श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

निजी अनुभव

भाग 7-9 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 7-9 · अध्याय 13 / 14

निजी अनुभव

तस्वीरे-यार¹ ग़ज़ल इस लिये तस्वीरे-जानां² हमने खिचवाई नहीं। (टेक) बात थी जो असल में, वह नक़ल में पाई नहीं। इस० 1 पहिले तो यहाँ जान की तन से शनासाई³ नहीं ॥ इस० 2 तन से जां जब मिल गयी तो उसमें दो ताई⁴ नहीं ॥ इस० 3 एक से जब दो हुए, तो लुत्फ़े-यकताई⁵ नहीं ॥ इस० 4 हम हैं मुश्ताक़े-सबुन⁶, और उसमें गोयाई⁷ नहीं ॥ इस० 5 Notes: 1 प्यारा यार अर्थात् अपने स्वरूप की मूर्ति, 2 पहचान, 3 द्वैतपन वा दो होना (अर्थात् जब शरीर के साथ आत्मा मिलकर बिलकुल एक हो गये तो उनको फिर अलग अलग दोकर ही नहीं सकते, तो फिर तस्वीर कैसे), 4 एकता का आनंद, 5 वार्तालाप के इच्छुक, 6 मगर तस्वीर में बोलने की शक्ति नहीं।

पाओं लंगड़ा हाथ लूला, आँख वीनाई' नहीं ॥ इस० 6 यार का ख़ाका' उड़ाना, यह भी दानाई' नहीं ॥ इस० 7 काग़ज़ी यह पैरहन' है, दिल को यह भाई नहीं ॥ इस० 8 दिल में डर है कि मुसव्वर' हो न वह बैठे रक़ीब' ॥ इस० 9 दाम मांगे था मुसव्वर, पास इक पाई नहीं ॥ इस० 10 असल की खूबी कभी भी नक़ल में आई नहीं ॥ इस० 11 [ 382 ] ✻ निफ़ाक़ ✻ रेख़ता सत्य धर्म को छिपा दिया, किसने ? निफ़ाक़ ने । लोगों में छल फैला दिया, किसने ? निफ़ाक़ ने ॥ (टेक) यह देश इक ज़माने में दुनिया की शान था। अब सब से अदना' कर दिया, किसने ? निफ़ाक़ ने ॥1॥ द्विज धर्म कर्म करने में रहते थे नित्य मग्न। अब उनको पस्त' कर दिया, किसने ? निफ़ाक़ ने ॥2॥ हर घर में शब्द सुनते थे वेदों पुराण के। उन सब को ही मिटा दिया, किसने ? निफ़ाक़ ने ॥3॥ महाबली रावण को तो जानत सभी यहां। सब नाश उसका कर दिया, किसने ? निफ़ाक़ ने ॥4॥ आया है वक्तृ अब तो हितैषी बनो सभी। घर घर में दख़ल कर लिया, किसने ? निफ़ाक़ ने ॥5॥ Notes: 1 (तस्वीर में) आँख की दृष्टि नहीं, 2 नक़्शा, अभिप्राय हँसी उड़ाना, 3 बुद्धिमता, 4 काग़ज़ी वस्त्र, 5 तस्वीर खैंचने वाला, चित्रकार, 6 शत्रु, दूसरा आशिक़, सम प्रीतम, 7 …, 8 अधम हीन

[ 383 ] ✻ समय ✻ समय कैसा यह आया है (टेक) न यारों से रही यारी, न भाइयों में वफ़ादारी। मुहब्बत उठ गई सारी, समय कैसा यह आया है ॥1॥ जिधर देखो भरी कुलफ़त', भुला दी सब ने है उल्फ़त'। बुरी सोहबत', बुरी संगत, समय कैसा यह आया है ॥2॥ समायें की बहुत जारी, बने ख़ुद उन के अधिकारी। न छोड़े कर्म ब्यभिचारी, समय कैसा यह आया है ॥3॥ बहुत उमदा कहें लैक्चर, मगर उलटा चलें उन पर। अक़्ल पर पड़ गये पत्थर, समय कैसा यह आया है ॥4॥ सचाई को छुपाते हैं, दिल औरों का दुखाते हैं। वृथा सांचे' कहाते हैं, समय कैसा यह आया है ॥5॥ नहीं व्यवहार की शुद्धि, विपर्यय हो रही बुद्धि। विचारें सत नहीं कुछ भी, समय कैसा यह आया है ॥6॥ घटा है पाप की छाई, उपद्रव होवें हर जाई'। है एक को एक दुःखदाई, समय कैसा यह आया है ॥7॥ न जाने देश के बासी, बनें कब सत्य विश्वासी। मिटे अब कैसे उदासी, समय कैसा यह आया है ॥8॥ Notes: 1 द्वेष, 2 प्रेम, 3 संग, संसर्ग, 4 सच्चे पुरुष, 5 उलटी, 6 हर तरफ़