उपदेश
[ 21 ] ❀ भिजोटी, ताल दादरा ❀ [ केनोपनिषद् के पाँच मन्त्रों का तात्पर्य ] चक्षु जिन्हें देखें नाहिं, चक्षु की अखें जान। सो परमात्म देव तू, कर, निश्चय नहीं आनैं॥1॥ जाको वाणी न जपे, जो वाणी की जान। सो परमात्म देव तू, कर निश्चय नहीं आन॥2॥ श्रोत्र जाको न सुनें, जो श्रोत्र के कान। सो परमात्म देव तू, कर निश्चय नहीं आन॥3॥ प्राणों कर जीवत नहीं, जो प्राणों के प्राण। सो परमात्म देव तू, कर निश्चय नहीं आन॥4॥ Notes: 1 नेत्र, 2 अन्य, दूसरा।
( 18 ) राम-वर्षा मन बुद्धि जाको न लखें, परकाशक पहचान। सो परमात्म देव तू, कर निश्चय नहीं आन॥5॥ [ 22 ] ❀ राग पहाड़ी, ताल चलन्त ❀ साधो! दूर दुई जब होवे, हमरी कौन कोई पत खोवे। (टेक) ऐसा कौन नशा तुम पीया, अबलों आप सही नाहीं कीया॥1॥ सिन्धु विषे रत्नक सम देखें, आप नहीं पर्बत सम पेखे॥2॥ चमके नूर तेज सब तेरा, तेरे नैनन काहे अँधेरा?॥3॥ तू ही राम भूप पति राजा, तू ही तीन लोक को साजा॥4॥ [ 23 ] ❀ राग देश, ताल दादरा ❀ ज़िन्दह रहो रे जीया! ज़िन्दह रहो रे। (टेक) सदा अखंड चिदानन्दघन, मोह भय शोक क्यों करो रे॥1॥ (ज़िन्दह०) आया ही नहीं तो जायगा कौन गृह, सोया ही नहीं तो कहाँ जागे! उपजा ही नहीं तो विनसेगा किस तरह? वेहा और शोक सब हरो रे॥2॥ (ज़िन्दह०) तू नहीं देह बुद्धि प्राण मन, तेरा नहीं मान अपमान जन। तेरा नहीं नफ़ा नुक़सान धन, ग़म चिन्ता डर ख़ौफ़ को तरो रे॥3॥ (ज़िन्दह०) Notes: 1 द्वैत, 2 मान, बड़ाई, 3 अब तक, 4 अपने आपको ठीक नहीं पहिचाना अर्थात् अनुभव नहीं किया, 5 समुद्र में छोटे से मोती को तो ढूँढ रहा है पर अभी तक अपने भीतर जो पर्वत के समान भारी रत (अपना स्वरूप) है उसका तू अनुभव नहीं करता, 6 किस लिये, क्यों।
जाग रे लालन जाग रे ! घर तेरे सदा सुहाग रे। सूर्यवत् उगरे भाग रे ! तव फ़िक्र को परे धरो रे॥4॥ (ज़िन्दा हो॰) है 'राम' तो सदा ही पास रे ! हँस खेल क्यों हुआ उदास रे। आनन्द की शिखर पर वास रे, हर श्वास में सोहं को भरो रे॥5॥ (ज़िन्दा हो॰) [24] मरे न टरे न जरै हरै, तर्मैं परमानन्द सो पायो। मंगल मोद भर्यो घट भीतर, गुरु श्रुति ब्रह्म त्वमेवं बतायो॥1॥ टूटी ग्रन्थी अविद्या नाशी, ठाकुर सत राम अविनाशी। लय मुझमें सब गयो रे बाकी, वासुदेव सौं कर झाँकी॥2॥ अहनिश का सुरज मैं नाशा, अहं प्रकाश, प्रकाश, प्रकाश। सूर्य को ठंडक लगे, जल को लगे प्यास? आनन्द घन मम राम से क्या आशा को आस॥3॥ [25] * गजल भैरवी * शाहंशाहे-जहानें है, सायलें हुआ है तू। पैदाकुने-ज़मानें है, ढ़ायलें हुआ है तू॥1॥ Notes: 1 वह ईश्वर वा परमात्मा मैं हूँ, 2 घटे, 3 बढ़े, 4 अंधकार, 5 तू ही मग्न है, 6 दिन रात, 7 समीपता, 8 चक्रवर्ती राजा, 9 भिखारी, माँगता, 10 समय का उत्पन्न कर्ता, 11 घड़ी की सुई। तात्पर्यः—जैसे दिन रात सूर्य में नहीं होते और न सूर्य को ठंडक और न जल को प्यास लग सकती है, वैसे ही मैं जो आनन्द घन, अर्थात् आनन्द स्वरूप राम हूँ, मेरे समीप किसी प्रकार की आशा की दाल नहीं गल सकती।
( 20 ) राम-वर्षा सौ बार गर्जा होवे तो प्यौ प्यौ पिये क़दमें। क्यों चरखों-मिहरों-माहूँ पै मायलें हुआ है तू॥2॥ बख़्तर की क्या मजाल कि इक ज़ख़्म कर सके। तेरा ही है ख़याल कि घायल हुआ है तू॥3॥ क्या हर गदा-ओ-शाह का राज़ाकँ है कोई और। अफ़्लासों-तंगदस्ती का क़ायलें हुआ है तू॥4॥ टायम है तेरे मुज़रे के मौक़्यां की ताक में। क्यों डर से उसके मुक़्त में ख़ायल हुआ है तू॥5॥ इमवग़लें तुझसे रहता है हर आनें 'राम' तो। वन पर्दा अपनी वसलें में हायलें हुआ है तू॥6॥ [26] * राग नट नारायण, ताल दादरा * मनुवा रे नादान ! ज़री मान, मान, मान। (टेक) आत्म-गह्न सङ्ग जङ्ग, विष्टा में गलतान॥1॥ मनुवा रे॰ शाहंशाही छोड़ के, तू क्यों हुआ हैरान॥2॥ मनुआ रे॰ शङ्कर शिव स्वरूप त्याग, हाव न वन री जान॥3॥ मनुवा रे॰ उदय अस्त राज तेरा, तीन लोक साज तेरा, फेंक दे अज्ञान॥4॥म॰ Notes: 1 चरण, 2 आकाश, 3 सूर्य, 4 चन्द्रमा, 5 नोहित, 6 समर्थ, शक्ति, 7 फ़क़ीर (भिखारी) और राजा, 8 अन्नदाता, 9 निर्धनता और तंगी, 10 विश्वासी, अधीन, 11 काल, 12 अवसर की प्रतीक्षा में, 13 वक़्त में अर्थात् अपने साथ, 14 हर समय, 15 मिलाप साक्षात्कार, 16 दो के बीच आच्छादित, या रुकावट डालने वाला, 17 रे मन!, 18 मृतक, मुर्दा।
उपदेश ( 21 ) हाय ब्रह्मघात करके, करे तू खान पान॥5॥ मनुवा रे॰ तू तो रवि रूप 'राम', शोक मोह से काहे काम, तिमिर की संतान॥6॥म॰ [27] * राग नट नारायण, ताल दादरा * मनुवा वे मदारिया ! नशंग वाज़ी ला (टेक) नशंगे वाज़ी ला वे निडंगे वाज़ी ला॥ मनुवा वे॰ महल अरु माड़ी उब अटारी दम भर दे विच ढा॥ मनु॰ झगड़े झांझे सब कर कोताः, अपने आप में आ॥ मनु॰ [28] * राग नट नारायण, ताल दादरा * (1) गंजे-निहां के कुफ़ुल पर, सिर ही तो मोहरे-शाहें है। तोड़ के कुफ़ुली-मोहर को कज़ को खुद न पाये क्यों!॥1॥ पंक्तिवार तात्पर्य [28] (1) गुप्त भण्डार (ख़ज़ाना) जो प्रत्येक प्राणी के भीतर है उसके ताले पर प्रजापति की मोहर अहंकार रूपी सिर है। हे प्यारे! इस ताले और मोहर को तोड़कर तू भीतर के रत्न (ख़ज़ाना) को क्यों नहीं पाता? Notes: 1 निर्भयता से, निडर होकर, 2 शमैं रहित होकर, 3 ऐ मदारी या जादूगर मन, 4 गिरा दे, 5 छोटे, या कम कर अर्थात् फैसल करदे, 6 गुप्त भंडार, 7 महाराजा की मोहर, 8 ख़ज़ाना, गुप्त रत्न।
( 22 ) राम-वर्षा (2) दीदा-ए-दिलें हुआ जो वा, खुब गया हुस्ने-दिलरुबा। यार खड़ा हो सामने, आँखा न फिर लड़ाये क्यों॥2॥ (3) जब वह जमाले-दिलफ़रोज़ां, सूरते-मिहरे-नीमरोज़ां। आप ही हो नज़ारा सोज़ां, परदे में मुँह छुपाये क्यों?॥4॥ (4) दर्शना-ए-गमज़ा जाँस्तां, नावक-ए-नाज़ी-वे पनाहें। तेरा ही अक्से-रुखें सही, सामने तेरे आये क्यों?॥5॥ (5) आप ही डाल साया को, उसको पकड़ने जाय क्यों? साया जो दौड़ता चले, कीजिये वोये वापे क्यों?॥3॥ (2) दिल की आँखें जब खुलीं तब प्यारे का सौन्दर्य भीतर धस गया। हे प्यारे! जब अपना यार (प्रियतम) सामने खड़ा हो तो फिर उससे तू दृष्टि क्यों नहीं लड़ाता? (3) जब वह दिल को प्रकाशित करने वाला सौन्दर्य मध्याह्न काल के सूर्य की भाँति आप ही प्रकाशमान हो अथवा दृष्टि को प्रकाशित करता हो, तो फिर हे प्यारे! तू पर्दे में मुख क्यों छिपाता है? (4) यह प्राण हरनेवाली नैन-कटारी, यह अथाह नज़रे का तीर, यह चाहे तेरे ही मुख का प्रतिबिम्ब है, पर तेरे सामने क्यों आते हैं? अर्थात् मोहनेवाली यह तेरी माया तेरी छाया होकर तेरे (स्वरूप के) सामने आकर तुझे क्यों ठगती वा मोहती है? (5) आपही अपनी छाया डालकर तू उसको पकड़ने क्यों दौड़ता है? और छाया को पकड़ने के लिये दौड़ते समय जब वह भी आगे दौड़ती चली जाती है (जो कि उसका स्वभाव है), तो हे प्यारे! तू तब हाय हाय क्यों करता है? Notes: 1 दिल का नेत्र, दिव्य चक्षु, 2 खुल गया, 3 धस गया, 4 प्यारे का सौन्दर्य, 5 हृदय को प्रकाशित करनेवाला सौंदर्य, 6 मध्यान्ह काल के सूर्य के रूप में, 7 प्रकाशमान हो या दृष्टि को प्रकाशित करे, 8 नैन कटारी, या प्राण हरने वाला कटाक्ष, 9 अथाह नज़रे का तीर, 10 मुख की छाया वा प्रतिबिम्ब।
उपदेश ( 23 ) (6) पहलो-अयालो मांलो-ज़र्दै, सबका है वारें राम पर। अस्पें पै लाथ बोझ घर, सिर पर उसे उठाये क्यों?॥4॥* [29] * राग शंकरा भरण, ताल कैरवा * फ़क़ीरा ! आपे अल्लाह हो। (टेक) आपे लाड़ा, आपे लाड़ी, आपे मापें हो॥1॥ फ़क़ीरा॰ (6) घर बार (बाल बच्चे) और धन दौलत सबका बोझ अत एक राम भगवान् पर है, तो तू घोड़े जादि के समान घोड़े पर अपने साथ बोझ रखकर उसको व्यर्थ अपने सिर पर क्यों उठाता है? मज़मन नम्बर 21 का पंक्तिवार अर्थ (1) आपही तू स्वयं पति, आपही पत्नी, और आपही पिता माता है। इस लिये ऐ प्यारे! तू आपही ईश्वर हो, अर्थात् वस्तुतः अपने आप की ही तू ईश्वर निश्चय कर। Notes: 1 बाल बच्चे, 2 धन दौलत, 3 बोझ, 4 घोड़े पर, 5 पति, 6 पत्नी, 7 पिता माता। * एक भोला जाट अपने साथ घोड़े पर असबाब रखकर अपने ग्राम को जा रहा था। घोड़े के साथ उसका अत्यन्त मोह था। समय मध्याह्न काल का था। ग्रीष्म ऋतु थी। असबाब घोड़े की पीठ पर रखकर उन पर आप सवार था। जब कुछ काल तक सवार रहने से (उसके और असबाव के बोझ से) घोड़े की पीठ पर पसीना आ गया, तो मारे मोह के असबाव को उसने पीठ पर से अलग कर दिया। वही पीठ पर आप स्वयं सवार हो गया, और उस असबाव को अपने सिर पर रख लिया, जिस से बोझ तो घोड़े पर उतना ही रहा, पर वस्तुतः अपनी गर्दन बोझ से तोड़ ली। (इसी प्रकार सब जगत् का बोझ ईश्वर ही घोड़े पर है, पर जो मूर्खता से उस बोझ को अपने सिर पर डाल लेता है, वह अपनी गर्दन व्यर्थ में तोड़ लेता है, बोझ चाहे सब भी ईश्वर पर वैसे का वैसा ही रहता है)।
( 24 ) राम-वर्षा आप बधाइयाँ, आप स्यापें, आप अलापें हो॥2॥ फ़क़ीरा॰ रांझा तुहीं, तूही रांझा, भुल हीरैं न वेले रो॥3॥ " तेरे जिहा सानूँ पथें ओथे, कोई न जापे ओ॥4॥ " घुण्डें कड के, क्यों वन मोंह उते, ओहले र हयो खलो॥5॥ " तूं ही सब दी जान प्यारी, तैनूँ ताना लगे न को॥6॥ (2) आप ही तू बधाई (आशीर्वाद) है, आप ही स्यापा और आप ही तू रोने पीटने का आलाप है। इस लिये ऐ प्यारे! तू अपने आप को ही प्रभु अनुभव कर। (3) वास्तव में तूही रांझा (प्रेमी) और तूही हीर (प्रिया) है, अपने आप को भूल कर तू हीर (प्रिया) की ख़ातिर वन में व्यर्थ मत रुदन कर। (4) तेरे जैसा यहाँ वहाँ हमें कोई नहीं दीखता, तू अपने आप को देख। (5) अपने चन्द्र मुख पर घूँघट निकाल कर तू ओट में क्यों खड़ा हो रहा है! अपने को साक्षात् कर। (6) तू ही सब की प्यारी जान है, तुझे कोई बोली ठठोली नहीं लग सकती है। अपने को सब का स्वामी निश्चय कर। Notes: 1 पंजाब में मनुष्य के मरने पर स्त्रियाँ खड़े होकर जो नियमबद्ध विलाप से रोती पीटती हैं, उसे स्यापा कहते हैं, 2 उस स्यापे में जिस शब्द की टेक से पीटा जाता है उसे विलाप कहते हैं, 3 एक प्यारे (आशिक़) का नाम है, 4 रांझा की प्रिया का नाम है, 5 वन, जंगल, 6 समान। 7 हमें, 8 यहाँ वहाँ, 9 जचता वा दीखता, 10 घूँघट, 11 मुख पर, 12 ओट में, 13 तुझे, 14 बोली ठठोली।
उपदेश ( 25 ) बोली ताना, यारी सेवा, जो देखें तूँ सो॥7॥ सूली सलीबें, ज़हर दे मुक़े, कदे न मुकदा जो॥8॥ वुक्लें विच वड़ यार जो सुते, ओथे तेरी लो॥9॥ तूँ ही मस्ती विच शराबाँ, हर गुलें दी खुशबो॥10॥ राग रंग दी मिठी सुर तूँ, लै कलेजा टो॥11॥ लाहू लीड़े, यूसफ घुट मिल लै, दूई दे पट ढो॥12॥ आठवें अर्श तेरा नूर चमकदा, होर भी ऊंच हो॥13॥ (7) बहिर बोली ठठोली, मित्रता सेवा इत्यादि जो दिखाई देते हैं, वह सब तू है। (8) सूली सलीब और ज़हर के अन्त होने पर जो कदापि नहीं मरता, वह तू है। (9) प्यारे की ग़ज़ल में प्रवेश होकर जब हम सोयें, तो वहाँ तेरा ही प्रकाश पाया। (10) शराब में मस्ती और पुष्प में गन्ध तू है, इसलिये अपने आप का तू अनुभव कर। (11) कलेजे में चुटकियाँ भरनेवाली जो राग रंग की मीठी स्वर है, वह तू है। (12) द्वैत के वस्त्र उतारकर तू अपने प्यारे आत्मा (यूसफ़) को घुट कर मिल। (13) आठवें आकाश पर तेरा ही प्रकाश है, और तू इससे भी ऊपर हो। Notes: 1 बोली ठठोली, 2 एक प्रकार की सूली, 3 ख़त्म होने पर, 4 बुलावा, 5 वहाँ, 6 प्रकाश, ज्योति, 7 पुष्प, 8 चित्त में चुटकियाँ भरता है, 9 वस्त्र उतार कर, 10 आकाश, 11 और।
( 26 ) राम-वर्षा यह दुन्या तेरे नौंहा दे विच, हथैं गल ते रख न रो॥14॥ ऐ रब भालें वाहिर किधरे, पसें गज्जों मुँह धो॥15॥ तू मौला नहीं बन्दा चन्दा, झूठ दी छड्डे खो॥16॥ पवन इन्दर तेरी पण्डाँ ढोंदे, क्यों तैनूँ किते न ढो॥17॥ काहनूँ पया खेड़ना है भों भों विलयां, बठ निचल्हा हो॥18॥ तेरे तारे सूरज थई थई नचदे, तूँ वेह जाकर चो॥19॥ पचे न तैनूँ सुख वे ओड़क, पहो गिरनों घो॥20॥ (14) यह संसार तेरे नाखुनों का खेल है, तू मुख पर हाथ रख कर मत रो। (15) यदि तू अपने से बाहिर कहीं ईश्वर ढूँढना चाहता है, तो इस बात से तू रो। (16) तू स्वयं मालिक वा प्रभु है, नौकर चाकर तू नहीं है। अपने आप को बद्ध जीव मानने का जो तेरा झूठा स्वभाव है, उसे तू छोड़। (17) पवन और इन्द्र देवता तो तेरा बोझ उठाते हैं, फिर तेरी सेवा क्यों नहीं कभी करते? (18) प्यारे को इधर उधर ढूँढने की जो घूमन फेरी खेल है, उस खेल को व्यर्थ तू क्यों खेलता है। स्थित होकर बैठ और अपना अनुभव कर। (19) तेरे आश्रय तारे और सूर्य थई थई नाच रहे हैं। तू स्वयं स्थिर होकर बैठ। (20) तुझे अनन्त सुख पचता नहीं है, इस बदहज़मी को तू दूर कर। Notes: 1 नाखुन, 2 हाथ, 3 इस बात से, 4 स्वभाव, 5 बोझ उठाते, 6 किस लिये, 7 घूमन फेरी खेल, 8 शौक़ से, आनन्द से, 9 बदहज़मी दूर कर।
उपदेश ( 27 ) दुःखहुर्ता, ते सुखकर्ता, तैनूँ ताप गये कदे पोह॥21॥ चोर न पये, तैनूँ भूत न चमड़े, होरैं गयो क्यों हो॥22॥ तूँ साक्षी केडी कईयां मारें, हुने थक कर चलियाँ हैं सौ॥23॥ खुल्लियाँ तैनूँ भऊ न ग्रान्दे, लुक लुक क़ैद न हो॥24॥ वहदतें नूँ कर कसरतें देखें, गयों भैड़ा किधरों हो॥25॥ ताज तख़त छड ठट्टी महली, पस गज्जों तू रो॥26॥ (21) तू स्वयं दुःखहर्ता और सुखकारक है, तुझे कब तीनों ताप तपा सकते हैं? (22) तुझे चोर नहीं पकड़ते और न भूत प्रेत तुझे चिमट सकते हैं, फिर तू अपने से इतर क्यों हो रहा है? (23) तू साक्षी कौन सी क़सियाँ मार रहा है अर्थात् कौन सा परिश्रम कर रहा है, जो अब थक कर सोने लगा है? (24) सुप्त (आज़ाद) होने में तुझे कोई राक्षस इत्यादि तो नहीं खाते, इसलिये छिप छिप कर बद्ध मत हो। (25) एकता को तू बहुत करके देखता है। भैंगे नेत्रवाला तू कहाँ से हो गया है। (26) निजी राज्य का ताज और तख़्त छोड़ कर छोटी सी कुटिया तूने ले ली है, इस मूर्खता पर तू रुदन कर और अपने स्वरूप का अनुभव कर। Notes: 1 कब, 2 सताने लगे, 3 दूसरा, 4 कौनसी, 5 अब, 6 तुझे, 7 हठवा, शैतान, 8 आज़ाद, 9 आगे, बहुत, 10 भैंगी दृष्टिवाला, 11 कहाँ से, 12 छोटी कुटिया, 13 इस बात से।
( 28 ) राम-वर्षा छड के घर दियाँ खण्डाँ खीरां, की लोड़ें चवावें तों॥27॥ तेरे घर विच राम वसेन्दा, हाय कुट कुट भर न भों॥28॥ राम रहीम सब वन्दे तेरे, तैथों वड़ा न को॥29॥ आप भगीरथ, आपही तीरथ, वन गंगा मल धो॥30॥ पद्दें फ़ाश होवां रव करके, नंगा सूरज हो॥31॥ छड मौहरा, सुन 'राम' दुहाई, अपना आप न को॥32॥ [30] ग़ज़ल आँख होवे तो देख वदन के परदे में अल्हाँ } टेक परदे में अल्हा, कलव को साफ करो वल्हा } (27) निज घर के स्वादिष्ट भोजन छोड़कर छिलके व तूड़ी को तू क्यों दबा रहा है? (28) तेरे घट में जब राम वस रहा है। हाय वहाँ भुस कूट कूट कर मत भर। (29) राम रहीम सब तेरे बन्दे (सेवक) हैं, तुमसे बड़ा कोई नहीं है। (30) श्री गंगा को स्वर्ग से लानेवाला राजा भगीरथ तू आप है और आप ही तू तीर्थ है, स्वयं गंगा रूप होकर तू सब मल धो। (31) ईश्वर करे तेरे सब पर्दे खुलें, और तू सूर्यवत् नितान्त नंगा हो। (32) तू संसार रूपी खेल वा विषय भोग रूपी विष को त्याग, ऐसी राम की पुकार है, और अपने आप को व्यर्थ नष्ट मत कर अर्थात् आत्म-घात मत कर। Notes: 1 क्या ज़रूरत, 2 तूड़ी, भूसी, 3 भूसी, 4 तुमसे, 5 संसार रूपी खेल का मोहरा छोड़, 6 कोसना, शाप देना, आत्मघात करना, 7 ऐश्वर्य, अन्तःकरण, हृदय।
उपदेश ( 29 ) जप तप दान यज्ञ तीर्थ से यही काम भल्ला। अन्त समय पर मित्र! साथ न जाये इक छल्ला॥1॥ भव सागर से पार लंघाने को सतगुर मिल्ला। झूठा है दारा सुतैं मित्र मुफ़त का रल्ला॥2॥ आँख॰ "तू तेरा," "मैं मेरा" स्वप्ने का सा है हल्ला। निजात्म जान, सुखी हो जा, है यही नेक सल्लाह॥3॥ आँख॰ अजैं अविनाशी आत्म जाने होये खैरैं सल्ला। निर्भय ब्रह्म रूप निज जाने हुआ पाकैं पल्ला॥4॥ आँख॰ [31] जागो रे संसारी प्यारे! अब तो जागो मेरे प्यारे॥ टेक घोर अविद्या के वश होकर, स्वामी से तुम भये हो कंकर। विषयन के कीचर में फंस कर, स्मृत नहीं हो तुम संभारे॥1॥जा॰ ज्ञान बड़ाई खोई है तुम ने, झूठी विद्या पढ़ी है तुम ने। माया को नहीं चीना तुमने, अब तो सोचो टूक मेरे प्यारे॥2॥जा॰ खिन को नित्य उठ तुम हो गावो, मूरत जिनकी होत बनावो। शिक्षा उनकी चित्त में लावो, देखो उनकी तरफ निहारे॥3॥ Notes: 1 अच्छा, उत्तम, 2 स्त्री, 3 पुत्र, 4 झगड़ा, शोर, 5 शोर, 6 उत्तम सम्मति, 7 जन्म से रहित, 8 उत्तम, भला, 9 शुद्ध, पवित्र, 10 होश, अपने स्वरूप का स्मरण, 11 जाना, पहिचाना, यहाँ मुराद है क़ाबू (वश) करने से, 12 ग़ौर से देखो, सोच विचार कर। नोट—यह कविता राम स्वामी के भक्त राय बहादुर ला॰ बैजनाथजी की है।
( 30 ) राम-वर्षा शिव संकादिक जिसको ध्यावें, नेति नेति से वेद लखावें। मन बुद्धि जा का पार न पावें, वह तुमही हो मित्र प्यारे॥ 4॥ विषयन से अब चित्त को खैंचो, प्रेम के जल से हीये को सींचो। ज्योती से मत नैननैं मीचो, तुम ज्योतन के ज्योत हो प्यारे॥ 5॥ महावाक्यैं को मन में गांवो, अहंब्रह्म यह नित उठ गावो। ओंकार से अलख जगावो, आनन्द से नहीं तुम हो न्यारे॥ 6॥ [ 32 ] राग पीलू, ताल धमार शशि सूर पावकैं को करे प्रकाश सो निजधामैं वे। इस चामैं से त्यज़े नहैं तूं, उस धाम कर विश्रामैं वे॥ 1॥ एक दमक तेरी पाय के सब चमकदा संसार वे। तुझ चीन्ह ब्रह्मानन्द को, जगसीरैं से होय पार वे॥ 2॥ मंसूरैं ने सूली सही, पर बोलता वही बयनैं वे। वन्दा न पायो एकां में, जब देखियो निज नयन वे॥ 3॥ Notes: 1 हृदय, 2 चक्षु, यहाँ दिल की आँख से अभिप्राय है, 3 वेदवाक्य अर्थात् अहं ब्रह्मास्मि इत्यादि, 4 चन्द्रमा, 5 सूर्य, 6 अग्नि, 7 अपना असली घर, परम धाम, अर्थात् आत्म स्वरूप, 8 चमड़ा अर्थात् देह, 9 छोड़, 10 प्रीति, आसक्ति, 11 आराम, चैन, 12 ले अनुभव कर, 13 भवजल, जगत रूपी समुद्र से पार हो, 14 एक मस्त ब्रह्मज्ञानी का नाम है, 15 कलमा, मंत्र, समझ, 16 जीव, दास, 17 सृष्टि, जगत्, 18 अपने नेत्र।
उपदेश ( 31 ) आशिक़ लगावैं सैनैं जो, लखैं सैन को कर चैन वे। तू आप मालिक ख़ुद ख़ुदा, क्यों भटकदा दिन रैनैं वे॥ 4॥ आपे ज्ञानी सुन प्राणी, नीरैं न धर धीर वे। आपा भुलायो जग बनायो, सब अपनी तक़सीरैं वे॥ 5॥ [ 33 ] खिजोटी, ताल दादरा ग़फ़लत से जाग देख क्या लुत्फ़ की बात है } (टेक) नज़दीक यार है मगर नज़र न आत है } (टेक) दूर की गई से चश्म की रौशनी गई। महबूब के दीदार की ताक़त नहीं रही॥ इसी बात से दुन्या के तू फँदे में फाथ है॥ ग़फ़० 1 बिसियारे तलब है अगर तुझे दीदार की। मुर्शिद के सब्रुओं से चलो गली विचार की॥ जिससे पलक में सब फँद टूट जात है॥ ग़फ़० 2 जिसके जुलूसों से तेरा रौशन वजूद है। ख़लक़त की सभी ख़ूबियों का भी जां ख़ूब है॥ सोई है तेरा यार यह सब भेद बात है॥ ग़फ़० 3 Notes: 1 इशारा, संकेत, 2 समझ, पहचान, 3 रात्रि, 4 कहे, 5 जब, 6 अपना स्वरूप, 7 ढूँढ, 8 आराधा=भूल, 9 आँख, नेत्र, 10 प्यारा, माशूक़, 11 दर्शन, 12 आसक्त, फँदा हुआ, 13 अधिक, बहुत, 14 जिज्ञासा, ढूँढ, चाह, 15 गुरु, 16 उपदेश, नसीहत, 17 शोभा, उपस्थिति अर्थात् बिराजने से, 18 शरीर, 19 सृष्टि।
( 32 ) राम-वर्षा कहते हैं ब्रह्मानन्द नहीं तेरे से जुदा। वुही है तू क़ुरान में लिखा है जो ख़ुदा॥ जिगर में लेके समझना मुश्किल की बात है॥ ग़फ़० 4 [ 34 ] खिजोटी, ताल दादरा ग़ाफ़िल! तू जाग देख क्या तेरा स्वरूप है। किस वास्ते पड़ा जन्म मरण के कूपैं है (टेक) यह देह गृह नाशवान है नहीं तेरा। वृथाभिमान जाति में फिरे कहां घेरा॥ तू तो सदा विनाश से परे अनूपैं है॥ गाफ़िल तू॰ 1 भेद-दृष्टि कीन जभी दीन हो गया। स्वभाव अपने से ही आप हीन हो गया॥ विचार देख एक तू भूपों का भूप है॥ गाफ़िल॰ 2 तेरे प्रकाश से शरीर चित्त चेतता। तू देह तीन दृश्य को सदा है देखता॥ दृष्टा नहीं होता कभी दृश्यरूप है॥ गाफ़िल॰ 3 कहते हैं ब्रह्मानंद, ब्रह्मानंद पाइये। इस बात को विचार सदा दिल में लाइये॥ तू देख जुदा करके जैसे छाया धूप है॥ गाफ़िल॰ 4 Notes: 1 किन्तु, 2 कुऑं, गड्ढा, 3 अद्वितीय आनन्द धारा, 4 स्वामी, बादशाह, 5 हरकत करता, चिन्तवन करता।
उपदेश ( 33 ) [ 35 ] खिजोटी, ताल दादरा अजी मान, मान, मान, कहा मान ले मेरा। जान, जान, जान, रूप जान ले तेरा॥ (टेक) जाने बिना स्वरूप, राम न जाचे है कभी। कहते हैं वेद बार बार बात यह सभी॥ हुशियार हो आज़ाद, बारे डार मैं मेरा॥ मान॰ 1 जाता है देखने जिसे काशी द्वारका। मुक़ाम है बदन में तेरे उसी यार का॥ लेकिन बिना विचार किसी ने नहीं हेरा॥ मान॰ 2 नयनों के नयन जो है सो वैनों के वैन है। जिसके बिना शरीर में न पलक चैन है॥ पिछान ले वखूबे सो स्वरूप है तेरा॥ मान॰ 3 ऐ प्यारी जान! जान तू भूपों की भूप है। नाचत है प्रकृति सदा मुजरा अनूप है॥ संभाल अपने को, वह तुझे करे न घेरा॥ मान॰ 4 कहते हैं ब्रह्मानंद, ब्रह्मानंद तू लही। बात यह पुराण वेद ग्रन्थ में कही॥ विचार देख मिटे जन्म-मरण का फेरा॥ मान॰ 5 Notes: 1 भार, 2 पाया, 3 चक्षु, आँखें, 4 ज्ञान-चक्षु अथवा अन्तरीय दृष्टि, 5 अच्छी तरह से, 6 आवागमन का चक्कर।
( 34 ) राम-वर्षा [ 36 ] राग भैरवी, ताल ठुमरी दिलबर पास बसदा, ढूँडन किथे जावना। टेक गली तें बाज़ार ढूँडो, शहर ते द्वारैं ढूँडो। घर घर हज़ार ढूँडो, पता नहीं पावना॥ दिलबर॰ 1 मक्के तें मदीने जाईये, मथे चा मसीतैं घसाईये। उत्तों कूक बांग सुनाईये, मिल नहीं जावना॥ दिलबर॰ 2 गंगा भावें जमुना नहावो, काशी ते प्रयाग जावो। बद्री केदार जावो, मुड़ घर आवना॥ दिलबर॰ 3 देस ते दसौंर ढूँडो, दिल्ली ते पशौंर ढूँडो। भावें ठौर ठौर ढूँडो, किसे न बतावना॥ दिलबर॰ 4 बनो जोगी ते बैरागी, संन्यासी जगत त्यागी। प्यारे से न प्रीति लागी, भेस की बटावना॥ दिलबर॰ 5 भावें गले माला डाल, चंदन लगावो भाल। प्रीति नहीं साईंनाल, जगत नूं दिखावना॥ दिलबर॰ 6 सोहनांहीं शकल बनावें, काफ़रां दे कर्म कमावें। मथे ते मेहराब लगावें, मौलवी कहावना॥ दिलबर॰ 7 Notes: 1 कहाँ, 2 और, 3 देश, 4 मसजिद, 5 चाहे, 6 वापिस, 7 सन्तों की, 8 पेशानी पर, माथे पर, 9 दहलीज़ की राख, या मंदिर के चरणों की धूल, भस्म।
उपदेश ( 35 ) [ 37 ] राग भैरवी, ताल तीन पराये नामैं भी अपना न कुछ वाकी निशां रखना। न तन रखना, न दिल रखना, न जी रखना, न जां रखना॥ 1॥ नाहक़ तोड़ देना छोड़ देना उसकी पावन्दी। क़ैवरदार अपनी गर्दन पर न यह वारे-निरां रखना॥ 2॥ मिलेगी क्या मद्द तुझको मद्दगारान-ए-दुनियां से। उमेदे-यावरी उनसे न यहां रखना, न वहां रखना॥ 3॥ बहुत मज़बूत घर है आख़िरत का दारे-दुनियां से। उठा लेना यहां से अपनी दौलत और वहां रखना॥ 4॥ उठा देना नसव्वुरे-ग़ैरे की सूरत का आँखों से। फ़क़त सीने के आयीने में नक़्शे-दिलस्तां रखना॥ 5॥ किसी घर में न घर कर बैठना इस दारे-फ़ानी में। ठिकाना बे-ठिकाना और मकां पर लामकां रखना॥ 6॥ Notes: 1 नाम मात्र भी, 2 चित्त, 3 सम्बन्ध, क़ैद, मज़दूरी, विवशता, 4 सहारे की, 5 संसार के सहायकों से, वा से इक्कों, 6 फल की आशा, 7 परलोक, 8 संसार के घर से, 9 भ्रम, ख़याल, 10 द्वैत-भावना, अनात्मा का, 11 अन्तःकरण के शीशे में, 12 चित्त हरने वाले (आत्मा) की सूरत (का ध्यान) रखना, 13 मृत्युलोक, 14 देशातीत या स्थान-रहित।
( 36 ) राम-वर्षा [ 38 ] राग सोहनी, ताल हेवरा दुनियां अजब बाज़ार है, कुछ जिन्सें यहां की साथ ले। नेकी का बदला नेक है, बद से बदी की बात ले॥ मेवा खिला, मेवा मिले, फल फूल दे, फल पात ले। आराम दे, आराम ले, दुःख दर्द दे, आफ़तें ले॥ कलयुग नहीं करयुग है यह, यहां दिन को दे और रात ले। } (टेक) क्या ख़ूब सौदा नक़द है, इस हाथ दे उस हाथ ले॥ } (टेक) कांटा किसी के मत लगा, गो मिले गुलैं फूला है तू। वह तेरे हक़ में तीर है, किस बात पर झूला है तू॥ मत आग में डाल और को, क्या घास का पूला है तू? सुन रख यह नुक्ता बेख़बर, किस बात पर भूला है तू॥ कलयुग नहीं॰॥ 2॥ शोख़ी शरारत मक्रो-फ़न सबका बसेरा है यहां। जो जो दिखाया और को, वह ख़ुद भी देखा है यहां॥ खोटी खरी जो कुछ कही, तिसका परखा है यहां। जो जो दग़ा तुलता है तोल, तिल तिल का लेखा है यहां॥ कलयुग नहीं॰॥ 3॥ Notes: 1 वस्तु, चीज़, 2 कहे, सुसज्जित, 3 पुष्प की तरह, 4 तेरे वास्ते, तेरे को, 5 दग़ा-फ़रेब, धोखा, 6 बसेरा, रहने की जगह, घर, 7 परखना, जांचना।
उपदेश ( 37 ) जो और की दुश्मनी रखे, उसका भी बसना है बुरा। जो शत्रु को मारे छूरी, उसके गले लगता है छुरा॥ जो और की तोड़े यह दिल, उसका सो टूटे है बड़ा। जो और का पर्दा खोले, उसका भी होना है बुरा॥ कलयुग नहीं॰॥ 4॥ जो और को फल देवेगा, वह भी सदा फल पावेगा। गेहूं से गेहूं जौ से जौ, चांवल से चांवल पावेगा॥ जो आज देवेगा यहां, वेगा ही वह फल पावेगा। कल देवेगा फल पावेगा, फिर देवेगा फिर पावेगा॥ कलयुग नहीं॰॥ 5॥ जो चाहे ले फल इस घड़ी, सब जिन्स यहां तैयार है। आराम में आराम है, आज़ार में आज़ार है॥ दुनियां न जान इस को मोया, दरिया की यह मंझधार है। औरों का बेड़ा पार कर, तेरा भी बेड़ा पार है॥ कलयुग नहीं॰॥ 6॥ तू और की तारीफ़ कर, तुझको सनाख़्वानी मिले। कर मुश्किल आसां और की, तुझको भी आसानी मिले॥ तू और का मेहमान कर, तुझको भी मेहमानी मिले। रोटी खिला रोटी मिले, पानी पिला पानी मिले॥ कलयुग नहीं॰॥ 7॥ जो गुड़ खिलावे और का, उसका ही गुड़ खाता भी है। जो और का कोंडे मुँह, उस का ही मुँह किलता भी है॥ Notes: 1 नगरी, 2 दिल में लावे, विचार करे, 3 दुःख, 4 तारीफ़, स्तुति, 5 गुड़, 6 कीले अर्थात् निन्दा करना या किसी पर घच्चा या दाग़ लगाना।
( 38 ) राम-वर्षा जो और का छीले जिगर, उसका जिगर छिलता भी है। जो और को देवे कपट, उसको कपट मिलता भी है॥ कलयुग नहीं॥ कर चुक जो कुछ करना है अब, यह दम तो कोई आन है। नुक़सान में नुक़सान है, एहसान में एहसान है॥ तोहमत में यहां तोहमत मिले, तूफ़ान में तूफ़ान है। रहमानें को रहमान है, शैतान को शैतान है॥ कलयुग नहीं॰॥ 9॥ यहां ज़हर दे तो ज़हर ले, शक्कर में शक्कर देख ले। नेकों को नेकी का मज़ा, मूज़ी को सक़र देख ले॥ मोती दिये मोती मिले, पत्थर में पत्थर देख ले। गर तुझको यह बावर नहीं, तो तू भी करके देख ले॥ कलयुग नहीं॰॥ 10॥ अपने नफ़े के वास्ते मत और का नुक़सान कर। तेरा भी नुक़सान होवेगा, इस बात पर तू ध्यान कर॥ खाना जो खा सो देखकर, पानी पिये सो छानकर। यहां पैर को रख तूं फूँक कर, और ख़ौफ़ से गुज़रान कर॥ कलयुग नहीं॰॥ 11॥ ग़फ़लत की यह जगह नहीं, साहिबे-इदराकों रहे। दिल शाद रख दिल शाद रहे, ग़मनाक रख ग़मनाक रहे॥ Notes: 1 घड़ी, पल, 2 दाता, कृपालु, बरकत देनेवाला, 3 सताने वाला, दुःख देनेवाला, 4 निश्चय, यक़ीन, 5 तीव्र दृष्टा, तेज़समझ वाला पुरुष, 6 प्रसन्न चित्त।
उपदेश ( 39 ) हर हाल में भी तू नज़ीरें अब हर क़दम की ख़ाक रहे। यह वह मक़ां है ओ मीयां! यां पाके रहे बेबाक रहे॥ कलयुग नहीं॰॥ 12॥ [ 39 ] राग सोहनी, ताल हेवरा दुनिया है जिसका नाम मीयां! यह अजब तरह की हस्ती है। जो मैहंगों को तो मैहंगी है और सस्तों को यह सस्ती है॥ यहां हरदम झगड़े उठते हैं, हर आन अदालत बस्ती है। गर मस्त करे तो मस्ती है और पस्त करे तो पस्ती है॥ कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इन्साफ़ों और अदलपरस्ती है। } टेक इस हाथ करो उस हाथ मिले, यहां सौदा दस्त बदस्ती है॥ } टेक जो और किसी का मान रखे, तो उसको भी अह मान मिले। जो पान खिलावे पान मिले, जो रोटी दे तो नान मिले॥ नुक़सान करे नुक़सान मिले, एहसान करे एहसान मिले। जो जैसा जिसके साथ करे, फिर वैसा उसको आन मिले॥ कुछ देर नहीं अंधेर॰॥ 2॥ Notes: 1 कवि का नाम है, 2 शुद्ध, पवित्र, 3 निडर, भय रहित, 4 वस्तु है, 5 हर वक़्त, हर दम, 6 घटावे, कम करे, अर्थात् झगड़े बढ़ावे तो उसके वास्ते बाज़ार गर्म है और जो लड़ाई-झगड़ों को घटाना चाहे तो उसके वास्ते घटा हुआ बाज़ार है, 7 न्याय, इन्साफ़, 8 रोटी।
( 40 ) राम-वर्षा जो और किसी की जां बख़्शे, तो हक़ उसकी भी जान रखे। जो और किसी की आन रखे, तो उसकी भी हक़ आन रखे॥ जो यहां का रहनेवाला है, यह दिल में अपने ठान रखे। वह तुरत फुरत का नक़्शा है, इस नक़्शे को पहचान रखे॥ कुछ देर नहीं अंधेर॰॥ 3॥ जो पार उतारे औरों को, उसकी भी नाव उतरनी है। जो ग़र्क़ करे फिर उसको भी यां डुबकूं डुबकूं करनी है॥ तलवार, तबर, बन्दूक़, सनां और नस्तर तीर निहरनी है। यां जैसी जैसी करनी है, फिर वैसी वैसी भरनी है॥ कुछ देर नहीं अंधेर॰॥ 4॥ जो और का ऊँचा बोलैं करे, तो उसका बोल भी वाला है। और दे पटके तो उसको भी कोई और पटकने वाला है॥ बेनुर्म-ख़ता जिस ज़ालिमैं ने मज़लूमैं ज़िबह कर डाला है। उस ज़ालिम के भी लहू का फिर बहता नदी नाला है॥ कुछ देर नहीं अंधेर॰॥ 5॥ Notes: 1 ईश्वर, 2 इज़्ज़त, मान, 3 जल्दी, 4 फ़ौरन् अर्थात् बदले का बदला फ़ौरन ही मिल जाता है ऐसा दुनियां का नक़्शा है, 5 भाला, 6 निहरण, छीलना वा छीलने का वा नाख़ून काटने का औज़ार, इस पंक्ति में सब हथ्यारों के नाम हैं, 7 इस जगह, इस दुनियां में, 8 बड़ी इज़्ज़त दे वा किसी का सम्मान से ज़िक्र करे, 9 दोष व अपराधरहित मनुष्य को, 10 ज़ुल्म करने वाला, या बिना अपराध के पीड़ा वा दुःख देने वाला, 11 दुःखी, पीड़ित, 12 गला घोंट कर वा छुरी से मार डाला है।
उपदेश (41) जो मिसरी और के मुँह में दे, फिर वह भी शक्कर खाता है। जो और के तई अब टक्कर दे, फिर वह भी टक्कर खाता है॥ जो और को डाले चक्कर में, फिर वह भी चक्कर खाता है। जो और को ठोकर मार चले, फिर वह भी ठोकर खाता है॥ कुछ देर नहीं अंधेर० ॥ 6 ॥ जो और किसी को नाहक़ में कोई झूठी बात लगाता है। और कोई ग़रीब बिचारे को नाहक़ में जो लुट जाता है॥ वह आप भी लुटा जाता है और लाठी मुक्की खाता है। जैसा जैसा करता है फिर वैसा वैसा पाता है॥ कुछ देर नहीं अंधेर० ॥ 7 ॥ है खटका उसके साथ लगा, जो और किसी को दे झटका। वह गैरों से भटका खाता है, जो और किसी को दे झटका॥ चीरे के बदले चीरा है, पटके के बदले है पटका। क्या कहिये और नज़ीर आगे, यह है तमाशा झटपटे का॥ कुछ देर नही अंधेर० ॥ 8 ॥ [ 40 ] लावनी नाम राम का दिल से प्यारे, कभी भुलाना न चाहिये। पा कर नर का बदन रत्न को, ख़ाक मिलाना न चाहिये॥ Notes: 1 अव्यक्त, दैवयोग से अर्थात् ईश्वर से वह चोट खाता है, 2 एक प्रकार की सुंदर पगड़ी का नाम है, 3 पटका भी एक उत्तम पगड़ी को कहते हैं, 4 उसी समय (तुरंत) बदला देनेवाला।
(42) राम-वर्षा सुंदर नारी देख प्यारी, मन को लुभाना न चाहिये। जलति अगन में जान पतंग समान समाना न चाहिये॥ बिन जाने परिणाम काम को हाथ लगाना न चाहिये। कोई दिन का ख्याल कपट का जाल बिछाना न चाहिये॥ नाम 1 यह माया बिजलीका चमका, मनको जमाना न चाहिये। बिछड़ेगा संयोग भोग का रोग लगाना न चाहिये॥ लगे हमेशा रंग संग दुर्जन के जाना न चाहिये। नदी नाव की रीत किसी से प्रीत लगाना न चाहिये॥ नाम 2 बांधव जन के हेतु पाप का खेत जमाना न चाहिये। अपने पांव पर अपने करों से चोट लगाना न चाहिये॥ अपना करना भरना दोष किसी पर लाना न चाहिये। अपनी आँख है मंद चंद को दो बतलाना न चाहिये॥ नाम 3 करना जो शुभ काज आज कर देर लगाना न चाहिये। कल जाने क्या हाल काल को दूर पिछाना न चाहिये॥ दुर्लभ तन को पाय कर विषयों में गँवाना न चाहिये। भवसागर में नाव पाय चक्कर में डुबाना न चाहिये॥ नाम 4 दारादिक सब घेर फेर तिन में अटकाना न चाहिये। करी वमन के ऊपर फिर कर दिल ललचाना न चाहिये॥ जान आपनो रोग रूप गृह में लटकाना न चाहिये। पूरे गुरु को खोज मनुष्य का बोझ उठाना न चाहिये॥ नाम 5 Notes: 1 सम्बन्धी, 2 कारण, 3 हाथ, 4 स्त्री इत्यादि, 5 की हुई या उलटी, 6 वर वधू कुटुम्ब।
उपदेश (43) बच्चा चाहे पापन से मन से मौत भुलाना न चाहिये। जो है सुख की लाग, तो कर सब त्याग, फ़लाना न चाहिये॥ जो चाहे तू ज्ञान, विपय के वाण चलाना न चाहिये। जो है मोक्ष की आशा रंग की पाश बढ़ाना न चाहिये॥ नाम 6 परमेश्वर है तन में, बन में खोजन जाना न चाहिये। कस्तूरी है पास, मृग को घास सुंघाना न चाहिये॥ कर सत्संग, विचार, निहार, कभी विसराना न चाहिये। आत्म-सुख को भोग, भोग में फिर भटकाना न चाहिये॥ नाम 7 [ 41 ] लावनी चेतो चेतो जल्द मुसाफ़िर गाड़ी जाने वाली है। लाइन क्लीयर होने को तैय्यार गार्ड बनमाली है॥ टेक पाँच धातु की रेल है जिसको मन अंजन ले जाता है। इन्द्रीगण के पहियों से वह ख़ूब ही तेज़ चलाता है॥ मील हज़ारों चलने पर भी थकने वह नहीं पाता है। कठिन वज़ लोहे जैसा होकर चंचलता दिखलाता है॥ बड़े गार्ड बनमाली से होती इसकी रखवाली है॥ 1 ॥ चेतो॥ जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया चार मुख्य स्टेशन हैं। आठ पहर इन्हीं में बिचरे रेल सहित यह उंजन है॥ Notes: 1 आशा, 2 फाँसी, जाल।
(44) राम-वर्षा कर्म, उपासन, ज्ञान टिकट घर लेता टिकट, हरएक जन है। फ़र्स्ट, सैकंड, अरु थर्ड क्लास ले जितना पल्ले शुभ धन है॥ बैठ न पावे हरगिज़ वह नर जो इस गाड़ी से ख़ाली है॥ 2॥ चेतो॥ राहगीरों के ललचाने को नाना रूप से सजती है। तीन घंटिका बाल, तरुण, और जरा की इसमें बजती है॥ तीसरी घंटी होने पर झट जगह को अपनी तजती है। आते जाते सीटी देकर रोती और चिल्लाती है। धर्म सनातन लाइन छोड़ के निपट बिगड़ने वाली है॥ 3॥ चेतो॥ पाप पुण्य के भार का बंडल अक्सर साथ ही रखते हैं। काम क्रोध लोभादिक डाकू खड़े राह में तकते हैं॥ स्टेशन स्टेशन पर अनेक रोगादिक रिपू भटकते हैं। पुलिसमैन सदगुरु उपदेशक रक्षा सबकी करते हैं॥ निर्भय वह हो जाता है, जो होवे पूरा ज्ञानी है॥ 4॥ चेतो॥ [ 42 ] तर्ज़े लेली मजनूँ प्रभू प्रीतम जिसने बिसारा हाय जनम अमोलक बिगाड़ा॥ टेक धन दौलत माल ख़ज़ाना, यह तो अन्त को होवे बेगाना। सत्य धर्म को नाहीं विचारा, भूला फिरता है मुर्ख गँवारा॥1॥ प्रभू॰ झूठे मोह में तन मन दीना, नाहीं भजन प्रभू का कीना। पुत्र पौत्र और परिवारा, कोई संग न चलन हारा॥ 2॥ Notes: 1 धन, 2 बुढ़ापा, 3 जल्द, 4 बदमाश, दग़ाबाज़, शत्रु, 5 सूखे , 6 कुटुम्ब।
उपदेश (45) भ्रातृ भाव न प्रीति परस्पर, कपट छल है भरा मन अन्दर। कुछ भी किया न पर उपकारा, खोटे कर्मों का लिया अजारा॥ 3॥ प्रभू॰ तेरा यौवन और जवानी, ढलती जावे ज्यों बर्फ़ का पानी। मीठी नींद में पाँव पसारा, चिड़ियाँ चुग गईं खेत तुम्हारा॥4॥ प्रभू॰ चोकेवाज़ी के दाम फैलाये, विषय-भोग के चैन उड़ाये। पुण्य दान से रहा नियारा, ऐसे पुरुषों को हो धिक्कारा॥ 5॥ प्रभू॰ जो जो शास्त्र वेद वखानें, मूर्ख उलटा ही उनको जाने। समय खोया है खेल में सारा, सत्संग से किया किनारा॥ 6॥ प्रभू॰ ऐसे जीने पै तू अभिमानी, टीला रेत का ज्यों बीच पानी। क्यों न गुण अरु कर्म सुधारा, मानुष जन्म न हो बारंबारा॥ 7॥ प्रभू॰ तेरे कर्म हैं नाव समाना, जिसमें बैठा है तू अज्ञाना। गहरी नदिया है दूर किनारा, कोई दम में तू डूबन हारा॥ 8॥ प्रभू॰ अपने दिल में तू जाग रे भाई, कुछ तो करले रे नेक कमाई। संग जाये नहीं सुत दारा, सत्य धर्म ही देगा सहारा॥ 9॥ प्रभू॰ [ 43 ] रागनी भिभास, ताल तीन तू कुछ कर उपकार जगत में, तू कुछ कर उपकार। टेक मानुष जनम अमोलक तुझको मिले न बारंवार॥ 1॥ तू॰ Notes: 1 ठेका, 2 उपदेश को, 3 नाव, बेड़ी, किस्ती, 4 स्त्री, पुत्र।
(46) राम-वर्षा सुकृत अपना कर धन संचय, यह वस्तु है सार। देश उन्नती कर पितृ सेवा, गुणियन का सत्कार॥ 2॥ तू॰ शील, संतोष, परस्वारथ, रति, दया क्षमा उर धार। भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, दीजे यथा अधिकार॥ 3॥ तू॰ कठिन समय में होवेंगे साथी तेरे श्रेष्ठ आचार। इसलिये इनका कर तू संग्रह, सुख हो सर्व प्रकार॥ 4॥ तू॰ होय अज्ञानी कहे बन्दा गन्दा, तिसको है धिक्कार। है ज्ञान ही औषध सब अवगुणों की करते वेद पुकार॥ 5॥ तू॰ [ 44 ] राग धुन, ताल तीन काहे शोक करे नर मन में, वह तेरा रखवारा है रे॥ टेक गर्भवास से जब तू निकला दूध स्तनों में डारा है रे। बालकपन में पालन कीनो, माता मोह द्वारा है रे॥ 1॥ काहे॰ अन्न रचा मनुषों के कारण पशुओं के हित चारा है रे। पक्षी वन में पान फूल फल, सुख से करत अहारा है रे॥ 2॥ काहे॰ जल में जलचर रहत निरंतर, खावें मास करारा है रे। नाग बसें भूतल के मांहि, जावें वर्ष हज़ारा है रे॥ 3॥ काहे॰ Notes: 1 पुण्य कर्म रूपी धन, 2 पर स्वार्थ में लगन वा सुख, 3 एकत्र, 4 कपूत, पाप, बेवकूफ़ियाँ।
उपदेश (47) स्वर्ग लोक में देवन के हित, बहुत सुधा की धारा है रे। महानंद फ़िकर सब तज के, सिमरो सज्जन हारा है रे॥ 4॥ काहे॰ [ 45 ] राग भूपाली, ताल दादरा विश्वपति के ध्यान में जिसने लगाई हो लगन। क्यों न हो उसको शान्ति, क्यों न हो उसका मन मगन॥ काम क्रोध लोभ मोह यह हैं सब महाबली। इनके हनने के वास्ते जितना हो तुझसे कर यतन॥ 1॥ विश्व॰ ऐसा बना स्वभाव को चित्त की शान्ति से तू। पैदा न ईर्षा की आँच दिल में करे कहीं जलन॥ 2॥ विश्व॰ मित्रता सबसे मन में रख, त्याग दे वैर भाव को। छोड़ दे टेढ़ी चाल को, ठीक कर अपना तू चलन॥ 3॥ विश्व॰ जिससे अधिक न है कोई, जिसने रचा है यह जगत। उसका ही रख तू आश्रा, उसकी ही तू पकड़ शरन॥ 4॥ विश्व॰ छोड़ के राग द्वेष को, मन में तू अपने ध्यान कर। तौ निश्चय तुझको होवेगा, यह सब हैं मेरे आत्मन्॥ 5॥ विश्व॰ जैसा किसी का हो अमल, वैसा ही पाता है वह फल। दुष्टों को दुख मिलता है सुष्टों का होता दुख हरन॥ 6॥ विश्व॰ Notes: 1 मारना, जीतना, 2 आश्रय, 3 वैसे, करनी, आचरण, 4 श्रेष्ठ पुरुष, धर्मात्मा या शुभ आचरण वाले।
(48) राम-वर्षा आप ही सब तु रूप हैं अपना ही कर तू आश्रा। कोई दूसरा नाहिं होगा सहाय, जो छेड़े तेरे दुःख कठिन॥ 7॥ वि॰ [ 46 ] राग जंगला नाम जपन क्यों छोड़ दिया, प्यारे! (टेक) झूठ न छोड़ा, क्रोध न छोड़ा, सत्य वचन क्यों छोड़ दिया॥ 1 नाम झूठे जग में दिल ललचा कर, असल वतन क्यों छोड़ दिया॥ 2 नाम कौड़ी को तो ख़ूब सँभाला, लाल रत्न क्यों छोड़ दिया॥ 3 नाम जिहि सुमिरन ते अति सुख पावे, सो सुमिरन क्यों छोड़ दिया॥ 4 नाम ख़ालिस इक भगवान भरोसे, तन मन धन क्यों छोड़ दिया॥ 5 नाम [ 47 ] रागनी पीलू, ताल तीन नेक कमाई कर ले प्यारे! जो तेरा परलोक सुधारे! टेक इस दुनिया का ऐसा लेखा, जैसा रात को स्वप्ना देखा॥ 1॥ नेक॰ ज्यों स्वप्ने में दौलत पाई, आँख खुली तो हाथ न आई॥ 2॥ नेक॰ कुटुंब कुनबा काम न आवे, साथ तेरे इक धर्म ही जावे॥ 3॥ नेक॰ सब धन दौलत पड़ा रहेगा, जब तू यहाँ से कूच करेगा॥ 4॥ नेक॰ Notes: 1 मददगार, साथी, 2 हिसाब, वर्ताव, तरीका।
उपदेश (49) तोशा कुछ नहीं सफ़र है भारा, क्योंकर होगा तेरा गुज़ारा॥ 5॥ नेक॰ अबतक ग़ाफ़िल रहा तू सोया, वक़्त अनमोल अकारथ खोया॥ 6॥ नेक॰ टेढ़ी चाल चला तू भाई, पग पग ऊपर ठोकर खाई॥ 7॥ नेक॰ ख़ूब सोच ले अपने मन में, समय गँवाया मूर्खपन में॥ 8॥ नेक॰ यदि अब भी नहीं तू यत्न करेगा, तो पछताना तुझको पड़ेगा॥ 9॥ नेक॰ कर सत्संग और विद्याध्ययनैं, तब पावै तू सुख और चैन॥10॥ नेक॰ एक प्रभू बिन और न कोई, जिसके सुमरे मुक्ति होई॥11॥ नेक॰ उसी का केवल पकड़ सहारा, क्यों फिरता है मारा मारा॥12॥ नेक॰ [ 48 ] सोरठ ताल दादरा वा जैजयवंती (महला 1) राम सिमर, राम सिमर, यही तेरो काजें है॥ टेक माया को संग त्याग, प्रभू जी की शरण लाग। जगत सुख मान मिथ्या, झूठो ही सब साज है॥ 1॥ राम॰ स्वप्ने जैसा धन पहचान, काहे पर करत मान। वालू की सी भित्ति जैसे बेसुधौं को राज है॥ 2॥ राम॰ नानक जन कहत बात, बिनस जायो तेरो गात। छिन्न छिन्न कर गयो काल, तैसे जात आज है॥ 3॥ राम॰ Notes: 1 रास्ते का भोजन आदि, 2 बेफ़ायदा, व्यर्थ, 3 ब्रह्म-विद्या का पढ़ना, 4 सिर्फ़, कविका नाम भी है, 5 फ़ौरन, काम, 6 रेत का घर या रेत की दीवार, 7 धन दौलत = श्री गुरू नानक देव से यहाँ अभिप्राय है, 8 अंग, बल।
(50) राम-वर्षा [ 49 ] राग जयजयवंती (महला 1) राम भज, राम भज, जन्म सिरातें है। (टेक) कहूँ कहा बार बार, समझत न क्यों गँवार। विनसत ना लागे वार, ओरे सम गातें है॥ 1॥ सगलें भरम डार दे, गोविन्द को नाम ले। अन्त वार संग तेरे, यह एक जात है॥ 2॥ विषयाँ विष ज्यों विसार, प्रभु को यश हिय-धार। नानक जन कह पुकार, अवसरैं बिहात है॥ 3॥ [ 50 ] राग तिलंग (महला 1) चेतना है तो चेत ले, निश-दिन में प्राणी। (टेक) छिन छिन अवधि बिहातैं है, फूटे घट ज्यों पानी॥ 1 हरिगुण काहे न गावहीं, मूरख अज्ञाना। झूठे लालच लाग के, नहीं मरण पिछाना॥ 2॥ अजहूँ कुछ बिगड़ियो नहीं, जो प्रभु गुण गावे। कहो नानक तिहूँ भजन से निर्भय पद पावे॥ 3। Notes: 1 गल रहा, बीत रहा है, 2 खोले, गड़े, 3 शरीर, 4 सारे, 5 विषयों में, 6 हृदय में धारण कर, 7 समय, आयु, 8 बीती जाती है, 9 रात दिन, 10 आयु, 11 बीती जाती है, 12 इस के।
उपदेश (51) [ 51 ] गौड़ी (महला 1) साधो! मन का मान त्यागो। (टेक) काम क्रोध संगति दुर्जन की ताते दहै-निश भागो॥ 1॥ सुख दुःख दोनों सम कर जाने, और मान अपमाना। हर्ष शोक से रहे अतीता, तिन जग-तत्व पिछाना॥ 2॥ उस्तति निन्दा दोऊ त्यागो, खोजे पद निर्वाणा। जन नानक यह खेल कठिन है, किन्हूँ गुरुमुख जाना॥ 3॥ [ 52 ] राग गौड़ी वा धनासरी ताल, झुमाली (महला 1) साधो! गोविन्द के गुण गावो। (टेक) मानुष जन्म अमोलक पायो, बिरथा काहे गँवावो॥ 1॥ पतित पुनीत दीन बंधु हरि, शरण तांहि तुम आवो। गज को त्रासैं मिट्यो जहिं सिमरत, तुम काहे बिसरावो॥ 2॥ तज अभिमान मोह माया पुनि, भजन राम चित्त लावो। नानक कहत मुक्ति-पंथ यह, गुरुमुख होय तुम पावो॥ 3॥ Notes: 1 उससे, 2 दिन-रात, 3 स्तुति, 4 किसी-किसी ने, 5 व्यर्थ, 6 हाथी, 7 भय, 8 फिर, पुनः।
( 52 ) राम-वर्षा [ 53 ] राग रामकली ( महला 1 ) प्राणी ! नारायण सुधि लै। (टेक) छिन छिन अवधू घटे निशवासरैं वृथा जात है देह ॥1॥ तरुनापौं³ विषयन संग खोयो, बालपना अज्ञाना। वृद्ध भयो अजहूँ नहीं समझे, कौन कुमति उरझाना ॥2॥ मानुष जन्म दियो जिस ठाकुर, सो तैं⁴ क्यों बिसरायो। मुक्ति होत नर जाके सिमरे, निमष⁵ न ताको गाथो ॥3॥ माया को मद कहा⁶ करत है, संग न काहू जाई। नानक कहत चेत चिन्ता मनि, होत है अन्त सहाई ॥4॥ [ 54 ] राग बिलावल ( महला 1 ) जौं मैं भजन राम को नाहिं। (टेक) तैं नर जन्म अकारथ खोया, यह राखो मन मांहि ॥1॥ तीर्थ करे, व्रत पुनि राखे, न मनुआ वश जाको⁷। निष्फल धर्म ताहि⁸ तुम मानो, साच कहत मैं या को ॥2॥ जैसे पाहन⁹ जल में राखयो, भेदे¹⁰ नाहिं तहि¹¹ पानी। तैसे ही तुम ताहि पिछानो, भक्ति हीन जो प्राणी ॥3॥ Notes: 1 आयु, 2 रात दिन, 3 युवावस्था, 4 तूने, 5 एक पलक-भर, 6 क्या, 7 जिसमें, 8 वह, 9 पत्थर, 10 छेदे, 11 उसको।
उपदेश ( 53 ) कलु¹ में मुक्ति नाम ते पावत, गुरु यह भेद बतावे। कहो नानक सोई नर गरुवा², जो प्रभु के गुण गावे ॥4॥ [ 55 ] राग रामकली ( महला 1 ) रे मन ! ओटैं³ लेओ हरि नामा। (टेक) जाके सिमरन दुर्मति नासे, पावै पद निर्वाणा ॥1॥ बड़भागी⁴ तेहि⁵ जन को जानो, जो हरि के गुण गावे। जन्म जन्म के पाप खोय के, पुनि वैकुण्ठ सिधावे ॥2॥ अजामल को अन्त काल में, नारायण सुधि आई। जौं गति को योगी सुर⁶ वांछतैं⁷, सो गति छिन में पाई ॥3॥ नाहिं गुण नाहिं कुछ विद्या, धर्म कौन गजैं⁸ कीना। नानक बिरद राम का देखो, अभय दान तैं दीना ॥4॥ [ 56 ] श्लोक महला 1 गुण⁹ गोविंद गायो नहीं, जन्म अकारथ¹⁰ कीन। कहो नानक हरिभज मना, जहि विधि जल की मीन¹¹ ॥1॥ Notes: 1 कलियुग, 2 श्रेष्ठ, बड़ा, 3 आश्रय, 4 बड़ा भाग्यवान्, 5 उसे, 6 योगी और देवता अथवा योगीश्वर, 7 चाहे हैं, 8 गज, हाथी, 9 महिमा, बड़ाई, यश, 10 व्यर्थ किया, 11 जल की मच्छी जैसे जल बिना नहीं जीवती है वैसे नाम बिना जीना कठिन है।
( 54 ) राम-वर्षा विषयनि स्यौं¹ काहे रचयो, निमष² न होय उदार। कहो नानक भज हरि मना, पड़े न यम की फांस ॥2॥ तरुनापो³ यूं ही गयो, लियो जरा⁴ तन जीत। कहो नानक भज हरि मना, अवधू⁵ जात है बीत ॥3॥ वृद्ध भयो सूझे नहीं, काल पहुंचयो आन। कहो नानक नर बावरे ! क्यों न भजे भगवान् ॥4॥ धन दारा संपति सगल, जिन अपनी कर मान। इनमें कुछ संगी नहीं, नानक साची जान ॥5॥ पतित उधारन, भयहरन, हरि अनाथ के नाथ। कहो नानक तहि⁶ जानिये, सदा बसत तुम साथ ॥6॥ तन धन जहि⁷ तो को दियो, तास्यों⁸ नेह⁹ न कीन। कहो नानक नर बावरे ! अब क्यों डोलत दीन ॥7॥ तन धन संपै¹⁰ सुख दियो, अरु जहि¹¹ नीके¹² धाम। कहो नानक सुन रे मना ! सिमरत काहे न राम ॥8॥ सब सुख दाता राम है, दूसर नाहिं न कोय। कहो नानक सुन रे मना ! तहि सिमरत गति होय ॥9॥ जहि सिमरत गति पाइये, तहि भज रे तैं मीत¹³। कहो नानक सुन रे मना ! अवध घटत है नीत¹⁴ ॥10॥ Notes: 1 विषयों के साथ, 2 पलक भर भी, 3 युवावस्था, 4 बुढ़ापा, 5 आयु, 6 उसे, 7 जिस ने, 8 उसके साथ, 9 प्यार, प्रीति, 10 संपत्ति, 11 जिसने, 12 अच्छा स्थान, 13 ऐ मित्र, 14 नित्य।
उपदेश ( 55 ) पांच तत्व को तन रचयो, जानहु चतुर सुजान। जिह ते उपजयो नानका ! लीन ताहि में मान ॥11॥ घट घट में हरि जू वसे, संतन कह्यो पुकार। कहो नानक तिह भज मना ! भवनिधि¹ उतरे पार ॥12॥ सुख दुःख जिह परसे² नहीं, लोभ मोह अभिमान। कहो नानक सुन रे मना ! सो मूरत भगवान ॥13॥ उस्तति³ निन्दा नाहिं जिहि, कंचन लोह समान। कहो नानक तिहि भज मना ! मुक्त ताहि⁴ ते जान ॥14॥ हर्ष शोक जाके नहीं, बैरी मीत समान। कहो नानक सुन रे मना ! मुक्त ताहि ते जान ॥15॥ भय काहू को देत नहीं, नहीं भय मानत आनैं⁵। कहो नानक सुन रे मना ! ज्ञानी ताहि बखानैं⁶ ॥16॥ जिहि विषयां⁷ सगली तजी, लियो भेष बैराग। कहो नानक सुन रे मना ! तिह नर माथे भाग ॥17॥ जिहि माया ममता⁸ तजी, सब से भयो उदास। कहो नानक सुन रे मना ! तिह घट ब्रह्म निवास ॥18॥ जिहि प्राणी हौं मैं तजी, कर्त्ता राम पछान। कहो नानक वह मुक्त नर, यह मन सांची जान ॥19॥ Notes: 1 संसार, समुद्र, 2 स्पर्श न करे, 3 स्तुति, 4 इसी से, 5 दूसरे, 6 कहो, जानो, 7 विषय, 8 अहंकार, ममत्व।
( 56 ) राम-वर्षा भय नासन दुर्मति हरन, कलि¹ में हर को नाम। निश-दिन जो नानक भजे, सफल होय तिह काम ॥20॥ जिह्वा गुण गोविन्द भजो, कर्ण सुनो हरि नाम। कहो नानक सुन रे मना ! पड़े न यम के धाम ॥21॥ जो प्राणी ममता तजे, लोभ मोह अहंकार। कहो नानक आपन² तरे, औरन लेत उद्धार ॥22॥ ज्यौं स्वप्ना अरु पेखनो³, ऐसे जग को जान। इन में कछु साचो नहीं, नानक बिन भगवान् ॥23॥ निश दिन माया कारणे, प्राणी डोलत नीत⁴। कोटन में नानक कोऊ, नारायण जहि चीतैं⁵ ॥24॥ जैसे जल से बुदबुदा, उपजे विनसे नीत। जग रचना तैसे रची, कहो नानक सुन मीत ॥25॥ प्राणी कछु न चेतई⁶, मद माया के अन्ध। कहो नानक बिन हरि भजन, पड़त ताहि यम फंद ॥26॥ जो⁷ सुख को चाहै सदा, शरण राम की ले। कहो नानक सुन रे मना ! दुर्लभ मानुष देह ॥27॥ माया कारण धावहिं⁸, मूरख लोग अजान। कहो नानक बिन हरि भजन, विरथा⁹ जन्म सिरानै¹⁰ ॥28॥ Notes: 1 कलियुग, 2 अपने आप, 3 देखना, 4 नित्य, 5 चित्त में, 6 चिन्तवन करे, 7 मगर, 8 दौड़ते हैं, 9 वृथा, 10 गला रहा, बिता रहा।
उपदेश ( 57 ) जो प्राणी निश दिन भजे, रूप राम तिहि¹ जान। हरिजन, हरि अन्तर नहीं, नानक साची मान ॥29॥ मन माया में फंस रह्यो, बिसरयो गोविन्द नाम। कहो नानक बिन हरि भजन, जीवन कौने² काम ॥30॥ प्राणी ! राम न चेतई, मद माया के अन्ध। कहो नानक हरि-भजन बिन, पड़त ताहि यम-फंध ॥31॥ सुख में बहुसंगी भये, दुःख में संग न कोय। कहो नानक हरि भज मना ! अन्त सहाई होय ॥32॥ जन्म जन्म भरमत फिर्यो, मिट्यो न यम को त्रास³। कहो नानक हरि भज मना ! निर्भय पावैं वास ॥33॥ यत्न बहुत मैं कर रह्यो, मिट्यो न मन को मान। दुर्मति स्यों नानक फंधयो, राख लेयो भगवान ॥34॥ बाल, जवानी, अरु बृद्ध पुनि, तीन अवस्था जान। कहो नानक हरि भजन बिन, बिरथा⁴ सब ही मान ॥35॥ करनो हुतो⁵ सो न कीयो, पड़यो लोभ के फंध। नानक समयो रम गयो, अब क्यों रोवत अंध ॥36॥ मन माया में रम रह्यो, निकसत नाहिं न मीत। नानक मूरत चित्र ज्यौं, छाडत नाहिं न भीत⁶ ॥37॥ Notes: 1 उसे राम का रूप जान, 2 किस काम का, 3 भय, 4 वृथा, 5 करने योग्य जो था, 6 दीवार को जैसे चित्र नहीं छोड़ता वैसे माया को मन नहीं छोड़ रहा है।
( 58 ) राम-वर्षा नर चाहत कछु और, औरे की औरे भई। चितवत रह्यो ठगौरै¹, नानक फांसी गल पड़ी ॥38॥ यत्न बहुत सुख के किये, दुःख को कियो न कोय। कहो नानक सुन रे मना ! हरि भावे सो होय ॥39॥ जगत भिखारी फिरत है, सब को दाता राम। कहो नानक मन सिमर तिहि, पूर्ण होवैं काम ॥40॥ झूठे मान कहां करे, जग स्वप्ने ज्यौं जान। इन में कछु तेरो नहीं, नानक कह्यो बखान ॥41॥ गर्भ करत है देह को, विनसे छिन में मीत। जिहि प्राणी हरियश कह्यो, नानक तिहि जग जीत ॥42॥ जिहि घट सिमरन राम को, सो नर मुक्ता जान। तिहि नर हरि अन्तर नहीं, नानक साची मान ॥43॥ एक भक्ति भगवान, जिहि प्राणी के नाहि मन। जैसे सूकर² स्वान³, नानक मानो ताहि तन ॥44॥ स्वामी को गृह ज्यौं सदा, स्वान तजत नहीं नित्तै⁴। नानक यह विधि हरि भजो, इक मन होय इक चित्त ॥45॥ तीरथ, व्रत अरु दान कर, मन में धरे गुमान। नानक निष्फल जात तिह, ज्यौं कुंजरै⁵ असनान ॥46॥ Notes: 1 चित्त के भीतर ठगपन, 2 सूअर, 3 कुत्ता, 4 नित्य, 5 हाथी जैसे स्नान के बाद धूल अपने पर फैंक लेता है वैसे अहंकारी पुण्य के तीर्थ व्रत इत्यादि निष्फल होते हैं।
उपदेश ( 59 ) कंपयो, पग डगमगे, नैनैं जोत से हीन¹। कहो नानक यह विधि भई, तौ न हर रस लीन ॥47॥ निज कर देखियो जगत में, को काहू को नाहिं। नानक थिरै² हरि भक्ति है, तिहि³ राखो मन मांहि ॥48॥ जग रचना सब झूठ है, जान लियो रे मीत। कहो नानक थिर न रहे, ज्यौं बालू की भीत ॥49॥ राम गयो, रावण गयो, जाको बहु परिवार। कहो नानक थिर कछु नहीं, स्वप्ने ज्यौं संसार ॥50॥ चिंता ताकी कीजिये, जो अनहोनी होय। यह मारग संसार को, नानक थिर नहीं कोय ॥51॥ जो उपजयो सो विनस है, पड़ो आज के काल। नानक हरि गुण गाय ले, छाड सगलैं⁴ जंजाल ॥52॥ बल छुटियो, बंधन पड़े, कछु न होत उपाय। कहो नानक अब ओटैं⁵ हरि, गज ज्यौं हो सहाय⁶ ॥53॥ * बल होवा बंधन छुटे, सब किछु होत उपाय। नानक सब किछु तुमरे हाथ में, तुम ही होत सहाय ॥54॥ संग सखा सब तज गये, कोउ न निभयो साथ। कहो नानक यह विपद में, टेक एक रघुनाथ ॥55॥ Notes: 1 नेत्र प्रकाश रहित, 2 स्थिर, 3 उसे ही, 4 सारा, 5 आश्रय, 6 सहारा। [* यहाँ से गुरु गोविन्द सिंह का उत्तर है।]
( 60 ) राम-वर्षा नाम रह्यो, साधू रह्यो, रह्यो गुरु गोविन्द। कहो नानक यह जगत में, किन जपयो गुरुमन्त ॥56॥ राम नाम उर¹ में गह्यो², जाके सम नहीं कोय ! जिहि सिमरत संकट मिटैं, दर्श तुहारो होय ॥57॥ [ 57 ] रविदास चमार का भजन रे प्राणी ! क्या तेरा क्या मेरा, जैसे तरवर पँख बसेरा। जल के भीत पवन का थम्बा, रक बन्धु का गारा ॥ हाड़ मांस नाड़ी का पिंजरा, पंछी बसे बिचारा। राखो कन्ध, उसारो नीमां, साढ़े तिन हथ तेरी सीमां ॥ बांके बाल, पाग सिर टेढ़ी, यह तन होगा भस्म की ढेरी। ऊँचे मन्दिर, सुन्दर नारी, राम नाम की बाज़ी हारी ॥ मेरी जाति कमीना, बुद्धि हीना, होछा जन्म हमारा। तुमरी शरणागत मैं प्रभु जी, कहे रविदास चमारा ॥ [ 58 ] बैरागन भूली आप प्रें और जल में खोजे राम (टेक) जल में खोजे राम जाय कर तीर्थ छाने। हूण्ड फिरी, खूट नहीं, सुध अपनी आने ॥1॥ फूल माँही ज्यौं वास, कांठ में अग्नि समानी। खोदे बिना नहीं मिले, रहे धरती में पानी ॥2॥ Notes: 1 हृदय, 2 ग्रहण, 3 बसयो चित्त में खचित हुआ।
उपदेश ( 61 ) जैसे दूध घृत छिपा, छिपी मेहँदी में लाली। ऐसे पूर्ण ब्रह्म, कहूँ तिल भर नहीं खाली ॥3॥ पलटू¹ कर सतसंग, बीच में कर ले अपना काम। बैरागन भूली आप में और जल में खोजे राम ॥4॥ [ 59 ] ☙ राग सिन्दूरा, ताल दीपचन्दी ☙ गुज़ारी उम्र झगड़ों में बिगाड़ी अपनी हालत है। हुआ खारिज अपील अपना, अजायब यह वकालत है ॥1॥ मुक़द्दमे गैर लोगों के हज़ारों कर दिये फ़ैसल। न देखा मिसल अपनी को, अजायब यह अदालत है ॥2॥ दलीलें दे के गैरों पर किया साबित असूल अपना। दिल अपने का न शक टूटा, अजायब यह दलालत है ॥3॥ बहुत पढ़ने पढ़ाने से हुआ सब इल्म में कामिल। न पाया भेद रब्बी का, अजायब यह कमालत है ॥4॥ बना हाफ़िज़, पढ़े मसले, सुनाये दूसरों को भी। वले टूटा न कुफ़्र अपना, अजायब यह मसालत है ॥5॥ तू कर फ़ैसल हिसाब अपना, तुझे औरों से क्या गोविन्दा²। न किस्सा तूल दे इतना, फ़ज़ूल ही यह तवालत है ॥6॥ Notes: 1 कवि का नाम है, 2 कवि का नाम है। [☙ यह कविता स्वामी रामजी के शिष्य स्वामी गोविन्दा की है।]
( 62 ) राम-वर्षा [ 60 ] राग धनासरी, ताल धुमाली अजहूँ तोहे मन ! समझ न आई। (टेक) कियो न कुछ शुभ कर्म देह धर, हरि की सुध बिसराई ॥1॥ दिन खोवत झूठे झगड़ों में, सोवत रैन बिताई। देख विचार बहुरि¹ नाहिं पैहै, यह अवसर सुखदाई ॥2॥ छल² प्रपंच फैलाये जगत में, नाना स्वांग बनाई। पर धन, पर तियौं में चित्त राखत, चाहत मान बड़ाई ॥3॥ अजहूँ त्याग बलदेव नींद को, आ जा प्रभु शरणाई। परम पिता इक वही अगोचर, सब विधि करत सहाई ॥4॥ [ 61 ] राग गौरी, ताल धुमाली मनुवा ! मोह निद्रा त्याग। (टेक) नाम रूपमय यह जग स्वप्ना, क्या सोवे है जाग ॥1॥ जिन विषयों को आज भोग रहियो, फल वह स्वप्न समान। इनमें कहा भयो रत मूरख, अजहूँ अचेत अज्ञान ॥2॥ माया का सुख आदि अन्त वत, या में क्यों भरमाया। ब्रह्मानन्द अनन्त अनादि, वाको क्यों बिसराया ॥3॥ Notes: 1 बार बार यह समय नहीं मिले है, 2 पर दगा।
मानुष जन्म मेहर अति दुर्लभ, बार बार नहीं पावे। उठ स्वरूप चिन्तन कर जा रे, बहुरी यहाँ नहीं आवे॥4॥ [ 62 ] राग गौरी, ताल धुमाली हरि पर राखो भरोसा भाई। (टेक) काहे सोच करो दिन राती, रहो चरणन लौं लाई॥1॥ गर्भ में तौ सुधि, अब भी ले है, जब गही बाँहै सो अब भी गहै है। दाँत दिये जिन अन्न भी दे है, कब सुधि है बिसराई॥2॥ मूरख! कहा सोच से लेगा, और ताप संताप गहेगा। तन जिन दिया, वह घर धन देगा, रीति सदा चली आई॥3॥ तोहे सोच वस अपनो एक का, हरि रक्षक ब्रह्माण्ड अनेक का। विरला चले मार्ग विवेक का, धीरज मिहर उपजाई॥4॥ [ 63 ] राग धनासरी, ताल धुमाली मनुवा! तू क्यों भयो दीवाना। (टेक) छल प्रपंच करत नित्य मूरख, दुःख को सुख कर माना॥1॥ माया मोह जन्म के ठगिया, तिन के हाथ विकाना। मुख ते धर्म धर्म कहरावत, कर्म करत मन माना॥2॥ Notes: 1 हर्षन, प्रीति, 2 पकड़ी, 3 भुजा, 4 अब भी पकड़े है, 5 सहेगा अर्थात् संतप्त होगा।
जो प्रभु घट घट की जाने, ताते करत बहाना। तैहि ते तू पूछे मारग, आप ही जौनें भुलाना॥3॥ या मनुवा के पीछे चल के, सुख का कहां ठिकाना। जो प्रताप सुखदै को चीन्है, सोई परम स्थाना॥4॥ [ 64 ] ग़ज़ल तू को इतना मिटा कि तू न रहे। और तुझ में दूई की बू न रहे॥1॥ जुस्तजू भी हिजाबे-हस्ती है। जुस्तजू है कि जुस्तजू न रहे॥2॥ आरज़ू भी विसाले-परदा है। आरज़ू है कि आरज़ू न रहे॥3॥ [ 65 ] राग जंगल था रागनी पीलू, ताल तीन दिन नीके बीते जाते हैं। (टेक) सिमरन कर हरि राम नाम, तज विषे भोग अरु काम। तेरे संग न चलसी एक दाम, जो देते हैं सो पाते हैं॥1॥ Notes: 1 जो आप स्वयं भूले हुए हैं उन से तू मार्ग पूछ रहा है, 2 जो सुख देनेवाले या सुखस्वरूप परमात्मा को पहचाने है वही बुद्धिमान् है, 3 द्वैत, 4 जिज्ञासा, 5 , 6 इच्छा, 7 मिलने में आवरण, 8 अच्छे।
कौन तुम्हारा, कुटुम्ब परिवारा, किसके ही तुम, कौन तुम्हारा। तू किसका और कौन तुम्हारा, सब जाते जी के नाते हैं॥2॥ लाख चौरासी भरम के आया, बड़े भाग से नर-तन पाया। तां पर भी नहीं करे कमाई, फिर पीछे पछताते हैं॥3॥ जो तू चाहे विषय-अभिलाषा, मूरख फँसियो मौत की फाँसा। क्या देखे स्वानन की आशा, गये फिर नहीं आते हैं॥4॥ [ 66 ] ग़ज़ल आदमी को चाहिये दुनिया में रहना किस तरह? जिस तरह तालाब के पानी में रहता है कमल॥1॥ साहिबे-ज़र मुफलिसों पर ज़र लुटायें किस तरह? जिस तरह सूखी ज़िमीं पर अबर बरसाता है जल॥2॥ पाके दौलत है बशर की रहना वाजिव किस तरह? जिस तरह झुककर रहे वह शाख आये जिसमें फल॥3॥ आदमी अपने इरादे का हो पक्का किस तरह? जिस तरह क़ानून है तक़दीरे-कुदरत का अटल॥4॥ रंजो-ग़म दुनिया के इंसाँ भूल जाये किस तरह? जिस तरह वह शख़्स जिसके ज़हन में आये ख़लल॥5॥ आदमी जाये मुसीबत के मुक़ाबिल किस तरह? जिस तरह है शेर जाता सैल में सीने के बल॥6॥ Notes: 1 नदी-जल का वेग।
चार घड़ी के रहने कारण, करते मेरा मेरा हैं। ऐसी बात न मन में लावें, बस बस गये बड़ेरा हैं॥ क्या ले आया क्या ले जासी, वृथा करत हैं हुंकारा॥ सुन05॥ इस दुनिया के बीच निरंतर, एक नदी चलती भारी। दिन दिन पल पल छिन छिन, उसका बेग बड़ा है बलकारी॥ पशु पक्षी नर देव दनुजँ, उसमें बहती दुनिया सारी। जमे न उसमें पैर किसी का, करके यतन सब पचहारी॥ बिन स्वरूप जाने, किसी का, कभी न होगा निस्तारा॥ सुन06॥ इस दुनिया में एक अँधेरा, सबकी आँख में जो छाया। जिसके कारण सूझ पड़े नहीं कौन हूँ मैं कहाँ से आया॥ कौन दिशा में जाना मुझको किससे देखकर ललचाया। कौन मालिक है इस दुनिया का किसने रची है यह माया॥ निजानन्द पाने बिन कबहुँ मिटे नहीं यह संसारा॥ सुन07॥ राग धनासरी, ताल धुमाली [ 69 ] हरि से लगन कठिन है भाई। (टेक) जैसे पपीहा प्यासा बूँद का, पिया पिया रट लाई। प्यासे प्राण तड़पे दिन राती, और नीरँ ना भाई॥1॥ Notes: 1 यहाँ मुराद काल भगवान् से है, 2 दानव, 3 अज्ञान से मुराद है, 4 जल।
जैसा मृग शब्द-स्नेही, शब्द सुनन को जाई। शब्द सुने और प्राण-दान दे, तिनको नहीं डराई॥2॥ जैसे सती चढ़े सत ऊपर, पिया की राह मन भाई। पावक देख डरे कुछ नाहिं, हँसत बैठ सराई॥3॥ छोड़ो धन और तन की आशा, निर्भय हो गुण गाई। कहत कबीर सुनो भई साधो, नाहिं तो जन्म निसाई॥4॥ राग गौरी, ताल धुमाली [ 70 ] रसना! रस विषयन का त्याग री! (टेक) मोरी मान, विष समान जान के, इन विषयन से भाग री॥1॥ गज, पतंग, मृग, भँवरा, माछी, रहे विषयन संग लाग री। इक इक इन्द्रिय-विषय के पाछे, जग से गये अभाग री॥2॥ मनुष्य जाति की पाँच इन्द्रिय, पाँच विषयों में राग री। कहाँ विथा होगी मन मूरख, बुद्धि से कहो जाग री॥3॥ [ 71 ] राग गौरी, ताल तीन कर प्रभु से प्रीति रे मन! कर प्रभु से प्रीत। (टेक) Notes: 1 किंचित् मात्र, 2 अग्नि, 3 हँसती बैठ कर जल जाती है, 4 नहीं नसेगा, अर्थात् आवागमन न छूटेगा, 5 भाग्यहीन, 6 पाँचों, विषयों में रुचि करती हैं, 7 क्या, कैसी, 8 दशा, विपदा।
ऐसो समय बहुर नहीं परे हो, जाय है अवसर वीत। तन सुन्दर छबि देख न भूलो, यह वालू की भीतें॥1॥ सुख सम्पति स्वप्ने की वतियाँ, जैसे तृण पर शीतें। जाहि कर्म परम पद पावे, सोई कर्म कर मीत॥2॥ शरण आय, सो सचहीं द्वारें, यह प्रभु की रीत। कहे कबीर सुनों भाई साधो, चल हो भवदल जीत॥3॥ [ 72 ] साकी, राग कालंगड़ा पी ले प्याला, हो मतवाला! प्याला प्रेम हरिरस का रे। (टेक) बालपना सब खेल गँवाया, तरुण भया नारी वश का रे। वृद्ध भया, कफ वायु ने घेरा, तन से जाय नहीं खटका रे॥1॥ नहीं सतसंग न कथा कीरतन, नहीं प्रभु चरणन प्रेम रचा रे। अबहुँ सोच समझ अज्ञानी, इस जग में नहीं कोई अपना रे॥2॥ काम क्रोध लोभ ईर्ष्या, इनमें निशदिन रहत फँसा रे। भोग विलास वासना जग की, गल बिच यम का फन्द पड़ा रे॥3॥ देह मोह में क्यों भरमाया, देह खेह यह है किसका रे। चौरासी से उवरा चाहे, छोड़ कामनी का चलका रे॥4॥ Notes: 1 दीवार, 2 वालें (बालू), 3 ओस, पाला, 4 जिस, 5 तारें, 6 संसार के नामरूपी दलदल को पार कर, या विषय-दल को जीत, 7 निकला।
नाम कमल बिच है कस्तूरी, जैसे मृग फिरे वन का रे। भटक भटक क्यों भटका खावे, घट के पट को दे झटका रे॥5॥ वाद विवाद में निशदिन बीते, मानुष जन्म न सार गह्यो रे। नर-देहि निष्फल गयी सारी, अवसर पाय न लाभ लह्यो रे॥6॥ मात पिता भाई सुत बन्धु, संग नहीं कोई जाय सका रे। जब लग जीवे हरिगुण गा ले, धन यौवन दिन है दस का रे॥7॥ कर्म धर्म एको नहीं जाना, सार वस्तु नहीं जान पड़ा रे। बिन सतगुरु इतना दुख पाया, वैद्य मिला नहीं इस तन का रे॥8॥ चार खानि नर भरमत डोले, कबहुँ न सतपथ खोज करा रे। कहैं कबीर सुनो भाई साधो, नख शिखैं पूर रहा विष का रे॥9॥ राग मारू [ 73 ] राम सिमर पछतायेगा, हे मन! राम सिमर। (टेक) पापी उधड़ा लोभ करत है, आज काल उठ जायेगा॥1॥ लालच लागे जन्म गँवाया, माया भरम भुलायेगा। धन यौवन का गरब न कीजे, कागज़ ज्यों गल जायेगा॥2॥ Notes: 1 पकड़ा जाना, 2 लिया, पाया, 3 चार योनि, जैसे अंडज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज, 4 नाखून से सिर तक उस मनुष्य का देह विष से भरा हुआ है, जो सत्य-पथ पर नहीं चलता है, 5 जीव, वित्त, 6 अहंकार।
जौं जम आय केस गहे पटके, ता दिन कछु न बँसायेगा। सिमरन भजन दया नहीं कीनी, तौ मुल चोटाँ खायेगा॥3॥ धर्मराय जब लेखा माँगे, क्या मुख लै के जायेगा। कहत कबीर सुनो रे सन्तो, साथ संगत तर जायेगा॥4॥ राग कालंगड़ा, ताल तीन [ 74 ] मत फिर मनुवा! भूला भूला जग में कैसा नाता रे। (टेक) माता कहे यह पुत्र हमारा, बहन कहे बीर मेरा। भाई कहे यह भुजा हमारी, नार कहे नर मेरा॥1॥ पेट पकड़ कर माता रोवे, बाँह पकड़ कर भाई। लपट झपट कर तिरिया रोवे, हंसा जाय उड़ाई॥2॥ जब लग जीवे माता रोवे, बहन रोवे दस मासा। तेरह दिन तक तिरिया रोवे, फेर करे घर वासा॥3॥ चार गज़ी चादर मँगवाई, चढ़ा काठ की घोड़ी। चारों कोने आग लगाई, फूँक दयी जैसे होरी॥4॥ हाड़ जरे जिस लाह कड़ी की, केश जरे जैसे घासा। सोना ऐसी काया जर गई, कोई न आया पासाँ॥5॥ Notes: 1 जब, 2 कुछ वश न चलेगा, 3 स्वजन्म, 4 भाई, 5 यहाँ भाई नाम अभिप्राय है, 6 स्त्री, 7 समीप।
नेह स्नेह ढूँढ नहीं पाई, ढूँढ फिरो चहूँ पासा। कहत कबीर सुनो भाई साधो, तजो जीने की आसा॥6॥ राग कालंगड़ा, ताल तीन [ 75 ] क्या माँगूँ कुछ थिर न रहाई, देखत नैन चलौ जग जाई॥1॥ इक लख पूत, सवा लख नाती। ता रावण-घर दिया न बाती॥2॥ लंका सा कोट, समुद्र सी खाई। ता रावण की खबर न पाई॥3॥ सोने का महल, रूपे का छाजा। छोड़ चलो नगरी का राजा॥4॥ कोई करो महल कोई करो टाटी। उड़ जाय हंस, पड़ी रहे माटी॥5॥ आवत संग न जात संघाती। कहूँ भयो घर बाँधे हाथी॥6॥ कहैं कबीर अन्त की बारी। हाथ झाड़ ज्यों चला जुआरी॥7॥ Notes: 1 चहूँ ओर, 2 स्थिर, 3 क्या होगा।
जौं जम आय केस गहे पटके, ता दिन कछु न बँसायेगा । सिमरन भजन दया नहीं कीनी, तौ मुल्ल चोटाँ खायेगा ॥ 3 ॥ धर्मराय जब लेखा माँगे, क्या मुख लै के जायेगा । कहत कवीर सुनो रे सन्तो, साध संगत तर जायेगा ॥ 4 ॥ राग कालंगड़ा, ताल तीन [ 64 ] मत फिर मनुवा ! भूला भूला जग में कैसा नाता रे । ( टेक ) माता कहे यह पुत्र हमारा, बहन कहे बिरं मेरा । भाई कहे यह भुजा हमारी, नार कहे नर मेरा ॥ 1 ॥ पेट पकड़ कर माता रोवे, बाँह पकड़ कर भाई । लपट झपट कर तिरिया रोवे, हंसा जाय उड़ाई ॥ 2 ॥ जब लग जीवे माता रोवे, बहन रोवे दस मासा । तेरह दिन तक तिरिया रोवे, फेर करे घर वासा ॥ 3 ॥ चार गजी चादर मँगवाई, चढ़ा काठ की घोड़ी । चारों कोने आग लगाई, फूँक दयी जैसे होरी ॥ 4 ॥ हाड़ जरे जिस लाह कड़ी की, केश जरे जैसे घास । सोना ऐसी काया जर गई, कोई न आया पासौं ॥ 5 Notes: 1 जब, 2 कुछ बस न चलेगा, 3 स्वजन, 4 भाई, 5 वीर का नाम अभिप्राय है, 6 स्त्री, 7 समीप ।
नेह स्नेह ढूँढ नहीं पाई, ढूँढ फिरो चहौं पैसा । कहत कवीर सुनो भाई साधो, तजो जीने की आसा ॥ 6॥ राग कालंगड़ा, ताल तीन [ 65 ] क्या माँगूं कुछ थिर न रहाई, देखत नैंन चलौ जग जाई ॥ 1 ॥ इक लख पूत, सवा लख नाती । ता रावण घर दिया न बाती ॥ 2 ॥ लंका सा कोट, समुद्र सी खाई । ता रावण की खबर न पाई ॥ 3 ॥ सोने का महल, रूपे का छाजा । छोड़ चलो नगरी का राजा ॥ 4 ॥ कोई करो महल कोई करो टाटी । उड़ जाय हंस, पड़ी रहे माटी ॥ 5 ॥ आवत संग न जात संघाती । कहाँ भयो घर बाँधे हाथी ॥ 6 ॥ कहै कबीर अन्त की बारी । हाथ झाड़ ज्यों चला जुआरी ॥ 7 ॥ Notes: 1 हंस का अभिप्राय जीवात्मा है, जो चहुँ ओर [फिरे], 2 स्थिर, 3 क्या होगा ।
( 74 ) राम-वर्षा राग कालंगड़ा [ 76 ] तनै घर सुख्या कोई न देखा, जो देखा सो दुख्या हो । राजा पैरजा रंक धनी नर, अघमाधम वा मुख्यां हो ॥ 1 ॥ घटे बढ़े सब जग दुख्या, दया गृही क्या त्यागी हो । सुख्या या जग यहीं कुटुम्बी, सुख्या नहीं वैरागी हो ॥ 2 ॥ योगी दुख्या, उंगम दुख्या, तपस्वी को दुःख दूना हो । आशा तृष्णा सब को व्यापे, कोई महल नहीं सूना हो ॥ 3 ॥ सांच कहूँ तो कोई न माने, झूठ कहा नहीं जाई हो । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर दुख्या, जिन यह राह चलाई हो ॥ 4 ॥ अवधू दुख्या, भूपति दुख्या, रंक दुखी विपैं रीते हो । कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मनुष्य सुखी में न जीते हो ॥ 5 ॥ [ 77 ] राग धनासरी, ताल थुमाली आगे समझ पड़ेगी माई । ( टेक ) Notes: 1 तनधारी प्राणी, 2 प्रजा, 3 निर्धन, गरीब, 4 अति नीच से नीच, 5 श्रेष्ठ से श्रेष्ठ वा ऊँचा से ऊँचा, 6 लाभहानि के फेर में, 7 खाली, अर्थात् कोई प्राणी आशा तृष्णा से खाली नहीं, 8 रीति, मार्ग, 9 अवधूत, 10 विरोधी दशा के कारण निर्धन दुख्या है, 11 मन के जीतने पर ही मनुष्य सुखी है
उपदेश ( 75 ) यहाँ अहार उदर भर खायो, बहु विधि माल बढ़ाई । तुम पर दया कहाँ ते होगी, तुम्हैं दया नहीं आई ॥ 1 ॥ यहां तो परधन लूट लेत हो, गल बिच फाँस लगाई । तिनके पीछे तीन प्यादे, छिन छिन ख़बर बताई ॥ 2 ॥ साध सन्त की निन्दा कीनी, अपना जन्म नसाई । पैर पैर पर कांटा लगि है, यह फल आगे आई ॥ 3 ॥ कहत कवीर सुनो भाई साधो, दुनिया है दो चित्ताई । सांच कहे सो मारा जाय, झूठे जग पतियाई ॥ 4 ॥ [ 78 ] राग धनासरी, ताल थुमाली मन ! तू क्यों भूला रे भाई । तेरी सुध बुध कहाँ हराई ॥ ( टेक ) जैसे पंछी रैन बसेरा, बसे वृक्ष में आई । भोरैं भये सब आप आपको, जहां तहां उड़ जाई ॥ 1 ॥ स्वप्ने में तोहे राज मिलो है, हाकिम हुक्म दुहाई । जाग पड़ा जब लाओ न लशकर, पलक खुले सुध पाई ॥ 2 ॥ माता पिता बंधु सुत तिरिया, ना कोई सगा सगाई । यह तो सब स्वारथ के संगी, झूठी लोक बड़ाई ॥ 3 ॥ Notes: 1 नाश किया, बिगाड़ा, 2 दो चित्त रखने का नाम ही दुनिया है, 3 झूठे मनुष्य की दुनिया सन्मान करती है, 4 रात, 5 प्रातःकाल होते ही, 6 स्त्री
( 76 ) राम-वर्षा सागर माहिं लहर उठत है, गिनती गिनी न जाई । कहै कवीर सुनो भाई साधो अवधी माहिं समाई ॥ 4 ॥ [ 79 ] राग धनासरी, ताल तीन रे मन ! धीरज क्यों न धरे ! ( टेक ) शुभ और अशुभ कर्म पूर्वला, रत्ती न घटे न बढ़े ॥ 1 ॥ होनहार होय पुनि सोई, चिन्ता काहे करे । पशु पक्षी जीव कोटी नाना, सब की सुध धरे ॥ 2 ॥ गर्भवास में खबर लेत है, बाहिर क्यों बिसरे । मात पिता सुख सम्पति दारा, काहे ज्वाल जरे ॥ 3 ॥ मन तो प्राणपति प्रभु से, भटकत काहे फिरे । हरि को छोड़ और को धावे, कार्य इक न सरे ॥ 4 ॥ हरि सेवा कर रे मन मूरख, कोटिन व्याधि हरे । कहत कवीर सुनो भाई साधो, सहज में जीव तरे ॥ 5 ॥ [ 80 ] राग गौरी, ताल थुमाली साधो ! मन मानत नहीं मोरा रे ( टेक ) याको चार बार समझाऊँ, जग में जीता थोड़ा रे ॥ 1 ॥ Notes: 1 समुद्र, 2 ज्वाला अर्थात् मातापिता सुख सम्पति के मोह रूपी अग्नि की ज्वाला में क्यों जलता है, 3 दूसरी ओर दौड़ता है, 4 पूर्ण नहीं होता, 5 सुगमता से
उपदेश ( 77 ) याका याका गरब न कीजे, क्या सांवरा क्या गोरा रे । बिन हरि भक्ति तन काम न आवे, कोटि सुगंध चमोरा रे ॥ 2 ॥ या माया का गरब न कीजे, क्या हाथी क्या घोड़ा रे । जोड़ जोड़ धन बहुत चले गये, सहस्र लाख करोड़ा रे ॥ 3 ॥ दुविधा दुरमति और चतुराई, जन्म गयो नर बौरा रे । कहै कवीर चरणन चित राखो, ज्यों सुई में डोरा रे ॥ 4 ॥ [ 81 ] राग सूह जयवन्ती ( महला 1 ) रे मन, कौन गति होइ है तेरी । ( टेक ) यह जग में राम नाम, सो तैं नहीं सुन्यो कान, विषयन सो अति लुभान, मति नाहीं फेरी ॥ 1 ॥ मानुष को जन्म लीन, सिमरन न निमष कीन । दारा सुंग भयो दीन, पगहूँ पड़ी बेरी ॥ 2 ॥ नानक जन कहै पुकार, स्वप्ने ज्यों जग पसार, सिमरत न क्यों सुरार, माया जाकी चेरी ॥ 3 ॥ [ 82 ] राग गौरी वा धनासरी, ताल थुमाली ( महला 1 ) मन रे ! कहाँ भयो तैं बौरा ! ( टेक ) अहँनिश अवध घटे नहीं जाने, भयो लोभ संग हौरा ॥ 1 ॥ Notes: 1 अति लीन, 2 एक पलक मात्र, 3 स्त्री का सुत, 4 पाँव में, 5 चेली, सेविका, 6 पागल, 7 रात दिन, 8 छोटा, हल्का, तुच्छ
( 78 ) राम-वर्षा जो तन तें अपनो कर मान्यो, अति सुन्दर यह नारी । इनमैं कछु तेरो रे नाहीं, देखो सोच विचारी ॥ 2 ॥ रतन जन्म अपनो तैं हार्यो, गोविन्द गति नहीं जानी । निमिषैं न लीन भयो चरनन सों, विरथा अवध सिरानी ॥ 3 ॥ कहो नानक खोई नर सुखिया, राम नाम गुण गावें । और सकल जग माया मोह्या, निर्भय पद नहीं पावे ॥ 4 ॥ [ 83 ] राग वसन्त ( महला 1 ) मन कहाँ बिसार्यो राम नाम । तन विनसे, जम द्वारे पड़े काम ॥ 1 ॥ यह जग धूएँ का पहाड़ । तैं साचा मानया कैहै विचार ॥ 2 ॥ धन दारा सम्पति ग्रहे । कछु संग न चाले समझ ले ॥ 3 ॥ इक भक्ति नारायण होय संग । कहो नानक भज, ताहि एक रंग ॥ 4 ॥ Notes: 1 सूने, 2 आँख की पलक मात्र, 3 व्यर्थ, 4 आयु, 5 गलना, व्यतीत होना, 6 सारा, 7 नष्ट हो, 8 यमराज के साथ, 9 किस विचार से, 10 उसको
उपदेश ( 79 ) [ 84 ] राग जयतसरी ( महला 1 ) भूल्यो मन ! माया उरझायो । ( टेक ) जो जो कर्म कियो लालच लग, तहि तहि आप बँधायो ॥ 1 ॥ समझ न परी विषय रस रचयो, यश हरि को विसरायो । संग स्वामी, सो जान्यां नाहिं, वन खोजन को धायो ॥ 2 ॥ रत्न नाम घट ही के भीतर, ताको मोल न पायो । जन नानक भगवन्त भजन बिन, वृथा जन्म गँवायो ॥ 3 ॥ [ 85 ] राग जैतसरी ( महला 1 ) मन रे ! साचा गहो विचारा । ( टेक ) राम नाम बिन मिथ्या मानो, सगरे यह संसारा ॥ 1 ॥ जाको योगी खोजत हारे, पायो नाहिं तैं पारा । सो स्वामी तुम निकट पिछानो, रूप रेख ते न्यारा ॥ 2 ॥ पावन नाम जगत में हरि को, कबहूँ नाहिं संभारा । नानक शरण पड्यो जग बंधन, राखो बिरद तुम्हारा ॥ 3 ॥ Notes: 1 उलझ उससे, 2 चला, दौड़ा, 3 उसका, 4 ग्रहण करो, 5 सारा, 6 पवित्र करनेवाला, 7 निज धर्म, हे प्रभु ! तुम अपना राखो
( 80 ) राम-वर्षा [ 86 ] राग गौरी व धनासरी, ताल थुमाली ( महला 1 ) प्राणी को हरिजस मन नहीं आवे । ( टेक ) अहनिश मग्न रहे माया में, कहो कैसे गुण गावे ॥ 1 ॥ पूत मीत माया ममता स्यों, यह विधि आप बँधावे । मृगतृष्णा ज्यों झूठो यह जग, देख तास उठ धावे ॥ 2 ॥ भुक्ति मुक्ति का कारण स्वामी, मूढ़ ताहि विसरावे । जन नानक कोटन में कोऊ, भजन राम को पावे ॥ 3 ॥ [ 87 ] राग गौरी व धनासरी, ताल थुमाली ( महला 1 ) नर अचेत ! पाप से डर रे । ( टेक ) दीन दयाल सगल भय भंजन, शरण ताहि तुम पड़ रे ॥ 1 ॥ वेद पुराण जासों गुण गावत, ताको नाम हिय में धर रे । पावन नाम जगत में हरि को, सिमर सिमर सगल मल सब हर रे ॥ 2 ॥ मानुप देह बहुर न पावे, कछु उपाय मुक्ति का कर रे । नानक कहत गाय करुणामय, भवसागर के पार उतर रे ॥ 3 ॥ Notes: 1 दिन रात, 2 पुत्र हत्यादि, 3 उसे, 4 वे उधर, 5 जिसका, 6 हृदय में, 7 पवित्र करने वाला, 8 मैल, पाप
उपदेश ( 81 ) [ 88 ] राग सोरठ ( महला 1 ) रे नर ! यह सोची जियँ धार । ( टेक ) सकल जगत है जैसे स्वप्ना, विनसत लगत न बार ॥ 1 ॥ बारू भीनि बनाई रच पच, रहत नहीं दिन चार । तैसे ही यह सुख माया के, उरझ्यो कहाँ गँवार ॥ 2 ॥ अजहूँ समझ कछु बिगड्यो नाहीं, भज ले राम मुरार । कहो नानक निज मत साधन को, भाख्यो तोहि पुकार ॥ 3 ॥ [ 89 ] राग सोरठ ( महला 1 ) या जग मीत न देखियो कोई । ( टेक ) सफल जगत आपने सुख लाग्यो, दुख में संग न होई ॥ 1 ॥ दारा मीत पूत सम्बन्धी, सगरे धन सों लागे । जवहीं निर्धन देख्यो नर को, संग छोड़ सब भागे ॥ 2 ॥ कहौं कहा इस मन बौरे को, इनसों नेह लगायो । दीनानाथ सकल भय भंजन, यश ताको बिसरायो ॥ 3 ॥ श्वान पूँछ ज्यों, भयो न सूधो, बहुत यत्न मैं कीनो । नानक लाज बिरद की राखो, नाम तुम्हारो लीनो ॥ 4 ॥ Notes: 1 सच करके, सच्ची बात, 2 चित्त में धार, 3 रेत की दीवार, 4 अभी भी, 5 कह्यो, 6 इस जगत में मित्र, 7 पागल, 8 स्नेह, प्रीति, 9 कुत्ते की पूँछ, 10 निज धर्म
( 82 ) राम-वर्षा [ 90 ] राग वसन्त हिंडोल ( महला 1 ) साधो ! यह तन मिथ्या जानो । ( टेक ) या भीतर जो राम वसत है, साचो ताहि पहिचानो ॥ 1 ॥ यह जग है सम्पति स्वप्ने की, देख कहा ऐंडानो । संग तिहारे कछू न चाले, ताहि कहा लपटानो ॥ 2 ॥ उस्तति निन्दा दोऊ परहर, हरि कीरति उर आनो । जन नानक सबही में पूरण, एक पुरष भगवानो ॥ 3 ॥ [ 91 ] राग धनासरी, ताल थुमाली ( महला 1 ) साधो यह जग भरमैं भुलाना । ( टेक ) राम नाम का सुमिरन छोड्या, माया हाथ बिकाना ॥ 1 ॥ मात पिता भाई सुत घनिता, ताके रस लपटाना । यौवन धन प्रभुता के मद में, अहनिशैं रहे दिवाना ॥ 2 ॥ दीन दयाल सदा दुख भंजन, तास्यों मन न लगाना । जन नानक कोटिन में किन्हूं, गुरुमुख होय पछाना ॥ 3 ॥ Notes: 1 क्या अहंकार कर रहा है, 2 चले, 3 त्यागो, 4 हृदय में बसा, धारण करो, 5 भ्रम, 6 स्त्री, 7 दिन रात, 8 उसमें
उपदेश ( 83 ) [ 92 ] राग गौरी वा धनासरी, ताल थुमाली ( महला 1 ) साधो ! यह मन गह्यो न जाई । ( टेक ) चंचल तृष्णा संग वसत है, यातें थिर न रहाई ॥ 1 ॥ कठिन क्रोध घट ही के भीतर, जेहि सुधि सब बिसराई । रतन ज्ञान सब को हर लीना, ता स्यों कछु न बसाई ॥ 2 ॥ योगी यत्न करत सब हारे, गुणी रहे गुण गाई । जन नानक हरि भये दयाला, तो सब विधि बन आई ॥ 3 ॥ [ 93 ] राग वसन्त ( महला 1 ) कहाँ भूलयो रे ! झूठे लोभ लाग, ( टेक ) कछु बिगड्यो नाहीं, अजहूँ जाग ॥ 1 ॥ सम स्वप्ने के यह जग जान । विनसे छिन में, साची मान ॥ 2 ॥ संग तेरे हरि बसत नीत । निश वासर भज ताहि मीत ॥ 3 ॥ Notes: 1 वश में नहीं आता अर्थात् निरोध नहीं होता, अथवा पकड़ा नहीं जाता, 2 जिससे, 3 स्थिर, 4 जिससे, 5 अभी भी, 6 नित्य, 7 रात दिन, 8 मित्र
( 84 ) राम-वर्षा वार अन्तै की होय सहाय । कहो नानक गुण ताके गाय ॥ 4 ॥ [ 94 ] राग सारंग ( महला 1 ) कहाँ मन विषयां स्यों लपटाई । ( टेक ) या जग में कोऊ रहन न पावे, इक आवै इक जाई ॥ 1 ॥ काको तन धन, सम्पति काकी, का स्यों नेह लगाई । जो दीसे सो सगल विनासे, ज्यों वादर की छाई ॥ 2 ॥ तज अभिमान, शरण संतन गहौं, मुक्ति होइ छिन माहिं । जन नानक भगवन्त भजन बिन, सुख स्वप्ने भी नाहिं ॥ 3 ॥ [ 95 ] तू सुमिरन कर ले मेरे मना ! तेरी बीती जाती उम्र हरि नाम बिना । ( टेक ) पंछी पंख बिन, हस्ती दन्त बिन, नारी पुरुष बिना । वेश्या पुत्र, पिता बिन होना, तैसे प्राणी हरि नाम बिना ॥ देह नैन बिन, रैन चन्द्र बिन, धरती मेघ बिना । जैसे पंडित वेद विहीना, तैसे प्राणी हरि नाम बिना ॥ Notes: 1 अन्त समय, 2 विषयों में, 3 किसका, 4 स्नेह, प्यार, 5 दिखाई दे, 6 पकड़ो
उपदेश (85) कूप नीर बिन, धेनु खीर बिन, मन्दिर दीप बिना। जैसे तरुवर फल बिन हीना, तैसे प्राणी हरि नाम बिना॥ काम क्रोध मद लोभ निहारो, छोड़ विरोध तू संत जना। कहै नानक शाह सुनो भगवंता, या जग में कोई नहीं अपना॥ [ 96 ] राग सोरठ ( महला 1 ) माई ! मन मेरो वश नाहिं। ( टेक ) निश वासर विषयन को धावत, कै विधि रोकूँ ताहि॥ 1 ॥ वेद पुराण सिमृति के मत सुन, निमष न हिये बसाये। पर धन, पर दारा स्यों रचयो, विरथा जन्म सिरावे॥ 2 ॥ मद माया के भयो बावरो, सुरत ना कछु ज्ञाना। घट ही भीतर बसत निरञ्जन, ताको मरम न जाना॥ 3 ॥ जब ही शरण साधु की आयो, दुर्मति सकल विनासी। तब नानक चेत्यो चिन्तामनि, काटी जग की फाँसी॥ 4 ॥ [ 97 ] राग तिलंग ( महला 1 ) जाग ले, रे मना ! जाग ले, कहूँ गाफिल सोया। ( टेक ) जो तन उपज्या संग ही, सो भी संग न होया॥ 1 ॥ Notes: 1 नित्य प्रति, रात दिन, 2 क्षणिक मात्र, आँख की झपक मात्र, 3 हृदय में, 4 व्यर्थ, 5 नष्ट हुई।
( 86 ) राम-वर्षा मात पिता सुत बंधु जन, हितू जौस्यों कीना। जीव छूटियो जब देह से, डार अग्नि में दीना॥ 2 ॥ जीवित तौ व्यवहार है, जग को तुम जानो। नानक हरि गुण गाय ले, सब स्वप्न समानों॥ 3 ॥ [ 98 ] राग तिलंग ( महला 1 ) हरियश रे मना ! गाय ले, जो संगी है तेरो। ( टेक ) औसर बीत्यो जात है, कहो मान ले मेरो॥ 1 ॥ संपति रथ धन राज स्यों अति नेह लगायो। काल फाँस जब गले पड़ी, सब भयो परायो॥ 2 ॥ जान बूझ के चावरे ! तैं काज विगाड़्यो। पाप करत सकुच्यो नहीं, नहीं गर्भ निवारियो॥ 3 ॥ जहि विधि गुरु उपदेसिया, सो सुन रे भाई। नानक कहत पुकार के, गहो प्रभु शरणाई॥ 4 ॥ [ 99 ] राग धनासरी ( महला 1 ) अब मैं कौन उपाय करूं। ( टेक ) जहि विधि मन को संशा चूके, भौनिधि पार परूँ॥ 1 ॥ Notes: 1 स्नेह, प्यार, 2 जिससे, 3 जीने तक, 4 स्वप्नवत्, 5 आयु, समय, 6 साथ, 7 अत्यन्त प्रेम, स्नेह, 8 पागल, मूर्ख, 9 तूने, 10 संकोचे नहीं, 11 जिस प्रकार, 12 पकड़ो।
उपदेश ( 87 ) जन्म पाय कछु भलो न कीनो, ताते अधिक डरूँ। मन, वच, कर्म हरिगुण नहीं गाय, यह जीय सोच धरूँ॥ 2 गुरु मति सुन कछु ज्ञान न उपज्यो, पशु ज्यों उदर भरूँ। कहो नानक प्रभु बिरद पछान्यो, तब हौं पतित तरूँ॥ 3 ॥ [ 100 ] राग आसा ( महला 1 ) बिरथा कहूँ कौन स्यों मन की। ( टेक ) लोभ बस्यो दशों दिश धावत, आशा लग्यो धन की॥ 1 सुख के हेत बहुत दुख पावत, सेव करत जन जन की। द्वारे द्वारे स्वान ज्यों डोलत, न सुधि राम भजन की॥ 2 ॥ मानुष जन्म अकारथ खोवत, लाज न लोक हसन की। नानक हरियश क्यों नहीं गावत, कुमति विनासे तन की॥ 3 ॥ [ 101 ] राग सोरठ ( महला 1 ) मन रे कौन कुमति तैं लीनी। ( टेक ) पर दारा निन्दा रस रचयो, राम भगति नहीं कीनी॥ 1 ॥ मुक्ति पंथ जान्यो तैं नाहीं, धन जोड़न को धाथौ। अन्त संग काहू नहिं दीना, बिरथा आप बँधाया॥ 2 ॥ Notes: 1 इससे, 2 मन वाणी कर्म से, 3 चित्त में, 4 निज धर्म ईश्वर का दया धर्म, 5 वृथा, 6 किस से, 7 दौड़ा, 8 व्यर्थ।
( 88 ) राम-वर्षा ना हरि भज्यो, न गुरुजन सेव्यो, नो उपज्यो कछु ज्ञाना। घट ही माँहि निरञ्जन तेरे, तैं खोजत उजाना॥ 3 ॥ बहुत जन्म भरमत तैं हार्यो अस्थिर मति नहीं पाई। मानुष देह पाय पद्यै हरि भज, नानक बात बताई॥ 4 ॥ [ 102 ] ग राग मारू ( महला 1 ) माई ! मैं मन को, मान त्यागयो। ( टेक ) माया के मद जन्म सिरायो, राम भजन नहीं लागयो॥ 1 ॥ यम को डंड पड़्यां सिर ऊपर, तब सोवन तैं जाग्यां। कहा होत अब के पछतायो, छूटत नाहिं भागयो॥ 2 ॥ यह चिन्ता उपजी घट में जब, गुरुचरणन अनुरागयो। सुफल जन्म नानक तब हुआ, जो प्रभु यश में पाग्यो॥ 3 ॥ [ 103 ] राग देव गंधारी ( महल्ला 1 ) सब कुछ जीवित को ब्योहार ( टेक ) मात पिता भाई सुत बांधव अरु फिर घर की नार॥ 1 ॥ तन से प्राण होत जब न्यारे तेरतें प्रेत पुकार। आध घड़ी कोऊ नहीं राखे, घर ते देत निकार॥ 2 ॥ Notes: 1 जंगल में, वन में, 2 स्थिर बुद्धि, 3 हरि चरण, 4 खोयो, गँवायो वा बितायो, 5 से, 6 पाया, 7 तुरन्त, पीछे।
उपदेश ( 89 ) मृग तृष्णा ज्यों जग रचना यह, देखहुँ हृदय विचार। कहो नानक भज राम नाम नित, जो ते होत उधार॥ 3 ॥ [ 104 ] राग सोरठ ( महला 1 ) रे मन ! राम स्यों कर प्रीत। ( टेक ) श्रवणों गोविंद गुण सुनो अरु गाओ रसना गीत॥ 1 ॥ कर साध संगति सिमर माधो, होय पतित पुनीत। काल व्याल ज्यों पड्यो डोले, मुख पसारे मीत॥ 2 ॥ आज काल फुनि तोहि ग्रसिहे, समझ राख्यो चीतैं। कहो नानक राम भज ले, जात औसर बीत॥ 3 ॥ Notes: 1 रेत जो दूर से धूप में जल दिखाई देती है, 2 जिप से, 3 साथ, 4 कानों से, 5 जिह्वा से, 6 ऐ मित्र, 7 चित्त में, 8 समय, आयु।