श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

वैराग्य

भाग 7-9 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 7-9 · अध्याय 4 / 14

वैराग्य

[ 105 ] राग जंगला, ताल तीन, वा राग सोरठ ( महला 1 ) प्रीतम जान लियो मन माहीं॥ ( टेक ) अपने सुख से ही जग बाँध्यो, कोउ काहू की नाहीं॥ 1 ॥ प्री० सुख में आन बहुन मिल बैठत, रहत चहूँ दिश घेरे। विपद पड़ी सब ही संग छाड़त, कोऊ न आवत नेरे॥ 2 ॥ प्री० वर की नार बहुत हित जासों, रहत सदा संग लागी। जब ही हंस तजी यह काया, प्रेत-प्रेत कह भागी॥ 3 ॥ प्री० यह विधि को ब्योहार बन्यो है, जासों नेह लगायो। अंत बार नानक बिन हर जी, कोऊ काम न आयो॥ 4 ॥ प्री० Notes: 1 चारों ओर, तरफ़, 2 दुःख, आपत्ति, 3 प्यार, स्नेह, 4 जीव, 5 मोह, प्रेम।

वैराग्य ( 91 ) [ 106 ] राग देव गंधारी ( महल्ला 1 ) * जगत में झूठी देखी प्रीत। ( टेक ) अपने ही सुख स्यों सब लागे, क्या दारा क्या मीतैं॥ 1 ॥ मेरो मेरो सबहि कहत हैं, हित स्यों बाँध्यो चीतैं॥ 2 ॥ अन्त काल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज है रीतैं॥ 3 ॥ मन मूरख अजहूँ नहिं समझत, सिख दे हारियो नीतैं॥ 4 ॥ नानक भवजल पार पड़े, जो गावे प्रभु के गीत॥ 5 ॥ [ 107 ] राग धनासरी, ताल चुमाली ( महला 1 ) साधो रचना राम रचाई॥ टेक॥ इक बिनसे इक स्थिर माने, अचरज लख्यो न जाई॥ 1 ॥ काम क्रोध मोह वश प्राणी, हरि मूरत बिसराई। झूठा तन साँचा कर मान्यो, ज्यों स्वपना रैनाई॥ 2 ॥ Notes: 1 साथ, 2 स्त्री, 3 मित्र, 4 स्नेह, स्वार्थ, भलाई, 5 चित्त, 6 व्यवहार, रिवाज, तरीका, 7 अभी तक, 8 शिक्षा देते, 9 नित्य, 10 संसार समुद्र, 11 नाश होना, 12 हरि की मूर्ति, ध्यान, 13 स्वप्न, ख्वाब, 14 रात। Note: * (नोट) यही भजन पहिली आवृत्ति में जब छपा था, तो वह लिखित कापी से लेकर दिया गया था। पर अब ग्रन्थ साहिब के साथ मिलाने से इसे दिया गया है, इसलिये पहिले से कुछ भेद इसमें है।

( 92 ) राम-वर्षा जो दीखे, सो सकल विनासे, बादर ज्यों की छाई। जन नानक जग जान्यो मिथ्या, रहो राम शरनाई॥ 3 ॥ [ 108 ] साकी, राग जोगी, ताल चुमाली। जग में कोई नहीं जिन्दे मेरिये ! हरी बिना रखपाले ( टेक ) धन जोड़न नूं बहुत सियाना, रैनैं दिनां यही चिन्ता। अन्त समय यह सब धन तेरा, कदे न होसी मन्ता॥ 1 ॥ जि० खावन पीवन दे विच रचया, भूल गया प्रभु अपना। यह जिस नूं अपना कर जाने, होसी रैनैं का सुपना॥ 2 ॥ जि० महल अरु माड़ी, ऊँची अटारी, है शोभा दिन चारी। नाम बिना कोई काम न आवे, छूटन अन्त ही वारी॥ 3 ॥ जि० लगत जंजाल तेरे गल फांसी, लेसी जान प्यारी। हरि भजन बिना इस जग दे बिच, सक्ते न कोई उतारी॥ 4 ॥ जि० जंगल ढूँढ़न जा न प्यारे, निकट वसे हरि स्वामी। तू जाने हरि दूर वसे है, वह तो घट-घट अन्तर्यामी॥ 5 ॥ जि० Notes: 1 सब नाश होवे, 2 बादल, 3 तरह, 4 ऐ जान मेरी!, 5 रक्षा करने वाला, 6 दक्ष, निपुण, चतुर, 7 रात दिन, 8 कभी, 9 अच्छा फल देने वाला, 10 खान पान, 11 लग गया, मग्न हो गया, 12 रात्रि का स्वप्न, 13 और, 14 ऊँचा मकान, 15 चार दिन की शोभा है, 16 पार उतारना, 17 समीप।

वैराग्य ( 93 ) होय अचीतें सोवे सुन मूरख ! जन्म अकारथ जावे। जीवन सफल तंदे ही होवे, भक्ति हृदय विच आवे॥ 6 ॥ जि० भक्ति विना सुझा अँधराना, देख-देख कर झूरे। जब मन अन्दर नाम बसे है, नसनें सकलैं बंसूरे॥ 7 ॥ जि० अमृत नाम जपे जब प्राणी, तृषा सकल मिट जावे। तपत हृदय मिट जावे सारी, ठण्ड कलेजे आवे॥ 8 ॥ जि० [ 109 ] साकी, राग कालंगड़ा यह जग स्वप्ना है रजनी का, क्या कहे मेरा-मेरा रे। ( टेक ) मात तात सुतैं दारा मनोहर, भाई बन्धु अरु चेरा रे। आपी अपने स्वारथ के सब, कोई नहीं है तेरा रे॥ 1 ॥ यह० जिनके हेतैं करत धन संचयैं, कर-कर पाप घनेरा रे। जब यमराज पकड़ ले जावे, कोई न संग चलेरा रे॥ 2 ॥ यह० ऊँचे ऊँचे महल बनाके, देश दिगंतर घेरा रे। सब ही ठाठ पड़ा रह जावे, होत जंगल में डेरा रे॥ 3 ॥ यह० इतर फुलेल मले जिस तन को, अन्त भस्म की ढेरा रे। ब्रह्मानन्द स्वरूप बिन जाने, फिरत चौरासी फेरा रे॥ 4 ॥ यह० Notes: 1 वे खबर, अचेत, 2 व्यर्थ, 3 तब, 4 घोर अन्धकार, 5 दूर भागे, 6 सारे, 7 कष्ट, तकलीफ़, दुःख, 8 रात, 9 पिता, 10 बेटा, 11 स्त्री, 12 शिष्य, 13 कारण, 14 एकत्र, जमा करना, 15 बहुत।

( 94 ) राम-वर्षा [ 110 ] राग मारू तू खुश कर नींद क्यों सोया। ( टेक ) जिन्हाँ घर झूलते हाथी, हजारों लाख थे साथी। उन्हाँ को खा गयी माटी, तू खुश कर नींद क्यों सोया॥ 1 ॥ नक्कारे कूच का बाजे, कि मारू मौत का बाजे। ज्यों श्रावण मेघड़ा गाजे, तू खुश कर नींद क्यों सोया॥ 1 ॥ कहाँ गये ज्वान मद माते, जो सूरज चाँद चमकाते। न देखे कहाँ जी वह जाते, तू खुश कर नींद क्यों सोया॥ 2 ॥ जिन्हाँ घर लाल और हीरे, सदा मुत पान के वीड़े। उन्हाँ नूं खा गये कीड़े, तू खुश कर नींद क्यों सोया॥ 3 ॥ जिन्हाँ घर पालकी घोड़े, ज़री ज़रवफ़त के जोड़े। वही अब मौत ने तोड़े, तू खुश कर नींद क्यों सोया॥ 4 ॥ जिन्हाँ दे वाल थे काले, मलाइयाँ दूध ते पाले। वह आख़िर आग में डाले, तू खुश कर नींद क्यों सोया॥ 5 ॥ जिन्हाँ संग प्यार था तेरा, उन्हाँ किया ख़ाक में डेरा। न फिर वह करनगे फेरा, तू खुश कर नींद क्यों सोया॥ 6 ॥ Notes: 1 जिनके, 2 बड़े अहंकार वाले अथवा बड़े मान वाले, ज्ञान नाहिव।

वैराग्य ( 95 ) [ 111 ] रागनी भुइंस, ताल धीमा। एथे रहना नाहिं, मत खरमस्तियाँ करो। ( टेक ) तन मद, धन मद, और राज मद, पी कर मस्ती न करो॥ 1 ॥ ऐ० कौरव पांडव भोज और विक्रम, दस कड़ाँ गये किधर ओ॥ 2 ॥ ऐ० रामचंद्र, लछमेश, विभीषण, लंका को गये खाली कर ओ॥ 3 ॥ ऐ० काल वारन्ट निकाल अचानक, तुरत ले जासी फड़ ओ॥ 4 ॥ ऐ० साथ न जासी संपतैं तेरे, ज़वत हो जासी वर ओ॥ 5 ॥ ऐ० मरघट दे विच मिलसी भूमी, साढ़े तीन हाथ भर ओ॥ 6 ॥ ऐ० यह देह खेह हो जासी पल विच, रूप जोवन जासी जर ओ॥ 7 ॥ ऐ० अमीर कंगाल न बचिया कोई, मौत नूं दे कर ज़र ओ॥ 8 ॥ ऐ० [ 112 ] राग पहाड़ी। धन जन यौवन संग न जाये प्यारे ! यह सब पीछे रह जावे। ( टेक ) रैनें गँवाई देह निसारे, प्यारे खाकर दिवसें गँवाये। मानुप जनम अकारथ खोया, मूर्ख ! समझ न आवे॥ 1 ॥ धन० Notes: 1 इस जगह, संसार में, 2 अहंकार, 3 लंका का स्वामी, रावण, 4 धन दौलत, 5 राख, 6 मुरझाना, 7 बड़ा पुरुष, कवि का नाम है, 8 धन दौलत, 9 स्त्री, संबन्धी, 10 रात, 11 खोये, 12 दिन।

( 96 ) राम-वर्षा धन कारण जो होवे दीवाना, चारों दिशा को धावे। राम नाम कभी न सुमरे, सो अंते पछतावे॥2॥ धन० प्रीति सहित मिल आवोरे साधो, ईश्वर के गुण गावें। जिसके किये लख गुम होवे, तिसको काहे भुलावें॥3॥ धन० [ 113 ] राग माँझ। इस तन चलना प्यारे। कि डेरा जंगल में मलना। (टेक) सूरत यौवन भी चल जांदा, कोई दिन दा ढोल वजांदा। आख़र माटी में मलना। कि इस तन चलना॥1॥ सब कोई मतलब दा है बेली, तेरी जासी जान अकेली। ओड़क वेला नहीं टलना। कि इस तन चलना॥2॥ यह तो चार दिनां दा मेला, रहना गुरू न रहना चेला। इस तन आतिशें में जलना। कि इस तन चलना॥3॥ जिस नूं कहै तू मेरी मेरी, यह नहिं मेरी है ना तेरी। इसने खाक विषे रलना। कि इस तन चलना॥4॥ यह तन अपना देखन भुलरे, बिना ईश्वर के फ़ना है कुलरे। प्रभु दे भजन बिना गलना। कि इस तन चलना॥5॥ Notes: 1 अन्त काल, 2 प्यारी, 3 अन्त समय, 4 ग्लानि, 5 खाक के बीच, 6 नाशवान्

वैराग्य ( 97 ) मिट्ठा बोल हथ्थों कुछ दे लै, नेकी कर ज़िन्दगी दा है बेला। पिछ्छों किसे नहीं घलना। कि इस तन चलना॥6॥ [ 114 ] राग जंगला। कोइ दम दा इहां गुज़ारा रे। तुम किस पर पाँव पसारा रे॥ (टेक) इहां पलक झलक दा मेला है। रहना गुरू न रहना चेला है। कोई पल का यहाँ गुज़ारा रे॥1॥ कोई दम०॥ यहाँ रात सराय का रहना है। कछु स्थिर होय न जाना है॥ उठ चलना सांझ सकारा रे॥2॥ कोई दम०॥ ज्यों जल के बीच पताशा है। त्यों जग का सभी तमाशा है॥ यह अपनी आँख निहारा रे॥3॥ कोई दम०॥ देखन में जो कोई आवे है। सब खाक माहिं मिल जावें है॥ यह सभी काल का चौंरा रे॥4॥ कोई दम०॥ यह दृष्टमान सब नाशी है। इस काल के सब घर फाँसी है॥ इस काल सबन को मारा रे॥5॥ कोई दम०॥ दर जिन के नौबत वाजे है। वे तख़्त छोड़ कर भाजे हैं॥ लशकर जिनके लाख हज़ारा रे॥6॥ कोई दम०॥ Notes: 1 हाथ से, 2 भेजना, 3 प्रातः, 4 देखा, 5 मृत्यु का आहार, 6 नाश होने वाला

( 98 ) राम-वर्षा [ 115 ] ग़ज़ल। ज़रा टुक सोच ऐ ग़ाफ़िल! कि दम का क्या ठिकाना है। निकल जब यह गया तन से, तो सब अपना बिगाना है॥ मुसाफ़िर तू है और दुनियाँ सराय है, भूल मत ग़ाफ़िल। सफ़र परलोक का आख़िर, तुझे दरपेश आना है॥1॥ ज़० लगाता है अबस दौलत पे, क्यों तू दिल को अब नाहक़। न जावे संग कुछ हरगिज़, यहीं सब छोड़ जाना है॥2॥ ज़० न भाई बन्धु है कोई, न कोई आशनौ अपना। बख़ूबी ग़ौर कर देखा, तो मतलब का ज़माना है॥3॥ ज़० रहो लग याद में हक़ की, अगर अपनी शफ़ाअत चाहो। क़वस दुनिया के धंधों में हुआ तू क्यों दिवाना है॥4॥ ज़० [ 116 ] राग देवगांधारी मान मन! क्यों अभिमान करे (टेक) यौवन धन क्षणभंगुर तिन पै, काहे मूढ़ मरे॥1॥ मान० Notes: 1 व्यर्थ, बेकायदा, 2 दोस्त, मित्र, 3 सत्यस्वरूप, परमेश्वर, 4 अलाई देहतरी [इलाही मदद], 5 पागल

वैराग्य ( 99 ) जल विच फेन बुदबुदा जैसे, छिन छिन बन विगड़े। त्यों यह देह खेय होय छिन में, बहुरैं न दीख पड़े॥2॥ मान० मंदिर महल बदल रथ वाहनैं, यहीं रह जात धरे। भाई बन्धु कोई संग न लागे, न कोई साखैं भरे॥3॥ मान० चाम के देह से नेहँ लगावे, उस बिन नाहिं टरे। थूकतो को अरे! अति सुन्दर हरि! ताकी सुध न करे॥4॥ मान० हरि चर्चा, संत सेवा अर्चा, इन ते निपट डरे। कूकर सूकर तुल्य भोग रत अंध होय विचरे॥5॥ मान० [ 117 ] राग सावन, ताल दीपचंदी मर्ना! तैं ने राम न जान्या रे। (टेक) जैसे मोती ओस का रे, तैसे यह संसार। देखत ही को झिलमिला रे, जात न लागी वार॥ मना01 सोने का गढ़ लंका बनायो, सोने का दरबार। रत्ती इक सोना न मिला रे, रावण मरती बार॥ मना02 Notes: 1 फिर, 2 सवेरे, 3 अभिप्राय कि न कोई साथ रहे और न कोई सहायता करे, 4 प्रीति, मोह, 5 पूजा, 6 हे मन, 7 माफ़, 8 शबनम, चमकीला, 9 जाते समय देर नहीं लगती, 10 सोने की लंका

राम-वर्षा ( 100 ) दिन गंवाया खेल में रे, रैनें गंवाई सोय। सूरदास भजो भगवन्ता, होनी होय सो होय॥ मना03 [ 118 ] ग़ज़ल दिलों! ग़ाफ़िल न हो एक दम कि दुनिया छोड़ जाना है। बग़ीचे छोड़ कर ख़ाली ज़मीं अन्दर समाना है॥ टेक वदन नाज़ुक गुलों जैसा, जो लेटे सेज फूलों पर। होवेगा एक दिन मुरदा, यही कीड़ों ने खाना है॥1॥ न बेली होयगा भाई, न देखा बाप ना माई। क्या फिरता है सौदाई, अमल ने काम आना है॥2॥ प्यारे! नज़र कर देखो, पड़ी जो माड़ियाँ ख़ाली। गये सब छोड़ फ़ानी देह, दग़ाबाज़ी को वाना है॥3॥ प्यारे नज़र कर देखो, न ख़्वेशों में नहीं तेरा। ज़नो-फ़र्ज़न्दे सब कूचें, किसे तुझ को छुड़ाना है॥4॥ घटत ऐबी यही तेरी, नहीं आराम है इस जां। मुसाफ़िर बेवतन तू है, कहाँ तेरा ठिकाना है॥5॥ Notes: 1 खोया, 2 रात, 3 भगवान को भजो जो होना है सो होने दो (होता रहे), 4 ये दिल, 5 पुष्प, फूल, 6 सम्बन्धीजन, रिश्तेदार, 7 स्त्री, पुत्र, 8 वे सगे, भूल, 9 स्थान, इस संसार में, 10 बिना घर के

वैराग्य ( 101 ) [ 119 ] राग सावन, ताल दीपचंदी चपल मन मान कही मेरी, न कर हरि-चिन्तन में देरी। (टेक) लख चौरासी योनि भुगत के यह मानुष-तन पायो। मेरी तेरी करते करते नाहक जन्म गमायो॥1॥ च० मात पिता सुत भ्रात नारि पति देखन ही के नाते। अंत समय जब जाय अकेला तो कोइ संग नहिं जाते॥2॥ च० दुनिया दौलत माल ख़ज़ाने व्यंजन अधिक सुहाने। प्राण छूटे सब होवें पराये, मूरख मुफ्त लुभाने॥3॥ च० काम क्रोध मद लोभ मोह यह पाँचों बड़े लुटेरे। इन से बचने के लिये तू हरि चरणन चित दे रे॥4॥ च० योग यज्ञ तप तीरथ संयम साधन वेद बताये। हरि सुमिरण सम एकहु नाहिं, बड़े भाग्य जो पाये॥5॥ च० [ 120 ] राग खमाच, ताल दादरा दुनिया के जंगलों में है यह दिल भटक रहा अटका यहाँ जो आज, तो कल वहाँ अटक रहा Notes: 1 स्वादिष्ट, भोग-पदार्थ, 2 लोभ करे, धन के लोभ में पड़े

( 102 ) राम-वर्षा मंदिर में फँस गया कभी, मसजिद में जा फँसा। छूटा जो यहाँ से आज, तो कल वहाँ अटक रहा॥2॥ हिन्दू का और किसी को इसलाम का ग़रूर। ऐसे ही वाहियात में हर एक भटक रहा॥3॥ वह हर जगह मौजूद है जिसकी तलाश है। आँखों के आगे परदा-ए-ग़फ़लत लटक रहा॥4॥ गुलज़ारे में है, गुल में है, जंगल में, चहरे में। सीने में, सिर में, दिल में, जिगर में, खटक रहा॥5॥ ढूँढ़ा है उसको जिसने, उसे आन कर मिला। अटका जो उसकी राह से, उससे अटक रहा॥6॥ सिदक़ और यक़ीन के बिना दिलबर मिले कहाँ। गो जंगलों में वर्षों ही सिर को पटक रहा॥7॥ प्यारे! उम्मेद एक पे रख, दिल को साफ़ कर। क्या विसवसों का काँटा है दिल में खटक रहा है॥8॥ [ 121 ] राग खम्माच। चंचल मन निश दिन भटकत है। ऐ जी भटकत है, भटकावत है। टेक॥ Notes: 1 अज्ञान (अविद्या) का पर्दा, 2 बाग़, 3 समुद्र, 4 निश्चय, विश्वास, 5 संशय, सन्देह, शक, 6 रात दिन

वैराग्य ( 103 ) ज्यों मर्कटै तरु ऊपर चढ़कर। डार डार पर लटकत है॥1॥ चंचल० रुकतै यतन से क्षण विषयन ते। फिर तिन ही में अटकत है॥2॥ चंचल० काँच के हेत लोभ कर मूरख। चिन्तामणि को पटकत है॥3॥ चंचल० ब्रह्मानन्द समीप छोड़ कर। तुच्छ विषय-रस गटकत है॥4॥ चंचल० [ 122 ] बारहमासी ठुमरी भजन बिन वृथा जन्म गयो॥ टेक॥ बालपनों सब खेल गमायो, यौवन कामैं बह्यो॥1॥ भ० बूढ़े रोग ग्रसी सब काया, पर-वश आप भयो॥2॥ भ० जप तप तीरथ दान न कीनो, ना हरिनाम लियो॥3॥ भ० ऐ मन मेरे! बिना प्रभु सुमरन, आकर नरक पयो॥4॥ भ० Notes: 1 कपि, बन्दर, 2 हुक कर, हुआ होकर, 3 गट-गट पी रहा है, 4 विषय-वासना में लिप्त हो गया, 5 दूसरे के वश में, दूसरे के अधीन

( 104 ) राम-वर्षा [ 123 ] राग धनासरी मेरो मन रे, भज ले कृष्ण मुरारी। (टेक) चार दिनन के जीवन ख़ातिर रे, कैसी जाल पसारी। कोई न जावत संग तुम्हारे रे, मात पिता सुत नारी॥ मेरो० पाप कपट कर संचितं धन को रे, मूरख मौत विसारी। ब्रह्मानन्द जन्म यह दुर्लभ, रे देत वृथा किम डारी॥ मेरो० [ 124 ] राग भैरवी सुनो नर रे, राम भजन कर लीजे (टेक) यह माया विजली का चमका रे, यामें चित्त न दीजे। फूटे घड़ैं में जल न रहावे रे, पल पल काया छीजे॥ भजन० सब ही ठाठ पड़ा रह जावे रे, चलत नदी जल पीजे। ब्रह्मानंद राम-गुण गावो रे, भव-जलैं पार तरीजे॥ भजन० Notes: 1 पुत्र, 2 एकत्र, जमा, इकट्ठा, 3 घड़ा, 4 शरीर, 5 घटना, 6 संसार रूपी समुद्र

वैराग्य ( 105 ) [ 125 ] होरी, राग ज़िला, काफी जीआ तोकूं समझ न आई, मूरख तैं उमर गँवाई। (टेक) मात पिता सुतैं कुटुम्ब क़बीला, धन जोबन ठकुराई। कोई नहिं तेरो, तू न किसी कौ, संग रह्यो ललाचई॥ उमर में तैं धूल उड़ाई, जीआ तोकूं समझ न आई॥1॥ राग द्वेष तूं किनसे करत है, एक ब्रह्म रह्यो छाई। जैसे स्वानैं रहे काँव-भुवनैं में, भौंक भौंक मर जाई॥ ख़बर अपनी नहिं पाई, जीआ तोकूं समझ न आई॥2॥ लोभ लालच के बीच तू लटकत, भटक रह्यो भरमाई। तृषा न जायगी मृगजल पीवत, अपनो भरम गँवाई॥ श्याम को जान ले भाई, जीआ तोकूं समझ न आई॥3॥ अगर्म अगोचरैं अकलंकैं अरूपीं, घट घट रहत समाई। सूरश्याम प्रभु तिहारे भजन बिन, कबहुँ न रूप दिखाई॥ श्याम को औ लखो सदाई, जीआ तोकूं समझ न आई॥4॥ Notes: 1 ऐ दिल, मन, 2 पुत्र, 3 मिलकियत, बड़ा पद, ठाकुरपन, 4 कुत्ता, 5 शीशे का महल, 6 जहाँ कोई जान न सके, दुर्गम, अगम्य, 7 इन्द्रियों की पहुँच से परे, इन्द्रियातीत, 8 कलंक रहित, 9 रूप रहित, 10 पासौ, समक्षौ, 11 सर्वदा, हमेशा

( 106 ) राम-वर्षा [ 126 ] राग खम्माच, ताल दादरा। तनैं तीव्र भयो वैराग्य तो मान अपमान क्या। जान्यो अपना आप तो वेद पुराण क्या॥ ख़ुद मस्ती कर मस्त, तो फिर मदरा पान क्या। किंचा देहाध्यास, तो आत्मज्ञान क्या॥ वीतराग जब भये, तो जगत की लोड़ क्या। तृणवत जान्यो जगत, तो लाख करोड़ क्या॥ चाह रज्जू से बँध्यो, तो फिर मरोड़ क्या। किंचा भ्रान्ति साथ, तो विवादैं फिर होरैं क्या॥ [ 127 ] राग सोहनी। यह पेट अजब है दुनिया की और क्या क्या चिन्स इकट्ठी है। याँ माल किसी का मीठा है और चीज़ किसी की खट्टी है॥ कुछ पकता है, कुछ भुनता है, पकवान मिठाई फटी है। जब देखा ख़ूब तो आख़िर को ना चूल्हा भाड़ न भट्टी है॥ Notes: 1 बहुत भारी, 2 राग-रहित, 3 इच्छा, वासना की रस्सी, 4 झगड़ा, 5 और अधिक, दूसरी, 6 मढ़ी

गुल शोर वगोला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है। हम देख चुके इस दुनिया को, यह धोखे की-सी टट्टी है॥ 1॥ कोई ताज खरीदे हँस हँस कर, कोई तख्त खड़ा वनवाता है। कोई रो रो मातम करता है, कोई गोरैं1 पड़ा खुदवाता है॥ कोई भाई वाप चचा नाना, कोई बाबा पूत कहाता है। जब देखा खूब तो आखिर को, नहीं रिश्ता2 है नहीं नाता है॥ गुल्ल शोर3 वगोला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है। हम देख चुके इस दुनिया को सब धोखे की-सी टट्टी है॥ 2॥ कोई बाल बढ़ाये फिरता है, कोई सिर को घोट मुँडाता है। कोई कपड़े रँगे पहने है, कोई नंग मनंगा आता है॥ कोई पूजा कथा बखाने है, कोई रोता है, कोई गाता है। जब देखा खूब तो आखिर को, सब छोड़ अकेला जाता है॥ गुल शोर वगोला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है। हम देख चुके इस दुनिया को, सब धोखे की-सी टट्टी है॥ 3॥ कोई टोपी टोप सजाता है, कोई बाँधे फिरे अमामाँ4 है। कोई साफ बरहना5 फिरता है, नैं6 पगड़ी नैं पाजामा है॥ कमख्वाव गर्ज़ी और गाढ़े का नित कज़ियाँ7 है, हंगामा8 है। अब देखा खूब तो आखिर को, न पगड़ी है न जामा है॥ Notes: 1 क़ब्र, 2 सम्बन्ध, 3 शोर शराबा, 4 पगड़ी, 5 नंग, 6 नहीं, 7 झगड़ा, 8 लड़ाई।

गुल शोर वगोला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है। हम देख चुके इस दुनिया को, सब धोखे की सी टट्टी है॥ 4॥ [ 128 ] राग खमाच, ताल दादरा जो ख़ाक से बना है, वह आखिर को ख़ाक है॥ टेक॥ दुनिया से जब कि औलिया1 अरु अंबिया2 उठे। अज्साम3 पाक उनके इसी ख़ाक में रहे॥ रहे हैं खूब जान में, रुहों4 के हैं मज़े। यह जिस्म से तो अब यही साबित हुआ मुझे॥ 1॥ जो० वह शख़्स थे जो सात विलायत के बादशाह। हशामत5 में जिनकी अर्श6 से ऊँची थी बारगाह॥ मरते ही उनके तन हुए गलियों की ख़ाके-राह7। अब उनके हाल का भी यही बात है गवाह॥ 2॥ जो० किस किस तरह के हो गये महबूब8 कज़कुलाहैं9। तन जिनके मिस्ले-फूल10 थे और मुँह भी रश्के-माह11॥ Notes: 1 बड़े बड़े पैग़म्बर, ऋषी, 2 नबी, बड़े-बड़े आत्म ज्ञानी महात्मा, 3 पवित्र देह, शरीर, 4 जीवात्मा, 5 इज़्ज़त, मान, विभूति, 6 आकाश, 7 रास्ते की धूल (मिट्टी), 8 प्यारे, माशूक़, 9 टेढ़ी टोपी पहनने वाले, जो सुन्दर पुरुष अपने सौन्दर्य को बढ़ाने के लिये पहना करते हैं, 10 पुष्प-समान, 11 चन्द्रमा से ईर्ष्या करने वाला, अर्थात् चन्द्रमा से भी अधिक सुन्दर।

जाती है उनकी क़बर पै जिस दम मेरी निगाहैं1। रोता हूँ जब तो मैं यही कह कह के दिल में आह॥3॥ जो० [ 129 ] राग सोहनी साईं की सदा यह दुनिया जाये-गुज़श्तनाँ2 है, साईं की है यह सदा3 बाबा। यहाँ जो है रूप-बरफ़तनाँ है, तू इसमें दिल न लगा वाबा॥ (टेक) ज्ञानी न रहे, ध्यानी न रहे, जो-जो थे लासानी4 न रहे। थे आखिर को फ़ानाँ5 न रहे, फ़ानी को कहाँ बक़ा बाबा॥1॥ यह० थे कैसे कैसे शाह ज़िमीं6, थे कैसे कैसे महल संगीन8। हैं आज कहाँ वह मकानों मकीं7, न निशान रहा, न पता बाबा॥2॥ यह० न वह शूर रहे, न वह वीर रहे, न वह शाह रहे, न वज़ीर रहे। न अमीर रहे, न फ़क़ीर रहे, मौला का नाम रहा वाबा॥3॥ यह० जो चीज़ यहाँ9 है फ़ानी है, जो शै है आनी जानी है। दुनिया वह राम-कहानी है, कुछ हाल हमें न खुला बाबा॥4॥ यह० माल10 आमाल11 को लाते हैं, फल साथ अपने ले जाते हैं। जो देते हैं सो पाते हैं, है यूँ ही तार लगा बाबा॥5॥ यह० Notes: 1 दृष्टि, 2 गुज़रने (छोड़ने) का स्थान, 3 आवाज़, पुकार, 4 चले जाने वाला, स्थिर न रहने वाला, 5 नाश होने वाला, 7 स्थिर रहना, 6 पृथ्वी के राजा, 8 पत्थर के महल, 9 जगह व स्थान, 10 पदार्थ, वस्तु, 11 कर्म।

आने जाने का यहाँ तार लगा, दुनियाँ है इक बाज़ार लगा। दिल इसमें न तू जिनहारे लगा, कब1 निकला वह जो फँसा बाबा॥6॥ यह० याँ मर्द2 वही कहलाते हैं, जो जाकर फिर नहीं आते हैं। जो आते हैं और जाते हैं, वह मर्द नहीं अवला बाबा॥7॥ यह० क्यों उमर अकारत3 तू ने खोई, कुछ कर ले अबभी ख़ुदाजोई4। मैं कहता हूँ तुझसे यहाँ कोई, न रहा, न रहा, न रहा, बाबा॥8॥ यह० तह कर तह कर बिस्तर अपना, बाँध उठ कर रखतें सफ़र अपना। दुनिया की सराय को घर अपना, तू ने है ग़लत समझा बाबा॥9॥ यह० क्या घोड़े बेचे के सोया5 है, क्यों वक़्त रायगाँ6 खोया है। जो सोया है वह रोया है, कहते हैं मर्दे-ख़ुदा7 बाबा॥10॥ यह० जितना यह माल ख़ज़ाना है, और तू ने अपना माना है। सब छोड़ के यहाँ से जाना है, करता है इकट्ठा क्याबावा॥11॥ यह० क्यों दिल दौलत में लगाया है, सच कहता हूँ झूठी माया है। यह चलती फिरती छाया है, क्या है इतबार8 इसका बाबा॥12॥ यह० दुनिया न कहो तू मेरी है, ग़ाफ़िल दुनिया कब तेरी है। साईं की जैसे फेरी है, फिरता है तू इस जा9 बाबा॥13॥ यह० Notes: 1 कदापि, 2 असल, सच्चे, 3 व्यर्थ, बेफ़ायदा, 4 ईश्वर प्राप्ति की जिज्ञासा, 5 अर्थात् बेखबर, बनसुबुधि में सोया है, 6 ये फ़ायदा, निष्फल, 7 ज्ञानी, आत्मवेत्ता, 8 भरोसा, 9 जगह, यहाँ।

यह मुल्क़ोमाल, यह जाहोहशम1, यह हवेशो-अक़ारबाँ2 है जो वहसें। सब जीते जी के हैं हमदम3, फिर चलना है तन्हा4 बाबा5॥14॥ यह० जो नेक कमाई करते हैं, जो साँसों पार गुज़रते हैं। जो जीते जी ही भरते हैं, जीना है बस उनका बावा॥15॥ यह० क्यों मेहर यह आलमे-निस्याँ6 का दुनियाँ है सौदा नुक़सां का। है ज़ाइक़7 तुझे तोइ रफ़ा, तुझको दुनियाँ से क्या बाबा॥16॥ यह० [ 130 ] राग सिंदोरा, ताल दीपचंदी गुज़ारी उमर झगड़ों में बिगाड़ी अपनी हालत है। हुआ ख़ारिज अपील अपना, अजायब यह वकालत है॥ मुक़द्दमे ग़ैर लोगों के, हज़ारों कर दिये फ़ैसल। न देखा मिसल अपनी को, अजायब यह अदालत है॥ दलीलें दे के ग़ैरों पर, किया साबित असूल अपना। दिल अपने का न शक टूटा, अजायब यह दलालत9 है॥ बहुत पढ़ने पढ़ाने से हुआ सब हल्म में कामिल10। न पाया भेद8 रब्बी11 का, अजायब यह कमालत है॥ Notes: 1 पद और मान, 2 अपने सम्बन्धी, कुटुम्बी, रिश्तेदार और पड़ोसी, 3 साथ प्राप्त हुये, 4 अकेले, 5 कवि-का नाम, 6 भूलने की दशा वा अज्ञानावस्था, 7 रुचि, लगन, 8 आत्म ज्ञान आत्म-साक्षात्कार, 9 दलीलबाज़ी, 10 सम्पन्न, पूरा, 11 मददगार, स्वस्वरूप (आत्मा)।