कि यूं॥4॥ दुन्या-ओ-आख़िरत⁷ बना, वाह वा जो जहल⁸ ने किया। तागें सा मिह्रे-राम⁹ ने, पल में उड़ा दिया कि यूं॥5॥ (1) जब मैंने उस प्यारे से रो कर प्रार्थना की "कि मुझे कभी न भूलना" तो उसने द्वैत का पर्दा बीच में से हटा दिया और मेरे से अभेद होकर अर्थात् मेरा ही स्वरूप बन कर भट मुझे भुला दिया (क्योंकि परस्पर एक दूसरे का स्मरण तो द्वैत में ही हो सकता है)। (3) मैंने उस प्यारे से कहा कि "शोक-चिन्ता कैसे मिटते हैं?" तो उसने छाती से छाती मिला कर (अर्थात् पूर्ण अभेद हो कर) कहा कि ऐसे मिटते हैं, और तरह से नहीं। (4) गरमी इतनी भारी (तीक्ष्ण) हो कि दाने की तरह पुरुष-स्त्री भुन रहे हों, परन्तु मुझे ऐसा भान होता है कि यह सब मेरा ही तेज़ और ताप है और मैं ही स्वयं भुना जा रहा हूं। (5) लोक और परलोक जो कुछ अज्ञान से बना था, राम ने उसे पल में ऐसे उड़ा दिया जैसे सूर्य तारों को उड़ा देता है। Notes: 1 प्रार्थना, 2 दुःख, पीड़ा, 3 छाती, 4 चन्द्र मुख प्यारे ने, 5 स्त्री-पुरुष, 6 चमक और दमक, 7 लोक और परलोक, 8 अविद्या, अज्ञान, 9 सूर्य रूपी राम।

निजानन्द ( 303 ) [ 286 ] ग़ज़ल, ताल दादरा हस्ती-ओ¹-अदम हूं, मस्ती हूं, नहीं नाम मेरा। किबरयाई²-ओ-खुदाई, है फ़क़त³ काम मेरा॥1॥ चश्मे-लैला⁴ हूं, दिलो-कैस⁵, व दस्ते-फरहाद⁶। वोसा⁷ देना हो तो दे हो, है लबे-जाम⁸ मेरा॥2॥ गोशे-गुल⁹ हूं, रुखे-यूसफ़¹⁰ दमे-ईसा¹¹, सरे-सरमद¹²। तेरे सीने¹³ में बयू हूं, है वही धाम¹⁴ मेरा॥3॥ हलके-मंसूर¹⁵, तने-शम्स¹⁶, व इल्मे-उल्मा¹⁷। वाह वा बेहर¹⁸ हूं और बुदबुदा¹⁹ इक राम मेरा॥4॥ Notes: 1 सच्चिदानन्द हूं, 2 स्वात्म अभिमान का महात्म्य और ईश्वरता, 3 केवल, 4 प्रिया लैली की आँख, 5 प्रिय मजनू का चित्त, अर्थात् लैली मजनू दो आशिक़ माशूक़ पंजाब देश में हुए हैं, और मजनू का चित्त अपनी प्रिया लैली की चक्षु (वा दृष्टि) पर अत्यन्त आसक्त था. इस लिये लैली की चक्षु का उदाहरण यहाँ दिया है, 6 (प्रिया शीरीं का प्यारा आशिक़) फरहाद का हाथ (जिसने पर्वत को फोड़ डाला था), 7 चुम्बन देना अर्थात् चूमना हो सो चूमलो, 8 मेरा मुँह रूपी प्याला तेरे पास है, 9 फूल का कान, 10 यूसफ का मुख, 11 ईसा का श्वास (प्राण फूंकना) 12 सरमद का सिर, 13 हृदय, 14 घर, 15 मंसूर (ब्रह्म-ज्ञानी) का कंठ, जो सूली पर चढ़ाया गया, 16 शम्सतबरेज़ का तन (शरीर) जिस की खाल उतारी गई, 17 विद्वानों की विद्या, 18 समुद्र, 19 बुलबुला।

[ 287 ] राग जिंजा, ताल दादरा क्या पेशवाई¹ वाजा है, अनाहद² शब्द है आज। वैलकम³ को कैसी रौशनी, समदान्या⁴ है आज॥1॥ चक्कर से इस जहान के फिरे असल घर को हम। फुट-बाल सब ज़मीन है, पा⁵ पर फिदा⁶ है आज॥2॥ (2) 1) स्वागत करने वाला प्रणव ध्वनि का बाजा क्यों उत्तम बज रहा है, और स्वागत के वास्ते कैसा उत्तम वा स्वच्छ प्रकाश जगमगा रहा है। अभिप्राय यह है कि:—प्रणव-उच्चारण, अर्थात् अहंग्रह उपासना से आत्म-साक्षात्कार होता है, और साक्षात्कार से पहिले चारों ओर भीतर प्रकाश ही प्रकाश भान होता है, इस लिये साक्षात्कार के थोड़ा पहिले की अवस्था को दर्शाते समय प्रणव ध्वनि और प्रकाश उस (अनुभव) का स्वागत करने वाले वर्णन हुए हैं। 2) इस संसार-चक्कर से निकल कर हम जब अपने असली धाम (निज स्वरूप) की ओर मुड़े, तो पृथ्वि हमारे लिये एक फुटबाल अर्थात् खेल का गेंद हो गई और अब वह हमारे चरणों पर वारे जाती है। अभिप्राय यह कि जब वृत्ति आत्मस्वरूप से विमुख थी और संसार वा संसार के विषयों में आसक्त थी, तो संसार दूर भागता था, जब वृत्ति संसार से मुँह मोड़कर अंतसुख हुई, तो संसार हमारे चरणोंपर गिरने लग पड़ा। Notes: 1 आगे चल कर लेने वाला (अर्थात स्वागत का बाजा), 2 अनहद ध्वनी, ॐ (प्रणव), 3 मुबारकबादी (स्वागत), 4 उत्तम, शुद्ध, पवित्र, 5 पाद, पावों, 6 प्राण दिये हुए, अर्पित।

निजानन्द ( 305 ) चक्कर में है जहान्, मैं मर्कज़¹ हूँ मिहर² साँ। धोके से लोग कहते हैं, सूरज चढ़ा है आज ॥3॥ शहज़ादे³ का जलूम⁴ है, अबु तख्ते-ज़ात⁵ पर। हर ज़र्रह⁶ सदक़ा⁷ जाता है, नग़मा-सरा⁸ है आज ॥4॥ ( 3 ) संसार तो चक्कर में है, और सूर्यवत् मैं उस चक्कर का केन्द्र हूँ पर लोग धोके से कहते हैं कि आज सूर्य चढ़ा है (यद्यपि वास्तव में सूर्य तो नित्य स्थित रहता है)। अभिप्रायः—लोग इस भूल में हैं कि ईश्वर कहीं बाहिर है और उस के ढूँढने में चक्कर लगाते फिरते हैं, पर आत्मदेव सूर्यवत् सब का केन्द्र हुआ सब के भीतर स्थित है, केवल अज्ञान के बादल से आच्छादित है, और उस के दूर हटने पर वह नित्य उपस्थित आत्मा वा आत्म-ज्ञान विद्यमान होता है, परन्तु लोग धोखे से यह कहते हैं कि हमने इसे ढूँढ पाया है। ( 4 ) युवराज अर्थात् सूर्य का अपने स्वराज्य की गद्दी पर बैठने का शुभ समय अब हो रहा है, अर्थात् उदयकाल अब हो रहा है, इस वास्ते एक एक परमाणु उस पर प्राण दे रहा वा क़ुर्बान जा रहा है। अभिप्रायः—वृत्ति का अपने परम स्वरूप में लय होने का अब समय आ रहा है, इस लिये प्रत्येक परमाणु उस ज्ञानी पर वारे न्यारे जा रहा है। Notes: 1 केन्द्र, 2 सूर्य के समान, 3 युवराज, 4 राज तिलक, 5 स्वराज्य की गद्दी, 6 परमाणु, 7 वारे जाता, प्राण देता वा क़ुर्बान होता है, 8 आवाज़ देता है, गीत गा रहा है,

( 306 ) राम-वर्षा हर बर्गो-मिहरो-माह¹ का रक़्सो-सरोद² है। आराम अमन चैन का तूफाँ बपा है आज ॥5॥ किस शोख़े-चश्म³ की है यह आमद⁴ कि नूरे-बर्क़⁵। दीदों⁶ को फाड़ फाड़ के राह देखता है आज ॥6॥ आता करम-फ़र्शां⁷, शाहे-अबर-दस्त⁸ है। बारिश की राह⁹ पानी छिड़कता ख़ुदा है आज ॥7॥ ( 5 ) इस समय प्रत्येक पत्ता, सूर्य और चन्द्र का नाच-राग हो रहा है, और सुख आनन्द, शान्ति का समूह बह रहा है। अभिप्राय यह है कि—इस आत्म-साक्षात्कार पर प्रत्येक पत्ता, चन्द्र और सूर्य प्रसन्नता में नृत्य कर रहे हैं, और चारों ओर प्रसन्नता, शान्ति और सुख का समुद्र बह रहा है। ( 6 ) किस तीक्ष्ण-दृष्टि प्यारे का यह आगमन है कि जिसकी दीदार में बिजली का तेज आँखें फाड़ फाड़ कर देख रहा है! अभिप्राय यह कि—ऐसा आनन्द का समय देख कर साधारण मनुष्यके चित्तमें संशय उठ पड़ता है कि ऐसा कौन प्रभावशाली अब आ रहा है जिस की प्रतीक्षा में विद्युत भी आँखें फाड़ फाड़ देख रहा अर्थात् घोर प्रकाश कर रहा है। ( 7 ) जिसके हाथ में बादल हैं वा जिस का हाथ बादल के समान कृपा-दृष्टि करने वाला है, ऐसा, कृपालु महाराजाधिराज ( सूर्य ) आ रहा है और वर्षा के स्थान पर आनन्द रूपी जल की वृष्टि कर रहा है। अभिप्राय यह है कि—जो कृपा का अधिष्ठान वा समुद्र है, ऐसे प्रकाश स्वरूप आत्मा का अनुभव हो रहा है और बादल के स्थान पर अब ईश्वर स्वयं आनन्द की वृष्टि कर रहा है। Notes: 1 प्रत्येक पत्ते, चन्द्र और सूर्य का, 2 नाच, राग, 3 तीक्ष्णदृष्टि वाला प्यारा, (आत्मा), 4 आगमन, 5 बिजली का तेज वा प्रकाश, 6 आँखों को, 7 कृपालु, कृपा वृष्टि करने वाला, 8 वह बादशाह जिसके हाथमें बादल हो अर्थात् सूर्य, वा जिसका हाथ बादल के समान कृपावृष्टि करता हो, 9 वर्षा के स्थानपर।

निजानन्द ( 307 ) झुक झुक सलाम करता है अब चाँदे-ईद है। इक़बाले¹ राम राम का बुद हो रहा है आज ॥8॥ [ 289 ] ❀ राग झिंझा, ताल दादरा ❀ गुल¹ को शमीम², आबे³ गौहर⁴ और ज़र⁵ को मैं। देता बहादरी हूँ बला शेरे-नर⁶ का मैं॥1॥ शाहों को रोब⁷ और हुसीनों⁸ को हुस्नो-नाज़⁹। देता हूँ जबकि देखूं उठा कर नज़र¹⁰ को मैं॥2॥ सूरज को सोना चाँद को चाँदी तो दे चुके। फिर भी त्वायफ़¹¹ करते हैं देखूं जिधर को मैं॥3॥ ( 8 ) ईद का जो चाँद अर्थात् द्वितीया का चन्द्र निकला है, वह मानो राम को नमस्कार झुक झुक कर कर रहा है। इस प्रकार राम अपना स्वागत ( मान-प्रतिष्ठा ) स्वयं आप हो रहा है। अभिप्राय यह कि—इस साक्षात्कार के बाद तो द्वितीय का चाँद जिस के आगे लोग झुकते हैं, वह स्वयं उस आत्मज्ञानी के आगे झुक झुक कर नमस्कार करता है। इस प्रकार राम स्वयं अपना स्वागत ( यश ) आप हो रहा है। Notes: 1 स्वागत, प्रताप, प्रभाव, 2 पुष्प, 3 सुगन्ध, 4 चमक, 5 मोती, 6 स्वर्ण, 7 नर शेर, सिंह, 8 दबदबा, प्रभाव, 9 सुन्दर लोग वा सुन्दरियों को, 10 सौन्दर्य और नखरा, 11 दृष्टि, 12 मुजरा, नाच।

( 308 ) राम-वर्षा अब्र-कहकशाँ¹ भी अनोखा² कमन्द है। वे कैद हो असीरें जो देखूं इधर को मैं॥4॥ तारे झमक झमक के बुलाते हैं राम को। आँखों में उन की रहता हूँ, जाऊँ किधर को मैं॥5॥ [ 290 ] ❀ राग भैरवी, ताल चलन्त ❀ यह इधर से मिहर¹ आ चमका, अहाहाहा, अहाहाहा। उधर मह² वीम³ से लपका, अहाहाहा, अहाहाहा॥1॥ हवा अटखेलियां करती है मेरे इक इशारे से। है कोड़ा⁴ मौत पर मेरा, अहाहाहा, अहाहाहा॥2॥ अंकाई⁵ ज़ातों⁶ में मेरी आँसुओं⁷ रंग है पैदा। मज़ो करता हूँ मैं क्या क्या, अहाहाहा, अहाहाहा॥3॥ कहूं क्या हाल इस दिल का कि शादी⁸ मौजें मारे है। है इक उमड़ा हुआ दरया, अहाहाहा, अहाहाहा॥4॥ यह जिस्मे-राम⁹ ऐ बदगो¹⁰! तसव्वुर¹¹ मैहज़¹² है तेता। हमारा बिगड़ता है क्या, अहाहाहा¹³, अहाहाहा॥5॥ Notes: 1 आँखों की भवें, 2 आकाश में एक लम्बी सफेदी जो रात्रि के समय जाहर आती है जिसको ( Milky Path ) दूधिया रास्ता वा आकाश गंगा कहते हैं, 3 विचित्र, 4 कैद, बद्ध, आसक्त, 5 सूर्य, 6 चाँद, 7 भय, 8 चाबुक, 9 एक, अद्वैत, 10 वास्तव स्वरूप, 11 खुशी, आनन्द, 12 लहरें मारना, 13 राम का शरीर, 14 बुरा बोलने वाले या ताना मारने वाले, अभिप्राय भेदवादी से है, 15 भ्रम, कल्पना, 16 केवल, 17 आश्चर्य और हर्ष का वाचक शब्द है।

निजानन्द ( 309 ) [ 291 ] ❀ ग़ज़ल, ताल पश्तो ❀ पीता हूँ नूर¹ हर दम, जामे-सकूर² पै हम। ⎫ है आस्माँ³ प्याला, वह शराबे-नूर⁴ वाला॥ ⎬ टेक है जो⁵ में अपने आता, दूं जो है जिस को भाता। हाथी, गुलाम, घोड़े, ज़ेवर, ज़मीन्, जोड़े॥ ले जो है जिस को भाता, मांगे बिग़ैर दाता॥ पीता हूँ॰ 1 हर क़ौम की दुआयें, हर मत की इल्तजायें। आती हैं पास मेरे, क्या देर क्या सवेरे॥ जैसे अड़ाती गायें जंगल से घर को आयें॥ पीता हूँ॰ 2 सब ख़्वाहशें, नमाज़ें, गुण, कर्म, और मुरादें। हाथों में हूं फिराता, दुन्या हूं यूं बनाता॥ मेमार⁶ जैसे ईटें, हाथों में है घुमाता॥ पीता हूँ॰ 3 दुन्या के सब बखेड़े, झगड़े, फसाद झेड़े। दिल में नहीं अड़कते, न निगह को बदल सकते॥ गोया गुलाल हैं यह, सुरमा मसाल⁷ हैं यह॥ पीता हूँ॰ 4 नेवर⁸ के लाज़⁹ सारे, अहकाम¹⁰ हैं हमारे। क्या मिहर¹¹ क्या सतारे, हैं मानते इशारे॥ हैं दस्तो-पा¹² हर इक के, मर्ज़ी पे मेरी चलते॥ पीता हूँ॰ 5 Notes: 1 प्रकाश, 2 आनन्द का प्याला, 3 आकाश, 4 प्रकाश रूपी मदिरा या ज्ञानामृत, 5 दिल, 6 प्रार्थनायें, 7 निवेदन वा दरख़्वास्तें, 8 मकान बनाने वाला, 9 आँखों में सुर्मे की तरह, 10 प्रकृति (कुदरत), 11 नियम, क़ानून, 12 आज्ञा, हुक्म, उपदेश, 13 सूर्य, 14 हाथ और पांव।

( 310 ) राम-वर्षा क़हरो-सिक़ल¹ की कुदरत, मेरी है मिहरो-छलफ़त²। है निगह³ तेज़ मेरी, इक नूर की अंधेरी॥ बिजली शफ़क़⁴ अंगारे, सीने⁵ के हैं शरारे॥ पीता हूँ॰ 6 मैं खेलता हूं होली, दुन्या से गैंद गोली। ख़्वाह इस तरफ को फेंकू, ख़्वाह उस तरफ चला दूं॥ पीता हूँ जाम⁶ हर दम, नाचूं मुदाम⁷ धम घम॥ दिन रात है तरन्नुम⁸, हूं शाहे-राम बेग़म⁹॥ पीता हूँ॰ 7 [ 292 ] ❀ ग़ज़ल, ताल क़व्वाली ❀ हवाबे-जिस्म¹⁰ लाखों मर मिटे, पैदा हुए मुझ में। सदा हूं बहरे-वाहद¹¹, लैहर है धोखा फ़रावाँ¹² का॥1॥ ( 1 ) मुझ में बुदबुदा रूपी शरीर लाखों मर मिटे और उत्पन्न हो गये, पर मैं नित्य अद्वैत रूपी समुद्र ही हूं, और मुझ में नानत्व-रूपी लहरें केवल धोखा हैं। Notes: 1 आकर्षण-शक्ति, ( Law of gravitation ), 2 कृपा ( मिहरबानी ) और प्यार, 3 दृष्टि, 4 दोनों काल के मिलते समय आकाश में जो लाली होती है, 5 दिल, 6 प्रेम-प्याला, 7 नित्य, हमेशा, 8 आनन्द से आसुओं का धीमे धीमे टपकना वा बरसना, 9 बेग़म राम बादशाह हूँ, 10 देह का बुदबुदा अर्थात् देह वा शरीर रूपी बुदबुदा, 11 अद्वैत का समुद्र अथवा अद्वैत रूप समुद्र, 12 नानत्व, अगणित, ज़्यादा, अर्थात् द्वैत केवल धोखा है।

निजानन्द ( 311 ) मेरा सीना¹ है मशरक़² आफ़ताबे-ज़ाते-ताबाँ³ का। तलूप-सुबहे-शादां⁴, बाशुद⁵ है मेरे मियगाँ का॥2॥ ज़ुबाँ अपनी बहारे-ईद⁶ का मुज़दह⁷ सुनाती है। दुरों⁸ के जगमगाने से हुआ आलम⁹ चरागां का॥3॥ सरापा-नूर¹⁰ पेशानी¹¹ पै मेरी मह¹² दरख़शां¹³। कि झूमर¹⁴ है जबीं¹⁵ सीमीं¹⁶ पै गिरज़ाये-ज़िमिस्तां¹⁷ का॥4॥ ( 2 ) मेरा जो हृदय है वह पूर्व है जहाँ से ( प्रकाशस्वरूप आत्मा का ) सूर्य प्रगट होता है, और मेरे हृदय-नेत्र की पलकों का खुलना ही आनन्द की प्रातःकाल का चढ़ना है। अर्थात् आत्मा के साक्षात्कार का स्थान हृदय है और हृदय-नेत्र के खुलते ही प्रसन्नता उदय होती है। ( 3 ) मेरी वाणी आनन्द की बहार की खुशख़बरी सुनाती है और उक्त वाणी से शब्द रूपी मोतियों के झरने से दीपमाला का समय बन्ध गया, अर्थात् ज्ञान का प्रकाश चारों ओर हो गया है। ( 4 ) मेरी चमकीली ललाट ( पेशानी ) पर अर्थात् पर्वतों की शिखर पर चाँद ऐसे चमक रहा है कि मानो पार्वती के चांदी रूप चमकीले माथे पर भूमर लटक रहा है। Notes: 1 हृदय, 2 पूर्व, 3 प्रकाशस्वरूप आत्मा ( सूर्य ) का पूर्व अर्थात् हृदय स्थान है, 4 आनन्द की प्रातः का उदय स्थान, 5 खुलना, 6 आँख अर्थात् ज्ञान नेत्र की पलकें, 7 ईद अर्थात् निजानन्द की बहार, 8 खुशख़बरी, आनन्द की सूचना-मोती, यहाँ अभिप्राय शब्दों से है, 10 ( ज्ञानरूपी ) दीपकों का लोक अर्थात् चारों ओर ज्ञानका प्रकाश ही प्रकाश हो गया, 11 प्रकाशमान् व प्रकाश से पूर्ण, 12 माथा, बर्फों से अभिप्राय है, 13 चांद, 14 प्रकाशमान, 15 माथे पर लटकने वाला ज़ेवर ( गहना ), 16 चाँदी जैसी चमकीली पेशानी ( बर्फ ) पर, 17 शीत स्वरूप पार्वती ( उमा )।

( 312 ) राम-वर्षा खुशी से जान जामे¹ में नहीं फूली समाती अब। गुलों² के वार³ से टूटा, यह लो दामाँ बियावाँ⁴ का॥5॥ चमन में दौर⁵ है जारी, तरव⁶ का, चहचहाने का। चहकने में हुआ तबदील, शेवन⁷ मुर्ग़े-नालाँ⁸ का॥6॥ निगाहे⁹-मस्त ने जब राम की आमद¹⁰ की सुन पाई। है मजमा¹¹ सैद¹² होने को यहाँ वहशी ग़ज़ालाँ¹³ का॥7॥ ( 1 ) आनन्द इतना बढ़ गया कि प्राण भी अब तन के भीतर फूले नहीं समाते, अथवा राम को पर्वतों में एक स्थान पर अब स्थित होने नहीं देते। बल्कि जैसे पुष्पों के बोझ से वन का पल्ला टूट गया कहलाता है, या पुष्प अपनी अधिकता के कारण वन से बाहिर उड़ आते हैं, वैसे ही राम भी इस निजानन्द के बढ़ने से पर्वतों से भीचे उतरा कि उतरा। ( 6 ) इस संसार रूपी उपवन में आनन्द के चहचहाने का समय जारी है और इस ( चहचहावट ) से पक्षियों का रोना भी चहकने में बदल गया है। ( 7 ) मस्त पुरुष की दृष्टि ने जब राम के आने की खबर सुनी तो दर्शन की प्रतीक्षा ( इन्तज़ार ) लोग ऐसे करने लगे कि मानो जंगली मृगों का समूह देखने को उत्सुक है ( अर्थात् जैसे मृग जल की इन्तज़ार में टिकटिकी बान्धे रहते हैं, वैसे सर्व लोग राम की इन्तज़ार में लगे हैं )। Notes: 1 भीतर के खाने रूपी पल्ले में, 2 पुष्प, फूल, 3 बोझ, 4 पल्ला, मुराद जंगल का तट वा किनारा, 5 समय का चक्र, 6 खुशी, 7 रुदन, शोक, खेद, विलाप, 8 रोते हुए पक्षियों का, 9 मस्त पुरुष की दृष्टि, 10 आगमन, 11 समूह हुजूम, 12 शिकार होने, लट्टू होने अर्थात् वारे जाने को, 13 जंगली मृगों का

निजानन्द ( 313 ) [ 293 ] ❀ ग़ज़ल ❀ मुझ बहरे-खुशी¹ की लैहरों पर दुन्या की किश्ती रहती है। अज़ सैले-सरूर² धड़कती है छाती और किश्ती बहती है॥ मुझमें! मुझमें!! मुझमें!!! (टेक) गुल³ खिलते हैं, गाते हैं रो रो बुलबुल, क्या हसते हैं नाले⁴ नदियाँ। रंगे-शफ़क़⁵ घुलता है, बादे-सबा⁶ चलती है, गिरता है छमछम वारां⁷। मुझमें! मुझमें!! मुझमें!!!॥1॥ करते हैं अंजम⁸ जगमग, जलता है सूरज धक धक, सजते हैं बागो-बियावाँ। बसते है नंदन फ़िरदौस⁹, पुजते हैं काशी मक्का, बनते हैं जिश्तो-रिज़वाँ¹⁰। मुझमें! मुझमें!! मुझमें!!!॥2॥ उड़ती हैं रेलें फर फर, बहती हैं बोटें झर झर, आती है आँधी सर सर। लड़ती है फौजें मर मर, फिरते हैं जोगी दर दर, होती है पूजा हर हर, मुझमें! मुझमें!! मुझमें!!!॥3॥ Notes: 1 खुशी का समुद्र, 2 आनन्द के तीव्र तूफान ( बहाओं ) से, 3 पुष्प, 4 धारा, चश्में, 5 प्रातःकाल और सायंकाल को आकाश में जो लाली बादलों में होती है, 6 पर्वो-वायु, 7 वर्षा, 8 तारे, 9 बाग और जंगल, 10 स्वर्ग और स्वर्ग का अध्यक्ष, 11 वेड़ी, किश्ती।

( 314 ) राम-वर्षा चरख़¹ का रंग रसीला, नीला नीला, हर तरफ दमकता है, कैलास छलकता है, बहर² डलकता है, चाँद चमकता है। मुझमें! मुझमें!! मुझमें!!!॥4॥ आज़ादी है, आज़ादी है, आज़ादी मेरे हाँ। गुन्जायशो-जा³ सब के लिये बेहदो-पाया⁴॥ सब वेद और दर्शन, सब मज़्हब, कुरआन, अंजील और नैपटको। बुद्ध, शंकर, ईसा और अहमद, था रहना सहना इन सबका मुझ में! मुझ में!! मुझमें!!! मुझमें!!!!॥5॥ थे कपल, कनाद और अफ़लातू⁵, अस्पैंसर, कैंट, और हैमिलटन⁶। श्री राम, युधिष्ठिर, असकन्दर, विक्रम, कैसर, अलज़बथ, अकबर। मुझमें! मुझमें!! मुझमें!!! मुझमें!!!!॥6॥ मैदाने-अबद⁷ और रोज़े-अज़ल⁸, कुल माज़ी, हाल और मुस्तक़बल⁹। चीज़ों का बेहद रहो बदल¹⁰, और तख़्ता-ए-दहर¹¹ का है दिल चल, मुझमें! मुझमें!! मुझमें!!! मुझमें!!!!॥7॥ Notes: 1 आकाश, 2 समुद्र, 3 स्थान की गुंजायश ( विशालता ), 4 बेशुमार, अथाह, 5 बुद्ध मत की पुस्तक, 6 यूरप के विज्ञान शास्त्रियों के ये नाम हैं, 7 अमर स्थान, 8 अनादि काल, 9 भूत वर्तमान और भविष्य, 10 बदलते रहना, विकार, 11 समय का पलड़ा।

निजानंद ( 315 ) है रिश्ता-ए-वहदत दूर क़सरत¹, है इल्लतो-सिहत² और राहत³। हर विद्या, इल्म, हुनर, हिकमत, हर खूबी, दौलत और बरकत। हर नेमत, इज़्ज़त और लज़्ज़त; हर कशिश का मर्कज़⁴, हर ताक़त। हर मतलब, कारण, कारज सब; क्यों, किस जा⁵, कैसे, क्योंकर, कब। मुझ में! मुझ में!! मुझ में!!! मुझ में!!!!॥8॥ हूं आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, ज़ाहिर, बातिन⁶, मैं ही मैं। माशूक़⁷ और आशिक़⁸, शाइर⁹, मदामून, बुलबुल, गुलशन¹⁰ मैं ही मैं॥9॥ ❀ यह उक्त कविता हिन्दी या उर्दू कविता के ढंग पर नहीं है, यह अमरीका देश के व्हाल्टविह्ट मेनियन ढंग पर वही हुई है, और उन दिनों में लिखी गई थी जबकि राम से अन्त में अपना नाम देना बंद हो गया था। जिन पाठकों को व्हाल्ट विह्ट मेनियन ढंग से परिचय न हो वे "Leaves of grass by Whalt Whitman" ( घास की पत्तियाँ ) ऐसे नाम की पुस्तक देखें। ( सम्पादक ) Notes: 1 एकता का सम्बन्ध वा धागा, 2 अनेकता, नानात्व, 3 कारण, सुख, वा निरोगिता, 4 आराम, 5 केन्द्र, 6 किस स्थान, 7 अन्दर, 8 प्रिया, इष्ट, 9 प्रेमी आसक्त वा भक्त, 10 कवि, 11 बाग़।

( 294 ) * ग़ज़ल, ताल पश्तो * ठंडक भरी है दिल में, आनन्द बह रहा है। अमृत बरस रहा है, झिम ! झिम !! झिम !!! ( टेक ) फैली सुबहे-शादी¹, क्या चैन की घड़ी है। सुख के छुटे फ़व्वारे, फ़रहत² चटक रही है ॥ क्या नूर³ की झड़ी है, झिम ! झिम !! झिम !!! शबनम⁴ के दल ने चाहा, पामाल करदे गुलों⁶ को। सब फ़िक्र मिलकर आये, कि निहाल करदें⁵ दिल को। आया सबा⁷ का झोंका, वह सबाये⁸-रौशनी का। झड़ती है शबनम राम, झिम ! झिम !! झिम !!! डट कर खड़ा हूँ खौफ़ से खाली जहान में। तसकीने⁹-दिल भरी है मेरे दिल में जान में ॥ Notes: 1 आनन्द की प्रात:, 2 खुशी, आनन्द, 3 प्रकाश, 4 ओस, 5 अधीन कर दें, 6 पुष्प, 7 पर्वा वायु अर्थात् वह वायु जो पूर्व से चल रही हो, अथवा वह पवन जो प्रातःकाल चलती है, 8 प्रकाश रूपी वायु, यहाँ अभिप्राय सूर्य से है, 9 दिल में चैन, शान्ति, आराम। (नोट्र—यह कविता अंग्रेज़ी कविता Drizzle Drizzle के अनुवाद के रूप में है और उन्हीं दिनों लिखी गई जब कि अन्त में अपना नाम देने का स्वभाव राम से छूट गया था।)

सूँघें ज़मीं¹, मकाँ², मेरे पाओं मिसले-सर्ग³। मैं कैसे आसकूँ हूँ ज़ैदे-वियान⁴ में ॥ ठंडक भरी है दिल में, आनन्द बह रहा है अमृत वरस रहा है, झिम ! झिम !! झिम !!! [ 295 ] * ग़ज़ल, ताल क़व्वाली * जब उमड़ा दरया उल्फ़तें⁵ का, हर चार तरफ़ आबादी है। हर रात नयी इक शादी है, हर रोज़ मुबारिकबादी है। खुश⁶ ख़ुंदः है रंगों गुल का, खुश शादी शाद मुरादी है। वन सूरत आप दरख़्शां⁷ है, खुद जंगल है, खुद वादी⁸ है। नित राहत है, नित फ़रहत है, नित रंग, नये आज़ादी है ॥1॥टेक॥ ( 10 ) ( 1 ) जब प्रेम का समुद बहने लग पड़ा तो हर तरफ प्रेम की बस्ती नज़र आने लग पड़ी। अब सुन्दर पुष्प की तरह हसना और खिलना रहता है, नित्य चित्त को प्रसन्नता और आनन्द है। आप ही सूर्य बन कर चमक रहा है और आप ही जंगल बस्ती बन रहा है, अहा! कैसा नित्य आनन्द है, नित्य शान्ति है, नित्य सर्व प्रकार की खुशी और आज़ादी हो रही है। Notes: 1 देश, 2 काल, 3 कुत्ते के समान, 4 बर्तों के बन्धन में, 5 प्रेम, 6 अच्छा खिला हुवा, 7 प्रकाशमान, 8 आबाद स्थान।

हर रग रेशे में, हरमू¹ में, अमृत भर भर भरपूर हुआ। सब कुलफ़त² दूरी दूर हुई, मन शादी मर्ग से चूर हुआ। हर बर्ग वधाइयाँ देता है, हर ज़र्रह ज़र्रह तूर हुआ। जो है सो है अपना मज़हर, ख्वाह आवी नारी वादी है। क्या ठंडक है, क्या राहत है, क्या शादी है, आज़ादी है ॥ 2 ॥ रिम झिम, रिम झिम आँसू बरसें यह अबरे बहारे देता है। क्या खूब मज़े की बारिश में वह लुत्फ़ वसलों का लेता है। किश्ती मौजों में डूबे है, बदमस्त उसे कब खेता है। यह गर्दाबी है जी उठना, मत झिझको, उफ़ बरवादी है। क्या ठंडक है, क्या राहत है, क्या शादी है आज़ादी है ॥ 3 ॥ मातम, रंजूरी, बीमारी, गलती, कमज़ोरी, नादारी। ठोकर ऊँचा नीचा, मिह्नत जाती (है) उन पर जां वारी। इन सब की मददों के बाइस, बरशामा मस्ती का है जारी। गुम शीरे, कि शीरीं तुफ़ां में, कोह और तेशा फ़रहादी है। क्या ठंडक है, क्या राहत है, क्या शादी क्या आज़ादी है ॥ 4 ॥ Notes: 1 सिर का बाल, 2 जुदाई का कष्ट, दुःख, 3 आनन्द के अनन्त बढ़ने से जो मृत्यु होती है, 4 प्रत्येक पत्ता, 5 स्वस्ति वचन, 6 परमाणु, 7 अग्नि का पर्वत, 8 झाँकी का स्थान, ज़ाहर होनेका स्थान, 9 पानी से उत्पत्ति वाला, अग्नि से उत्पत्ति वाला 10 वायु से उत्पत्ति वाला, 11 आराम, 12 प्रसन्नता, खुशी, 14 वादल, 15 अभेदता, एकता, 16 चलाता है, 17 डूब जाना, 17 ज़िन्दा हो जाना वा जीवित होना, 18 रोना पीटना, शोक चिन्ता, 20 निर्धनता, जिस समय पास कुछ न हो, 21 कारण, 22 मीठी नदी जो अपनी प्रिया (शीरीं) के इश्क़ (प्रेम) में फरहाद पहाड़ पर से तोड़ कर मैदानों में लाया था, 23 पर्वत।

पंक्तिवार अर्थ ( 2 ) हर रग और नाड़ी में तथा रोम रोम में आनन्द रूपी अमृत भरा हुआ है। जुदाई के सब दुःख और कष्ट दूर हो गये और मन (अहंकार के) मरने (मौत) की खुशी से चूर हो गया है, अब प्रत्येक पत्ता वधाइयाँ (स्वस्ति) दे रहा है, और क्योंकि परमाणु मात्र भी इस ज्ञानाग्नि से अग्नि के पर्वत की तरह प्रकाशमान हो गया। अब जो है सो सब अपना ही झाँकी-स्थान या ज़ाहर करने का स्थान है। ख्वाह वह पानी का जीव है, ख्वाह अग्नि का और ख्वाह हवा का जीव है (यह समस्त वास्तव में मुझ को ही ज़ाहिर करने वाले हैं)। ( 3 ) आनन्द की वर्षा से आँसू रिम झिम बरस रहे हैं, और यह आनन्द का बादल क्या अच्छी बहार दे रहा है। इस ज़ोर की वर्षा में वह (चित्त) क्या खूब अभेदता (एकता) का आनन्द ले रहा है। (शरीर रूपी) किश्ती तो आनन्द की लहरों में डूबने लग रही है, मगर वह सच्चा (आनन्दमें) उन्मत्त उसे कब खेता है? (वह तो शरीर का ख्याल नहीं करता) क्योंकि उसके लिए यह (देहाध्यास का) डूबना वास्तवमें जी उठना है, इसलिये ऐ प्यारों! इस मौत से मत झिझको (क्योंकि झिझकने में अपनी बरबादी है)। इस मृत्यु में तो क्या ही ठंडक है, क्या ही आराम है, और क्या ही आनन्द, और क्या ही स्वतंत्रता है, इसका कुछ वर्णन नहीं हो सकता। ( 4 ) रोना पीटना, शोक चिन्ता, बीमारी, गलती, कमज़ोरी, निर्धनता, नीच ऊँच, ठोकर अरु दुःखार्थ, इन सब पर प्राण वारे जा रहे हैं। और इन सब की सहायता से मस्ती का समुद्र बह रहा है। प्रिया शीरीं के इश्क़ में फरहाद का तेशा पर्वत और शीरीं लोप हो रहे हैं। इस लोप होने में क्या शांति है, क्या आराम है, क्या आनन्द और क्या ही आज़ादी हो रही है।

इस मरने में क्या लज़्ज़त है, जिस मुँह को चाट लगे इसकी। थूके है शाहँशाही पर, सब नेमत दौलत हो फीकी। मय चाहिये! दिल सिर दे फूँको, और आग जलावो भट्ठीकी। क्या सताता वादा बिकता है, "ले लो" का शोर मुनादी है। क्या ठंडक है, क्या राहत है, क्या शादी क्या आज़ादी है ॥ 5 ॥ इल्लत मालूल में मत डूबो, सब कारण कार्य तुम ही हो। तुम ही दफ़तर से खारिज हो, और लेते चारज तुम ही हो। तुम ही मसरूफ बने बैठे, और होते हारिज़ तुम ही हो। तू दावर है, तू वुकला है, तू पापी तू फ़र्यादी है। नित फ़रहत है, नित राहत है, नित रंग नये आज़ादी है ॥ 6 ॥ दिन शर्व का झगड़ा न देखा, गो सूरज का चिह्ना सिर है। जब खुलती दीद्ये-रौशनें है, हंगामाये-ख्वाबे कहाँ फिर है?। आनन्द सरूर समुद्र है जिसका आग़ाज़, न आखिर है। सब राम पसारा दुन्या का, जादूगर की उस्तादी है। नित फ़रहत है, नित राहत है, नित रंग नये आज़ादी है ॥ 7 ॥ पंक्तिवार अर्थ ( 5 ) इस मरने में क्या ही आनन्द (लज़्ज़त) है, जिस मुँह को इस लज़्ज़त की चटक (स्वाद) लग गयी वह शाहँशाही पर थूकता है, और सब धन दौलत (वैभव) फीका हो जाता है। Notes: 1 चटक, स्वाद, लज़्ज़त, 2 शराब, आनन्द रूपी शराव 4 कारण, 5 कार्य 6 किसी काम में हरज करने वाले, 7 न्याय कारी, मुँसिफ, जज, 8 वकील, 9 रात, 10 ज्ञान चक्षु, 11 स्वम की दुन्या, स्वम का फांड़ा, फिसाद, 12 आनन्द, खुशी, 13 आदि, शुरू।

यमनोत्री इस शिखर पर माश की दाल नहीं गलती और न दुन्या की दाल ही गलती है। अत्यंत गरम २ चश्मासार, कुदरती लालाज़ारें, आबशारों अगर आप को (आनन्द की) शराब चाहिये, तो दिल और सिर को फूँक कर (इस शराब के वास्ते) उसकी भट्ठी जला दो। वाह! (निजानन्द की) शराब (अपने सिर के इवज़) क्या सस्ती बिक रही है, और (कबीर की तरह) "ले लो" "ले लो" का शोर हो रहा है। इस शराब से क्या शान्ति, आराम, आनन्द, और आज़ादी है। ( 6 ) हेतु (कारण) और फल (कार्य) में मत डूबो, क्योंकि सब कारण कार्य तुम ही हो, और जो दफ़तर से खारिज होता है अथवा जो नौकर होता है, वह सब तुम आप हो। तुम ही सब काम में प्रवृत्त होते हो। तुम ही उस में विक्षेप डालने वाले होते हो। तुम ही न्यायकारी, तुम ही वकील और तुम ही पापी और फर्यादी होते हो। आहा! नित्य चैन है, नित्य शांती है और नित्य राग रंग और आज़ादी है ( 7 ) सूर्य यद्यपि आप सफ़ेद है, मगर दिन रात का भगड़ा अर्थात् श्वेत काले का भेद उसमें नहीं देखा जाता, क्योंकि दिन रात तो पृथ्वी के घूमने पर निर्भर है। ऐसेही जब आँख खुलती है तो स्वम फिर बाकी नहीं रहता, बल्कि चारों ओर अनन्त और नित्य आनन्द का समुद्र उमड़ता दिखाई देता है। यह संसार ठीक राम का पसारा है, और जादूगर (राम) की उस्तादी है। इसलिये यहाँ नित्य चैन है, शांति है, और नित्य राग रंग और नयी आज़ादी है। Notes: 6 स्रोत, 7 सुन्दर फुलवाड़ी।

(झरनों) की बहार, चमकदार चाँदी को शर्माने वाले श्वेत दोपट्टे (आग, केन) और उनके नीचे आकाश की रंगत को लजानेवाला यमुना रानी का गात (तन) बात-बात में कश्मीर को मात करते हैं। आबशार (झरने) तो तरंगे-वेखुदी (निराभिमानता की लटक) में नृत्य कर रहे हैं। यमुना रानी साज़ बजा रही है। राम शाहंशाह गा रहा है:— [ 296 ] * ग़ज़ल, ताल क़व्वाली * हिप हिप हुरै। हिप हिप हुरै॥ ( टेक ) अब देवन के घर शादी है, लो! राम का दर्शन पाया है। पा-कोबाँ नाचते आते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 1॥ खुश खुर्रमैं मिल मिल गाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै। है मंगल साज़ बजाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 2॥ सब ख्वाहिश मतलब हासिल हैं, सब खूबों से मैं वासिल हूँ। क्यों हम से भेद छुपाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 3॥ हर इक का अन्तर आत्म हूँ, मैं सब का आक़ा साहिब हूँ। मुझ पाये दुःखड़े जाते हैं। हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 4॥ सब आँखों में मैं देखूँ हूँ, सब कानों में मैं सुनता हूँ। दिल बरकत मुझ से पाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 5॥ Notes: 1 खुशी, 2 पांवों के बल नाचते आते हैं, 3 अंग्रेज़ी भाषा में अति प्रसन्नता का बोधक यह शब्द है, 4 आनन्द, मस्त हो कर, 5 सुन्दर भोग, 6 अभेद, मिला हुआ, 7 मालिक, 8 कभी।

गह इश्वा¹ सीमीबर² का हूँ, गह नारह³ शेर-बबर⁴ का हूँ। हम क्या क्या स्वाँग बनाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 6॥ मैं कृष्ण बना, मैं कंस बना, मैं राम बना, मैं रावण था। ह्रां वेद अघ क्रममें खाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 7॥ मैं अन्तर्यामी साक़िन⁵ हूँ, हर पुतली नाच नचाता हूँ। हम सूत्रधार हिलाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 8॥ सब ऋषियों के आयीनहे-दिल में, मेरा नूर दरख्शां था। मुझ ही से शादुर लाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 9॥ मैं ख़ालिक़, मालिक, दाता हूँ, चशमक से दैहर बनाता हूँ। क्या नक़्शे रंग जमाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 10॥ इक कुन से दुन्या पैदा कर, इस मन्दिर में खुद रहता हूँ। हम तनहा शैहर बसाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 11॥ वह मिसरी हूँ जिस के वास्ते दुन्या की इशरत शीरी है। गुल मुझ से रंग सजाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 12॥ Notes: 1 नाज़, नखरा, 2 चाँदी जैसी सूरत वाली प्यारी, 3 गर्ज, 4 बबर शेर, (सिंह); 5 स्थिर, 6 सूत्रधारी की तरह पुतली तार हिलाते हैं, 7 अस्तः करण रूपी शीशा, 8 प्रकाश, 9 चमकता था, 10 कवि (अर्थात् मेरे आत्म स्वरूप से यह सब कवितादि निकलती है), 11 सृष्टि के रचने वाला, 12 आँख की झपक में, 13 युग, समय, 14 आज्ञा, हुक्म वा संकेत, 15 सब, कारण, 16 विषय-आनन्द, विषयभोग के पदार्थ, 17 मीठी, 18 पुष्प।

मसजूद¹ हूँ, क़िबला², काबा हूँ, माबूद³ अज़ां⁴ नाकूसे⁵ का हूँ। सब मुझ को कूक बुलाते हैं, हिप हिप हुं, हिप हिप हुरै॥ 13॥ कुल आलम मेरा साया है, हर आन बदलता आया है। ज़िह्नँ क़ामत⁶ गिर्द घुमाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥14॥ यह जगत हमारी किरणें हैं, फैली हर सू मुझ मरकज़⁷ से। शाँ वूकलमू⁸ दिखलाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 15॥ मैं हस्ती⁹ सब अशया की हूँ, मैं जान अमलायक कुल की हूँ। मुझ बिन बेवूद कहाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 16॥ बेज़ानों में हम सोते हैं, हैवान में चलते फिरते हैं। इन्सान में नींद जगाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 17॥ संसार तजल्ली है मेरी, सब अन्दर बाहर मैं ही हूँ। हम क्या शोले भड़काते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 18॥ जादूगर हूँ, जादू हूँ खुद, और आप तमाशा-बीं में हूँ। हम जादू खेल रचाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 19॥ Notes: 1 उपास्य, पूजा किया गया, 2 जिसकी तरफ मुँह करके ईश्वर-पूजा (ध्यान) की जाती है, 3 पूज्यदेव, 4 बाँग, 5 शंख-ध्वनि, 6 सब संसार, 7 छाया, प्रतिबिम्ब, 8 बिम्ब, 9 तरफ, 10 केन्द्र, 11 नाना प्रकार के, 12 अस्तित्व, जान सब की, 13 वस्तु, 14 सारे फ़रिश्तों (देवताओं) की 15 न होना, अविद्यमान् 16 पशुओं, 17 तेज, चमक, 18 अग्नि की लाटें, अंगारे, 19 तमाशा देखने वाला।

है मस्त पड़ा महिमां में अपनी, कुछ भी ग़ैर अज़ राम नहीं। सब कल्पित धूम मचाते हैं, हिप हिप हुरै, हिप हिप हुरै॥ 20॥ [ 297 ] * ग़ज़ल वा राग खमाच, ताल दादरा * चलना सबा का ठुम ठुमक, लाता प्यामे-यार है। * टुक आँख कव लगने मिली, तीरे-निगह तय्यार है ॥ 1॥ ( 1 ) प्रातःकाल की वायू का ठुमक ठुमक चलना ही अपने प्यारे यार (स्वरूप) का सँदेशा ला रहा है और ज़रा सी आँख भी लगने नहीं देता, क्योंकि आँख जब ज़रा लग जाती है (सोने लगता हूँ) तो झट उस प्यारे (स्वरूप) की दृष्टि (प्रकाश) का तीर लगना आरम्भ हो जाता है जिससे मैं सोने न पाऊँ, (अर्थात् उसे भूल न जाऊँ)। Notes: 1 राम से अतिरिक्त, 2 प्रातःकाल की वायू, 3 ईश्वर (प्यारे) का संदेश 4 दृष्टि का तीर। *—यह कविता राम महराज से उस समय लिखी गयी थी जिन दिनों वह नितान्त अकेले, टिहरी नगर से छे मील की दूरी पर, गोदी खिरायीं ग्राम के समीप एक बमरोगी नाम की गुहा (गुफा) में कुछ दिन से चुप चाप रहे और वहाँ निजानन्द की मस्ती से बेहोश हुए दुन्या से बेखबर बहुत काल गंगा तट पर लेटे रहे थे। तत्पश्चात् होश में आने से और नारायण (लेखक) के पहुँचने पर यह (कविता) अत्यन्त मस्ती के साथ सुनायी और फिर नारायण के साथ बात चीत की गई।

होशो-खिरद से इत्तफ़ाक़न, आँख अगर दो चार है। बस यार की फिर छेड़खानी का गर्म बाज़ार है ॥ 2॥ मालूम होता है हमें, मतलब का हम से प्यार है। सख्ती से क्यों छीने है दिल, क्या यूं हमें इन्कार है? ॥ 3॥ लिखने की न, पढ़ने की फुरसत, काम की, न काज की। हम को निकम्मा कर दिया, वह आप तो बेकार है ॥ 4॥ पैहरा मुहब्बत का जो आये, हमवग़ल होता है वह। गुस्सा तबीयत का निकालें? रूबरू दिलदार है ॥ 5॥ ( 2 ) अगर अकस्मात् अक्ल और होशमें आने लगता हूँ, वा मन बुद्धि का संग करने लगता हूँ, तो उसी समय प्यारा छेड़खानी करने लग जाता है, ताकि फिर बेहोश और आत्मानन्द से पागल हो जाऊँ, अर्थात् मैं पुनः दुन्या का न रहूँ, सिर्फ़ प्यारे (स्वस्वरूप) का ही हो जाऊँ (इस छेड़खानी से)। ( 3 ) ऐसा मालूम होता है कि प्यारे का हम से एक मतलब (स्वार्थ) के कारण प्यार है, और वह मतलब हमारा दिल लेना है। भला—सख्ती से वह क्यों दिल छीनता है, क्या वैसे हमको इन्कार है! (अर्थात् जब पहिले से ही हम प्यारे के हवाले दिल करने को तैयार बैठे हैं, तो फिर वह सख्ती से क्यों छीनना चाहता है?)। ( 4 ) दिल को प्यारे के अर्पण करने से न लिखने की फुसंत रही, और न किसी काम काज की। आप तो वह बेकार (अकतो) था ही, अब हम को भी वैसा ही बेकार कर दिया है। ( 5 ) जब प्रेम का समय आता है तो वह (प्यारा) झट हमवग़ल (संग वा मूर्तिमान्) हो जाता है, ऐसी दशा में हम किस पर गुस्सा निकालें, क्योंकि सामने तो वह स्वयं खड़ा है। Notes: 1 होश और अक्ल, 2 नहीं।

सोने पै हाज़िर ख़्वाब में, जागे पै ख़ाको-आब में। हँसने में हँस मिलता है, मिल रोता है लूलू-वार है ॥ 6 ॥ गह वक़्र-वश खंदाँ बना, गह अवतर गिर्याँ बना। हर सूरतो हर रंग में पैदा वुते-अख़्यार है ॥ 7 ॥ दौलत ग़नीमत जान दर्दे-इश्क़ की, मत खो उसे। मालो-मता, घर-वार, ज़र सदक़े सुवारिक नार है ॥ 8 ॥ (6) सोते समय वह हाज़िर है, जाग्रत में पृथ्वी जल के रूप में साथ है, हँसते समय वह साथ मिल कर हँसता है और रोते समय वह (अभेद हुआ) साथ रोता है, अर्थात् सब दशा में वह ही स्वयं मौजूद है। (7) कभी चमकती हुई बिजली के रूप में हँसता है और कभी बरसते हुये घने बादलों के रूप में रोता है, इस प्रकार प्रत्येक रूप और रंग में वही प्यारा प्रकट हुआ दिखाई देता है। (8) ऐ प्यारे जिज्ञासु! इश्क़ (प्रेम) के धन को उत्तम जान, इसको मत खो, बल्कि इस प्रेम की आग पर सारा घर-वार और धन-दौलतको वार दो। Notes: 1 पृथिवी और जल, 2 कभी बिजली की मानन्द, 3 हँसता आ, 4 बादल की तरह तरबतर, 5 रोते हुए, 6 तसवीर जिससे यार का अन्दाज़ा लगाया जावे, अथवा अपने प्यारे के साक्षात्कार की कसौटी, 7 माल अर असबाव, 8 धन, 9 नौछावर कर दो, 10 मुबारिक आग, धन्य प्रेमाग्नि पर।

मंज़ूर नालायक़ को होता है, इलाजे-दर्दे-इश्क़। जब इश्क़ ही माशूक़ हो, क्या सिहत में बीमार है ॥ 9 ॥ क्या इन्तज़ारी-क्या मुसीबत, क्या बला, क्या ख़ारे-दश्तें। शोला मुबारिक जब भड़क उठा, तो सब गुलनार है ॥ 10 ॥ दौलत नहीं, ताक़त नहीं, तालीम नैं, तक़रीम नैं। शाहे-ग़नी को तो फ़क़त, इर्फ़ाने-हक़ दरकार है ॥ 11 ॥ उम्रों की उम्मीदें उड़ा, छोटी बड़ी सब ख़्वाहिशें। दीदार का लीजिये मज़ा, जब उड़ गयी दीवार है ॥ 12 ॥ (9) इस प्रेम के दर्द का इलाज करना तो अज्ञानी पुरुष को ही मंजूर होता है, क्योंकि जब प्रेम ही माशूक़ (इष्ट देव) हो, तो क्या ऐसी निरोगता में भी बीमार है!। (10) इन्तज़ार, मुसीबत, बला और जंगल का काँटा यह सब उसी समय जलकर फूल (आग का पुष्प) होगये, जिस समय ज्ञानाग्नि अन्दर प्रज्वलित हुई। (11) दौलत, बल, विद्या और इज़्ज़त तो नहीं चाहिये, उस (अनन्य भक्त वा महाविद्) बेपरवाह बादशाह को तो केवल आत्मज्ञान (वहा विद्या) की ही आवश्यकता है। (12) कई वर्षों की आशाएँ, जो स्वरूप के अनुभव में पर्दे वा ओट का काम कर रही हैं, इन सब छोटी बड़ी आशाओं को (आत्मज्ञान से) जला दो, और जब इस तरह से इच्छाओं की दीवार उड़ जावे तो फिर प्यारे (स्वस्वरूप) के दर्शन का आनन्द लो। Notes: 1 इश्क़ के दर्द (पीड़ा) का इलाज (औषध), 2 जंगल के काँटे, 3 प्रेमाग्नि वा ज्ञानाग्निकी शुभ ज्वाला, 4 आनार का फूल, यहाँ अग्निके पुष्प से मुराद है, 5 नहीं, 6 मान प्रतिष्ठा, 7 सखीदिल बादशाह, 8 आत्मज्ञान, 9 दर्शन।

मंसूर से पूछी किसी ने, कूचये-जानाँ की राह। खुब साफ दिल में राह बतलाती जुबाने-दार है ॥ 13 ॥ इस जिस्म से जाँ कूद कर, गंगाये-वहदत में पड़ी। कर लें महोछा जानवर, लो वह पड़ा मुरदार है ॥ 14 ॥ तशरीफ लाता है जुनू, चश्मो-सिरो-दिल फर्शे-राह। पैहलू में मत रखना खिरद को, रांड यह बदकार है ॥ 15 ॥ (13) मंसूर एक मस्त ब्रह्मवेता का नाम है, जब वह सूली पर चढ़ाया गया तो उस समय एक पुरुष ने उस से प्यारे की गली अर्थात् स्वस्वरूप के अनुभव करने का रास्ता पूछा। मंसूर तो चुप रहा क्योंकि वह सूली पर उस समय था, परन्तु सूली की नोक अर्थात् सिरे ने (जिसको जुवानेदार कहते हैं) मंसूर के दिल में साफ खुबकर बतला दिया, कि यह रास्ता है, अर्थात् प्यारे के अनुभव का केवल दिल के भीतर जाना ही रास्ता है। (14) इस शरीर से शारीरिक प्राण कूदकर तो अद्वैत की गंगा में पड़ गये हैं, अब इस मृतक शरीर (मुर्दे) को (प्रारब्धभोग रूपी) पक्षी आयें और महोत्सव कर लें (क्योंकि साधू के मरने के पश्चात भण्डारा अर्थात् भोजन दिया जाता है और मस्त पुरुष अपने शरीर को ही सब के अर्पण करना भण्डारा समझता है, इस लिए राम जब मस्त हुए तो शरीर को मृतक देखकर भण्डारे के वास्ते पक्षीयों को बुलाते हैं। (15) जब इस निजानन्द के कारण पागलपन आने लगे तो उस समय अपने पास द्वैत दर्शाने वाली संसार की अक़्ल न रक्खो, बल्कि अपने दिल और आँखों के द्वारा उस बेवुद्धि को आने दो। Notes: 1 अपने प्राण प्यारे अर्थात् परमात्मा के घर का रास्ता, 2 सूली की नोक से अभिप्राय है, 3 एकता की गंगा, अद्वैत रूपी समुद, 4 अपने समीप, 5 बुद्धि, 6 बुरी, दुराचार परायण।

पल्ला छुटा इस जिस्म से, सिर से टली अपने बला। वैलकम! पे तेग़े-खूँ बकाँ, क्या मर्ग लज़्ज़तदार है ॥ 16 ॥ यह जिस्मो-जाँ नौकर को दे, ठेका सदा का भर दिया। तू जान तेरा काम रे, क्या हम को इस से कार है ॥ 17 ॥ खुश हो के करता काम है, नौकर मेरा चाकर मेरा। हो राम बैठा बादशाह, हुश्यार खिदमतगार है ॥ 18 ॥ सोता नहीं यह रात दिन, क्या उड़ गयी दीदों से नींद। ग़फ़लत नहीं दम भर इसे, यह हर घड़ी बेदार है ॥ 19 ॥ (16) जब राम अति मस्त हुए, तो बोल उट्ठे कि "इस शरीर से अब सम्बन्ध छूट गया है," इस लिये इस की ज़िम्मेदारी की सिर से बला टल गयी। अब तो राम खून पीने वाली तलवार (सुसीघत) को भी स्वागत करता है क्योंकि राम को यह मौत बड़ा स्वाद देती (वा स्वादिष्ट) है। (17) यह देह-प्राण तो अपने नौकर (ईश्वर) के हवाले कर के उस से नित्य का ठेका ले लिया है, अब ऐ प्यारे (स्वस्वरूप)! तू जान तेरा काम, हम को इस (शरीर) से क्या मतलब है? (18) नौकर बड़ा खुश हो के काम कर रहा है, राम अब बादशाह हो बैठा है, क्योंकि खिदमतगार (सेवक) बड़ा हुश्यार मिला हुआ है। (19) नौकर ऐसा अच्छा है कि रात दिन ज़रा भी सोता नहीं, मानो उसकी आँखों में नींद ही नहीं, और दम भर भी इस को सुस्ती नहीं, वह हर घड़ी जागता ही रहता है। Notes: 1 खून चखाने वाली अर्थात् खून करने वाली तलवार, 2 मृत्यु, 3 आँखों, 4 सुस्ती, आलस्य, सोना, 5 जागा हुआ।

नौकर मेरा यह कौन है? आक़ा हूँ इस का कौन राम! ख़ादिम हूँ मैं या बादशाह? यह क्या अजब इसरार है ॥ 20 ॥ वाहिद-मुजर्रद, लाशरीको, ग़ैर सानी, बे बदल। आक़ा कहां ख़ादिम कहां! यह क्या लव गुफ़्तार है ॥ 21 ॥ तनहास्तम, तनहास्तम, दर बहरो-बर यक्तास्तम। नुतक़ो-ज़ुबां का राम तक आ पहुँचना दुशवार है ॥ 22 ॥ ऐ बादशाहाने-जहां! ऐ अज़मे-हफ़्त आस्मान! तुम सब पै हूँ मैं हुक्मरान्, सब से बड़ी सरकार है ॥ 23 ॥ (20) ऐ राम! मेरा नौकर कौन है? और मालिक उसका कौन है? मैं क्या मालिक हूँ या नौकर हूँ! यह क्या आश्चर्य जनक रहस्य है (कुछ नहीं कहा जा सकता है)। (21) मैं तो अकेला, अद्वैत, नित्य, असंग, और निर्विकार हूँ, मालिक और नौकर का भाव कहां! यह क्या शक़त बोल चाल है। (22) मैं अकेला हूँ, मैं अकेला हूँ, पृथ्वि जल पर मैं ही अकेला हूँ, बाणी और वाक्-इन्द्रिय का मुझ तक पहुँचना कठिन है (अर्थात् बाणी इत्यादि मुझे वर्णन नहीं कर सकती हैं)। (23) ऐ दुन्या के बादशाहो! और ऐ सातों आसमानो के तारो! मैं तुम सब पै राज्य करता हूँ। मेरा राज्य सब से बड़ा है। Notes: 1 मालिक, 2 नौकर, सेवक, 3 रहस्य, गुह्य भेद, 4 एकमेवाद्वितीयम्, 5 संग रहित वा अकेला, 6 सम्बन्ध वा दृष्टान्त रहित, 7 अद्वितीय, 8 निर्विकार, 9 मैं अकेला हूँ, 10 पृथ्वी समुद्र अर्थात् जल थल पर, 11 अकेला हूँ, 12 वाक्-इन्द्रिय, वा बाणी, 13 कठिन, 14 ऐ सातो आकाशों के तारों।

जादू निगाहे-यार हूं, नशा हवे-मैं-गू हूं मैं। आवे-ख़्याते-रुख़ हूं मैं, अवल मेरी तलवार है ॥ 24 ॥ यह काकुले-ज़ुलमाते-माया, पेच-पेचां है वले। सांधे को जल्वा-ए-राम है, उलटे को डसता मार है ॥ 25 ॥ [ 298 ] राग भैरवी, ताल कैहरवा विछड़ती दुलहन वतन से है जब, खड़े हैं रोम और गला रुके है। कि फिर न आने की है कोई ढब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 1 ॥ (24) मैं अपने प्यारे (स्वरूप) की जादूभरी दृष्टि हूँ, निजानंद भरी मस्ती की शराब का नशा मैं हूँ अमृत स्वरूप में हूँ, भवें (माया) मेरी तलवार है। (25) यह मेरी माया की जुलफें (अविद्या के पदार्थ) पेचदार (आकर्षक) तो हैं, मगर जो मुझे (मेरे असली स्वरूप की ओर) सीधा ध्यान कर देखता है, उस को तो वास्तविक राम के दर्शन हो जाते हैं, और जो उलटा (पीछे को) होकर मेरी माया रूपी काली जुल्फों को देखता है, उसको ("राम" शब्द का उलटा शब्द "मार") अविद्या का सांप काट डालता है। (1) जब लड़की पति के साथ ब्याही जाकर अपने माता पिता के घर से अलग होने लगती है, तो लड़की और माता पिता के रोमांच हो जाते हैं और आश्चर्य दशा व्याप्त होने से गला रुक जाता है। लड़की को फिर घर वापस आने की अथवा माता पिताके घर का ही बने रहनेकी कोई आशा मालूम नहीं देती, इस वास्ते सर्वदा की जुदाई होते देखकर माता पिता और लड़की के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और गला रुक आता है। Notes: 1 प्यारे की जादू भरी दृष्टि, 2 आनन्द रुपी शराब की क़िसम वाले नशे को पीनेवाला, 3 अमृत की ओर जाने वाला मार्ग वा अमृत स्वरूप, 4 (माया रुपी) काली घंघोर जुलफें, 5 पेचदार, 6 लेकिन, 7 राम का दर्शन, 8 सांप (सर्प), 9 विवाहित लड़की, 10 घर, 11 उपाय, रास्ता, तरीक़ा।

यह दीनो-दुन्या तुम्हें मुबारिक, हमारा दुलहा हमें सलामत। पै याद रखना, यह आख़िरी छब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 2 ॥ है मौत दुन्या में बस ग़नीमत, ख़रीदो राहत को मौत के भाओ। न करना चूं-चरा, यही है मज़हब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 3 ॥ (2) (लड़की फिर मन में यह कहने लगती है) कि मातपिता! यह घर और आप की दुन्या तो आपको मुबारिक हो और मेरा पति मुझे, पर यह (जुदा होते समय की) आखरी छब (अवस्था) आप ज़रूर याद रखें, "कि रोंगटे खड़े हो रहे हैं और गला रुक रहा है"॥ ऐसे ही जब मनुष्य की वृत्ति रुपी लड़की (अपने) पति (स्वस्वरूप) के साथ ब्याही जाती अर्थात आत्मा से तादाकार होती है, तो उसके मात-पिता (अहंकार और बुद्धि) के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और गला मारे बेबसी के रुकता जाता है, और उस वृत्ति को अब वापिस आते न देख कर इन्द्रियों में रोमांच हो जाता है। उस समय वृत्ति भी अपने संबन्धीयों से यह कहती मालूम देती हैं। कि ऐ अहंकार रूपी पिता! और बुद्धि रूपी माता! यह दुन्या अब तुम्हें मुबारिक हो और हमें हमारा दुलहा (स्वस्वरूप) सलामत हो। (3) (अहंकार की) यह मौत दुन्या में अति उत्तम हैं, और इस मौत के दाम पर आनन्द को खरीदो, इस में चूं-चरा (क्यों, कैसे) न करना ही धर्म है। यद्यपि इस (मौत) को ख़रीदते समय रोंगटे खड़े हो जाते हैं और गला रुक जाता है। Notes: 1 धर्म और संसार, अर्थात् आपका लोक परलोक, 2 पति, 3 परंतु, 4 उत्तम, 5 आराम, 6 धर्म।

जिसे हो समझे कि जाग्रत है, यह ख़्वाबे-ग़फ़लत है सख्त पे जां! कलोरोफ़ार्म हैं सब मताल्बें, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 4 ॥ ठग्गों को कपड़े उतार दे दो, लुटा दो असवाबो-माले-ज़र सब। खुशी से गर्दन पे तेग़ धर तब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 5 ॥ जो आर्ज़ू को हैं दिल में रखते, हैं वोसा दीवाना सर्ग को देते। यह फूटी क़िसमत को देख जब कब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 6 ॥ कहा जो उसने उड़ा दो टुकड़े, जिगर के टुकड़ों के प्यारे अर्जुन। यह सुन के नादाँ के खुश्क हैं लब, खड़े हैं रोम और गला रुके हैं ॥ 7 ॥ (4) ऐ प्यारे! जिसे आप जाग्रत समझ रहे हो, वह तो घोर स्वप्न अर्थात् सुषुप्ति है, क्योंकि यह सब विषय के पदार्थ तो कलोरोफ़ार्म दवाई की तरह हैं जिसको सूंघने (अर्थात् भोगने) से सब रोम खड़े हो जाते है, और गला रुक जाता है। (5) ठगों को कपड़े उतार कर देदो और माल असबाव सब लुटा दो और (अहंकारकी) गर्दन पर खुशी से तलवार रखदो, चाहे तब रोम खड़े हों और गला रुक जावे (मगर जब तक आनन्द से अपने आप अहंकार को नहीं मारोगे, तब तक किसी प्रकार का भला आप का नहीं होगा)। (6) जो इच्छा मात्र को दिल में रखते हैं वह पागल कुत्तेको चुम्मा (बोसा) देते हैं, ऐसी फूटी प्रारब्ध को देख कर रोमांच हो जाते हैं और गला रुक जाता है। (7) जब उस (कृष्ण) ने अर्जुन को कहा, कि सर्व संबन्धियों को टुकड़े टुकड़े कर दो, यह सुन कर उस अज्ञानी (अर्जुन) के खुश्क होंठ हो जाते हैं, और रोमांच होते तथा गला रुक जाता है। Notes: 1 सुषुप्ति अवस्था है, 2 इच्छायें, स्वार्थ, मतलब, 3 तलवार, 4 इच्छा, 5 चूमना, 6 पगला कुत्ता, 7 यहाँ कृष्ण से अभिप्राय है, 8 मूर्ख अर्जुन।

लहू का दर्या जो चीरते हैं, हैं तख़्त पाते वही हक़ीक़ी। तअल्लुक़ों को जला भी दो सब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 8 ॥ है रात काली घटा भियानक, राज़व दरिन्दे हैं, वाये जंगल। अकेला रोता है तिफ़्ल या रब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 9 ॥ गुलों के विस्तर पे ख़्वाब ऐसा, कि दिल में दीदों में ख़ार भर दे। है सीना क्यों हाथ से गया दव, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 10 ॥ (8) (फिर कृष्ण जी कहते हैं कि ऐ प्यारे अर्जुन!) जो पुरुष लहू का दर्या (अर्थात् संबन्धीयों को) चीरते हैं (अर्थात् मारते हैं), वह ही (स्वराज्य) असली तख्त पाते हैं, इसलिये ऐ प्यारे! सर्व सांसारिक संबन्धों को जला भी दो, पर यह सुन कर उस अर्जुन के रोमांच होते हैं, और गला रुकता जाता है। (9,10) (ऐसा स्वप्न आ रहा है कि) रात काली है, घनघोर घटा छा रही है, क्रूर वा रुधिर के प्यासे पशू (शेर हत्यादि) सामने हैं और बड़ा भारी जंगल है, उस वन में लड़का अकेला रोता है। ऐसा देख कर रोमांच हो रहे हैं, गला रुक रहा है। मगर पुष्पों के विस्तर पर ऐसा भयानक स्वप्न आ रहा है कि जो दिल में और आँखों में कांटे भर दे, परंतु ऐ प्यारे! अपने हाथ से तेरी छाती क्यों दव गयी? कि जिस के कारण ऐसा भयभीत स्वप्न आ रहा है, और रोमांच होते जाते हैं तथा गला रुक जाता है। Notes: 1 सच्चा या असली स्वराज्य, 2 सम्बन्धों को, 3 पशू, 4 बच्चा, 5 फूलों के, 6 आँखों में, 7 कांटे, 8 छाती।

न बाक़ी छोड़ेंगे हम कोई, थे इस इरादे से जम के बैठे। है पिछला लिक्खा पढ़ा भी गायब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 11 ॥ है बैठा पट्टों में कच्चा पारा, रही न हिलने की तांबो-ताक़त। न असर करता है नैश-अक़रब, खड़े हैं रोम और गला रुके हैं ॥ 12 ॥ पीये निगाहों के जाम रज कर, न सिर की सुध बुध रही न तन की। न दिन ही सूझे है, नैं तो अब शर्ब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 13 ॥ (11) हम इस विचार (संकल्प) से (गंगा किनारे) जम कर बैठे थे कि अब बाक़ी कोई विद्या नहीं छोड़ेंगे, मगर अब तो पिछला लिखा पढ़ा भी गुम हो गया है, रोंगटे खड़े हो रहे हैं और गला रुक रहा है। (12) पट्टों में ऐसा कच्चा पारा बैठ गया है (मस्ती का इतना जोश चढ़ गया) कि हिलने की भी ताक़त नहीं रही, और न अब बिच्छू का डंक ही कुछ असर करता है, बल्कि ऐसी हालत हो रही है "कि रोंगटे खड़े हो रहे हैं, और गला रुक जाता है"। (13) प्यारे की दृष्टि (दर्शन) रुपी अनुभव के प्याले, ऐसे भिर कर पिये हैं कि अपने सिर और तन की भी सुधिबुद्धि नहीं रही। अब न तो दिन सूझता है और न रात ही नज़र आती है, बल्कि रोमांच हो रहे हैं, और गला रुके जाता है। Notes: 1 भूल गया, 2 हिम्मत और बल, 3 बिच्छू का डंक, 4 प्याले, 5 नदों, 6 रात।

हवासे-ख़मसा के बन्द थे दर, किधर से क़ाबिज़ हुआ है आकर। बला का नश्शा, सितम तऽज्जुब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 14 ॥ यह कैसी आँधी है जोशे-मस्ती की, कैमा तूफ़ां सक़र का है। रही ज़मीं महं न मेहरो-कौकब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 15 ॥ थीं मन के मन्दिर में रक़्सां करतीं, तरह तरह की सी ख़्वाहिशें मिल। चिराग़े-ख़ाना से जल गया सब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥ 16 ॥ (14) पाँचो ज्ञान-इन्द्रियों के द्वार तो बन्द थे, मगर मालूम नहीं कि किस तरफ से यह (मस्ती का जोश) अन्दर आकर क़ाबिज़ हो गया है, जो बला का नशा है और सितम ढा रहा है, जिससे रोमांच खड़े हो रहे हैं, और गला रुके जा रहा है। (15) यह ज्ञान की मस्ती की कैसी घटा आ रही है और निजानन्द का जोश कैसे बढ़ रहा है कि पृथ्वी, चांद, सूर्य, तारे की भी सुधि बुधि नहीं रही, अर्थात् द्वैत बिलकुल भावमान नहीं हो रही, बल्कि रोंगटे खड़े हैं और गला रुका हुआ है। (16) मन रुपी मन्दिर में जो नाना प्रकार की इच्छायें नाच रही थीं, वह घर के दीपक से (आत्मानुभव से) सब जल गयीं, अर्थात् अपने अन्दर ज्ञान-अग्नि ऐसे प्रज्वलित हुई कि सर्व प्रकार के संकल्प जल गये और रोंगटे खड़े हो गये और गला रुक गया। Notes: 1 पाँचों ज्ञान-इन्द्रियों के, 2 द्वार, 3 बड़े ग़ज़ब का आश्चर्य, 4 आनन्द, 5 चांद, 6 सूर्य और तारे, 7 नाच करती, 8 घर का दीपक, निजात्मा के प्रकाश से।

है चौड़ चौपट यह खेल दुन्या, लपेट गंगा में इस को फैंका । मरा है फ़ीला', उड़ा है अशहब², खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥17॥ पड़ा है छाती पे धर के छाती, कहां की दुई³ कहां की वहृदत⁴ । है किसको ताक़त बियान की अब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥18॥ यह जिस्मे-फ़ज़ूं⁵ की मौत का अब, मज़ा समेटे से नहीं समिटता । उठाना दुभर⁶ है वेहमे-कुलिय⁷, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥19॥ कलेजे ठंडक है, जी⁸ में राहत⁹,भरा है शादी¹⁰ से सीनाये-राम¹¹ । हैं नैन¹² अमृत से पुर लबा लब, खड़े हैं रोम और गला रुके है ॥20॥ (17) यह दुन्या शतरन्ज के खेल की तरह है, इस (शतरन्ज रूपी खेल) को लपेट कर अब गंगा में फैंक दिया, वह फ़ीला मरा और वह घोड़ा मरा, यह देख कर रोम खड़े हो रहे हैं, वरु गला रुक रहा है। (18) अब प्यारा छाती पर छाती धर कर पड़ा है, अब तो कहाँ की द्वैत और कहाँ की एकता है ! किस को बताने की अब ताक़त है, केवल रोंगटे खड़े हैं और गला रुके हैं। (19) (यह जो आनन्द आ रहा है यह क्या है ?) यह संकल्पमयी (भासमान) शरीर की मौत का आनन्द है जो समेटे से भी नहीं सिमटता है। अब तो (इस आनन्द के भड़कने से) यह पंचभौतक शरीर उठाना भी कठिन हो गया है, क्योंकि आनन्द के मारे रोम खड़े हैं और गला रुक रहा है। (20) कलेजे(हृदय)में शान्ति है और दिल में अब चैन है, खुशीसे रामका हृदय भरा हुआ है,और नैन (आनन्दके) अमृतसे लबालब भरे हुये हैं, अर्थात् आनंदके मारे आँसू टपक रहे हैं,और रोम खड़ेहैं तथा गला रुक रहा है। Notes: 1 हाथी, 2 घोड़ा, 3 द्वैत, 4 एकता, 5 कल्पित शरीर, 6 कठिन, मुश्किल, 7 शरीर का अंश, 8 चित्में, 9 सुख, चैन, 10 खुशी, 11 राम का हृदय, 12 नेत्र।

[ 299 ] ग़ज़ल भैरवी, ताल पशतो कैसे रंग लागे, खुव भाग जागे, हरी गयी¹ सब भूख और नंगें मेरी । चूड़े साँच स्वरूपे के चढ़े हम को,टूट पड़ी जब काँच की वँगें मेरी ॥ तारों संगे आकाश में लशकतीं³ है, बिन डोर अब उड़ी पतंगें मेरी । झड़ी नूर⁵ की बरसने लगो ज़ोरों⁶, चंद सूर में एक तरंग मेरी ॥ [ 300 ] ॐ ग़ज़ल क़व्वाली ॐ बिठा कर आप पैहलू¹⁰ में, हमें आँखें दिखाता है। सुना बैठेंगे हम सच्ची, फ़क़ीरों को सताता है॥1॥ अरे दुन्या के वाशिन्दो¹¹ ! डरो मत बीम¹² को छोड़ो। यह शीरीं-क़¹³ तो मिसरी है, भवें नाहक़¹⁴ चढ़ाता है॥2॥ (1) राम का शरीर जब रोगी हुआ था तो राम अपने (प्रेमात्मा) स्वरूप से यूँ कहते हैं:—ऐ प्यारे (प्रेमात्मा) अपने समीप बिठला कर हमें आँखें दिखलाता है, यह याद रख, हम सच्ची कह बैठेंगे, क्या फ़क़ीरों को सताता है ? (2) ऐ संसारी लोगो ! मत डरो, भय को छोड़ दो, क्योंकि यह मधुर सुत्र वास्तव में मिसरी रूप है, परन्तु भवें व्यर्थ चढ़ा लेता है (अर्थात् ऊपर ऊपर से कोप में आ जाता है और वह भी व्यर्थ)। Notes: 1उड़ गई, दूर होगई, 2 शरम, 3 सत्यस्वरूप, 4पहनने का कड़ा,यहाँअभिप्राय अहंकार से है, 5 साथ, 6 चमकती, 7यहाँ वृत्ति से अभिप्राय है, 8प्रकाश की वर्षा, 9 ज़ोर से, 10 अपने पास, 11 संसार में वसने वालो, जगत्-निवासी, 12 डर, भय, 13 मधुर सुख, मीठे बोल वाला 14 व्यर्थ।

यह सलवटें डालना चेहरे पे गंगाजी से सीखा है। है अन्दर से महा शीतल, यह उपर से डराता है॥3॥ बनावट की ज़ुल्फ़ें पुरत्नौन² है उलफ़त³ से मुलव्व⁴ दिल। बनावट चालवाज़ी से यह क्यों भरें में लाता है॥4॥ अगर है ज़र्रे ज़र्रे में, बलकि लाखवें जुज़ में। तो जुव⁵ ओ-कुल भी सब वह है,दिगर⁶ छट उड़ ही जाता है॥5॥ निगाहे-ग़ौर रख क़ायम ज़रा वुर्क़ा⁷ को ताके जा। यह वुर्क़ा साफ उड़ता है, वह प्यारा नज़र आता है॥6॥ (3) चेहर पर बल डालना ने (शिकनी बढ़ाना) यह इमने प्यारे स्वरूप ने गंगा जी से सीखा है (क्योंकि बैइने समय गंगा के जल पर भँवर पड़ने हैं मगर अन्दर से जल बिलकुल ठंडा होता है, ऐसे ही यह प्यारा) अन्दर मे बड़ा शीतल है और ऊपर से डराता है। (4) प्यारे की बलों से भरी ललाट केवल बनावटी है क्योंकि दिल उस का प्रेम से लबालब भरा हुआ है, मगर मालूम नहीं कि यह बनावटी चालबाज़ों से लोगों को भरें में क्यों ले आता है। (5) अगर परमाणु मात्र में यह है और उस के लाखवें भाग में भी वह है, तब व्यष्टि और समष्टि भी वह ही सब है, उस से अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं सकता। (6) निरन्तर विचार-दृष्टि से (इस माया के) पर्दे को देखते जा, इस विवेक से यह पर्दा साफ उड़ जाता है और वह प्यारा (आत्मा-) दृष्टि गोचर होता है। Notes: 1 माथे पर बल, स्यूरी, रेखा वा स्यूरी से भरी पैशानी वा माथा, 3 प्रेम, 4 लबालब भरा हुआ, 5 परमाणु मात्र, 6 व्यष्टि और समष्टि,7दूसरा,8पर्दा।

तलातम¹-खेज़ हुस्नो-हुबनो²-बहरी है अहाहाहा। हवास-ओ-होश की किश्ती को दम भर में बहाता है॥7॥ हसीनों³! हुस्न-ओ-खूबी है मेरी ज़ुल्फ़े-सियाहँ⁴ का ज़िल⁵। सायम⁵ साया-परस्तों⁶ का पड़ा दिल तलमलाता है॥8॥ अरे शोहरत! अरे रुसवाई! अरे तोहमत! अरे बड़ाई। मरो लड़ लड़ के तुम अब राम तो पहला⁹ छुड़ाना है॥9॥ (7) यहाहाहा अर्थात् सौन्दर्य का समुद्र क्या लहरें मार रहा है, जो होश और हवास की नौका को दम भर में बहा ले जाता है, अर्थात् मन बुद्धि जिसे देख कर चकित हो जाते है। (8) ऐ, प्यारे सुन्दर पुरुषों! (यह याद रखो) तुम्हारी खूबसूरती (सुन्दरता) जो है वह मेरी काली ज़ुल्फ़ (माया) ही की केवल छाया (प्रतिबिम्ब) है, परछाईं (साया) को पूजने वालों का (रूप से मोहित वा माया-आसक्त पुरुषों का) चित्त व्यर्थ तलमलाता (टमटमाता) है। (9) ऐ यश! और अपयश! ऐ कलंक! ऐ बड़प्पन! तुम सब अब लड़ लड़ के मरो, राम तो तुम सब से साफ पहला छुड़ाता है (तुम से पृथक होता है)। Notes: 1 छैहरें मारने वाला, 2 सौन्दर्यता का समुद्र, 3 सुन्दर पुरुषों, 4 काली जुल्फ अर्थात् माया,5 छाया, प्रतिबिम्ब, 6 व्यर्थ है, 7 छाया से मोहित होने वाले, यहाँ अभिप्राय मायासक्त से है, 8 कलंक, 9 बुजुर्गी, बड़ाई, 10 अलग होता है।

[ 301 ] ॐ ग़ज़ल केहरवा ॐ (यह कविता पंजाबी भाषा में है इस में राम महाराज ईश्वर को सेवक का पद देकर पुरुष को उपदेश कर रहे हैं)। वाह वा कामां¹ रे नौकर मेरा, सुगर सियाना²रे नौकर मेरा (टेक) ख़िदमत करदयाँ करे न डरदा, रोज़ो-अज़ल³ तों सेवा करदा। लूं⁴ लूं⁵ दे विच रैंहदा वरदा, हर-शै-समाना⁶ रे नौकर मेरा॥1॥ जद मीला मौलापन⁷ छडदा, नौकर नखरे टखरे फड़दा। फिर भी टहलें ओह पूरी करदा, हर नाच नचाना रे⁸ नौकर मेरा॥2॥ [ 61 ] (टेक) वाह वाह काम करने वाले नौकर मेरे, शाबाश! वाह रे बुद्धिमान् नौकर मेरे, शावाश! (1) मेरा नौकर ईश्वर सेवा करने से कभी भी नहीं डरता है और अनादि काल से सेवा करता चला आता है। और (यह ऐसा नौकर है कि) मेरे रोम रोम में बसता है और सर्व वस्तु में रम रहा है। (2) जब ईश्वर अपने ईश्वरपन को छोड़ता है, अर्थात् जव यह पुरुष अपनी ब्रह्मदृष्टि को त्यागता है, तब ईश्वर रूपी नौकर भी उस समय नखरे टखरे करने लग पड़ता है, पर तौ भी वह सेवा पूरी करता है। वाह वाह! हर तरह के नाच नाचने वाला (काम करने वाला) मेरा नौकर है। Notes: 1 काम करने वाला, 2 बड़ा बुद्धिमान, अक्लमन्द, 3 अनादि काल से, 4 रोम रोम में, 5 नौकर, 6 प्रत्येक वस्तु में समाने वाला, सर्वव्यापक 7 ईश्वर 8 ईश्वरपन, ऐश्वर्य,9सेवा, 10हरनाच नाचनेवाला और नचाने वाला।

बादशाही छड अर्दल¹ मल्ली, पर यह शाह फ़ोलों कद चल्ली। नौकर नूं उठ चौरी झल्ली², हाय बीवा³ राना रे नौकर मेरा॥3॥ बे समझी दा झगड़ा पाया, नौकर तो इतबार⁴ उठाया। बिच दलीलों बहृत गँवाया, विश्वहे⁵ ग़ज़व निशाना रे नौकर मेरा॥4॥ लाया अपने घर विच हेरा, राम अकेला सूरज जेड़ा। नूर जलाल⁶ है नौकर मेरा,दिगर⁷ न जाना रे नौकर मेरा॥5॥ सुघड़ सियाना रे नौकर मेरा, वाह वाह कमां रे नौकर मेरा (टेक) (3) जब इस ने अद्वैत तत्व-दृष्टि छोड़ कर द्वैत-दृष्टि (मैं पापी, मैं पापात्मा वाली दृष्टि) एकड़ी, अर्थात् ईश्वरपना छोड़ कर उसकी चपरास इख्तयार करी और वजाये उस से सेवा कराने के उस की खुद सेवा करनी शुरू की (उसे चँवर करना शुरू किया), तो शाह (सब के मालिक पुरुष) से ऐसा कब तक सहन हो सकता था। निदान (ईश्वर) उसे चोटें दे दे कर उस से यह ख़राव दृष्टि छुड़ा देता है) इस वास्ते मेरा यह नौकर (ईश्वर) बड़ा अच्छा और योग्य है। (4) जो पुरुष अपने नौकर (ईश्वर) पर अपना विश्वास नहीं रखता, वह मूर्खता से उलट अपने घर में झगड़ा डाल लेता है, और तरह तरह की दलीलों में व्यर्थ समय खो बैठता है। अरे प्यारे! मेरा नौकर तो हर काम में ग़ज़व का निशाना लगाता है। (5) राम बादशाह ने, जो अकेला सूर्य है, जब अपने असली घर (स्वस्वरूप) में दिखती की, तो अपना नौकर स्वयं तेजामय ज्योति पाया, अन्य कोई नौकर नज़र न आया। अरे! यह मेरा नौकर बड़ा बुद्धिमान् है। वाह वाह काम करनेवाले मेरे नौकर! Notes: 1चपड़ास, 2 चँवरकरी, 3 भोला भाला, नेक, 4 विश्वास, यक़ीन, 5 छेड़े, बेधे, 6 तेजोमय ज्योति, 7 अन्य, दूसरा

[ 302 ] राग शंकरा भरण, ताल धुमाली हमें एक पागलपन दरकार॥टेक अक्ल नक़ल नहीं चाहिये हम को पागलपन दरकार॥हमें एक01 छोड़ पुवाड़े², झगड़े लारे, गोता वहृदत में अन्दर मार॥हमें एक02 लाख उपाय करले प्यारे! कद्दे न मिलसी यार॥हमें एक03 बेखुद⁴ होजा देख तमाशा, आपे खुद दिलदार⁵॥हमें एक04 [ 303 ] लावनी,ताल धुमाली कोई हाल मस्त, कोई माल मस्त, कोई तूती मैना खूप में। कोई खान मस्त, पैहरान मस्त, कोई राग रागनी दूहे⁶ में॥ कोई अमल मस्त, कोई रमल मस्त, कोई शतरंज चौपट जूप में। एक खुद मस्ती बिन अवर मस्त, सब पड़े अविद्या कूप में॥1॥ कोई अक्ल मस्त, कोई शक्ल मस्त, कोई चंचलताई हाँनी में। कोई वेद मस्त, कितेब मस्त, कोई मक्के में, कोई काशी में॥ कोई ग्राम मस्त, कोई धाम मस्त, कोई सेवक में, कोई दासी में। एक खुद मस्ती बिन अवर मस्त, सब बन्धे अविद्या फांसी में॥1॥ Notes: 1 फ़ाड़े बखेड़े, 2 एकता, अद्वैत, 3 कभी भी, 4 अहंकार रहित, 5 आशिक़, प्यारा, 6 तुकबन्दी में दोहे चौपाई में।

कोई पाठ मस्त, कोई ठाठ मस्त, कोई भैरों में, कोई काली में। कोई ग्रन्थ मस्त, कोई पन्थ मस्त, कोई श्वेत पीतरंगे लाली में॥ कोई काम मस्त, कोई ग्वाम मस्त, कोई पूर्ण में, कोई ख़ाली में। एक खुद मस्ती बिन अवर मस्त, सब बन्धे अविद्या जाली में॥3॥ कोई हाट मस्त, कोई घाट मस्त, कोई वन पर्वत ओजाड़ा³ में। कोई जात मस्त कोई पाँत मस्त. कोई तात भ्रात सुत दारा में॥ कोई कर्म मस्त कोई धर्म मस्त, कोई मसजिद ठाकुरद्वारा में। एक खुद मस्ती बिन अवर मस्त, सब वहे अविद्या धारा में॥4॥ कोई साफ मस्त,कोई खाक मस्त, कोई खासे में, कोई मलमल में। कोई योग मस्त, कोई भोग मस्त, कोई स्थिति में, कोई चलचल में॥ कोई ऋद्धि मस्त, कोई सिद्धि मस्त, कोई लेन देन की कल कल में। एक खुद मस्ती बिन अवर मस्त, सब फंसे अविद्या दलदल में॥5॥ कोई ऊर्ध्व मस्त, कोई अधः⁴ मस्त, कोई बाहर में, कोई अन्तर में। कोई देश मस्त बिदेश मस्त, कोई औषध में, कोई मन्तर में। कोई आप मस्त, कोई ताप मस्त, कोई नाटक चेटक तन्तर में। एक खुद मस्ती बिन, अवर मस्त, सब फंसे अविद्या यन्तर में॥6॥ कोई शुष्ट⁵ मस्त, कोई तुष्ट मस्त, कोई दीर्घ में, कोई छोटे में। कोई गुफा मस्त, कोई सुफा मस्त, कोई तूंबे में, कोई लोटे में॥ कोई ज्ञान मस्त, कोई ध्यान मस्त, कोई असली में, कोई खोटे में। एक खुद मस्ती बिन अवर मस्त, सब रहे अविद्या टोटे में॥7॥ Notes: 1 सफेद, 2 जर्द, पीला, 3 उजाड़, वियावान, 4 नीचे, 5 खाली, अतृप्त 6 प्रसन्न चित्त।

[ 304 ] राग सूजोटी, ताल तीन आ दे मुक़ाम उच्चे¹ आ मेरे प्यारिया! (टेक) पा गल्लै असली पागल हो जा, मस्त अलस्त सफा मेरे प्यारिया! आ दे01 ज़ाहर सूरत दौला³ मौला, वातन⁴ खास खुदा मेरे प्यारिया! आ दे02 टेक पुस्तक पोथी सुट्टें गंगा विच, दम दम अलख जगा मेरे प्यारिया! आ दे03 सेली टोपी ला दे सिर तों, रुण्ड मुण्ड होजा मेरे प्यारिया! आ दे04 इज़्ज़त फोकी फूक दुन्या दी, इक धतूरा खा मेरे प्यारिया! आ दे05 झगड़े झेड़े फैसल रिंदा, लेखा पाकैं चुका मेरे प्यारिया! आ दे06 लड़का वग़ल, ढण्ढोरा किहा⁶, ढूण्डन कितें न जा मेरे प्यारिया! आ दे07 Notes: 1 आ (अद्वैत तत्व) के पद पर, 2 रमज़, रहस्य (असली वस्तु), 3भोला भाला, 4 अन्दर से, 5 फैंक, 6 मान की (दुन्या की) पगड़ी, टोपी, 7 साफ हिसाब चेवाक़, 8 कैसा।

तेरी बुक्कल¹ बिच प्यारा लेटे, खोल तनी गल ला मेरे प्यारिया! आ दे08 आपे भुल, भुलावे आपे, आपे बने खुदा मेरे प्यारिया! आदे09 परदे फाड़ दूई² दे सारे, इक्को इक दिखा मेरे प्यरिया! आ दे010 [ 305 ] राग भैरवी, ताल दादरा अर हम ने. दिल सनम को दिया, फिर किसी को क्या। इसलाम³ छोड़ कुफ्र लिया, फिर किसी को क्या॥1॥ हमने तो अपना आप गिरेवां⁴ किया है चाक⁵। आप ही सिया, सिया न सिया, फिर किसी को क्या॥2॥ आँखें हमारी लाला, सनम! कुछ नशा पिया?। आप ही पिया, पिया न पिया फिर किसी को क्या॥3॥ अपनी तो ज़िन्दगी मियां! मिस्ले-हुवाब⁶ है। गो खिज़र⁷ लाख बरस जिया, फिर किसी को क्या॥4॥ दुन्या में हमने आ के भला या बुरा किया। जो कुछ किया सो हमने किया, फिर किसी को क्या॥5॥ Notes: 1बग़ल, गोद, 2द्वैत, 3प्यारा,4मुसलमानी धर्म, 5अपना कपड़ा या चोग़ा 6फाड़ा 7बुलबुले के सदृश, 8मुसलमानों में पानी के देवता का नाम है।

[ 306 ] राग मांड, ताल धुमाली भला हुआ हर बीमरो¹, सिर से टली बलाय। जैसे थे वैसे भये, अब कछु कहा न जाय॥1॥ मुख से जपूं, न करैं जपूं, उर³ से जपूं न राम। राम सदा.हम को भजे, हम पावें विश्राम⁴॥2॥ राम मरे तो हम मरे ? हमरी मरे बलाय। सत्पुरुषों का वालक्रा मरे न मारा जाय॥3॥ हद टप्पे सो औलिया⁵, बेहद टप्पे सो पीर। हद बेहद दोनों टप्पे, वाक़ा नाम फ़क़ीर॥4॥ हद हद करते सब गये, बेहद गया न कोय। हद बेहद मैदान में रह्यो कबीरा सोय॥5॥ मन ऐसो निर्मल भयो जैसो गंगा नीर⁶। पांछे पांछे हर फिरे, कहत कबीर, कबीर॥6॥ [ 307 ] राग ज़िला, ताल दादरा बाज़ीच-ए-इतफ़ाल⁷ है दुन्या मेरे आगे। होता है शबो रोज़⁸ तमाशा मेरे आगे॥1॥ Notes: 1 भूल गया, 2 हाथ, 3 दिल वा हृदय से, 4 आराम, 5 पैग़म्बर, 6 गंगा जल, 7 बच्चों का खेल, 8 रात और दिन।

इक खेल है औरंगे-सुलेमान¹ मेरे नज़दीक । इक बात है इजाज़े-मसीहा² मेरे आगे ॥ 2 ॥ जुज़³ नाम नहीं सूरते-आलम⁴ मेरे नज़दीक । जुज़ वहम⁵ नहीं हस्ती-ए-अशया⁶ मेरे आगे ॥ 3 ॥ होता है निहां⁷ ख़ाक में स्वहरा⁸ मेरे होते । बिसता है जबीं⁹ ख़ाक पे¹⁰ दरिया मेरे आगे ॥ 4 ॥ [ 308 ] राग ज़िला, ताल दादरा फेंके फ़लक को तारे, सब बख्श दूंगा मैं । भर भर के मुट्ठी हीरे, सब बख्श दूंगा मैं ॥ 1 ॥ सूरज को गर्मी, चांद का ठण्डक, गुहर¹¹ को आब¹² । यूं मौज¹³ अपनी आई, सब बख्श दूंगा मैं ॥ 2 ॥ गाली, गलोच, झिड़की, ताने करूं मुआफ । बोली, ठठोली, धमकी, सब बख्श दूंगा मैं ॥ 3 ॥ तारीफ से परे हूं, ऐबों से मैं बरी हूं । हम्दो-सना-दुआ¹⁴ भी, सब बख्श दूंगा मैं ॥ 4 ॥ Notes: 1 सुलेमान बादशाह का शाही तख्त, 2 हज़रत ईसामसीह की करामात, मोअज़्ज़ा, 3 सिवाय, 4 संसार का रूप वा दृश्य, 5 भ्रम, 6 पदार्थ की मौजूदगी, अथवा उस का दृश्य मात्र, 7 गुप्त होता, छिप जाता है, 8 जब्ज़, 9 माथा (मस्तक), 10 पृथ्वी पर, 11 मोती 12 चमक, 13 तरंग 14 स्तुति, उपमा और प्रार्थना ।

वाहिद¹ हूं ज़ाते-मुत्लक़², यां इम्तयाज़³ कैसी । औसाफ़⁴ को लुटा दूं, सब बख्श दूंगा मैं ॥ 5 ॥ बेहद्दे-बेकरां⁵ हूं, दरिया हूं बे किनार । बूं सैर की न छोडूं, सब बख्श दूंगा मैं ॥ 6 ॥ दिल नज़र मेरी कर दे, हूं शाहे-बेनियाज़⁶ । कौनो-मकां-ज़मां-ज़र⁷, सब बख्श दूंगा मैं ॥ 7 ॥ झगड़े, क़सूर क़ज़िये, अच्छे बुरे ख्याल । जूं⁸ ओस झट उड़ा दूं, सब बख्श दूंगा मैं ॥ 8 ॥ मौजूद कुछ नहीं है, मेरे सिवा यहां । वैह्मो-दुई⁹, गुमानो-शक¹⁰, सब बख्श दूंगा मैं ॥ 9 ॥ अक्लो-क़यास¹¹, जिस्मो-जां, मालो-दोस्तां । कर राम पर निसार, यह सब बख्श दूंगा मैं ॥ 10 ॥ [ 309 ] सवैया राग धनासरी सब शाहों का शाह मैं, मेरा शाह न कोय । सब देवों का देव मैं, मेरा देव न होय ॥ Notes: 1 एक, 2 वास्तविक तत्व, 3 विवेचना, अन्तर, भेद, फ़रक़, 4 गुण, 5 बेहद वियावां, 6 द्वैत की गन्ध, 7 उदार चित्त बादशाह, 8 देश काल वस्तु और सम्पत्ति, 9 सदृश, 10 द्वैत भ्रम, 11 संशय और अनुमान, 12 बुद्ध और ख्याल ।

चाबुक सब पर है मेरा, क्या सुल्तान¹ अमीर² । पता मुझ बिन न हिले, आंधी³ मेरी असीर⁴ ॥ [ 310 ] रागिनी जयजयवन्ती, वा राग एमन कल्याण, ताल चलन्त । तमाम दुन्या है खेल मेरा, मैं खेल सब को खिला रहा हूं । किसी को बेखुद बना रहा हूं, किसी को ग़म में डुला रहा हूं ॥ 1 ॥ अवस⁵ है सद्मा⁶ भले बुरे का, हो कौन तुम और कहां से आये । खुशी है मेरी, मैं खेल अपना, बना बना के मिटा रहा हूं ॥ 2 ॥ फिरो हो रूये-ज़िमीन⁷ पे यारो ! तलाश मेरी में मारे मारे । अमल करो, तुम दिलों में देखो, मैं नहने-अकरब⁸ सुना रहा हूं ॥ 3 ॥ कभी मैं दिन को निकालूं सूरज, कभी मैं शब को दिखाऊं तारे । यह ज़ोर मेरा है दोनों पांवों को मिस्ले-फिरकी फिरा रहा हूं ॥ 4 ॥ किसी की गर्दन में तौक़े-लानत⁹, किसी के सिर पर है ताजे-रहमत¹⁰ । किसी को ऊपर उछला रहा हूं, किसी को नीचे गिरा रहा हूं ॥ 5 ॥ Notes: 1 महाराजा अधिराज, 2 धनी, 3 घटा, 4 केद, अधीन, 5 व्यर्थ, 6 चोट, 7 पृथ्वी के ऊपर, 8 शाहरग (कंठ) से भी अधिक समीप ईश्वर है, 9 रात्रि, 10 लानत की ज़ंजीर, 11 कृपादृष्टि का ताज, तिलक,

[ 311 ] राग भैरवी, ताल चलंत । कहूं क्या रंग उस गुल¹ का, अहाहाहा, अहाहाहा । हुआ रंगीं² चमन³ सारा, अहाहाहा, अहाहाहा ॥ 1 नमक छिड़के है वह किस किस मज़े से दिल के ज़ख्मों पर । मज़े लेता हूं मैं क्या क्या, अहाहाहा, अहाहाहा ॥ 2 ॥ खुदा जाने हलावत⁴ क्या थी, आबे-तेग़े-क़ातिल⁵ में । तबे-हर-ज़ख्म⁶ है गोया, अहाहाहा, अहाहाहा ॥ 3 ॥ शारांगे⁷-वक़्र में क्या फ़र्क़, मैं समझूं कि दोनों में । है इक शोला-भड़का⁸ सा, अहाहाहा, अहाहाहा ॥ 4 ॥ बला-गर्दां⁹ हूं साक़ी¹⁰ का, कि जामे-इश्क़¹¹ से मुझ को । दिया घूंट है इक ऐसा, अहाहाहा, अहाहाहा ॥ 5 ॥ मेरी सूरत-परस्ती¹² हक़्क़-परस्ती¹³ है, कहूं मैं क्या ? कि इस सूरत में है क्या क्या, अहाहाहा, अहाहाहा ॥ 6 ॥ Notes: 1 फूल; (सुन्दर स्वरूप वा आत्मस्वरूप) 2 रंगदार (नाना प्रकार की), 3 बाग़, 4 मिठास, स्वाद, 5 क़ातिल की तलवार की धार, 6 हर घाव के समीप 7 श्रंगारा और बिजली, 8 भड़की हुई लाट, 9 कृतज्ञ, अर्पित हूं, 10 शराब (प्रेमामृत) पिलाने वाला, यहां आत्मज्ञानी वा गुरु से अभिप्राय है, 11 इश्क़ (प्रेम रस) का प्याला, 12 मूर्ति; पूजा (बुत परस्ती) 13 ईश्वर पूजा,

ज़फ़रे-ख़ालम में कहूं ? कहूं मैं क्या, तखवीयत की रवानी³ का । कि है उमड़ा हुआ दरिया, अहाहाहा, अहाहाहा ॥ 7 ॥ [ 312 ] ग़ज़ल क़व्वाली । गर यूं हुआ तो क्या हुआ, और वूं हुआ तो क्या हुआ । टेक था एक दिन वह धूम का, निकले था जब असवार हो । हर दम पुकारे था नक़ीव¹, आगे बढ़ो, पीछे हटो । या एक दिन देखा उसे, तन्हा पड़ा फिरता है वह । बस क्या ख़ुशी, क्या ना ख़ुशी, यक्सां है सब ऐ दोस्तो ! ॥ गर यूं॰ 1 या नेमतें खाता रहा, दौलत के दस्तर-ख़्वान पर । मेवे मिठाई वा मज़े, हल्वा-ओ-तुर्शी² और शकर । या वान्ह झोली भीख की, टुकड़े के ऊपर धर नज़र । होकर गदा फिरने लगा, कूचा बकूचा दर बदर ॥ गर यूं॰ 2 या इशारतों³ के ठाठ थे, आराइश⁴ के असबाब थे । साक़ी, सुराही, गुलबदन⁵, जामे-शराबे-नाब⁶ थे । या बेकसी के दर्द से बेहाल थे, बेताब थे । आखिर जो देखा दोस्तो । सब कुछ ख़याले-ख़्वाब थे ॥ गर यूं॰ 3 Notes: 1 कवि का नाम, 2 हाल (अवस्था), 3 रफ़्तार (चाल) गति, 4 कोतवान, कोतवार, 5 अहेला, 6 अच्छे अच्छे पदार्थ, 7 स्वादिष्ट, 8 खट्टा मीठा, 9 फ़क़ीर, 10 द्वार द्वार पर, या गली दर गली, 11 विषयानन्द अर्थात् भोगों के पदार्थ, 12 प्रेमरस की शराब पिलाने वाला, 13 शराब रखने का बर्तन, 14 पुष्प वर्ण की सुन्दर स्त्रियां, 15 प्याला, 16 अंगूरी शराब ।

जो इशारतें आ कर मिलीं, तो वह भी कर जाना मियां । जो दर्दो-दुःख आकर पड़े, तो वह भी भरजाना मियां । ख्वाह दुःख में, ख्वाह सुख में, यां से गुज़र जाना मियां । चार दिन की ज़िन्दगी, आखिर को मरजाना मियां ॥ गर यूं॰ 4 [ 313 ] ग़ज़ल, क़व्वाली, ताल दादरा पा लिया जो था कि पाना, काम क्या बाक़ी रहा । } (टेक) जानना था सोई जाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ } आ गया, आना जहां, पहुंचा वहां जाना जहां । अब नहीं आना न जाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 1 ॥ बन गया बनना बनाने बिन बना, जो बन बना ! अब नहीं [अस्पष्ट] होना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 2 ॥ जानते आय [अस्पष्ट] [अस्पष्ट] तैं हुआ । उठ गया बकना बकाना, [अस्पष्ट] बाक़ी रहा ॥ 3 ॥ लाख चौरासी के चक्कर से थकी [अस्पष्ट] कमर । अब रहा आराम पाना, काम [अस्पष्ट] रहा ॥ 4 ॥ स्वप्न के मानन्द यह सब अनहुआ [अस्पष्ट] रहा । फिर कहां करना कराना, काम क्या वा[अस्पष्ट] रहा ॥ 5 ॥ Notes: 1 विषय भोग, 2 सह जाना, 3 यहां, 4 बिना, 5 [अस्पष्ट], 6 बनाने की बस्तु, ताना, 7 समाप्त, फ़ैसल, 8 बिना हुए ही हो [अस्पष्ट]

बाल दो हथयार, मेरी राय पुख्ता अब हुई । लग गया पूरा निशाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 6 ॥ होने दो जो हो रहा है, कुछ किसी से मत कहो । सन्त हो किसि को सताना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 7 ॥ आत्मा के ज्ञान से हुआ कृतार्थ जन्म है । अब नहीं कुछ और पाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 8 ॥ देह के प्रारब्ध से मिलता है सब को सर्व कुछ । फिर जगत को क्यों रिझाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 9 ॥ घोर निद्रा से जगाया सद्गुरु ने वाह वा । अब नहीं जगना जगाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 10 ॥ मान कर मन में मियां, मौला का मेला है यह सचा । फिर बनूं अब क्या मौलाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 11 ॥ जान कर तौहीद का मनशा, शुबहा सब मिट गया । यूं ही गालों का बजाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 12 ॥ एक में कसरत-व-कसरत में भी एक ही एक है । अब नहीं डरना डराना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 13 ॥ अक़्ल से भी दूर है, कहने-व-सुनने से परे । हो चुका कहना कहाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 14 ॥ Notes: 1 सम्मति, 2 सन्तुष्ट, 3 खुशामद करना, चापलूसी करना, 4 गहरी, सुसुप्ति, 5 ईश्वर लीला, 6 मौलवी, पंडित, 7 अद्वैत, एकता, 8 सन्तव्य, 9 बहुत अनेक ।

रमज़ है तौहीद, यहां हुकमां की हिकमतें तंग है । हो गया दिल भी दीवाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 15 ॥ रह गये उलमा-व-फुज़ला हुक्म की तहक़ीक़ों में । भ्रम है पढ़ना पढ़ाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 16 ॥ द्वैत और अद्वैत के झगड़े में पड़ना है फ़जूल । अब न दांतों को घिसाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 17 ॥ जान कर दुनिया को पूरे तौर से ख़्वाबो-ख़याल । अब नहीं तपना तपाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 18 ॥ कुछ नहीं मतलब किसी से, सो रहा टांगें पसार । अब कहीं काहे को जाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 19 ॥ हो गयी दे दे के डण्डा, सारी शण्डा भी फ़ना । अब मिला निर्भय ठिकाना, काम क्या बाक़ी रहा ॥ 20 ॥ [ 314 ] नी ! मैं पाया मरहम यार । } जिस दे हुसन दी अजब बहार ॥ } जिस दा जोगी ध्यान लगावन । पीर पैग़म्बर निश दिन ध्यावन ॥ Notes: 1 इशारा, रहस्य, 2 अद्वैत, एकता, 3 अक्लमन्द, 4 अक्ल, बुद्धि, 5 पागल, 6 विद्वान और महात्मा, 7 दर्याफ़त, ढूंढ, 8 स्वप्न भ्रम, 9 नाश, 10 भय रहित और कवि का नाम भी है, 11 शाजी ! ऐ प्यारी; 12 अपना भेदी प्यारा, प्रेमात्मा, 13 सुन्दरता, सौन्दर्य ।

पंडित आलिम अन्त न पावन । तिस दा कुल अज़हार ॥ नी! मैं॰ ॥ 1 ॥ "मैं" "तू" दा जद भेद मिटाया । कुफ़र इस्लाम दा नाम भुलाया ॥ पैन ग़ैन दा फ़र्क़ गंवाया । खुल्या सब इसरार ॥ नी ! मैं॰ ॥ 2 ॥ वहदत कसरत विच समाई । कसरत वहदत हो के भाई ॥ जुज़ विच कुल दी सूझी पाई । बिसर गया संसार ॥ नी ! मैं॰ ॥ 3 ॥ कहन सुनन ते न्यारा जोई । लामकां कहे सब कोई ॥ "है" "नाहीं" दा झगड़ा होई । तिस दा गर्म बाज़ार ॥ नी मैं॰ ॥ 4 ॥ साक़ी ने भर जाम पिलाया । वे खुद हो के जशन मनाया ॥ ग़ैरीयत दा नाम गंवाया । हुई जय ज़ये कार ॥ नी मैं॰ ॥ 5 ॥ Notes: 1 विद्वान, 2 दृश्य, नाम रूप, 3 नास्तिकपन, 4 अद्वैत, 5 द्वैत से यहां अभिप्राय है, 6 भेद, रहस्य, 7 एकता, 8 अनेकता, 9 पसन्द आई, 10 व्यष्टि, 11 समष्टि, 12 स्थान रहित, अर्थात देश से परे 13 निजानन्द रूपी शराब पिलाने वाला, यहां गुरू से अभिप्राय है, 14 प्रेम प्याला अथवा आत्मानन्द का प्याला, 15 खुशी मनायी, 16 द्वैत भाग, भेद दृष्टि, 17 आनन्द का हुलास ।

[ 315 ] होरी, राग काल्ंगड़ा, ताल दीपचंदी । रे कृष्ण कैसी होरी तैंने मचाई, अचरज लख्यो न जाई । असत सत कर दिखलाई, रे कृष्ण कैसी होरी तैंने मचाई ॥ (टेक) एक समय श्रीकृष्ण के मन में होरी खेलन की आई । एक से होरी मचे नहिं कबहुं, यातें करूं बहुताई । यही प्रभु ने ठहराई, रे कृष्ण कैसी होरी तैंने मचाई ॥ 1 ॥ पांच भूत की धातु मिलाकर, अंड पिचकारी बनाई । चौदह भुवनन रंग भीतर भरकर, नाना रूप धराई । प्रकट भये कृष्ण कन्हाई । रे कृष्ण कैसी होरी तैंने मचाई ॥ 2 ॥ पांच विषय की गुलाल बनाकर, बीच ब्रह्मांड उड़ाई । जिस जिस नैन गुलाल पड़ी, उसकी सुध बुध बिसराई । नहीं सूझत अपनाई । रे कृष्ण कैसी होरी तैंने मचाई ॥ 3 ॥ बेद अंत अंजन की सलाका, जिस ने नैन में पाई । तिस का ही ठीक तम नाश्यो, सूझ पड़ी अपनाई । होरी कछु बनी न बनाई । रे कृष्ण कैसी होरी तैंने मचाई ॥ 4 ॥ [ 316 ] मरज़ी चेतन की जब झक मारन की होय । मृग तृष्णा के नीर में बह चलयो बिन तोय ॥ 1 ॥ Notes: 1 अपना आप, अपना स्वरूप, 2 सीख, सखाई, 3 अन्धकार, 4 जल ।

बह चलपो बिन तोय सहारा कहीं न पावे । इत उत घोते खाय बहोरी पाछे फिर आवे ॥ कहे गिरिधर कवी राय करूं मैं का पर अरज़ी । झक मारन की चेतन की जब होवे मरज़ी ॥ [ 317 ] काफी हुन मैंनूं कौन पछाने मैं कुछ हो गया होर (टेक) हादी मैंनूं सबक़ पढ़ाया ओथे पैरां न आया जाया । मुतलक़ ज़ात जमाल दिखाया वहदत पाया शोर ॥ 1 ॥ अव्वल हो के लामकानी, जाहिर वातन उस दा जानी । रहया न मेरा नाम निशानी मिट गया झगड़ा शोर ॥ 2 ॥ प्यारा ! आप जमाल दिखाले मस्त कलन्दर हो मतवाले । हंला दे हुन देख के चाले बुल्हा भुल गया कागांदी टोर ॥ 3 ॥ [ 318 ] इस क़दर महज़-तजल्ली हो गया । अक्स मिट कर नूर पैदा हो गया ॥ 1 ॥ Notes: 1 पुनः, 2 किंतु, 3 अब, 4 दूसरा, 5 गुरु, 6 पाठ, 7 वहां, 8 अन्य, 9 सत्यस्वरूप, 10 दर्शन, साक्षात्कार, 11 अद्वैत, 12 स्थान रहित, 13 बाहिर भीतर, 14 काक कौव्वों की, 15 चाल 16 आत्म ज्योति में लीन, 17 प्रतिबिम्ब ।

वन्दगी है बन्दह वनने के लिये। जब हुआ आज़ाद मौला हो गया ॥ 2॥ ग़ैरे-हक़¹ दिल में जहां आया ख़याल। बुत² ख़ुदा के घर में पैदा हो गया ॥ 3॥ साथ है सूरत के सूरतें-आफ़रीं³। नक़्श पर नक़्क़ाशों⁴ शैदा हो गया ॥ 4॥ शकले-अहद⁵ में अहद⁶ था जल्वहगरं। देखने वालों को धोखा हो गया ॥ 5॥ दार पर चढ़ कर कहा मनसूर ने। आज अपना बोल वाला हो गया ॥ 6॥ सुन के आसी तिरी ख़ुश अलहानिया। बुलबुले-शीराज़ गोया हो गया ॥ 7॥ [. 319 .] मुझी से हुई इब्तदाये—दोआलम। मुझी में क़याम इनका रहता है मुहकम॥ Notes: 1 ईश्वर से इतर अर्थात् अनात्मा, 2 मूर्ति, प्रतिमा, 3 स्तुति योग्य मूर्ति, 4 चित्रकार मूर्ति खैंचने वाला, 5 हज़रत अहद के रूप में, 6 भेद, बहु, 7 प्रकाशमान्, 8 सूली, 9 एक मस्त का नाम, 10 कवि का नाम, 11 मधुर स्वर, 12 बोलने वाला, 13 दोनों लोक, (अर्थात लोक पर लोक) का प्रारम्भ, 14 स्थिति, 15 दृढ़।

मुझी में फ़ना होंगे एक रोज़ एक दम। शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं ॥ 1॥ मैं दरया हूँ और मुझ में बेहद हैं क़तरे। मैं सूर्य हूँ और मुझ से रौशन हैं ज़र्रे॥ अहा हा अज़व देखता हूँ तमाशे। शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं ॥ 2॥ चमक है मेरी मेहरो-मह की ज़िया में। दमक छालो-गुहर की आबो-सफ़ा में॥ खिला में मिरा नूर है और मला में। शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं ॥ 3॥ बहिश्त बरी मेरा जल्वह जमाली। जहन्नम के तवक्कों हैं शकले-जलाली॥ मेरी शानवहो-गुमान से है शाली। शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं ॥ 4॥ फ़लक पर मलिक और ज़मीपर वशर हूँ। यहाँ हूँ, वहाँ हूँ, इधर हूँ, उधर हूँ॥ जिधर देखिये मिह्र मैं जल्वहगर हूँ। शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं, शिवोऽहं ॥ 5॥ Notes: 1 नाश, 2 असंख्य, 3 सूर्य और चाँद, 4 रौशनी, प्रकाश, 5 लाल मोती, 6 शुद्ध चमक, 7 आकाश, एकान्त, 8 उपज्योति, प्रकाश, 9 भीड़, समूह, समाज, 10 सबसे ऊँचा स्वर्ग लोक अर्थात् ब्रह्मलोक, 11 सौन्दर्य व महिमा की विभूति, 12 नरक, दोज़ख़, 13 वैभव का रूप, 14 भ्रम और शंका, 15 वर्षा, 16 आकाश या परलोक, 17 फरिश्ता, देवता, 18 मनुष्य वा प्राणी, 19 कवि का नाम, 20 प्रकाशवान्।

[ 320 ] ग़ज़ल ये होश हैं तो हम हैं, हुश्यार हैं तो हम हैं मय नोश हैं तो हम हैं, दींदार हैं तो हम हैं ॥ 1॥ अपने सिवा नहीं है हस्ती किसी की हरगिज़। बे जान हैं तो हम हैं, जांदार हैं तो हम हैं ॥ 2॥ गुलशन में हम हैं नज़हत, सहरा में हम हैं वहशत। गर फूल हैं तो हम हैं, गर ख़ार हैं तो हम हैं ॥ 3॥ अलफ़ाज़ और मआनी दिल से हमारे निकले। गर नस्र हैं तो हम हैं, अशआर हैं तो हम हैं ॥ 4॥ अय्यारी और यारी दोनों की तह में हम हैं। गर यार हैं तो हम हैं, अशरार हैं तो हम हैं ॥ 5॥ झगड़ा भी तह करो तुम ऐ शेखे-रिन्द अपना। बेदीन हैं तो हम हैं, दींदार हैं तो हम हैं ॥ 6॥ इल्म और जह्ल पहलू दो अपनी ज़ात के हैं। नादान हैं तो हम हैं हुश्यार हैं तो हल हैं ॥ 7॥ हम से है सब अमीरी, हम से है सब फ़क़ीरी। ज़रदार हैं तो हल हैं, नादार हैं तो हम हैं ॥ 8॥ Notes: 1 प्रेम मद पीने वाले, 2 धार्मिक, 3 बाग़, 4 सुगन्ध, 5 जंगल वियाबान, 6 पशुत्व, 7 काँटा, 8 शब्द, 9 अर्थ, 10 गद्य, 11 पद्य, 12 बदमाशी, 13 चालाक, बदमाश, 14 विद्या, 15 अविद्या, 16 निजात्मा, निज स्वरूप, के 17 धनी, 18 निर्धन।

हम ही निहां रहे हैं, हम ही अयाँ हुए हैं। गर कशफ़ हैं तो हम हैं, असरार हैं तो हम हैं ॥ 9॥ हैं शैख़ सोमये हैं और रिन्द मय-कदे में। हुद्यार हैं तो हम हैं, सरेशार हैं तो हम हैं ॥ 10॥ अपनी है सारी बरकत, अपनी है सारी हरकत। रफ़्तार हैं तो हस हैं, गुफ़्तार हैं तो हम हैं ॥ 11॥ वहृदत में हम निहां हैं, कसरत में हम अयाँ हैं। मस्तूर हैं तो हम हैं, दो चार हैं तो हम हैं ॥ 12॥ मुनकर हैं जो वह अगले और जो मुक़र वह अपने। इक़रार हैं तो हम हैं, इन्कार हैं तो हम हैं ॥ 13॥ ख़ुद कहते हैं अनलहक़, ख़ुद पाते हैं सज़ायें। मन्सूर हैं तो हम हैं, और दार हैं तो हम हैं ॥ 14॥ अपने ही दम से सारी गुलज़ार की फ़िज़ा है। गर वग़ हैं तो हम हैं, गर वार हैं तो हम हैं ॥ 15॥ जिन्नतें जमाल अपना, दोज़खें जलाल अपना। गर तूर हैं तो हम हैं, गर नार हैं तो हम हैं ॥ Notes: 1 गुप्त, अप्रकट, अविद्यमान, 2 प्रकट, विद्यमान, 3 साक्षात्कार, 4 गुप्त रहस्य, 5 पुजारी वा पादरी, 6 शराब खाना, 7 दोनों से पूर्ण, 8 चेष्टा, 9 बात चीत, बोल चाल, 10 अद्वैत, 11 गुप्त, 12 प्रकट, 13 छुपे हुए वा परदे में, 14 इन्कार करने वाला, 15 स्वीकार करने वाल, 16 शिवोऽहं, 17 मस्त का नाम, 18 सूली, 19 बाग़, 20 रौनक़, 21 पत्ते फूल, 22 फल व फलों का भार, 23 स्वर्ग, 24 वैभव, 25 नरक, 26 गौरव, सामर्थ्य, 27 पर्वत का नाम, 28 अग्नि।

हर शक्ल है हमारी, हर नाम है हमारा। ऐ मेहर! तुम से हर जा, दो चार हैं तो हम हैं ॥ 16॥ [ 321 ] बने ध्यान में जिस के ध्यानी हैं मज़नूँ। हुए ज्ञान पर जिस के ज्ञानी हैं मफ़तूँ॥ पढ़ा जिस का जोगी यति ने है अफ़सूँ। वही आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ ॥ 1॥ कर्म जिस के मिलने को करता है कर्मी। धर्म जिस के पाने को करता है धर्मी॥ मर्म जानता है फ़क़त् जिस का मर्मी। वही आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ ॥ 2॥ जिसे यज्ञ और दान से ढूँढ़ते हैं। जिसे तप और ज्ञान से ढूँढ़ते हैं॥ जिसे धारणा ध्यान से ढूँढ़ते हैं। वही आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ ॥ 3॥ न आग़ाज़ जिसका, न अंजाम जिस का। जहाँ देखिये, जल्वह है आम जिस का॥ हर इक शक्ल जिस की, हर इक नाम जिस का। वही आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ ॥ 4॥ जिसे सुन के इन्सान् कहता नहीं है। जिसे देख कर होश रहता नहीं है॥ Notes: 1 कवि का नाक, 2 सर्वत्र, 3 पागल, मस्त, आसक्त, 4 नोक्झोंकर, कहानी, कथा, 6 केवल, 7 आरम्भ, 8 अन्त, 9 दर्शन, प्रकाश।

जिसे पा के दुःख कोई सहता नहीं है। यही आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ ॥ 5॥ ज़मानो-मकान में हुआ जो नुमायाँ। अलम में हुआ वन के इल्हर्त जो पिन्हा॥ गरज़ जिस से मुमकन है नैरंग-ए-मकाँ। वही आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ ॥ 6॥ किसो शै की हस्ती नहीं जिस से बाहिर। हर इक नूर जिस नूर से है मुनव्वर॥ जो बेमिसल आनन्द का है समुन्दर। वही आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ ॥ 7॥ जिसे मेहर मौजूद माना है सब ने। जिसे अपना मक़्सूद माना है सब ने॥ जिसे ग़ैरमहदूद माना है सब ने। वही आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ ॥ 8॥ [ 322 ] ग़ज़ल हर बार नई शक्ल से आलम में अयाँ हूँ। हूँ तिफ़ला कभी, पीर कभी, गह जवां हूँ ॥ 1॥ Notes: 1 देश, काल, 2 प्रकट, विद्यमान, 3 कारणों में, 4 कारण, 5 छिपा हुआ, अप्रकट, गुप्त, 6 नानत्व, 7 सम्भवता, 8 प्रकाश, ज्योति, 9 प्रकाशवान् या ज्योतिमय, 10 अद्वितीय, 11 सूर्य, अथवा कवि का नाम, 12 ध्येय, लक्ष्य, उद्देश्य, 13 अपरिच्छिन्न वा अनन्त, 14 रूप, 15 सृष्टि, जगत, 16 प्रकट, विद्यमान, 17 बालक, शिशु, 18 वृद्ध, 19 कभी।

मसजिद में कभी हूँ कभी बुतख़ाने में मस्कन। वाइज़ हूँ किसी जा पे कहीं पीरमुग़ाँ हूँ ॥ 2॥ मिसले-दहने-यार हूँ एक नुक्तए-मौहूम। क्या कोई क़ज़िया हूँ कि मुहताजे-वियाँ हूँ ॥ 3॥ बनता हूँ मुसव्वर कभी और कभी तस्वीर। गोया हूँ कभी और कभी गूँगे की ज़ुबान् हूँ ॥ 4॥ कहता हूँ जो मन्सूर के मानिन्द अनलहक़। मैं होश में उस वक़्त असद अपने कहां हूँ ॥ 5॥ [ 324 ]⊗ ग़ज़ल मुझे बेखुदी! तू ने भली चाशनी चखाई। किसी आरज़ू की दिल में नहीं अब समाई ॥ 1॥ न हज़र है, न ख़तर है, न रजा है, न दुआ है। न ख़याले-बन्दगी है, न तमन्ना है ख़ुदाई ॥ 2॥ Notes: 1 मन्दिर, रहने वाला, स्थित, 2 उपदेशक, मौलवी, पूजारी गुरु, 5 प्यारे के मुँह के सदृश, 6 कल्पित बिन्दु, 7 वृतान्त, कहानी, वार्दात, 8 जिस के वर्णन करने की आवश्यकता है, 9 चित्रकार, 10 चित्र, 11 वक्ता, 12 एक मस्त का नाम, 13 सदृश, 14 शिवोऽहँ, अहं ब्रह्मास्मि, 15 कवि का नाम, 16 इच्छा, जिज्ञासा, 17 भय, 18 डर, 19 आशा, विश्वास, 20 प्रार्थना, 21 सन्ध्योपासना का विचार, 22 अभिलाषा। ⊗ बीच में भजन नं॰ 278 की संख्या दो बार भूल से दी गई थी इस लिए यहाँ एक संख्या जान बूझ कर बढ़ा दी गई है।

न मुक़ामे-गुफ़्तगू है, न महले-जुस्तजू है। न वहाँ हवास पहुंचें, न ख़िरद को है रसाई ॥ 3॥ न मकाँ है न मकीं है, न ज़माँ है न ज़मीं है। दिले-बेनवा ने मेरे, वहाँ छावनी है छायी ॥ 4॥ न वसाल है, न हिज्रां, न सरूर है, न ग़म है। जिसे कहिये ख़्वाबे-ग़फ़लत, सो वह नींद मुझको आई ॥ 5॥ [ 325 ] ग़ज़ल जिधर देखता हूँ ख़ुदा ही ख़ुदा है। ख़ुदा से नहीं चीज़ कोई जुदा है ॥ 1॥ जब अव्वल और आख़िर ख़ुदा ही ख़ुदा है। तो अब भी वही, कौन इस के सिवा है ॥ 2॥ है आवाज़-व-अख़्ज़ाम जेवरों का ज़र में। म्यान में न हरगिज़ वह ग़ैरे-तिला है ॥ 3॥ वही आप हर एक सूरत में आया। कहीं आबो-आतिश, ज़मीनो-हवा है ॥ 4॥ Notes: 1 बात का स्थान, 2 जिज्ञासा का स्थान व आधार, 3 ज्ञान-इन्द्रियां, 4 बुद्धि, 5 पहुंच, 6 देश, स्थान, 7 स्थान वाला, 8 काल, 9 पृथिवी, 10 विना हथ्यारों वा साधनों के दिल ने, 11 मिलाप, 12 जुदाई, 13 आनन्द, चैन, 14 सुसुप्ति, 15 आरम्भ, आदि, 16 अन्त, 17 भूषण, 18 स्वयं, 19 बीच में, 20 कदापि, 21 स्वर्ण से भिन्न, 22 जल-अग्नि।

ख़ुदा में दूई को जो देता दख़ल है। वही काफ़रो-मुन्कर व अहले-ख़ता है ॥ 5॥ कहां उसको दूर और जुदा ढूँढ़ते हो। हमेशा है हाज़िर न हरगिज़ छुपा है ॥ 6॥ जिसे तुम समझते हो दुन्या ऐ ग़ाफ़िल! यह कुल हक़ ही हक़, न जुदा न मिला है ॥ 7॥ सफ़ाती-यक़ीन से हटा दिल को देखो। यही एक ज़ाते-ख़ुदा जा वजा है ॥ 8॥ यही चीज़ ज़ाता, यही है सफ़ाती। सिर्फ़ इक तय्यन में दो हो रहा है ॥ 9॥ नज़र आती है मुख़्तलिफ़ सूरतें गो। मगर रूये-मानी से सब यक्ता है ॥ 10॥ हर इक चीज़ हस्ती में अपनी है क़ायम। नहीं पैदा होता नहीं कुछ फ़ना है ॥ 11॥ नहीं होता हरगिज़ फ़ना का फ़ना भी। हुआ इससे साबित बक़ा ही बक़ा है ॥ 12॥ धर्मदास समझेगा वह बात मेरी। दूई से किया जिस ने दिल को सफ़ा है ॥ 13॥ Notes: 1 द्वैत, 2 नास्तिक, ईश्वर न मानने वाला, 3 अपराधी, 4 अज्ञानी, 5 सत्य स्वरूप, 6 गुण और रूप अर्थात् नामरूपपर विश्वास, 7 सर्वत्र, 8 असली, 9 नक़ली, 10 उपाधि व ख़याल, 11 भिन्न-भिन्न रूप, 12 यद्यपि, 13 भीतर से, लक्ष्यार्थ से, 14 एक ही, 15 निज स्वरूप, 16 स्थित, 17 नाम, 18 सिद्ध, 19 अविनाशी।

राम-वर्षा दूसरा भाग विविध तरंग