तीन शरीर और वर्ण
तीनों अंशों में ग़ज़ल (1) जाने-मन ! जिस्म एक खिलता है । इसके उतरे न कुछ बिगड़ता है ॥ याद रख, तू नहीं यह जिस्मे-कसीफ़ । और हरगिज़ नहीं तू जिस्मे-लतीफ़ ॥ जिस्म तेरा कसीफ़ ओवर-कोट । जिस्म तेरा लतीफ़ अंडर-कोट ॥ जिस्म बेरूनी झट बदलता है । जिस्म अन्दर का देरपा सा है ॥ देह स्थूल मर गया जिस वक्त । देह सूक्ष्म चला गया उस वक्त ॥ देह सूक्ष्म फिरे है आवागमन । तू तो हर जा है, आना जाना कौन ॥ Notes: 1 शरीर, 2 ऐ मेरी जान ! ऐ मेरे प्यारे ! 3 चोगा, कोट है, 4 स्थूल, शरीर, 5 सूक्ष्म शरीर, 6 स्थूल, 7 कोट के ऊपर का कोट, 8 कोट के नीचे का कोट, 9 बाह्य शरीर अर्थात् ओवर कोट, 10 देर तक रहने वाला, 11 हर जगह है ।
(2) पक्की मट्टी के बेशुमार घड़े । भर के पानी से, धूप में घर दे ॥ जितने बर्तन हैं, अक्स भी उतने । मुख़्तलिफ़ से नज़र आयेंगे ॥ लैक सूरज तो एक है सब में । और जो सायंस पढ़ा हो मकतब में ॥ तब तो जानोगे तुम, कि यह साया । आब अन्दर कमी नहीं आया ॥ नूर बाहर है, लैक धोखे से । बीच पानी के लोग थे समझे ॥ अब यह पानी घड़े बदलता है । टूटते हैं सबू, यह रहता है ॥ पानी जिस्मे-लतीफ़ को जानो । मट्टी जिस्मे-कसीफ़ पहिचानो ॥ जाने-मन ! तू तो मिहरे-ताबां है । एक जैसा सदा दरख़शां है ॥ जैहल से है तू क़ैदे-क़ालिब में । तुझ में सब कुछ है, तू ही है सब में ॥ गो यह जिस्मे-लतीफ़ पानी सां । बदलता है हमेशा ही अबदान ॥ पर तेरी ज़ाते-कुद्से-वाला का । बाल हरगिज़ न हो सका बीड्ढ़ा ॥ Notes: 1 प्रतिबिम्ब, 2 पानी, जल, 3 प्रकाश, 4 घड़े, ठलिया, 5 प्रकाश करने वाला सूर्य, 6 चमकने वाला, प्रकाशस्वरूप, 7 अविद्या, अज्ञान, 8 शरीर की क़ैद, 9 बहुत शरीर, देह, 10 तेरा परम शुद्ध स्वरूप (आत्मा) 11 टेढ़ा ।
मेरे प्यारे ! तू आफ़ताब ही है । अक्स मुतलक़ नहीं, तू आप ही है ॥ रूये-अनघर ज़रा दिखा तो दे । पानी उड़ता है, अक्स हो कैसे ? ॥ कैसा पानी, कहां तनासख़ें हो ? । मैं ख़ुदा हूँ, पक़ीन राखख़ हो ॥ इल्मे-औप्टिक्स से गर करो कुछ और । तो सुबू, आब, मिहर से नहीं और ॥ यह ज़मीन और सारे सय्यारे । चश्मा-ए नूर से नहीं न्यारे ॥ नैवूलर मसले को जाने दो ! । एक सीधी सी बात यूं देखो ॥ यह जो आबो-सुबू-ओ-सहरा है । रात काली में किस ने देखा है ॥ चश्म जब आफ़ताब ने डाली । पानी बर्तन दिखाये वनमाली ॥ आप बर्तन है, आप पानी है । क्या अजब राम की कहानी है ॥ आप मज़हर है, साया अफ़गन आप । साया मज़हर कहां ? है आप ही आप ॥ क्या तइय्यर है, हाये हैरत है । और से क्या ग़ज़ब की तैरत है ॥ Notes: 1 प्रकाश वाला स्वरूप, (अपना स्वरूप) 2 आवागमन (मरना और फिर जीना), 3 सच्चा व पक्का, निश्चय, 4 नज़र, दृष्टि का शास्त्र, 5 घड़े, पानी और सूरज, 6 आकाश के तारे इत्यादि, 7 प्रकाश के स्रोत, ख़ज़ाने से = जुदा, पृथक्, 8 आकाश के तारे इत्यादि की विद्या के भेद, 10 जंगल, 11 जगह ज़ाहिर होने की, 12 प्रतिबिम्ब डालने वाला, 13 आश्चर्य ।
कैसी माया, यह कैसा तिलिस्म है । दुनियाँ तो हैरते-मुज़स्सम है ॥ अब ज़रा और खोज कीजेगा । यह अचम्भा अजीब है माया ॥ कहिये आश्चर्य क्या कहाता है ? । इन्तहा का मज़ा जो आता है ॥ इन्तहा का मज़ा है आनन्दघन । यानी खुद राम सच्चिदानन्द घन ॥ पस यह माया भी आप ही है ब्रह्म । नाम रूप हैं कहां ? है खुद ही ब्रह्म ॥ उमड आयी हो गर स्पाहे-वैहम । फिर भगा दो उसे, न जाना सैइम ॥ माया माया की कुछ नहीं दरअसल । वसल कैसे हो, अहद में कब फ़सल ॥ इस को देखें वइतवारे अबद । तब तो माया यह जैहल है वेदर्द ॥ प्राण, अव्यक्त और अविद्या भी । इल्लते-औला है, नाम इस के ही ॥ ख़्वाबे-ग़फ़लत है, घन सुषुप्ती है । दीद कारण भी यह कहलाती है ॥ आलमे-ख़्वाब और बेदारी । इस ही चश्मे से होगये जारी ॥ Notes: 1 जादू, 2 आश्चर्यरूप, 3 विचार, सोचा, 4 भ्रम की फ़ौज (सेना), 5 डर, भय, 6 श्रद्धेत, एक, 7 फ़ासला, अन्तर, 8 जीव के लिहाज़ से, जीव दृष्टि से, 9 अविद्या, अज्ञान, 10 सबसे पहिला कारण, इत्यादि, 11 स्वप्न, 12 दृष्टि, 13 जाग्रत ।
[ 370 ] कारण शरीर । (3) जौग्रफी में नक्शा दरिया का । ज्यूं शजर सरनगूं है दिखलाया ॥ गरचि निसबत शजर से रखता है । जड़ को ऊंचा तने से रखता है ॥ बेख़ दरिया की वरफ़ जड़ क़ायम । रहती कैलास पर ही है दायम ॥ मुर्तफ़ा बेख़ की तरह कारण । मुख़्तमिद सर्द ठोस ज़र्रीन तन ॥ सख़त मस्ती ग़रूर से भरपूर । नेस्ती, लाशरीक, हर्कत दूर ॥ [ 371 ] सूक्ष्म शरीर । इस ही कारण शरीर से पैदा । यह लतीफ़ो-कसीफ़ जिस्म हुआ ॥ ऊंचे कोहों पै बर्फ़ सारे हैं । सोने चान्दी की झलक मारे है ॥ Notes: 1 भूगोल, 2 वृक्ष, 3 सिर के बल, उलटा मुँह ( अर्थात् ऊर्ध्व मूल मधा शाखा; गीता ) 4 मूल, जड़, 5 नित्य, 6 ऊंचे उठी हुई अर्थात् ऊंची जड़ वाले की तरह, 7 जमा हुआ, 8 सुनैहरी तन वाली, 9 अव्यक्त, 10 अद्वितीय, 11 सूक्ष्म और स्थूल, 12 पर्वत ।
पिघलते पिघलते बर्फ़ यही । पर्वतों पर बनी है गंगा जी ॥ इस से शफ़्फ़ाफ़ नदियां बहती हैं । खेलती जिन में लैहरें रहती हैं ॥ कोह का, फूल का, फल का, पत्तों का । साया लैहरों पै लुत्फ़ है देता ॥ नन्हें, नन्हें यह सब नदी नाले । बर्फ़ ऊंची के बाल के बाले ॥ देनी निसबत वन्हें मुनासिब है । देह सूक्ष्म से, औ न वजिब है ॥ देह सूक्ष्म है "फिक्रो-अक़्लो-होश । इम्त्याज़ो ख़यालो-गुफ़्तो-नोश" ॥ आलमे-ख़्वाब में यही सूक्ष्म । चलता पुर्ज़ा बना है क्या चम ख़्रम ॥ रेढ़े तिछे कलोल करता है । चुहल पुहलों में क्या लचकता है ॥ बर्फ़ जड़ जो शरीर कारण है । ज़ोरे-अन्वारे-मिहरे-रौशन है ॥ देह सूक्ष्म रसी से ढलता है । ज्यूं पहाड़ी नदी निकलता है ॥ Notes: 1 छोटे छोटे, 2 अक़्ल, होश, तमीज़, ख़याल, वाणी और श्रोतादि इन्द्रियाँ ये सब ( अन्तःकरण ) सूक्ष्म शरीर कहलाता है, 3 स्वप्नावस्था, 4 प्रकाश स्वरूप सूर्य ( आत्मा ) के तले ( नीचे ) है ।
[ 372 ] ☙ स्थूल शरीर ☙ ख़्वाब गुज़रा तो जाग्रत आई । नदी मैदान में उतर आई ॥ ज्यूं ही सूक्ष्म ने क़दम यहां रक्खा । गदला ख़ाकी कसीफ़ जिस्म लिया ॥ या कहो यूं कि जिस्मे-नाज़ुक ने । सूफ़ मोटे के कपड़े पहिने ॥ शव को शीरीं-वदन जो सोता है । जामा तन से उतार देता है ॥ जब ज़मिस्तां की रात आती है । नंगा दरिया को कर सुलाती है ॥ दरिया का करके मुशाहदा देखा । खिर्क़ा हर साल में नया ही था ॥ ठीक इस तौर पर ही, जिस्मे-लतीफ़ । बदलता पैरहन है जिस्मे-कसीफ़ ॥ यूं तो हर शव लिबासे-ज़ाहिर को । दूर करता है बदने-दरबर को ॥ इल्ला फिर सुबह पैहन होता है । स्थूल देह में फिर आन रहता है ॥ Notes: 1 मोटा, स्थूल, 2 सूक्ष्म शरीर, 3 कपड़ा, वस्त्र, लिबास, 4 शरद ऋतु, शीत काल, 5 दृष्टि, नज़र करना, 6 वस्त्र, लिबास, 7 पोशाक, 8 अपने ऊपर के शरीर को, 9 किन्तु ।
[ 373 ] ☙ आवागमन । ☙ लैक मरते समय यह जिस्मे-लतीफ़ । बदलता मुतलक़नें है जिस्मे-कसीफ़ ॥ जब पुरानी यह हो गयी पोशाक । दे उतारी यह फैंक दी पोशाक ॥ कैंचली चोला को उतार दिया । और ही जिस्म फिर तो उधार लिया ॥ इस को कहते हैं हिंदू आवागमन । बदलना जिस्म का है आवागमन ॥ [ 374 ] ☙ आत्मा । ☙ मिहरे जो बर्फ़ पर दरख़शां था । साफ़ नालों पे नूर-अफ़शां था ॥ वही स्थूल रवद्-मैदान पर । जल्वा अफ़गन था, आबे-हैरां पर ॥ एक दरिया के तीन मौक़ों पर । मिहर है एक हाज़िरो-नाज़िर ॥ Notes: 1 बिल्कुल, निःशान्त, 2 सूर्य, 3 चमकीला, 4 प्रकाश छिड़कता था, 5 मैदान की नदी, 6 प्रकाश अर्थात् अपरा विश्व डालने वाला है, 7 चंचल जल ।
बल्कि दुनियां के जितने दरिया हैं । तैहते परतों सभों के सेह जा हैं ॥ आत्मा एक तीन जिस्मों पर । जल्वा-अफ़गन है, हाज़िरो-नाज़िर ॥ सारी दुन्या के तीन जिस्मों पर । एक आतम है बातनो-ज़ाहिर ॥ आना जाना नहीं है आत्म में । यह तो मफ़रूज़ सब हुये तन में ॥ आत्मा में कहां की आवागमन । आये किस जा ? और जाये कौन ? ॥ [ 375 ] ☙ तीन वर्ण । ☙ असल को अपने भूल कर इन्सान् । भूला भटका फिरे है, हो हैरान् ॥ मरना ख़रगोश जवकि जाता है । झाड़ी झाड़ी में सिर छुपाता है ॥ है तअाक़ुब में बैज़ का सय्याद । छोड़ता ही नहीं ज़रा जल्लाद ॥ गाह बदने-कसीफ़ में आया । गाह जिस्मे-लतीफ़ में धाया ॥ Notes: 1 प्रकाश के तले, 2 तीनों स्थान, 3 अन्दर और बाहर, 4 कल्पित, फ़र्ज़ किये गये, 5 स्थान, 6 पीछे जाना; भागे हुये का पीछा करना, 7 शिकारी, 8 मारने वाला या पोस्त उतारने वाला ज़ालिम, 9 कभी।
कभी कारण में है पनाहगज़ी¹। वैश्य से बन गया है वाख़ता दीन्² ॥ [ 376 ] ✱ शूद्र ✱ जिसने स्थूल में निशस्त³ करी। "जिस्में⁴ बेरूँ हूँ" ठान जाँ⁵ में ली ॥ नक़दे-उलफ़त को बदन में रक्खा। ऐशो-इशरत हवास⁶ में चक्खा ॥ करलिया जिस्म अपना पाया-ए-तख़त खाने पीने में समझ रक्खा वख़त⁷ ॥ न रक्खी हुस्नो-फ़ज़ल से कुछ गर्ज़। एक तनपरवरी⁸ ही समझा फ़र्ज़ ॥ गर्ज़ यह थी, चला जो चाल कहीं। कि न हो जिस्म को ज़वाल⁹ कहीं ॥ जिसको परवाह नहीं है इज़्ज़त की। है फ़क़त आजू¹⁰ तो लज़्ज़त की ॥ ढाल कर लश्करे-अनानीयत¹¹। समझा दरिया कसीफ जमीयत¹² ॥ Notes: 1 आश्रय लेने वाला, 2 व्याकुल, थका, माँदा, 3 स्थिति, आसक्ति, 4 वाह्य अर्थात् स्थूल शरीर, 5 चित्त, 6 इन्द्रिय, 7 नसीब, भाग्य, शुभ, प्रारब्ध, 8 केवल प्राण रक्षा या देह का पालन पोषण, 9 गिरना, पतला होना, 10 इच्छा, ख्वाहिश, 11 अहंकार का लंगर, 12 इकट्ठा किया हुआ ख़ज़ाना।
वे दिरम¹ देहे-कसीफ़² का चाकर। इसे को कहना ही चाहिये शूद्र ॥ [ 377 ] ✱ वैश्य ✱ डेरा जिस ने लतीफ़³ में रक्खा। राजधानी उसे चुना बैठा ॥ कह रहा है जुवाने-हाल⁴ से वह। "देह सूक्ष्म हूँ मैं" जो हो सो हो ॥ जो ठठोली से क़ाबू आता है। ताना खज़र सा चीर जाता है ॥ भूका काटेगा नँगा रह लेगा। ज़ाहरी पीड़ दुःख सह लेगा ॥ मौक़ा शादी का हो, कि मरने का। मर मिटेगा नहीं वह डरने का ॥ घर गिरौ रख के खर्च कर देगा। चोटी कर्ज़ों से भी जकड़ देगा ॥ कोई मेरे को बोली मार न दे। जिस्म सूक्ष्म को गोली मार न दे ॥ फिकर हर दम जिसे यह रहती है। देखूँ क्या खल्क़⁵ मुझ को कहती है ॥ Notes: 1 एक पैसा भी जिसका मूल्य न हो, अति तुच्छ, 2 स्थूल शरीर, 3 सूक्ष्म शरीर, 4 अपनी वाणी अर्थात् वाणी और अमल से, 5 जनता, लोग।
जान जिस की है निन्दा-स्तुति में। हमनशीनों¹ से बढ़ के इज़्ज़त में ॥ पल में तोला, घड़ी में माशा है। पेंडूलम² की तरह तमाशा है ॥ राये लोगों की मिस्ले-चौगां³ है। गेंद सां दौड़ता हरासां⁴ है ॥ रात दिन पेचो-ताब है जिस को। नंग⁵ का इज़्ज़तराव⁶ है जिस को ॥ रहता इसी उधेड़ बुन में है। पासे-नामूस⁷ ही की धुन में है ॥ जीता औरों की राये पर जो है। ख्याले-वैहशत⁸ फ़ज़ाये पर जो है ॥ क्रियास में जिस के रेढ़ा बेढ़ापन। तवा⁹ जिस की सदा है मुतलव्वन¹⁰ ॥ गाह¹¹ चढ़ती है, गाह घटती है। हठ पहाड़ी नदी वद्लती है ॥ ऐसा वैही मिज़ाज है जिस का। देह सूक्ष्म से फ़ाज है जिस का ॥ वैश्य कहना बजा¹² है ऐसे को। शक्लो-सूरत में ख्वाह कैसे हो ॥ Notes: 1 बराबर वाले साथियों से, 2 घड़ी के नीचे जो धातु का टुकड़ा लटक हुआ एक ओर से दूसरी ओर हिलता रहता है, 3 गुल्ली डंडा के खेल की तरह, 4 परेशान, व्याकुल, घबराहट, 5 इज़्ज़त, 6 व्याकुलता, 7 इज़्ज़त (नाम) का ख्याल, डर, 8 नफरत बढ़ानेवाले ख्याल, 9 प्रकृति, स्वभाव, 10 नाना रंग बदलने वाली, 11 कभी, 12 उचित।
[ 378 ] ☬ क्षत्रिय ☬ जिस की निष्ठा है देह कारण में। है अचल, वज़्म¹ में हो या रण में ॥ दुनियाँ हिल जाये पर न हिलता है। मुस्तक्लिल²-अज़म क़ौल³ पक्का है ॥ ख्वाह तारीफ ख्वाह मुज़म्मत⁴ हो। शादी और ग़म पै जिस की क़ुदरतें हो। लाज से भय जिसे असला⁵ हो ॥ दो दिली से न काम पतला हो ॥ जो नहीं देखता है पवलिक⁶ को। मद्हे-नज़र⁷ बातने-मुवारिक⁸ हो ॥ राये पर और की न चलता है। क़ौम को आप जो चलाता है ॥ लोग दुनियाँ के मुखालिफ सव। जान लेने की आयें उस की जब ॥ ज़हर, सूली, सलीब⁹ या फाँसी। हँस के सहता है जैसे हो खांसी ॥ जिस को तारीफ की नहीं परवाह। खाली तारीफ से ही वह होगा ॥ पैर पूजेंगे, नाम पूजेंगे। लोग सव उस की बात बूझेंगे¹⁰ ॥ Notes: 1 सभा, 2 दृढ़ निश्चय, 3 वचन वा प्रतिज्ञा, 4 निन्दा, घृणा, 5 ताक़त वा वश, 6 बिलकुल, 7 जनता, 8 दृष्टि तले, 9 जिसे अपनी (भीतर की) सम्मति धन्य हो, 10 सूली, 11 समझेंगे।
उस को अवतार करके मानेंगे। लोग जब उस की बात जानेंगे ॥ धर्म क्षत्रिय है, यह मुबारिक धर्म। वरतर अज़ ज़ोफो-नंगो, आरो-शर्म¹ ॥ आज इस धर्म की ज़रूरत है। धर्म यह वरतर अज़ ज़रूरत² है ॥ नाम को ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो। नाम को वैश्य और कि शूद्र हो ॥ सब को दरकार है, यह क्षत्रिय धर्म। जान निशान³ की है यह क्षत्रिय धर्म ॥ इस को कहते हैं लोग कैरेक्टर⁴। देह कारण को जान, इस का घर। उस तलेटी पै रहता है क्षत्रिय। राना प्रताप और शिवा जी ॥ जिस से नदियां तमाम आती हैं। वज्ज व्यौपार को सजाती हैं ॥ है चमक दमक और आबो-ताब। यह वलन्दी है गोया आलमे⁵-ताब। इस ज़मीन पर यह है बुलन्द⁶ तरी। मसनद⁷ शाही को है जेव⁸ यही ॥ चश्मा व्यवहार का है सम्भाला। राज है उस का, मरतवा⁹ आला ॥ Notes: 1 लज्जा, शर्म, निर्बलता, इज़्ज़त से अतीत, 2 मलिनता, गंदलापन, 3 राष्ट्र, 4 श्रेष्ठ आचरण, उत्तम एवं दृढ़ चरित्र, 5 प्रकाश देने वाले सूर्य के समान, 6 बहुत ऊँची, 7 गद्दी, तख्त, 8 उचित, शोभा।
जोश है और खरोश है जिस में। शूरमापन का होश है जिस में ॥ शेरे-नर को न लाये खातर में। तैहलका डाले फौजो-लशकर में ॥ गरज से कोह को हिलाता है। दिल बवर¹ का भी दहिल जाता है ॥ जीक़² दर जौक़, फौज दल वादल। मिथ्या, ला³ शै है, हेच⁴ और वातल⁵ ॥ धर्म की आन पर है जान् कुर्वान्। गीदी⁶ बन कर न हो कभी हैरान् ॥ वही क्षत्रिय है, राम का प्यारा। देश पर जिस ने जान को वारा ॥ मस्त फिरता है ज़ोर में, बल में। कौन्द जाता है विजली वन, पल में ॥ तोप बंदूक़ की सदा⁷ से डर! लड़खड़ी लेता नहीं वह कान में धर ॥ कपकपी में नहीं कभी आता। लाले-जान के पड़े, नहीं डरता ॥ गर्चि घायल हो, फिर भी सीनह् स्पर⁸। शोक करता नहीं, नहीं कुछ डर ॥ तीरो-तलवार की दना दन में। अभिमन्यु⁹ सा जा पड़े रण में ॥ Notes: 1 बड़ा भारी शोर, 2 झुंड के झुंड, 3 झूठा, 4 कुछ नहीं, तुच्छ, 5 झूठी, 6 कमज़ोर दिल, 7 आवाज़, 8 उत्साह से भरा हुआ (छाती मज़बूत किये युद्ध में डटा रहने वाला), 9 अर्जुन के पुत्र का नाम।
जां बाज़ी ही जिस की राहतें हो। जंगो-ज़ोरावरी ही फरहत¹ हो ॥ रण हो, वमसान का क़यामत हो। बला का हंगामा², और शामत हो ॥ ज़ख़म ज़ख़मों पै खून खाता है। पैर पीछे नहीं हटाता है ॥ सख्त से सख्त कारज़ारो-रज़्म³। शान्ति दिल में हो, अंज़म हो बिलज़्म⁴ ॥ जिस्म हरकत में, चित्त साकन⁵ हो ॥ दिल तो फारिग हो, कारकुन तन हो ॥ हर दो जानिय समा भयंकर था। तुन्द मोरो-मलख़ सा लशकर था ॥ हाथी घोड़ों का, शूर वीरों का। शाँख बाजे का, और तीरों का ॥ शोर था आसमां को चीर रहा। गर्द से मिहर बन फ़क़ीर रहा ॥ अफरा तफरी में और गड़बड़ में। वह दिलावर कमाल की जड़ में ॥ क्या दिखाता जवान मर्दी है। क्या ही मज़बूत दिल है, मर्दी है ॥ गोत ठण्डक भरा सुनाता है। फिल्सफ़ा⁶ क्या अजब बताता है ॥ Notes: 1 आराम, चैन, आनन्द, 2 खुशी, प्रसन्नता, 3 युद्ध, लड़ाई, 4 महाभारत, 5 बड़े मज़बूत (पक्के) इरादे वाला, 6 स्थिर, अचल, 7 अगणित, बेशुमार, 8 शास्त्र, तर्कज्ञान।
जिसके नुक्तों¹ को ता अबद² कामिल³। सोचा चाहें गे गौर से मिल मिल ॥ सख्त नारों में शांत यह ख़ुर है। सब्बा यह मन चला बहादुर है ॥ [ 379 ] ब्राह्मण। कोह¹ पर शिव नज़र जो आता है। वर्फ को आब² कर बहाता है ॥ जिस से कैलास ही न तावां³ है। रौनक़े-वैहर⁴ और वियाबां है ॥ वैश्य क्षत्रिय को और शूद्र को। दे है प्रकाश किह्-ओ-मिहतर⁵ को ॥ ओम् आनन्द आत्मा चैतन्य। तीनों देहों में है जो नूर अफ़गन⁶ ॥ निष्ठा इस में है जिस की कि "यह मैं हूँ" "शिव हूँ, सूरज हूँ, ख़ास शक्कूर हूँ" ॥ रुये-आलम⁷ पै नूर-अफगन⁸ है। वह ब्राह्मण है, वह ब्राह्मण है ॥ Notes: 1 गुह्य वाक्यों, वचनों, 2 सदैव, 3 बुद्धिमान, 4 यहाँ भगवान् कृष्ण की ओर संकेत है, 5 गरजों में, भीषण शब्दों में, 6 पर्वत, 7 जल, 8 बर्फकोला, 9 समुद्र की शोभा, 10 छोटे और बड़े सब को, 11 प्रकाश, (तेज), डालने वाला, 12 सारे संसार पर, 13 प्रकाशमान्।
मुक़ खुद, दर्शनों से मुक्त करें। नूर और ज़िन्दगी से चुस्त करे ॥ तीन गुण से परे है, पर सब को। नूर देता है, ख्वाह क्या कुच्छ हो ॥ जिसको फरहत न दे कभी पैसा। ब्राह्मण है वही जो हो पैसा ॥ खड़ा करता नहीं है, दस्ते-दुआ¹। है ग़नी² जात³ ही में वह घनी हुआ ॥ मांगता ख्वाव में भी कुछ न है। उसकी दृष्टि से काञ्च कुंदन है ॥ विष्णू को लात मार देता है। वह ब्राह्मण है, वह ब्राह्मण है ॥ [ 380 ] ✱ शुद्ध स्वरूप ✱ तीनों अजसाम⁴ से गुज़र कर पार। यां अदू⁵ है नहीं न कोई यार ॥ हुसन में अपने खुद दरख़शां⁶ हूँ। मिहरे-ताबां⁷ हूँ, मिहरे-ताबां हूँ ॥ मिह्नतें⁸ क्या मज़े से खाता हूँ। मौत वटनी मिर्चें लगाता हूँ ॥ Notes: 1 माँग के लिये हाथ पसारना, 2 बड़ा धनवान, 3 स्वस्वरूप, 4 यहाँ ऋषि की ओर संकेत है, 5 यहाँ है, 6 दुशमन, शत्रु, 7 रौशन, 8 प्रकाशमान् सूर्य, 9 मत, भेद, पन्थ।
मेरी किरणों में हो गया धोका। आब¹ का था सुराबे-दुन्या² का ॥ क़िला दुःखों का सर किया, ढाया। राज अफ़लाको-मिहर³ पर पाया ॥ हस्ते-मुतलक़⁴, सरूरे-मुतलक़⁵ पर। झंडा गाड़ा, फूरेरा लहराया ॥ कुछ न बिगड़ा था, कुछ न सुधरा अब। कुछ गया था न, कुछ नहीं आया ॥ Notes: 1 जल, 2 मृग तृष्णा के जल का, 3 आकाश और सूर्य, 4 सत्य स्वरूप, 5 आनन्द स्वरूप।