श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

वना1 हाफ़िज़, पढ़े मसले3, सुनाये दूसरों को भी। — वेले टूटा न कुफ़्र2 अपना, अजायब यह मसालत है॥ — तू कर फ़ैसल हिसाब अपना, तुझे औरों से क्या गोविंद4। — न क़िस्सा तूले5 दे इतना, फ़जूल ही यह तवालत6 है॥ — भक्ति ( इश्क़ )

भाग 7-9 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 7-9 · अध्याय 5 / 14

वना1 हाफ़िज़, पढ़े मसले3, सुनाये दूसरों को भी। — वेले टूटा न कुफ़्र2 अपना, अजायब यह मसालत है॥ — तू कर फ़ैसल हिसाब अपना, तुझे औरों से क्या गोविंद4। — न क़िस्सा तूले5 दे इतना, फ़जूल ही यह तवालत6 है॥ — भक्ति ( इश्क़ )

[ 131 ] राग खमाच, ताल दादरा (1) कलीदे-इश्क़7 को सीने8 की दीजिये तो सही। मचा के लूट कभी सैर कीजिये तो सही॥ 1॥ (2) करो शहीद रुह्दाँ के सवार9 को रोकर। यह जिस्म दुलदुले-बेयाँ10 कीजिये तो सही॥ 2॥ [ 13 ] (1) हार्दिक प्रेम की कुंजी तो अपने भीतर के भण्डार को दे और फिर उसकी लूट मचाकर कभी आनन्द तो लो। (2) देह का सवार जो अहंकार है उसको मारकर शहीद तो करो और इस शरीर के सवार-रहित घोड़े (दुलदुल) के समान तो कर देखो। Notes: 1 किन्तु, लेकिन, 2 नास्तिकता, 3 प्रमाण, मसले पढ़ के सुनाना, 4 कवि का नाम, 5 लम्बा, 6 लम्बा ज़िकर बढ़ाना, 7 प्रेम की कुंजी, 8 दिल, 9 अहंकार, 10 उस घोड़े को कहते हैं जो मुसलमानों के हज़रत हसन हुसेन की सवारी में था और युद्ध में अपने सवार हज़रत साहिब के मारे जाने पर ख़ाली घर में आ गया था और उसने इस प्रकार अपने सवार के मारे जाने की सूचना दी थी।

(3) जला के ख़ाना-ओ-असबाब1 मिस्ल नीरों2 के। मज़ा सरोदे3 का शोलों का लीजिये तो सही॥ 3॥ (4) है ख़ुम तो मय से लबालब यह तिश्नाकामी क्यों? लो तोड़ मोहरे-ख़ुदी मय भी पीजिये तो सही॥ 4॥ (5) उड़ा पतंग मुहब्बत का चर्ख़9 से भी दूर। ख़िरद10 की डोर को अब छोड़ दीजिये तो सही॥ 5॥ (3) नीरो बादशाह के समान अपना घर बार और असबाव (अर्थात् अहंकार और उसकी सब पूँजी को) जलाकर4 (निज स्वरूप रूपी पर्वत के शिखर पर चढ़कर) उस अहंकार के जलने का और (निज स्वरूप के) राग रंग का आनन्द तो लो। (4) निजानन्द रूपी शराब6 से जब दिल का मटका5 पूर्ण है तब गला7 प्यासा क्यों है? इस मटके की मोहर8 को तोड़कर आनन्द रूपी मद तो पीजिये। (5) प्रेम का पतंग जब आकाश से भी दूर उड़ जाय, तब बुद्धि रूपी रस्सी को ढीला छोड़ तो दो। Notes: 1 घरबार व धन दौलत, 2 एक राजा का नाम है जिसने अपने देश को आग लगाकर आप एक पर्वत पर चढ़कर राग रंग किया और प्रजा को जलते देखकर प्रसन्न हुआ, 3 राग रंग, 4 अग्नि, 5 मटका (हृदय रूपी), 6 प्रेम रूपी शराब, मद, 7 प्यासा गला, 8 अहंकार की मोहर, 9 आकाश, 10 बुद्धि।

(6) मज़ा दिखायेंगे जो कह दो रामैं1 मैं ही हूँ। ज़मी ज़माँ को भी यूँ 'रामैं2' कीजिये तो सही॥ 6॥ [ 132 ] राग भैरव, ताल दादरा (1) इश्क़ का तूफ़ाँ बपा है, हाजते मयख़ाना नेस्त। ख़ूँ शराबो, दिल कवाबो, फ़ुरसते-पैमाना नेस्त॥ 1॥ (2) सख़्त मख़मूरी है तारी हवाह कोई क्या कुछ कहे। पस्त है आलम नज़र में, वहशते-दीवाना नेस्त॥ 2॥ (6) यदि तुम अपने आप को राम भगवान् कह दो तो हम आप को निजानन्द का साक्षात्कार करावें। इस प्रकार अनुभव करके आप देश (पृथ्वी) और काल सब को स्वाधीन तो कीजिये। [ 14 ] (1) प्रेम3 घटा4 आई हुई है, अन्य शराबख़ाने की अब ज़रूरत5 नहीं6 है। इस समय अपना रुधिर तो शराब हो रहा है और चित्त कबाब हो रहा है, अतएव किसी प्याले का अब अवकाश7 नहीं। (2) प्रेम मद का नशा8 अत्यंत चढ़ा9 हुआ है, इसलिये अब चाहे कोई कुछ कहे, सारा संसार तो तुच्छ10 हो रहा है। पर यह नशा पागल मनुष्य की पशुवृत्ति12 के समान नहीं है। Notes: 1 राम भगवान्, 2 अधीन, अनुचर, आज्ञाकारी, 3 प्रेम, 4 घटा, 5 शराबखाने की ज़रूरत, 6 नहीं है, 7 प्याला पीने का अवकाश तक नहीं। 8 नशा, 9 छाया हुआ, 10 तुच्छ, 11 संसार, 12 पागल पुरुष का बहशीपन (पशुवत व्यवहार)।

(3) अलविदा ऐ मर्गे-दुनिया! अलविदा ऐ जिस्मो-जाँ!! ऐ अतश! ऐ जू चलो, ईं जाँ कबूतरख़ाना नेस्त॥ 3॥ (4) क्या तजल्ली है यह नारे-हुस्न शोलाख़ेज़ है। मार ले पर ही यहाँ पर ताक़ते-परवाना नेस्त॥ 4॥ (5) मेहर हो महं हो दविस्ताँ हो गुलिस्ताँ कोहसार। मौज़जने अपनी है ख़ूबी, सूरते-बेगाना नेस्त॥ 5॥ (6) लोग बोले गहन ने पकड़ा है सूरज को, ग़लत। ख़ुद हैं तारीकी में वरना साया महजूवाना नेस्त॥ 6॥ (3) हे जगत् के रोग! तू अब रुख़सत1 हो। हे देह, प्राण! तुम दोनों भी अब रुख़सत हो। हे भूख3 प्यास2! तुम दोनों मेरे पास से परे हटो, यह जगह4 कोई कबूतरख़ाना (अर्थात् तुम्हारे रहने सहने का घर) नहीं है। (4) आहा! सौंदर्य6 की तेज़5 ज्वाला कैसी भड़की7 हुई है। अब किस परवाने की शक्ति है कि जो इसके आगे पर भी मार सके? (5) सूर्य8 हो चाहे चन्द9, पाठशाला10 हो चाहे वाग़11 और पर्वत12, इन सब में अपनी ही सुन्दरता तरंगें13 मार रही हैं, अन्य किसी रूप की नहीं। (6) लोग कहते हैं कि सूर्यको ग्रहण14 ने पकड़ रखा है, पर यह नितान्त झूठ है। क्योंकि स्वयं तो अंधकार15 में होते हैं और प्रकाश स्वरूप सूर्य को अंधकार में समझने लग जाते हैं। जैसे सूर्य का ग्रहण से पकड़े जाना झूठ है और सूर्य वास्तव में ग्रहण से ऊपर होता है, ऐसे ही मुझे अज्ञान के पर्दे में आसक्त मानना झूठ है और मुझ16 पर वास्तव में किसी प्रकार का पर्दा17 ढकने वाला नहीं है। Notes: 1 रुख़सत हो, 2 प्यास, 3 भूख, क्षुधा, 4 यह जगह, 5 प्रकाश, चमक, 6 सौंदर्य रूप ज्वाला, 7 भड़की हुई, 8 सूर्य, 9 चन्द्र, 10 पाठशाला, 11 वाग़, 12 पर्वत व पहाड़ी जगह, 13 तरंगमयी वा लहरा रही, 14 ग्रहण, 15 अंधकार, 16 मुझपर, 17 परदे में छुपे के समान छिपानेवाला।

(7) उठ मेरी जाँ! जिस्म2 से हो पर्क़े ज़ाते-राम1 में। जिस वदरीश्वर की मूरत, हरकते-अर्ज़ाना नेस्त॥ 7॥ [ 133 ] ☙ कँजोटी, ताल ठुमरी ☙ भाग4 तिन्हाँ दे अच्छे, जिन्हाँ नूं राम मिले। (टेक) (1) जद5 "मैं" सां ताँ दिलबर नासी। 'मैं' निकसी पिया घट वासी॥ खलम6 मरे घर वस्से! भाग तिन्हाँ॥ 1॥ (7) हे मेरे प्राणों! इस देह2 से बढ़कर राम के स्वरूप में लीन हो जाओ। और देह ऐसी हो जाय जैसे बदरीनारायणजी की मूर्ति कि जिसमें बालकवत् चेष्टा3 भी नहीं है। [ 15 ] (टेक) उनके भाग्य निःसन्देह बड़े अच्छे हैं जिन्हें राम मिल जायँ। (1) जब तुच्छ अहंकार रूपी 'मैं' भीतर थी तब अपरिच्छिन्न अहंकार रूपी मैं अर्थात् प्यारा आत्मा भीतर अनुभव नहीं होता था। और जब तुच्छ अहं- कार रूपी मैं भीतर से निकल गई (अर्थात् जब उसका अभाव हो गया) तब प्यारा (निज स्वरूप) घट रहने लगा अनुभव हुआ। Notes: 1 राम का स्वरूप, 2 देह, 3 बालकवत् चेष्टा, 4 भाग्य, 5 जब मैं थी, 6 पति, स्वामी, तात्पर्य अहंकार से। * यह कविता सन् 1902 की दीपमाला में हिमालय के बदरीनारायण के मन्दिर में प्रहर के समय लिखी गई थी। अतएव इसमें प्रहर और श्रीबदरीनारायण जी की मूर्ति का दृष्टान्त आया है।

(2) जद "मैं" मार पिछाँवल1 सुट्टियाँ2। प्रेम नगर चढ़ सेजे सुत्तियाँ॥ इश्क़ हुलारे दस्से3! भाग तिन्हाँ॥ 2॥ (3) चादरफूँक शरह4 दी सेकाँ। अखियाँ खोल दिलवर नूं देखाँ॥ भरम शुब्हे सब नस्से6! भाग तिन्हाँ॥ 3॥ (4) ढूँड ढूँड के उमर गँवाई। जाँ घर अपने झाती पाई॥ राम सज्जे7 राम खब्बे8! भाग तिन्हाँ॥ 4॥ (2) जब इस तुच्छ अहंकारको मारकर पीछे फेंका, तब प्रेमानन्द भोगना नसीब हुआ। फिर तो प्रेम अपना प्रबल वेग दर्शोंने लग पड़ा। (3) जब मैं कर्म-काण्ड रूपी अज्ञान के पर्दे को ज्ञानाग्नि से जलाकर उसकी आग तापने5 लगा, तब निज स्वरूप प्रत्यक्ष अनुभव होने लगा, तब तो सारे अब संशय स्वतः दूर हो गये। (4) इतनी देर तक तो तलाश में आयु खोई पर जब अपने भीतर दृष्टि की तो राम (निज स्वरूप) को दायें बायें अर्थात् चारों ओर व्यापक पाया। Notes: 1 पिछली ओर, 2 फेंका, 3 ज़ोर दिखावे, 4 कर्म-काण्ड, 5 तापी, 6 भागे, 7 दायें, 8 बायें।

[ 134 ] राग भैरवी, ताल दादरा। अक्ल के मदहोश्से से उठ, इश्क़ के मैकदे' में आ। जामे-शराबे-बेखुदी, अब तो पीया जो हो सो हो॥ 1 लागें की आग लग उठी, पम्वा सां सब जल गया। रखते-वजूदो-जानो-तनें, कुछ न बचा जो हो सो हो॥ 2 हिजर की जब मुसीबतें, अज़ल की उसके रूबरू। नाज़ो-अदा से मुस्करी, कहने लगा जो हो सो हो॥ 3॥ इश्क़ में तेरे कोहे-गमें, सिर पै लिया जो हो सो हो। पैग़ो-निशाते-ज़िन्दगी, सब छोड़ दिया जो हो सो हो॥ 4॥ दुनिया के नेको-बदे से काम, हम को न्याज़ कुछ नहीं। आपे से जो गुज़र गया, फिर उसे क्या जो हो सो हो॥ 5 [ 135 ] राग भैरवी, ताल दादरा। ऐ दिल! तू राहे-इश्क़ में मरदाना हो, मरदाना हो। कुर्बान कर अपनी जान को, जानाना हो जानाना हो॥ 1॥ Notes: 1 (प्रेम का) शराब खाना, 2 बेखुदी की शराब का प्याला, 3 प्रेमकी लगन (लटक), 4 रुई के फंबे की तरह, 5 शरीर प्राण और तन रूपी असबाब कुछ न बचा, 6 विरह, 7 नखरे टखरे, 8 हँसकर, 9 प्रेम स्नेह, 10 शोक का पर्वत, 11 जिन्दगी की प्रसन्नता और आनन्द, 12 अच्छे और बुरे, पुण्य पाप, 13 कवि का नाम, 14 जान हथेली पर रक्खे रखना, अर्थात् जो अहंकार को मारे जीते हुए हो, वा अपने आप से गुज़ार चुका हो, 15 प्रेम के मार्ग में, 16 आशिक़ अर्थात् जान देने वाला।

तू हज़रते-इन्सान है, लाज़िम तुझे इर्फ़ाने है। हरगिज़ न तू हैवान सा दीवाना हो दीवाना हो॥ 2॥ हर ग़म से तू आज़ाद हो खुर्सन्दै हो और शादे हो। हर दो जहाँ के फ़िक्र से बेगाना हो, बेगाना हो॥ 3॥ कर तर्क ज़ोहर्दे-ज़ाहिदाँ! मज्लिस-निशीं रिन्दों का हो। दीवानगी से दगुज़र, फ़र्ज़ाना हो, फ़र्ज़ाना हो॥ 4॥ मैं तू का मनशा अक्ल है, लाज़िम है तुझ को क़ादरी। पी कर शराबे-बेखुदी, मस्ताना हो, मस्ताना हो॥ 5॥ [ 136 ] लावनी सवैया। समझ बूझ दिल खोज प्यारे! आशिक़ हो कर सोना क्या॥ जिन नैनों से नींद गंवाई, तकिया छोड़ बिछौना क्या॥ रूखा सूखा राम का टुकड़ा, चिकना और सलूना क्या॥ पाया है तो कर ले शादी, पाई पाई पर खोना क्या॥ कहत कुमाळ प्रेम के मारग, सीस दिया फिर रोना क्या॥ Notes: 1 आत्म ज्ञान, 2 पागल, 3 आनन्द, 4 खुश, प्रसन्न, 5 फ़िक्र रहित हो, निश्चिन्त हो, 6 तप, कर्म-काण्ड, 7 तपी, कर्मकाण्डी, 8 मस्तों की सभा में बैठने वाला बन, 9 पागलपन, 10 आत्मवित्, अक्लमन्द, 11 कवि का नाम है, 12 दिल में विचार करके, 13 खुशी, 14 कवि का नाम, 15 रास्ता।

[ 137 ] राग खमाज, ताल दादरा। अब तो मेरा राम नाम, दूसरा न कोई (टेक) माता छोड़ी, पिता छोड़े, छोड़े सगा सोई। साधू संग बैठ बैठ, लोक लाज खोई॥ अब तो०॥ 1॥ संत देख दौड़ आई, जगत देख रोई। प्रेम आँसू डार डार, अमर बेल बोई॥ अब तो०॥ 2॥ मारग में तारणे मिले, संत राम दोई। संत सदा शीश पर, राम हृदय होई॥ अब तो०॥ 3॥ अंत में से तंतें काढ्यो, पिछ्छे रही सोई। राणे भेज्यो विष का प्याला, पीते मस्त होई॥ अब तो०॥ 4॥ अब तो बात फैल गयी, जाने सब कोई। दास मीरा लाल गिरधर, होनी सी सो होई॥ अब तो०॥ 5॥ [ 138 ] राग कालंगड़ा ताल धुमाली। माई! मैंने गोविन्द छीना मोल (टेक) Notes: 1 सर्वदा रहने वाली, 2 पार करने वाले, बचाने वाले, उद्धार करनेवाले, 3 तत्व, सत्य वस्तु से अभिप्राय है।

कोई कहे हलका, कोई कहे भारी, लिया तराजू तोल॥ माई०॥ कोई कहे सस्ता, कोई कहे महँगा, कोई कहे अनमोल॥ माई०॥ वृन्दावन की कुंज गली में, लिया बजा के ढोल॥ माई०॥ मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, पूर्व जन्म के बोल॥ माई०॥ [ 139 ] राग खमाज, ताल दादरा राम की दीवानी, मेरा दर्द न जाने कोय। (टेक) घायल की गति घायल जाने, जो कोई घायल होय। शेषनाग पै सेज पिया की, किस बिधि मिलना होय॥ 1॥ दर्द की मारी बन बन डोलूँ, वैद मिळा नहीं कोय। मीरा की पीड़ प्रभु कैसे मिटेगी, वैद सँवलिया होय॥ 2॥ [ 140 ] राग खमाज, ताल दादरा मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई। (टेक) जाके शिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई। तात मात भ्रात बंधु अपना नहिं कोई॥ 1॥ छोड़ दई कुलकी कान, दया करेगा कोई। सन्तन ढिग बैठ बैठ, लोक लाज खोई॥ 2॥

अँसुवन जल सींच सींच, प्रेम बेल बोई। अब तो बेल फैल गई, आनन्द फल होई॥ 3 आई मैं भक्ति जान, जगत देख मोही। दास मीरा गिरधर प्रभु, तारो अब मोही॥ 4 [ 141 ] राग खमाज, ताल दादरा मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई। दूसरा न कोई साधो, दूसरा न कोई॥ (टेक) प्रेम की मथनियां माथी, भक्ति से बिलोई। घृत घृत काढ़ लीनो, छाछ पीवे कोई॥ 1॥ अँसुवन जल सींच सींच, प्रेम बेल बोई। छाँड़ दई कुल की रीति, लाज सब बगोई॥ 2॥ सन्तन संग बैठ बैठ, लोक लाज खोई। दास मीरा लाल गिरधर, होनी सी सो होई॥ 3॥ [ 142 ] साकी राग जोगी राणाजी! मैं सांवरे रंग राती। (टेक) जिनके पिया परदेश वसत हैं लिख लिख भेजत पाती। मेरा पिया मेरे हृदय वसत हैं, यह कछु कहीं न जाती॥ 1॥

झूठा सुहाग जगत का री सजनी! होय होय मिट जासी। मैं तो एक अविनाशी बरूँगी, जाहे काल नहीं खासी॥ 2॥ और तो प्याला पी पी माती, मैं बिन पिये ही माती। यह प्याला है प्रेम हरी का, छकी रहूँ दिन राती॥ 3॥ मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, खोल मिली हरि से मैं छाती। कोई कहे खरी कि खोटी, मेरी प्रेम की रीत सुहाती॥ 4॥ [ 143 ] साकी, राग जोगी मैं गिरिधर संग राती गुसैंयाँ, मैं गिरधर संग राती। (टेक) पचरंग चूनर रंगा दी सखी मैं झुरमट खेलन जाती। वा झुरमट मेरा पिया मिलेगा, वा ही को गले लगाती॥ 1॥ सुरत नरत का दीवा बना के, मनसा की कर ले वाती। प्रेम हटी का तेल मंगा ले, जग रह्यो दिन और राती॥ 2॥ जिनके पिया परदेश बसत हैं, लिख लिख भेजैं पाती। मीरा के पिया हृदय बसत हैं, ना कहीं आती न जाती॥ 3॥ [ 144 ] साकी, राग जोगी भज मन चरण कमल अविनासी। (टेक) जे तोहे दीखे धरती गगन बिच ते तानी सब उठ जासी॥ 1॥ Notes: 1 प्रेम में रती हुई, 2 बहुत से प्रेम मग्न स्त्रियों के समूह में, 3 सुरति वा ध्यान, 4 मन, 5 पत्र, 6 जो तुम्हें, 7 वह माया जाल।

कहो भयो तीरथ व्रत कीने, कहा लिये करवट कासी। घर में वस्तु धरी नहीं सूझे, वन वन फिरत उदासी॥ 2॥ कहा भयो जो भगवाँ पहने, घर त्यज हो संन्यासी। योगी हुए युक्ति नहीं जानी, उलट जन्म कर फाँसी॥ 3॥ अज़ करूँ अबला करूँ जोड़ी, हरि तुम्हारी दासी। मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, काटो यम की फाँसी॥ 4॥ [ 145 ] देश, ताल देवार। जूँ ही आमद आमदे-इश्क़ का मुझे दिल ने मुज़दह सुना दिया। खिदो-हवासो-शकेव ने कहीं कूचे-कूचे वजा दिया॥ 1॥ जिसे देखना ही मुहाळ था, न था जिस का नामो-निशां कहीं। सो हर एक ज़र्रे में इश्क़ ने मुझे उसका जलवा दिखा दिया॥ 2॥ पंक्तिवार अर्थ। (1) जिस समय मेरे अंदर अपने स्वरूप के इश्क़ (प्रेम) के आनेकी खुशख़बरी दिल ने सुनाई, उससमय अक्ल और होश और सन्तोप ने मेरे अंदर से निकलने का नक्कारा बजादिया (अर्थात् भीतरसे होश-हवास निकलने लगे) (2) (प्रेम आने से पहिले) जिसको देखना कठिन था और जिस का नाम और निशान नज़र नहीं आता था, उसका इस इश्क़ (प्रेम) ने हर एक अणु मात्र में भी मुझे दर्शन अब करा दिया। Notes: 1 इश्क़ की हैरानी की खबर सुनकर, 2 बेखुदी के वादशाह, 3 बख्शा, 4 नंगेपन का वस्त्र, 5 बुद्धि, अक्ल, 6 काट फाट, 7 ढांपे रहना, 8 दृष्टि, 9 सौ (100) प्यालों की शराब की इच्छा, 10 दिल का मटका।

करूँ क्या बयान मैं हम निशाँ असर उस की लुत्फ़े-निगाह का! कि तउय्युनात की क़ैद से मुझे एक दम में छुड़ा दिया॥ 3॥ वह जो नक़्शे-पा की तरह रही थी नमूदे अपने वजूद की। सो क़ज़ा से दामने-नाज़ुकी उसे भी ज़िमीं से मिटा दिया॥ 4॥ तेरी नासिहा! यह चुनाँ चुनीं, कि है खुद पसन्दी के सब क़रीन। न दिखाई देगी तुझे कहीं, कभी जो किसी ने सुझा दिया॥ 5॥ (3) ऐ प्यारे साथी! मैं उस अपने प्यारे स्वरूप की दृष्टि के आनन्द के प्रभाव को (आत्मानुभव के प्रभाव को) क्या वर्णन करूँ कि उस [अनुभव] ने मुझे सब बन्धनों की कैद से एक दम में छुड़ा दिया [अर्थात् सब बन्धनों से तत्काल मुक्त कर दिया]। (4) ज़मीन पर पांवों (पाद) के चिह्न की तरह जो अपने तन की प्रतीति थी सो उस स्वरूप [यार] के नाज़ुक पल्ले के आकर्षण [अर्थात् अनुभव के बढ़ने] ने उसको भी पृथ्वी से मिटा दिया। (5) ऐ उपदेश करने वाले! तेरी यह 'क्यों कब' अहंकार के कारण से हैं। अगर किसी ने तुझ को सुझा दिया अर्थात् अनुभव करा दिया तो यह क्यों किस तरह (अर्थात् क्यों और कैसे होश उड़ जाते हैं इत्यादि) तुम को भी नहीं दिखाई देंगे। Notes: 1 साथ बैठने वाला, 2 दृष्टि का आनंद या प्रभाव, 3 बंधन, परिच्छिन्नता, 4 पाद का चिन्ह, 5 व्यक्ति, प्रतीत, 6 तन, 7 बारीक या पतला पल्ला, 8 उपदेश करने वाले, 9 क्यों, किस तरह, 10 नज़दीक, समीप।

तुझे इश्क़े-दिल से ही काम था, न कि उस्तखानों का फूँकना। गज़ब एक शेर के वास्ते तू ने जंगलों को जला दिया॥ 6॥ यह निहाल शोलाए-हुस्न का तेरा बढ़ के सर वफ़लक हुआ। मेरी काये हस्ती ने मुश्तइल हो उसे यह नख्वो-नुर्मा दिया॥ 7॥ (6) इस के दो मतलब हैं:— (1) ऐ ब्रह्म साक्षात्कार के जिज्ञासू! तुम को दिल में प्रेम भड़काना चाहिये था, न कि अज्ञानी तपस्वियों की तरह हठयोग इत्यादि से तन बदन को सुखाना और अस्तियों को जलाना था। बड़े आश्चर्य की बात है कि तूने एक शेर (दिल) के क़ाबू करने के लिये सारे जंगल (अर्थात इस शरीर को जिस में यह दिल रूपी शेर रहता है) को व्यर्थ आग लगा दी, मुफ़्त में शरीर को जर्जरी भूत कर दिया। दूसरा अर्थ (2) ऐ यार! (प्रेमात्मन्)! तुझे हमारा दिली प्रेम लेना चाहिये था, न कि हड्डियों और शरीर को जलाना और बरबाद करना था। बड़ा आश्चर्य है कि तू ने हमार दिल लेने के बजाये हमारे शरीर रूपी वन को मुफ़्त में जला दिया। (7) यह तेरी सुन्दरता की अग्नि (दमक) की ताज़ी लाट आकाश तक उपर बढ़ गयी (भड़क उठी) और मेरे शरीर रूपी तृण ने उस से जल कर उस आग को और अधिक बढ़ा दिया (अर्थात् उस अग्नि को और भी ज़्यादा भड़का दिया)। Notes: 1 हड्डियों, 2 जंगल, 3 वृक्ष, वृटा, 4 सुन्दरता की ज्वाला, 5 आकाश तक पहुँच, 6 मेरी स्थिति के तृण अर्थात् मेरी स्थिति रूप तृण ने, 7 जलाकर वा भड़ककर, 8 अधिक किया, भड़काया।

[ 146 ] साहनी, ताल तेवरा, 1 खबरे-तइय्यरे-इश्क़ सुन न जुनूँ रहा न परी रही। न तो तू रहा, न तो मैं रहा, जो रही सो बेखबरी रही॥ 2 शाहे-बेखुदी ने अता किया, मुझे जब लवासे-नैहनगी। न खिरद की वख्यागिरी रही, न जुनूँ की परदादरी॥ 3 वह जो होशो-अक़लो-हवास थे, तेरी इक निगाह ने उड़ा दिये। कि शराबे-सद्कदहे-आजू खुमे दिलमें थी सो भरी रही॥ पंक्तिवार अर्थ (1) इश्क़ की अजीव खबर सुनने से न तो दुन्यावी पगलापन रहा न सांसारिक खुबसूरती (परि) रही और इस इश्क़ के आने से न तो तू रहा और न मैं रहा जो कुछ रही वह बेखबरी रही। (2) अहंकार रहित बादशाह (आत्मा) ने जब मुफ्को नंगा लिवास अर्थात् नंगापन बख्शा (अर्थात् जब मैं माया के पदों से रहित हुआ) तो बुद्धि का उधेरपन (काट फाट) और पगड़े पन का छुपे रहना न रहा। (3) ऐ यार (स्वस्वरूप)! वह जो होश अह अक्ल अह हवास थे तेरी दृष्टि मात्र से उड़ गये [अर्थात् तेरे अनुभव से अक्ल इत्यादि भाग गयी] और सैकड़ों क़िस्म की ख्वाहिश रूपी प्यालों की शराब जो दिल रूपी मटके में भरी हुई थी वह ज्यूँ की त्यूँ भरी रही [अर्थात् ख्वाहिशें पूरे हुये बग़ैर, नष्ट होगईं]। Notes: 1 इश्क़ की हैरानी की खबर सुनकर, 2 बेखुदी के वादशाह, 3 बख्शा, 4 नंगेपन का वस्त्र, 5 बुद्धि, अक्ल, 6 काट फाट, 7 ढांपे रहना, 8 दृष्टि, 9 सौ (100) प्यालों की शराब की इच्छा, 10 दिल का मटका।

4 चली सिम्ते-ग़ैव से एक हवा, कि चमन ग़रूरका जल गया। बल्के शमां-ए-खाना जला के सब गुले-सुर्खसाँ ही हरी रही॥ 5 वह अजब घड़ी थी कि जिस घड़ी, लिया दस्तु सब्ख़े— इश्क़ का। कि किताबे-अक़ल की ताक़ पे, जो धरी थी ज्यूँ ही धरी रही॥ 6 तेरे जोशे-हैरते-हुस्न का, हुआ इस क़दर से असर यहाँ। न तो आयीने में जलां रही, न परी में जल्वा गरी रही॥ 7 किया खाक आतशे-इश्क़ ने, दिले-बेनवाए-सराज को। न हज़र रहा न खतर रहा, जो रही सो बेखतरी रही॥ (1) अव्यक्त देश से ऐसी एक हवा चली कि अहंकार का सारा बाग़ जल गया वल्कि घर (अंतःकरण) का दीपक (ज्ञान) सब जलाकर आप स्वयं लाल (अनार के) फूल की तरह हरा रहा (ताज़ा रहा) (5) वह अजीव घड़ी थी कि जिस घड़ी इश्क़ (प्रेम) का सबक पढ़ा था कि जिसके आने से अक्ल की किताब ताक़तेपर धरी की धरी रही। (6) ऐ यार! (स्वस्वरूप)! तेरे सौंदर्य के जोशका प्रभाव इतना हुआ कि शीशे की सफ़ाई अह (माया रूपी) परीकी प्रतीति सभी जाती रही। (7) इश्क़ की आग ने सराज (कवीका नाम है) को ख़ाक कर दिया। फिर न कोई डर रहा न ख़तरा रहा। जो कुछ रहा वह निर्भयता रही। Notes: 1 लेकिन, 2 घर का दीपक, 3 लाल फूल की तरह, 4 सबक़, 5 प्रेम के, 6 सुन्दरता की हैरानी का जोश, 7 साफ शफ़ाफ़ पना, 8 प्रेम-अग्नि, 9 कवि के दिल, 10 डर, 11 भय, खिफ़क, 12 निर्भयता, निडरपना।

[ 147 ] राग भैरवी, ताल ग़ज़ल तमाशाये-जहान् है और भरे हैं सब तमाशाई। न सूरत अपने दिलबर सी, कहीं अब तक नज़र आई॥1॥ न उसका देखने वाला, न मेरा पूछने वाला। इधर यह बेकसी¹ अपनी, उधर उसकी वह तनहाई²॥2॥ मुझे यह धुन³, कि उसके तालिबों⁴ में नाम हो जावे। उसे यह कहूँ, कि पहिले देख लो है यह भी सौदाई⁵॥3॥ मुझे मतलूब⁶ दीदार⁷ उसका, इक ख़िल्वत⁸ के आलम⁹ में। उसे मंजूर, मेरी आज़मायश, मेरी रुसवाई¹⁰॥4॥ मुझे धड़का, कि आज़ुर्दा¹¹ न हो मुझ से कुछ दिल में। उसे शिकवा¹², कि तूने क्यों तबीयत अपनी भटकाई॥5॥ मैं कहता हूँ कि तेरा हुस्ने¹³ आलम सोज़¹⁴ है जाना¹⁵। वह कहता है, कि क्या हो, गर करूं मैं जुल्फ़-आराई¹⁶॥6॥ मैं कहता हूँ, कि तुझ पर इक ज़माना जान देता है। वह कहता है, कि हाँ बेइन्तहा हैं मेरे शैदाई¹⁷॥7॥ Notes: 1 कमज़ोरी, लाचारी, 2 अकेलापन, 3 लग्न, 4 जिज्ञासुओं, 5 ख़याल तरंग, हठ, 6 ज़रूरत, आवश्यकता, 7 दर्शन, 8 एकान्त, 9 अवस्था, समय, 10 ख़्वारी, 11 नाराज़, ख़फ़ा, क्रुद्ध, 12 शिकायत, 13 सुन्दरता, 14 जगत व दुनिया को जलाने वाला, 15 ऐ प्यारे, 16 शृंगार करना, अपने नख़्श को सजाना, अपने वालों को सजाना, 17 आसक्त, आशिक़, भक्त।

मैं कहता हूँ, कि दिलवर! मैं नहीं हूँ ऐ क्या तेरा आशिक़? वह कहता है, कि मैं तो रखता हूँ ऐसी ही रानाई¹॥8॥ मैं कहता हूँ, कि तू नज़रों से मेरी क्यों हुआ ओझल²। वह कहता है, यही अपनी अदा³ मुझ को पसंद आई॥9॥ मैं कहता हूँ, तेरा यह हुस्न और देखूं न मैं उस को। वह कहता है, कि मैं ख़ुद देखता हूँ अपनी जेवाई⁴॥10॥ मैं कहता हूँ, कि हद पर्दों की आख़िर तावकैं⁵ पर्दा। वह कहता है, कि कोई जब तक न हो अपना शनासाई⁶॥11॥ मैं कहता हूँ, कि अब मुझ को नहीं है ताब⁷ फ़ुर्क़त की। वह कहता है, कि आशिक़ हो के कैसी ना शिकेबाई⁸॥12॥ मैं कहता हूँ, कि सूरत अपनी दिखला दीजिये मुझ को। वह कहता है कि सूरत मेरी किस को देगी दिखलाई?॥13॥ मैं कहता हूँ, कि जाना⁹! अब तो मेरी जान जाती है। वह कहता है, कि दिल में याद कर क्योंकर थी वह आई॥14॥ मैं कहता हूँ, कि इक झलकी है काफ़ी मेरी तसल्ली¹⁰ को। वह कहता है, कि वामे तूर¹¹ पर थी क्या निदा¹² आई॥15॥ Notes: 1 सुन्दरता, वाँकपन, कृत वज़्रा, 2 छुपा, अप्रकट, 3 चेष्टा, चाल, नज़रा-टेढ़रा, 4 सजावट, ख़ूबसूरती, 5 कब तक, 6 अपने आप को पहिचानने वाला, आत्मवेत्ता, 7 जुदायगी के सहने की शक्ति वा ताक़त, 8 बेसबरी, 9 ऐ प्यारे, 10 तसल्ली, सन्तोष, 11 तूर के पहाड़ की चोटी पर [ जहाँ मूसा को ज्ञान मिला और जहाँ ईश्वर आग की लाट में मूसा के आगे प्रकट हुआ था ] अर्थात् ज्ञान की शिखर पर, 12 आवाज़, बोली।

मैं कहता हूँ, कि मुझ बेसबर को किस तौर सबर आये। वह कहता है, कि मेरी याद की लज़्ज़तें नहीं पाई॥16॥ मैं कहता हूँ, यह दामे-इश्क़ बेढब तूने फैलाया। वह कहता है, कि मेरी ख़ुद पसन्दी मेरी ख़ुदराई॥17॥ [ 148 ] राग परज़, ताल खुमाली। हमने हैं, इश्क़ के माते⁶, हमन को दौलतां¹ क्या रे। नहीं कुछ माल की परवाह, किसी की मिन्नतां² क्या रे॥1॥ हमन को खुश्क³ रोटी बस, कमर को यक लंगोटा बस। सिरे पै एक टोपी बस, हमन को इज़्ज़तां⁴ क्या रे॥2॥ कुवां⁵ शाला वज़ीरों को, जुरी ज़रबफ्त⁷ अमीरों को। हमन जैसे फ़क़ीरों को, जगत की नेअमतां⁸ क्या रे॥3॥ जिन्हों के सुखने ठ्याने¹⁰ हैं, उन्हीं को खल्क़¹¹ माने हैं। हमन आशिक़ दिवाने⁹ हैं, हमन को मजलसां क्या रे॥4॥ कियो हम दर्द का ख़ाना, लियो हम भस्म का बाना। वली¹² बस शौक़ मन भाना, किसी की मसलहतां¹³ क्या रे॥5॥ Notes: 1 स्वाद, रस, 2 प्रेम का जाल, इश्क़ का फन्द, 3 अपनी मर्ज़ी, 4 अपनी ही बनाई हुई, अपने आप से वा अपनी सजाई हुई, 5 हम, 6 मस्त, 7 अमीरों की पोशाक, 8 जगत के आनंद दायक पदार्थ, 9 वाक्य, उपदेश, बातें, 10 बुद्धि युक्त, ठीक, 11 दुनिया, 12 कवि का नाम, 13 सलाह, नसीहत।

[ 149 ] राग गारा, ताल दादरा हम कूये-दरे-यारै¹ से क्या टल के जायेंगे। हम न पत्थर हैं फिसलने कि फिसल जायेंगे॥1॥ वसले-सनम² को छोड़ कर क्या काबे जायेंगे। वहाँ भी वही सनम³ है तो क्या मुँह दिखायेंगे॥2॥ हम अपने कूए-यारै⁴ को काबा बनायेंगे। लैला⁵ बनेंगे हम, उसे मजनूं⁶ बनायेंगे॥3॥ ग़ैरों से मत मिलो कि सितमगरै⁷ बनायेंगे। हम से मिला करो तुम्हें दिलबर बनायेंगे॥4॥ आसन जमाये¹⁰ बैठे हैं, दर से न जायेंगे। हम कैहकशां⁸ बनेंगे, तुझे माहरू⁹ बनायेंगे॥5॥ [ 150 ] राग गारा, ताल खुमाली ( वज़्न—सब से जहाँ में अच्छा ) चुन्दन के हम डले हैं, जब चाहे तू गला ले। वावरैं न हो, तो हम को ले आज आज़माले॥ Notes: 1 प्यारे के द्वार की गली से, 2 प्यारे के दर्शन, मिलाप, संग, 3 प्यारा ( अपना स्वरूप ) 4 कूचा, गली, 5 एक प्रिया का नाम, 6 एक प्यारे का नाम है, 7 ज़ालिम, ज़ुलम करने वाला, 8 दूधिया रास्ता जो रात को आकाश में नज़र आता है, जिसे आकाश गंगा, ( milky path ) भी कहते हैं, 9 चन्द्रमुख, चाँद मूरत, 10 विश्वास, निश्चय।

जैसे तेरी खुशी हो, सब नाच तू नचा ले। सब छान बीन कर ले, हर तौरै¹ दिल जमा ले॥1॥ राज़ी हैं हम उसी में जिस में तेरी रज़ा² है। } यां यूँ भी वाह वाह है और वूँ भी वाह वाह है॥ } टेक या दिल से अब खुश होकर कर हमको प्यार प्यारे। या तेग़³ खैंच ज़ालिम⁴! टुकड़े उड़ा हमारे॥ जीता रखे तू हमको या तन से सिर उतारे। अब तो फ़क़ीर आशिक़ कहते हैं यूँ पुकारे-राज़ी हैं॥2॥ अब दरै⁵ पै अपने हमको रहने दे या उठा⁶ दे। हम इस तरह भी खुश हैं, रख या हना बना दे॥ आशिक़ हैं पर क़लन्दर चाहे जहाँ बिठा दे। या अर्श⁷ पर चढ़ादे या ख़ाक में सुलादे-राज़ी हैं॥3॥ Notes: 1 हर तरह, तरीक़ा, 2 मर्ज़ी, 3 तलवार, 4 ज़ुल्म करने वाला, निर्दयी, सताने वाला, अथवा रुद्र रूप, 5 द्वार अर्थात निकट अपने, 6 दूर फेंक दे, 7 आकाश। [ 151 ] राग संधोरा, ताल दीपचन्दी। (टेक) अरे लोगों! तुम्हें क्या है! या वह जाने या मैं जानूं। वह दिल मांगे तो हाज़िर है, वह सिर मांगे तो वे सिर हूँ। जो मुख मोडूं तो काफ़िर हूँ, या वह जाने या मैं जानूं॥1॥

वह मेरी बग़ल छुप रहता, मैं उसके नाज़ सभी सहता। वह दो बातें मुझे कहता, या वह जाने या मैं जानूं॥2॥ वह मेरे खून का प्यासा, मैं उस के दर्द का मारा। दोनों का पन्थ है न्यारा, या वह जाने या मैं जानूं॥3॥ मूआ आशिक़ द्वारे पर, अगर वाक़िफ़ नहीं दिलवर। अरे मुल्ला सपारा पढ़, या वह जाने या मैं जानूं॥4॥ [ 152 ] राग सिंधोरा, ताल दीपचन्दी। रहा है होश कुछ बाक़ी उसे भी अब निबेड़े जा। यही आहंगे मुतरब-पिसरै! टुक और छेड़े जा॥1॥ मुझे इस दर्द में लज़्ज़तें हैं, ऐ जोशे जुनूं! अच्छा। मेरे ज़ख़्मे जिगर के हर घड़ी टाँके उधेड़े जा॥2॥ पंक्तिवार अर्थ: (1) ए प्यारे! (आत्मा)! अगर कुछ संसार का होश बाक़ी रहा है तो उसे भी अब दूर छेड़े, ऐ रागी पुत्र! यही सुर तू छेड़े जा। (2) मुझे इस दर्द में आनन्द है क्योंकि यह दर्द अपने स्वरूप को याद दिलाता है, इसलिये ऐ पागलपन के जोश! मेरे जिगर के टाँके (मेरे दिल के घाव) हर घड़ी उधेड़े (फोड़े) जा। Notes: 1 नफ़रे, टख़रे, 2 मार्ग, 3 राग वा सुर, 4 गाने वाले के पुत्र, 5 आनन्द, स्वाद, 6 पागल पन का जोश, 7 दिल के घाव।

उखड़ना दम, कलेजा मुँह को आना, ज़ार-वेताबी। यही साहिलै पै आना है, लगे हैं पार बेड़े जां॥3॥ है नाला-ज़ार ने पाया, सुरागे-नाका-प-लैली। मुवादा कैसे आ पहुँचे, हुदी को ज़ोर छेड़े जा॥4॥ कहां लज़्ज़त, कहां का दर्द, तूफां कैसा, ज़ख़मी कौन। हक़ीक़त पर पहुँचते ही मिटे क्या ख़ूब झेड़ें जा॥5॥ अरे हड़ नाख़ुदा! पत्वारै! मुड़ ले, टूट पर तूफां। अड़ा डा धम, अड़ा डा धम, किरारो को थपेड़े जा॥6॥ (3) दम उखड़ता है तो उखड़ने दे, कलेजा मुँह को आता है तो आने दे, चेतावी होती है तो हो, क्योंकि हमें इसी (दर्दके) किनारे पर आना है। (4) क्योंकि मजनूं के ज़ार ज़ार रोने ने ही लैला के घर का पता पाया, इसलिये ऐ ऊँट वाहे! ऊँट को बढ़ाये जा जिससे कहीं मजनूं न पीछे से आ जाये [ क्योंकि जिस समय मजनूं (मन) लैला (तत्व दृष्टि) को मिल जाय अर्थात् आत्मानुभव कर ले ] तो फिर। (5) कहां की लज़्ज़त, कहां का दर्द, कैसा तूफां, कौन ज़ख़मी तत्व पर पहुँचते ही ये सब झगड़े मिट जाते हैं। (6) अरे नाव के मल्लाह [ शरीर के अहंकार ] ! परे हट, पतवार मुड़ता है तो मुड़ने दे, तूफां टूट पड़ता है तो टूटने दे, और तूफां के ज़ोर से अगर किनारे टूट कर पानी में अड़ा डा धम अड़ा डा धम करके गिरते हैं तो गिरने दे। Notes: 1 बेताबी का दर्द, रोना, 2 किनारा, 3 रोने का शोर, 4 लैला (माशूक़) के घर का पता, 5 ऐसा न हो, शायद, 6 मजनूं, 7 ऊँट को ढकेलने की आवाज़ अर्थात् ऊँट को चलाये चल, 8 सब झगड़े, झगड़िये, 9 बेड़ी का मल्लाह ( मांझी ), 10 नाव को मोड़ने ( घुमाने ) की वल्ली, 11 किनारे।

हैं हम तुम दाख़िले-दफ़्तर, खुमे-मय में है दफ़्तर गुम। न मुज्रिम मुदई वाक़ी, मिटे क्या खुश बख़ेड़े जा॥7॥ [ 153 ] राग गारा, ताल खुमाली। किस किस अदा से तूने जल्वा दिखा के मारा। आज़ाद हो चले थे, बन्दा बना के मारा॥1॥ ख़ुद बोल उठा अनलहक़ ख़ुद बन के शरह तूने। इक मर्द-हक़ को नाहक़ सूली चढ़ा के मारा॥2॥ क्यों कोहकनै पै तू ने यह संग-रेज़ियां कीं। ली उस की जाने-शीरीं, तेशा उठा के मारा॥3॥ पहिले बना के पुतला, पुतले में जान डाली। फिर उस को ख़ुद क़ज़ा की सूरत में आ के मारा॥4॥ (7) क्योंकि अब हम तुम दाख़िले-दफ़्तर हैं और निजानन्द के मटके (अन्तः करण) में दफ़्तर गुम है, अब न कोई (द्वैत रूप) मुज्रिम है न मुदई वाक़ी है। वाह! क्या उत्तम रीति से सब झगड़े निपटे हैं। Notes: 1 आनन्द रूपी शराब का मटका, 2 नज़रे, 3 दर्शन, 4 बद्ध जीव, परिच्छिन्न, अनुचर, 5 शिवोऽहं, ब्रह्मास्मि व कर्मकाण्ड वा स्मृतिशास्त्र, 7 ज्ञानवान्, 8 व्यर्थ, विना अपराध, 9 प्रिया शीरीं के प्यारे फ़रहाद का नाम है, 10 पत्थर फेंके, 11 मृत्यु, काल भगवान्।

गर्दन में कुमरियों की उलफ़त का तौक़ डाला। बुलबुल को प्यारे! तूने गुलैं वन के ख़ुद ही मारा॥5॥ आँखों में तेरे ज़ालिम! छुरियां छुपी हुई हैं। देखा जिधर को तूने पलक उठा के मारा॥6॥ गुंचे में आ के महका, बुलबुल में जा के चहका। इस को हँसा के मारा, उसको छला के मारा॥7॥ [ 154 ] *राग तिलंग, ताल दादरा। इक ही दिल था सो वह भी दिलबर ले गया अब क्या करूं। दूसरा पाता नहीं, किस को कहूँ अब क्या करूं॥1॥ ले चुका था जाने-जानां जां को तो पहिले हाथ से। फिर भी हमले कर रहा, किस को कहूँ अब क्या करूं॥2॥ हम तो दरै पर मुन्तज़िर थे, तिशनए-दीदार के। पहुँचते विसमिल किया किस को कहूँ अब क्या करूं॥3॥ *यह कविता श्रीराम के शिष्य स्वामी गोविन्दानन्द की है। Notes: 1 बुलबुलों, 2 बन्धन, संगल, 3 पुष्प, 4 पुष्पकंजी, 5 ख़ुशबूदी, 6 जान की जान (जान से अति प्यारा) अर्थात् प्राणप्रिय, 7 द्वारपर, 8 दर्शन के प्यासे, 9 (मिलते ही) मार दिया या घायल किया।

याददाश्त के लिये, रहता था फोटो¹ जिस्मों जां²। वह भी ज़ायल³ कर दिया, किस को कहूँ अब क्या करूं॥4॥ यार के मुँह पर झरोखे⁴ से नज़र इक जा पड़ी। देखते घायल हुआ, किस को कहूँ अब क्या करूं॥5॥ आप⁶ को भी क़तल कर, फिर आप ही इक रह गये। वाह नज़ाकत आप की, किस को कहूँ अब क्या करूं॥6॥ [ 155 ] राग राम कली। सइयो नी! मैं प्रीतम पिया को कमाऊंगी। इक पल भी उसे न बिसाऊंगी⁵॥ टेक॥ नयन हृदय का करूँगी बिछौना। प्रेम की कलियां बिछाऊंगी॥ सइयो०॥1॥ तन मन धन की भेंट धरूंगी। हाँ मैं खूब मिटाऊंगी॥ सइयो०॥2॥ बिन पिआ दुःख बहुत होवत है। बहु जूनां⁷ भरमाऊंगी॥ सइयो०॥3॥ Notes: 1 सूरत, तस्वीर, 2 शरीर ( देह ) अरु प्राण, 3 नष्ट, 4 खिड़की, 5 न अलग करूंगी, 6 परिच्छिन्न अहंकार, 7 बहुत योनियों में।

भेद खेद को दूर छोड़ कर। आत्म-भाव रिझाऊंगी¹॥ सइयो०॥4॥ जे कहा पीया नहीं माने मेरा। मैं आप गले लगजाऊंगी॥ सइयो०॥5॥ पिया गले लागी, हुई बड़भागी। जन्म मरण छुट जाऊंगी॥ सइयो०॥6॥ पिया गले लागे, सब दुःख भागे। मैं पिया-विच लय हो जाऊंगी॥ सइयो०॥7॥ राम पिया मोरे पास बसत हैं। मैं आप पिया हो जाऊंगी॥ सइयो०॥8॥ [ 156 ] राग परज, ताल रूपक। जिस को शोहरत भी तरसती हो, वह ख़्वारी² है और। होश भी जिस पर फड़क जायें, वह सौदा और है॥1॥ बन के पर्वानो तेरा आया हूँ मैं, पे शमां-प-तूरैं³। बात वह फिर छिड़ न जाये, यह तक़ाज़ा⁴ और है॥2॥ Notes: 1 आत्म भाव में प्रवेश या तृप्त होऊंगी, 2 अनादर, अपमान, 3 ऐ पहाड़ रूपी अग्नि के दीपक ( आत्म देव ), 4 झगड़ा।

देखना ! ज़ौक़े-तकल्लुम¹ में यहाँ कोई मूसा नहीं । जो मेरी आँखों में फिरता है, वह शीशा और है ॥ 3 ॥ यूँ तो ऐ सैयाद²-ए-आज़ादी में हैं लाखों मज़े । दाम³ के नीचे फड़कने का तमाशा और है ॥ 4 ॥ जान देता हूँ तड़प कर कूचा-ए-उलफ़तें⁴ में मैं । देख लो तुम भी कोई दम का तमाशा और है ॥ 5 ॥ तेरे खंजर ने जिगर टुकड़े किया, अच्छा किया । कुछ मेरे पहलू⁵ में लेकिन चिलबला⁶ सा और है ॥ 6 ॥ भेस बदले⁷ महफ़िले-अग़यार⁸ में बैठे हैं हम । वह समझते हैं यह कोई ओपरा⁹ सा और है ॥ 7 ॥ [ 157 ] राग भैरवी, ताल दादरा । आशिक़ जहाँ में दौलतो-इक़बाल क्या करे । मुल्को-मकानो¹⁰ तेग़ो-तबर¹¹ ढाल क्या करे ॥ Notes: 1 वाणी अर्थात् 'अहं' पद से अपने को पुकारने का शौक़ अथवा आनंद, 2 शिकारी, 3 जाल, 4 प्रेम की गली में, प्रेम के मार्ग में, 5 दाग़ में, अंग में, 6 काँटा चुभना, 7 वेश बदले, 8 अपने प्यारे से भिन्न पुरुषों की समाज, 9 अन्य, अपरिचित, 10 मुल्क और मकान, 11 तलवार और ढाल।

जिसका लगा हो दिल यह ज़रो-माल क्या करे । दीवाना जाहो-हशमतो-अजलाल क्या करे ॥ बेहाल हो रहा हो सो वह हाल क्या करे । गाहक ही न कुछ लेवे तो दल्लाल क्या करे ॥ 1 टेक ॥ मरने का डर है उन को जो रखते हैं तन में जाँ । और वह जो मर गये तो उन्हें मौत फिर कहाँ ॥ मोहताजे पत्थरों को तरसते हैं हर ज़माँ । और जिन के हाथ काने-जवाहर लगे मियाँ ॥ वह फिर इधर उधर के दुरो-लाल क्या करे । गाहक ही कुछ न लेवे तो दल्लाल क्या करे ॥ 2 ॥ पाला है जिन सवारों ने याँ खर को आशकार । कुत्ते की पीठ पर नहीं चढ़ सकते जिनहार ॥ और जो फलांग मार के हो चर्ख़ पर सवार । वह फ़ीलो-अस्पे-ज़र्दो-सियाह लाल क्या करे ॥ दीवाना जाहो-हशमतो-अजलाल क्या करे । गाहक ही न कुछ लेवे तो दल्लाल क्या करे ॥ 3 ॥ Notes: 1 धन, दौलत, 2 ईश्वर का पागल, (खुद मस्त), 3 पद, वैभव और मान, मतवा, इज़्ज़त, शोहरत, 4 हाजतमंद, दरिद्री, 5 जवाहरात, मोती, 6 हर समय, 7 जवाहरात की खान, 8 मोती और लाल, 9 गधा, गदभ, 10 ज़ाहिरा, स्पष्ट, 11 कदापि, 12 आकाश, 13 पीला, लाल, और काला हाथी व घोड़ा।

[ 158 ] राग देश, ताल तीन गुम हुआ जो इश्क़ में, फिर उस को नंगो-नाम क्या । दैरे-काबा से गरज़ क्या कुफ़र क्या इस्लाम क्या ॥ 1 ॥ शैखजी जाते हैं मैखाना से मुँह को फेर फेर । देखिये मसजिद में जाकर पायेंगे इनाम क्या ॥ 2 ॥ मौलवी साहिब से पूछे तो कोई है जिस्म क्या । कह क्या है, दम है क्या, आग़ाज़ें क्या, अंजामें क्या ॥ 3 ॥ दम को लय कर सुम्मो-बुक्म बेसवर सा बैठ रहे । कूचये-दिलदारें में वाइज़ से तुम को काम क्या ॥ 4 ॥ यार मेरा मुझ में है, मैं यार में हूँ बिलज़ुरर । वस्ले को यहाँ दख़ल क्या और हिजरे नाफ़ज़ाम क्या ॥ 5 ॥ तुम में मैं और मुझ में तू आँखें मिलाकर देख ले । और गर देखे न तू तो मुझे पै है इल्ज़ाम क्या ॥ 6 ॥ पुख्ता-मग़ज़ों के लिये है रहनुमा मेरा सखुन । हाफ़िज़ा ! हासिल करेंगे इस से मद्दे-ख़ाम क्या ॥ Notes: 1 शर्म, लज्जा, 2 मन्दिर, 3 शराव खाना, 4 शुरू आदि, 5 अन्त, 6 चुप चाप, गूँगा, 7 यार की गली अर्थात् साक्षात्कार के मार्ग में, 8 उपदेश, 9 मिलाप, मुलाक़ात, दर्शन, 10 विरह, वियोग, 11 बद असल, 12 तीन बुद्धि वाले, (बहुत समझ वाले,) 13 नेता, लीडर, नायक, 14 उपदेश, 15 कवि का नाम, 16 कच्ची समझ वाले, कमज़र्फ़ वा कमज़ोर दिल।

[ 159 ] राग भैरवी, ताल रूपक । जो मस्त हैं अज़लें के उन को शराब क्या है । मक़बूल-ख़ातिरों को बू-ए-कबाब क्या है ॥ 1 ॥ क्यों मुँह छुपाओ हम से, तक़सीरें क्या हमारी । हर दम की हमनशीनी, फिर यह हिजाब क्या है ॥ 2 ॥ हो पास तुम हमारे, हम ढूँढते हैं किस को । मुँह से उठा दिखाना, ज़ेरे-नक़ाबें क्या है ॥ 3 ॥ [ 160 ] ग़ज़ल सोहनी । जिन प्रेम रस चाख्या नहीं, अमृत पिया तो क्या हुआ । जिन इश्क़ में सिर ना दिया युग युग जिया तो क्या हुआ ॥ टेक मशहूर हुआ पंथ में साबित न किया आप को । आलिम अरु फ़ाज़िल होय के, दाना हुआ तो क्या हुआ ॥ 1 ॥ जिन० औरों नसीहत है करे, और ख़ुद अमल करता नहीं । दिल का कुफ़र छूटा नहीं, हाज्जी हुआ तो क्या हुआ ॥ 2 ॥ जिन० Notes: 1 अनादि वस्तु में जो मस्त हैं (अपने स्वरूप करके जो मस्त हैं), 2 दिल क़बूल (मंज़ूर) करने वालों को, दिल देने वालों को, 3 कबाब (विषयानन्द) की गन्ध, 4 अपराध, क़सूर, 5 साथ रहना, 6 परदा, 7 परदे के नीचे, 8 हज (तीर्थयात्रा) करने वाला।

देखी गुलिस्ताँ बोस्ताँ, मतलब न पाया शैख़ का । सारी किताबाँ याद कर, हाफ़िज़ हुआ तो क्या हुआ ॥ 3 ॥ जिन० जब तक पियाला प्रेम का पी कर मगन होता नहीं । तार मंडल बाजते ज़ाहिर सुना तो क्या हुआ ॥ 4 ॥ जिन० जब प्रेम के दरियाव में ग़र्क़ावें यह होता नहीं । गंगा-यमुन गोदावरी नहाता फिरा तो क्या हुआ ॥ 5 ॥ जिन० प्रीतम से किंचित् प्रेम नहीं, प्रीतम पुकारत दिन गया । मत्लूबे हासिल ना हुआ, रो रो सुआ तो क्या हुआ ॥ 6 ॥ जिन० [ 161 ] राग विरवा । अब मैं अपने राम को रिझाऊँ, वैहि भजन गुण गाऊँ ॥ टेक डाली छेड़ूँ न पत्ता छेड़ूँ न कोई जीव सताऊँ । पात-पात में प्रभु वसत हैं, वाहि को सीस नवाऊँ ॥ 1 ॥ अब० गंगा जाऊँ न यमुना जाऊँ, ना कोई तीरथ नहाऊँ । अठसठ तीरथ घट के भीतर, तिनहि में मल मल नहाऊँ ॥ 2 ॥ अब० औषध खाऊँ न बूटी लाऊँ, ना कोई वैद्य बुलाऊँ । पूर्ण वैद्य मिले अविनाशी, वाहि को नब्ज़ दिखाऊँ ॥ 3 ॥ अब० ज्ञान कुठारा कस कर बांधूँ, सुरत कमान चढ़ाऊँ । पाँचो चोर वसें घट भीतर, तिन को मार गिराऊँ ॥ 4 ॥ अब० Notes: 1 लीन, 2 इच्छित वस्तु, 3 बैठ, 4 सिर, मस्तक।

योगी होऊँ न जटा बढ़ाऊँ, न अंग भभूति रमाऊँ । जो रंग रंगे आप विधाता, और क्या रंग चढ़ाऊँ ॥ 5 ॥ अब० चँद सूरज दोऊ सम कर राखो, निज मन सेज बिछाऊँ । कहन कबीर सुनो भाई साधो, आवागमन मिटाऊँ ॥ 6 ॥ अब० [ 162 ] राग सिंधड़ा, ढाई ताल इश्क़ होवे तो हक़ीक़ी इश्क़ होना चाहिये । इस सिवा जितने हैं आशिक़ उनपे रोना चाहिये ॥ 1 ॥ पेशो-इशरत में गुज़ारा, रोज़ा सारा गर्चि तुम । रात को प्रभु याद करके तब तो सोना चाहिये ॥ 2 ॥ बीज वो कर फल उठाया खूब तुमने है यहाँ । आक़वत के वास्ते भी कुछ तो बोना चाहिये ॥ 3 ॥ यहाँ तो सोये शौक़ से तुम बिस्तरे-कमख्वाब पर । सफ़र भारी सिर पै है, वहाँ भी बिछौना चाहिये ॥ 4 ॥ है ग़नीमत उमर यारो ! जान को जानो अज़ीज़ । रायगाँ और मुफ़्त में इस को न खोना चाहिये ॥ 5 ॥ Notes: 1 आना जाना, मरना जीना, 2 प्रेम, भक्ति, 3 विषयभोग, विषयानन्द, 4 परलोक, 5 धन्य, 6 व्यर्थ, बे फ़ायदा।

गर्चि दिलबर साथ है, बिन जुस्तजू मिलता नहीं । दूध से माखन जो चाहो, तो बिलोना चाहिये ॥ 6 ॥ यादे-हक़ दिन रात रख, जंजाल दुनिया छोड़ दे । कुछ न कुछ तो लुत्फ़े-ख़ालिस तुझ में होना चाहिये ॥ 7 ॥ [ 163 ] ग़ज़ल सोहनी प्रीत न की स्वरूप से तो क्या किया, कुछ भी नहीं । ( टेक ) जान दिलबर को न दी, फिर क्या दिया, कुछ भी नहीं ॥ 1 ॥ प्री० मुल्कगीरों में सिकन्दर से हज़ारों मर मिटे अपने पर क़ब्ज़ा न कीया, क्या लिया, कुछ भी नहीं ॥ 2 ॥ प्री० देवताओं ने सोम रस पीया तो फिर भी क्या हुआ । प्रेमरस गर ना पिया, तो क्या पिया, कुछ भी नहीं ॥ 3 ॥ प्री० हिज्र में दिलबर के हम जो उम्र पाई खिज़्र की । यार अपना ना मिला, तो क्या जिया, कुछ भी नहीं ॥ 4 ॥ प्री० [ 164 ] भाव, ताल चंचल । आऊँगा न जाऊँगा, मरूँगा न जीऊँगा । हरि के भजन प्याला प्रेम-रस पीऊँगा ॥ } टेक Notes: 1 पुरुषार्थ, प्रयत्न ढूँढना, 2 ईश्वरस्मरण, 3 श्रद्धानन्द, या निजानन्द, 4 देश देशान्तरों का विजय करना, 5 विरह, जुदाई, 6 ख़िज़र एक मुसलमानों के हज़रत का नाम है जिसकी आयु अनन्त कही जाती है।

कोई जावे मक्के, कोई जावे काशी, देखो रे लोगो ! दोहूँ गल फाँसी ॥ 1 ॥ आऊँगा० कोई फेरे माला, कोई फेरे तसवीहें । देखो रे साधो ! यह दोनों हैं कसंबी ॥ 2 ॥ आऊँगा० कोई पूजे महड़ियां, कोई पूजे गोरां ॥ देखो रे सन्तो ! मैं लुट गयी जे चोरां ॥ 3 ॥ आऊँगा० कहत कबीरा सुनो मेरी लोई । हम नहीं मरना, रोवे न कोई ॥ 4 ॥ आऊँगा० [ 165 ] राग आसा । खेडन दे दिन चार नी ! वतन तुसाड़े मुड नहीं आवना । टेक । चोला चुनड़ी सानूं मापियां दितड़ां । हप दित्ता करतार नी ! वतन तुसाड़े॰ ॥ 1 ॥ पंक्तिवार अर्थ । टेक—मेरे संसार में खेलने के अब दो चार दिन हैं (क्योंकि मुझे ईश्वर का इश्क़ (प्रेम) लग गया है । इस वास्ते ऐ शारीरिक माता पिता ! तुम्हारे सांसारिक घर में मेरा अब आना वापिस नहीं होगा । (1) शारीरिक चोला (शरीर इत्यादि) तो माता पिता ने दिया, मगर असली रूप कर्तार ने दिया है (इस वास्ते मैं ईश्वर की हूँ तुम्हारी नहीं) इसलिये । टेक० Notes: 1 जपनी, माला, (जो मुसलमान भजन में वर्तते हैं), 2 पेशावर, व्यापारी, 3 कबर, 4 कवि का नाम है, 5 कबीर की स्त्री का नाम है।

अम्बड़ भोली कत्तियां लोड़े । भठ पइय्यां पूनीयां, भठ पये गोढ़े । तुक़ले दे वल्ल चार नी ! वतन तुसाड़े ॥ 2 ॥ रल मिल सैयां खेडन चल्लीयाँ । खेड खिडन्दरी नूं कंडा नी ! पुरया । विसर गया घर बार नी ! वतन तुसाड़े॰ ॥ 3 ॥ [ 166 ] राग आसा । करसां मैं सोई शृंगार नी, जिस विच पिया मेरे वश आवे । टेक । (2) शारीरिक माता यह चाहती है कि दुनिया रूपी व्यवहार में लगूं, मगर मेरे दिल रूपी तकले (कला) के चार वल पड़ गये हैं (क्योंकि ईश्वर के प्रेम में मेरा चित्त लगा हुआ है) इस वास्ते मैं कह रही हूँ कि रुई का कातना, व रुई की पूनियां (अर्थात् सांसारिक व्यवहार) तमाम भाड़ में पड़ें, और मैं तुम्हारे घर में ही नहीं आने लगी । (3) जब संसारिक घर से बाहर निकल कर हम सब सहेलियाँ ( सखियाँ ) खेलने को जाने लगीं तो रास्ते में (प्रेम का) काँटा मुझे खेलते २ ऐसा चुभा कि घर बार (दुनिया का सारा काम काज) मुझे विसर (भूल) गया । इस वास्ते (टेक) पंक्तिवार अर्थ । टेक—अब मैं ऐसा शृंगार (अपने अन्दर को साफ़) करूँगी कि जिससे मेरा पति (ईश्वर) मेरे वश में आजावे ।

जिस भूषण विच होवे न दूषण, सोई मेरे दरकार नी । जि० ॥ 1 ॥ गजरयां वंगां तों हुन संगां, कच्चा कव उतार नी । जि० ॥ 2 ॥ नामदा नामां, प्रेम दा धागा, पावां गल विच हार नी । जि० ॥ 3 ॥ पावांगी लच्छे, मैं निर्लज्जे, आंतर पियादा प्यार नी । जि० ॥ 4 ॥ सैंह न सकदी मैं सौकन वैरण, आंतर दा छिनार नी । जि० ॥ 5 ॥ (1) जिस भूषण (बनावटी सजावट) से कोई दोष न उत्पन्न हो, वड़ी श्रृंगार (ज़ेवर) में चाहती हूँ, और वही पहेनूँगी ताकि मेरा ईश्वर (पति) मेरे वश में आवे । (2) दुनियावी काँच की चूड़ी जो स्त्री लोग पहेनती हैं उन को पहेनने में मुझे लज्जा आती है । इस लिये मैं इस कच्चे काँच को उतार कर (ऐसा कोई असली और सुदृढ़ भूषण पहेनती हूँ) जिससे मेरा पति (ईश्वर) मेरे वश हो जावे । (3) ईश्वर-नाम का तो नामा ज़ेवर मैं पहेनूँगी, और उस भूषण में प्रेम रूपी धागा डालूँगी । ऐसा सुंदर हार बना कर मैं अपने गले में डालूँगी जिससे मेरा प्यारा (ईश्वर) मेरे वश में आ जावे । (4) पावों में ऐसा लच्छे-रूप ज़ेवर, जो मेरी शर्म उतार दे, मैं पहेनूँगी कि जिस में पिया (प्यारे) के प्यार रूपी छाँजरे हों, ताकि मेरा पति (ईश्वर) मेरे वश में हो जावे । (5) मैं ही एक सहेली उसकी प्यारी होना चाहती हूँ, और उसकी दूसरी स्त्री (सौकन) देखना मैं स्वीकार नहीं कर सकती, और न किसी दूसरी स्त्री (सौकन) के ज़ेवर इत्यादि छाँजरों की झिंकर सुनना सहन कर सकती हूँ । ताकि पिया का मेरे पर ही प्यार हो और वह मेरे वश में ही आया हुआ हो ।

[ 167 ] राग पीलू, ताल दीप चंदी । ग़लत है कि दीदारें की आर्ज़ू है । ग़लत है कि मुझ को तेरी जुस्तजू है ॥ तेरा जल्वा ऐ जल्वागरे ! कुबकू है । हुज़ूरी है हर वक़्त तू रूबरू है ॥ 1 ॥ जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है ॥ टेक ॥ हर इक गुल में बू हो कि तू ही बसा है । सदाहाये-बुलबुल में तेरी नवा है ॥ चमन फ़ैज़े-क़ुदरत से तेरे हरा है । बहारे-गुलिस्तां में जल्वा तेरा है ॥ 2 ॥ जि० ॥ नबातात में तू नमू है शजर की । जमादात में आब है बहरो-बर की ॥ तू हैवां में ताक़त है सैरो-सफ़र की । तू इन्सां में क़ुव्वत है नुतक़ो-नज़र की ॥ 3 ॥ जि० ॥ Notes: 1 दर्शन, 2 इच्छा, 3 जिज्ञासा, खोज, 4 प्रकाश, तेज, 5 प्रकाशमान, 6 सर्व दिशा में, हर गली में, 7 आवाज़ों में, 8 गीत, सुर, 9 प्रकृति या माया की कृपा से, 10 बाग़ की बहार में, 11 बनस्पति, 12 वृद्धि, पालन, पोषण, 13 वृक्ष, झाड़ी, 14 पापाण, पत्थर, धातु, 15 चमक दमक, 16 पृथ्वी और समुद्र की, 17 पशुओं, 18 चलने फिरने, 19 बुद्धि और ज्ञान-चक्षु।

भक्ति (इश्क़) ( 151 ) घटा तू ही उठता है घनघोर हो कर। छुपा तू ही है बैहेर में शोर हो कर॥ निहां¹ तू हि तूफ़ां में है ज़ोर होकर। अयां² तू हि मौजों³ में झकझोर हो कर॥4॥ जि० तेरी है सदा⁴ राद⁵ में गर कड़क है। तेरी है ज़ियां⁶ बर्क़⁷ में गर चमक है॥ यह क़ौसे-क़ुज़ह⁸ ही में तेरी झलक है। जवाहर के रंगों में तेरी दमक⁹ है॥5॥ जि० ज़मीं आस्मां तुझ से मामूर¹⁰ हैं सब। ज़मानो-मकां¹¹ तुझ से भरपूर हैं सब॥ तजल्ली¹² से कौनो-मकां¹³ नूर हैं सब। निगाहों में मेरी जहां तूर¹⁴ हैं सब॥6॥ जि० हसीनों¹⁵ में तू हुस्नो नाज़ो-अदा¹⁶ है। तू उश्शाक़¹⁷ में इश्क़ो-सिद्क़ो-सफ़ा¹⁸ है॥ मिज़ाज़ो¹⁹-हक़ीक़त में जलवा तेरा है। जहां जाईये एक तू रुनुमा²⁰ है॥7॥ जि० Notes: 1 छुपा हुआ, 2 ज़ाहिर, व्यक्त, 3 लहरों, तरंगों, 4 आवाज़, 5 बिजली की गरज, 6 रोशनी, 7 विजली, 8 इन्द्र धनुप, 9 तेज, चमक, 10 भरपूर, 11 देश, काल, 12 प्रकाश, तेज, 13 सब स्थान, 14 अग्नि के पर्वत से अभिप्राय है, 15 सुन्दर पुरुष, 16 सौन्दर्यता और नज़रा, हाव भाव, 17 भक्त जन, 18 भक्ति व विश्वास, निश्चय और अन्तःकरण की शुद्धि, 19 रंग और पारमार्थिक प्रेम, 20 सामने हाज़िर।

( 152 ) राम-वर्षा मक़ां तेरा-हर एक पे लामकां¹ है। निशां हर जगह तेरा ऐ बे निशां है॥ न ख़ाली ज़मीं है न ख़ाली ज़मां² है। कहीं तू निहां³ है कहीं तू अयां⁴ है॥8॥ जि०॥ तेरा लामकां नाम जेबा⁵ नहीं है। मकां कौम खा है तू जिस जा⁶ नहीं है कहीं मासिवा⁷ मैंने देखा नहीं है। मुझे ग़ैर⁸ का वेह्म होता नहीं है॥9॥ जि० ज़मीं-ओ-ज़मां नूर से हैं मुनव्वर⁹। मकीं-ओ-मकां ज़ात के तेरे मज़्हर¹⁰॥ जहां में दिले-रास्ता¹¹ है तिरा घर। इधर और उधर से मैं इस घर में आकर॥10॥ जि० [ 168 ] राग गारा, ताल दादरा हर आन में हर बात में हर ढँग में पहचान। आशिक़ है तो दिलबर को हर इक रंग में पहचान॥ टेक तनहा न उसे अपने दिले-तंग में पहचान। हर बाग़ में हर दश्त¹² में हर संग में पहचान॥ Notes: 1 देश रहित, 2 काल, 3 छिपा हुआ, 4 प्रकट, व्यक्त, 5 युक्त, उचित, 6 जगह, स्थान, 7 तेरे सिवाय दूसरा, 8 अन्य, 9 प्रकाशमान, 10 तुझे ज़ाहिर करने वाले, 11 सब पुरुषों का दिल, 12 जंगल, वन।

भक्ति (इश्क़) ( 153 ) बेरंग में वारंग में नैरंग¹ में पहचान। हर ताल में हर राग में हर आहंग² में पहचान॥ नित रूप में और हिन्द में और जंग में पहचान। आशिक़ है तो दिलबर को हर एक रंग में पहचान॥1॥ मंज़िलों³ में मुक़ामात⁴ में फ़रसंग⁵ में पहचान। हर राह में हर साथ में हर संग में पहचान॥ हर अज़्म⁶ इरादा में, हर उमंग में पहचान। हर धूप में, हर छुलह में, हर जंग में पहचान॥ हर आन में, हर बात में, हर ढँग में पहचान। आशिक़ है तो दिलबर को हर इक रंग में पहचान॥2॥ हँसता है कोई शाद⁷ किसी का है बुरा हाल। रोता है कोई होके ग़मो-दर्द में पामाल॥ नाचे है कोई शौक़⁸ वजाता है कोई ताल। पहने है कोई चीथड़े ओढ़े है कोई शाल⁹॥ करता है कोई नाज़¹⁰ दिखाता है कोई माल। जब ग़ौर से देखा तो उसी की है यह सब चाल॥3॥टेक॥ [ 169 ] राग भैरवी, ताल 1ज़्ज कहा जो हमने, दर¹¹ से क्यों उठाते हो? कहा कि इस लिये, तुम याँ जो ग़ुल¹² मचाते हो॥1॥ Notes: 1 नाना रंग में, 2 ध्वनि, 3 पड़ावों, 4 स्थानों में, 5 पत्थर, पाषाण, 6 संकल्प, 7 प्रसन्न, 8 आकर्षक मूर्ति, 9 दुशाला, 10 नाज़ नख़रा, 11 द्वारे, 12 शोर।

( 154 ) राम-वर्षा कहा लड़ाते हो क्यों हम से ग़ैरों¹ को हरदम। कहा कि तुम भी तो हम से निगहें² लड़ाते हो॥2॥ कहा जो हाले³-दिल अपना, तो उसने हँस हँस कर। कहा ग़लत है यह बातें जो तुम बनाते हो॥3॥ कहा जताते हो क्यों हमको हर रोज़⁴ नाज़ो-अदा⁵? कहा तुम भी तो चाहत हमें जताते हो॥4॥ कहा कि अर्ज़⁶ करें, हम पे जो गुज़रता है। कहा ख़बर है हमें! क्यों ज़बां पै लाते हो॥5॥ कहा कि रूठे⁷ हो क्यों हम से, क्या सबब इसका। कहा सबब है यही, तुम जो दिल छुपाते हो॥6॥ कहा कि हम नहीं आने के यहां, तो उसने नज़ीर⁸। कहा कि सोचो तो क्या आप से तुम आते हो॥7॥ [ 170 ] राग बिहाग टुक बूझ कौन छिप आया है॥ टेक॥ पंक्तिवार अर्थ। ऐ प्यारे! ज़रा सोच कि अन्दर अपने कौन छुपा हुआ बैठा है। Notes: 1 दूसरा, अन्य, 2 दृष्टि, नज़र, 3 अपने दिल का हाल, 4 प्रति दिन, 5 नज़रे ठज़रे, 6 इच्छा, 7 गुस्से, 8 कवि का नाम।

भक्ति (इश्क़) ( 155 ) इक नुक़ते में जो फेर पड़ा, तब ऐन ग़ैन का नाम धरा। जब नुक़ता दूर किया तब फिर, ऐनही ऐन कहाया है॥1॥टुक० तुसीं इल्म कतावां पढ़दे हो, मुफ़्त¹ में क्यों उलटे माने करदे हो। वे मूजव ऐवें लड़दे हो, केहा उलटा वेद पढ़ाया है॥2॥ टुक० दूई दूर करो कोई शोर नहीं, हिंदू तुरक सभी कोई अन्य² नहीं। सब साध लखो कोई चोर नहीं, घटघटमें आप समाया है॥3॥टुक० (1) एक बिन्दु से ऐन हर्फ़ ग़ैन हो जाता (या ख़ुदा से जुदा हो जाता है) और जब बिन्दु हटा दे तो वही ऐन का ऐन ही रहता है। इससे तात्पर्य कवि का यह है कि ऐ प्यारे! तू तो ईश्वर साफ़ शुद्ध अपने आप है, सिर्फ़ जब अज्ञान या मोह की बिन्दु (पर्दा) तू अपने पर लगा (डाल) लेता है, तो ईश्वर से बन्दा (जीव) बन जाता है। (2) ऐ प्यारे! तुम पुस्तक पोथे बहुत पढ़ते हो और मुफ़्त में आपस में बहुत झगड़ते हो (क्योंकि जितना हम बहिमुख झगड़े लड़ाई अथवा अध्ययन में लगे हैं उतना ही हम अपने असली स्वरुप से बे मुख बैठे हुए हैं), इस वास्ते ऐसे उलटे काम तू क्यों कर रहा है और ऐसी उलटी पढ़ाई क्यों पढ़ रहा है। (3) यह द्वैत तू दूर कर, तुमसे भिन्न कोई हिंदू तुर्क अन्य नहीं है, मुफ़्त में शोर मत कर क्योंकि यह सब तू ही आप है, और सब को साध (उत्तम) देख, क्योंकि तू ही उन सब के घट में (दिल के अन्दर) बस रहा है। Notes: 1 बिना कारण, 2 अन्य, दूसरा।

( 156 ) राम-वर्षा ना मैं मुल्ला ना मैं क़ाज़ी, ना मैं शेख़, सय्यद न हाजी। बुल्लेया शौह नाल लाई वाज़ी, अनहद शब्द कहाया है। टुक० [ 171 ] काफ़ी इश्क़ दी नवीं ऐं नवीं बहार (टेक) जां मैं सबकूँ इश्क़ दा पढ़िया। मसजद कोलों ज्योड़ा¹ डरिया॥ डेरे जा ठाकुर दे वड़िया। जित्थे वजदे नाद हज़ार॥1॥ इश्क़ दी... जां मैं रमज़² इश्क़ दी पाई। मैना तोती मार गवाई॥ अन्दरों बाहिर होइ सफ़ाई। जितवलें³ देखां यारो यार॥2॥ इश्क़ दी... Notes: 1 यात्री (यात्रा करने वाला), 2 प्रगल्भ, श्रौ, 3 जब, 4 पाठ, 5 चित्त, जीव, 6 जिधर।

भक्ति (इश्क़) ( 157 ) हीर¹ रांझे दे हो गये मेले²। भुल्ली होर ढूण्डेन्दी वेले॥ रांझा यार बुक्कल³ विच खेले। खुद न⁴ रही और सुरत संभाल॥3॥ इश्क़ दी... वेद क़ुरान पढ़ पढ़ थके। सजदियां करदियां घिस गये मत्थे॥ ना रब⁵ तीर्थ ना रब मक्के। जिन पाया तिस नूर⁶ जमाल॥4॥ इश्क़ दी... फूक मसले ते⁷ भुन्न सुर लोटा। न फड़ तसबीह आसा सोटा॥ आशक़ कहंदे दे दे होका। तरक हलालों⁸ खा सुरदार॥5॥ इश्क़ दी... उम्र गंवाई विच मसीती। अन्दर भरया नाल पलीती⁹॥ कदे नमाज़ बहुदत¹⁰ न कीती। हुनें¹¹ की करना है शोर पुकार॥6॥ इश्क़ दी... इश्क़ भुलाया सज्दह¹² तेरा। हुन क्यों ऐंवें पावें झेड़ा॥ Notes: 1 एक प्रेमी और प्रीतम का नाम, 2 सुलाक़ात, मिलाप, 3 बगल, 4 नहीं, 5 ईश्वर, 6 प्रकाश स्वरुप, 7 और, 8 जो पशु मुसलमान लोग छुरे से बिस्मिल्लाह के साथ अहिस्ता 2 काटते हैं, उसे हलाल कहते हैं, ऐसे मारे हुए पशु को छोड़ने और मन को मार कर खाने की शिक्षा यहां दी है, 9 मलिन, 10 श्रद्धैत, 11 अब, 12 संध्योपासना वा नमाज़ादि।

( 158 ) राम-वर्षा बुल्लेह हुन्दा चुप बतेरा। पर इश्क़ करेन्दा मारो मार॥7॥ इश्क़ दी... [ 172 ] काफ़ी कहो पर्दा किस तों राखीदा। } टेक क्यों ओहले¹ बैह बैह झाकीदा॥ } पहिलां आपे साजन साजी दा। हुन दसदा² है सबकूँ नमाज़ी दा॥ हुन आया आप नज़ारे नूँ। विच लैला बन बन झाकीदा॥1॥ कहो... शाह शमस³ दी खल्ल लहायो। मंसूर⁴ नूँ चा सूली दबायो॥ ज़करिये⁵ सर कलवत्तर⁶ धरायो। की लेखा रह्या बाक़ी दा॥2॥ कहो० हुन साडे वल्ल धाया है। न रहन्दा छुपा छुपाया है॥ कितें बुल्लेह नाम धराया। विच ओहला रख्या ख़ाकी⁷ दा॥3॥ कहो० Notes: 1 कवि का नाम, 2 श्रोत में, 3 शब्द, 4 बताता है, 5 नाम एक मस्त था, 6 नाम है, 7 नाम है, 8 आरा से सिर कटवायो, 9 हमारी ओर, 10 पंच भौतिक देह।

भक्ति (इश्क़) ( 159 ) [ 173 ] काफ़ी हुन किस थीं आप छुपाईदा, हुन किस थीं आप छुपाईदा। (टेक) कितें¹ मुल्लां हो बुलंदे हो, कितें सन्त फ़र्ज़ दिसेन्दे हो। कितें राम दोहाई दें दे हो, कितें माथे तिलक लगाईदा॥1॥ हुन० 'मैं' मेरी है कि तेरी है, पर अन्त भस्म की ढेरी है। ढेरी भस्म की खेरी है, ढेरी नूँ, नाच नचाईदा॥2॥ हुन० कितें वेसर चूड़ा पाईदा, कितें जोड़ा शान हंडाईदा। कितें आदमहव्वा वलआईदा, कितें मैथों भी भुल जाईदा॥3॥ हुन० बाहर जाहर डेरा पायो, आपे ढौं ढौं ढोल वजायो। जगते अपना आप लखायो², फिर अबदुल्ला दे घर ढाईदा॥4॥ हुन० जो याद तुसांदी करदा है, ओह मोयां तो अग्गे मरदा है। ओह मोया भी तैथों डरदा है, मत मौयां नूँ मार खाईदा॥5॥ हुन० बिंद्रावन में गऊ चरावें, लंका चढ़ के नाद वजावें। मक्के दा बन हाजी आवें, वाह वा रंग वटाईदा॥6॥ हुन० मंसूर तुसां वलें³ आया है, तुसीं सूली पकड़ दबाया है। मेरा वीरैं⁴ न वावलें जाया है, तुसां ख़ून देयो मेरे भाई⁵ दा॥7॥ हुन० Notes: 1 कहीं, 2 समझायो, दर्शायो, पहचान करायी, 3 तुम्हारी तरफ़, 4 भाई, 5 क्या पिता का पुत्र।

( 160 ) राम-वर्षा बुल्लाहें¹ शौ हुनैंसहीसंझातेहो, हर सूरत नाल पछाते हो। कितेआतेहो कितेजातेहो, हुन मैथों भुल न जाईदा॥8॥ हुन० [ 174 ] काफ़ी इल्मों वस करीं ओ यार। इक्को अलफ़ तेरे दरकार। (टेक) इल्म न आवे विच शुमार इक्को अलफ़ तेरे दरकार। जांदी उम्र नहीं इतबार इल्मों वस करी ओ यार॥1॥ इके० पढ़ पढ़ इल्म लगावे ढेर क़ुरान किताबां चार² चोफेर³। कर दे चानन विच अन्धेरे⁴ बाहज़ों रहबर ख़बर न सार⁵॥2॥ ढेके पढ़ पढ़ शेख़ मशायख होया भर भर पेट नींद भर सोया। जांदी वार नैन भर रोया डूबा विच उरारें न पार॥3॥ इल्मों० पढ़ पढ़ इल्म होया बोराना⁶ बे इल्मों नूँ लुट लुट खाना। यह की कीता यार! बहाना करे नाहीं कदे इन्कार॥4॥ इल्मों० पढ़पढ़ नक़ल नमाज़ गुज़ारे उचियां बांगा, चांगा मारे। मिम्बर चढ़ के वाज़ पुकारे तैनूँ कीता हिरस⁷ क़रार॥5॥ इल्मों० पढ़ पढ़ मुल्लां होये क़ाज़ी अल्लाह इल्मां बाझों⁸ राज़ो। होवे हिरस दिनों दिन ताज़ी नफ़ा नियत विच गुज़ार॥6॥ इल्मों० Notes: 1 कवि का नाम, 2 सब, 3 चारों तरफ़, 4 अन्धेरा, 5 वार न पर, 6 पथ्रित, 7 लालच, तृष्णा, 8 बिना।

भक्ति (इश्क़) ( 161 ) पढ़ पढ़ मुसल्ले रोज़ सुनावें ख़ाना शक शुभा दा खावें। दस्सें¹ होरैं², ते होर कमावें अंदर खोट बाहिर सच्चयार॥7॥ इल्मों० पढ़ पढ़ इल्म नजूम विचारे गिनदा रासां बुरज सितारे। पढ़े अज़ीमतां, मंत्र झाड़े अवजद गिने तावीज़³ शुमार⁴॥8॥ इल्मों० इल्मों पये कज़िये होर अखीं वाले अन्धे कोर। फंडैं साध ते छोड़ैं चोर दोहीं जहानीं होया ख़्वार॥9॥ इल्मों० इल्मों पये हज़ारों फसते राही⁵ अटक रहे विच रस्ते। मारया वजू होया दिल खस्ते पिया विछोड़ेदा⁶ सर भार॥10॥ इल्मों० इल्मों मियां जी कहावें तम्वा चुकैं चुक⁷ मंडी जावें। धेता ले के छुरी चलावें नाल⁸ कसाइयां बहुत प्यार॥11॥ इल्मों० बहुता इल्म अजाज़ील⁹ पढ़या झुग्गा झांजा उस दा सड़या। गल्ल विच तौक़¹⁰ लानतदा पड़या आख़िर गया वह बाज़ी हार॥12॥ इल्मों जद मैं सबकु इश्क़ दा पढ़या¹¹ दरया देख वहदत¹² दा डरया। घुम्मन घेरां दे विच अड़या शाह अनायत¹³ कीता पार॥13॥ इल्मों [ 175 ] काफ़ी लैली इश्क़ लिया दरगाहों, कपड़े मूल न धोये॥ 1॥ पंक्तिवार अर्थ (1) लैली के भाग्यमें प्रेम था, इस निमित्त उसे कपड़े धोने व रंगने नहीं पड़े। Notes: 1 बताचें, 2 अन्य, 3 टोना, यंत्र, 4 श्र, ह, क, ख, 5 मार्ग चलने वाले, 6 प्यारे का बिरह, 7 उठा उठा कर, 8 साथ, 9 नाम, 10 जंजीर, 11 पाठ, 12 श्रद्धैत, 13 बुल्लाह के गुरु का नाम।

रांझन रांझन हीर कुकेंदी, नैन अंझू भर रोये ॥ 2 ॥ गिरधर कह कह मीरां लुट्टी, राना राज दोनों ही खोये ॥ 3 ॥ शीरीं टुट महल्लों मोई, पते राह सज्जन दे होये ॥ 4 ॥ पढ़ों वग्र करो ते अच्छी, साधो ! रत्नाँ जेहे तो होये ॥ 5 ॥ [ 166 ] ग़ज़ल वही एक शोलहँ है, तुरवतें भी है, और शमाँ-ए-तुरवत भी । मज़ा मरने का कुछ परवानहे-आतँश वज़ां तक है ॥ 1 ॥ Notes: (2) हीर (स्त्री) अपने प्यारे रांके के लिये नेत्रों से अश्रुपात करते हुए स्थान स्थान कूकती फिरी; (3) गिरिधर कहते कहते मीराँ (स्त्री) ने अपना पति (राजा) और राज्य दोनों ही खो दिये। (4) शीरीं (स्त्री) अपने प्यारे फरहाद के लिये महल पर से गिर कर मर गई। इतने मार्ग अपने प्यारे के पाने में उक्त स्त्रियों ने वर्तें। (5) इस से बढ़ कर यदि आप मनुष्य लोग करो तो उत्तम, अन्यथा स्त्रियों के समान तो ऐ साधो ! तुम होवो। पंक्तिवार अर्थ। (1) वही (निज स्वरूप) इस देह रूपी क़बर में ज्योति है, वही यह देह रूपी क़बर भी है, और वही इस क़बर पर दीपक भी है। पर इस ज्योति पर न्योछावर होने का स्वाद अग्नि पर प्राण देने वाले परवाने (पतंगा) तक ही है। अर्थात् मन को इस ज्योति पर न्योछावर वही कर सकता है और वही आनन्द इस यज्ञ से लूट सकता है कि जिसका मन उसके प्रेम में पतंगे के समान हो गया है। 1 लाट, 2 क़बर, 3 क़बर का दीपक, 4 आग पर प्राण देने वाला परवाना।

न सीखी तू ने मुर्गें-रंगे-गुल से रमज़े-आज़ादी। यह क़ैदे-बोस्तां बुलबुल ! ख़्याले-आदयां तक है ॥ 2 ॥ चमन अंफ़रोज़ है सय्याद ! मेरी खुशनवाई तक। रही बिजली की बेताबी, सो मेरे आशयां तक है ॥ 3 ॥ Notes: (2) पुष्प के प्रति प्यारे पक्षी (बुलबुल) से तूने स्वतन्त्रता का रहस्य नहीं सीखा है। वह रहस्य यह है कि बुलबुल बाग़ में क़ैद तब तक होती है जब तक उसे अपना घर (घोंसला) भूले रहता है। घोंसले का ख़याल आते ही बाग़ उससे छूट जाता है, और बाग़ की क़ैद से स्वतन्त्र हो कर वह निज घर में स्थित होती है। इसी प्रकार प्राणी तब तक इस नाम रूप उपाधि में क़ैद रहता है, जब तक वह निज धाम को भूले हुए है। निज धाम वा निज स्वरूप में स्थित होते ही वह इन सब क़ैदों से मुक्त हो जाता है। (3) बुलबुल कहती है कि ऐ शिकारी (पारधी) ! यह बाग़ तो मेरी खुश आवाज़ तक दीप्तमान है। मेरी आवाज़ के बन्द होने पर बाग़ की रौनक़ भी बन्द हो जाती है। और बिजली की बेक़रारी भी मेरे घोंसले तक है। अर्थात् यह पंच भौतिक जगत तो मेरे ही आनन्द से अच्छा लग रहा है। मेरे भीतरी आनन्द के लुप्त होते ही यह जगत भी दुःखरूप हो जाता है। और जब तक निज धाम में स्थिति नहीं होती, तब तक ही विषय-आनन्द की बिजली चमकती रहती है। 1 पुष्प के पक्षी (बुलबुल), 2 बाग़ की क़ैद, 3 घर के ख्याल तक, 4 बाग़ रौशन है, 5 शिकारी, 6 मेरी उत्तम आवाज़ पर।

वह मुश्के-ख़ाक हूँ फैज़े परेशानी से सहरा हूँ। न पूछो मेरी वुसअत की ज़मीं से आसमां तक है ॥ 4 ॥ अरसे हूँ मैं सदा, ख़्वाबीदा है मेरे रगों-पे में। यह ख़ामोशी मेरी वक्ते रहीले-कारवां तक है ॥ 5 ॥ सुकून दिल से सामाने-कशूद कार पैदा कर। कि उक़्दह ख़ातिरे-गिरदाब का आवे-रवां तक है ॥ 6 ॥ Notes: (4) मैं वह सूक्ष्म गंध हूँ कि जो एक स्थान में किसी से क़ैद नहीं हो सकती, बल्कि इसी अत्यन्त सूक्ष्मता और स्वतन्त्रता के कारण मैं जंगलवत सारे बन में फैला हुआ हूँ। और मेरे फैलने वा मेरी व्यापकता की सीमा केवल जंगल तक ही अन्त नहीं होती और न यह पूछो कि इस संसार में मैं कहाँ तक फैला हुआ हूँ, क्योंकि पृथिवी से आकाश तक सर्वत्र मैं ही फैला हुआ (व्यापक) हूँ। अर्थात् यह आत्मा चाहे वह इस मिट्टी के पुतले (भौतिक शरीर) का आत्मा कहलाता है, पर वह केवल इसीका ही आत्मा नहीं है बल्कि इस शरीर के रोमरोम में व्यापक होता हुआ भी अन्य सब शरीरों का आत्मा है, अपनी सूक्ष्मता और अपरिच्छिन्नता वा स्वतन्त्रता के कारण वह सारे जगत में फैला हुआ है, इसलिए उसकी सीमा न पूछी जा सकती है और न कही जा सकती है कि वह कहाँसे कहाँतक है। (5) मैं स्वयं घन्टा (नाद) हूँ और मेरे नस नाड़ी में उसकी आवाज़ सोई हुई है। और यह ख़ामोशी मेरे प्राण रूपी काफ़ले (समुदाय) की कूच (उत्क्रान्ति) तक है। अर्थात् जब तक मन प्राणादि उपाधियों में आसक्त वा अधीन हुआ है, तब तक निज नाद की आवाज़ सुनाई नहीं देती। तब तक प्राण देह के भीतरही धड़कते हुए रहते है। जब यह समुदाय देहत्याग कर चलने लगता है तब वह प्राणध्वनि बाहिर निकलती दिखाई देती है। (6) चित्त की स्थिरता से आत्म-साक्षात्कार का साधन उत्पन्न कर, अर्थात् स्थिर चित्त से साक्षात्कार कर, क्योंकि (घूमन घेर) के भीतर की ग्रन्थि तब तक बनी रहती है जब तक कि पानी चलता रहता है। वहाश्रो के बन्द हो जाने पर भँवर भी स्वतः बन्द हो जाता है। 1 जंगल, 2 सीमा, 3 घन्टा, 4 आवाज़, 5 सोई हुई, 6 नस नाड़ी में, 7 काफ़ले की कूच तक, 8 चित्त की शांति वा स्थिरता से, 9 साक्षात्कार का सामान, 10 रहस्य, 11 भँवर, 12 पानी के चलने तक।

नहीं मिश्नत पज़ोरे-चश्मे, रोना शमा-ए-सोज़ा का। समझ ग़ाफ़िल ! गुदाज़े-दिल में आज़ादी कहाँ तक है ॥ 7 ॥ जवानी है तो ज़ौक़े-आरज़ू भी लुत्फे-अरमां भी। हमारे घर की आवादी क़यामे-मेहमाँ तक है ॥ 8 ॥ [ 167 ] राग खमाज, ताल दादरा एक ही सागर में कुछ ऐसा पिला दे साक़ियो। वे ख़वर दुन्या व दीन् से तेरा मतवाला तो हो ॥ 1 ॥ हाथ ख़ाली मर्दुमें-दीदह खुतों से क्या मिलें। मोतियों की पलखे-मयगाँ में इक माला तो हो ॥ 2 ॥ Notes: (7) जलते दीपक का रोना अर्थात् पिघलना वा चमकना नेत्र पर उसकी कृतज्ञता नहीं है। ऐ अज्ञानी ! तू समझ कि दिल के पिघलने की सीमा कहाँ तक है। अर्थात् दिल के पिघलते पिघलते यदि आत्म-साक्षात्कार हो जाय तो उसका पिघलना सफल, अन्यथा कितनाही क्यों न पिघले, वह सब निष्फल है; ऐसेही नेत्र खुले हों तो दीपक का जलना सफल, अन्यथा सब निष्फलहै। (8) अगर जवानी (यौवन) है तो उसके मिलाप की इच्छा का स्वाद भी है और हमेशा का आनन्द भी है, और जीव रूपी अतिथिके रहने तक ही हमारे इस देह रूपी घर की आबादी है। पंक्तिवार अर्थ। (1) ऐ सद्गुरो ! एक ही प्याले में अर्थात् एक ही वाक्य में मुझे आप ऐसा प्रेमरस वा ज्ञानरस पिला दें कि जिस के पी जाने से दीन दुनिया से तो बेख़बर हो जाऊँ और केवल आप का मतवाला हो जाऊँ। (2) खुले नेत्र वालों (ज्ञान वानों) से खाली हाथ भला कैसे मिलें, पहिले नेत्रों की पलकों के पक्षमें अश्रुरूपी मोतियों की एक सुन्दर रमाला तो पास हो। अर्थात् पहिले नेत्रों में प्रेम वा भक्ति के अश्रुरूपी मोती तो टपकते हों। 1 नेत्र की कृतज्ञता, 2 जलते दीपक का रोना, 3 अतिथि के रहने तक, 4 प्याला, 5 प्रेम रूपी मदिरा पिलाने वाला, सद्गुरु, 6 खुले नेत्र वाले अर्थात् अनुभवी पुरुष (ज्ञानवान्), 7 नेत्रों के पलकों के हाथ में।

नाखुने-ख़ार आके ख़ुद उक़दह तिरा कर देगा वो। पहिले पाएं-शौक़ में पैदा कोई छाला तो हो ॥ 3 ॥ [ 168 ] राग देश, ताल तीन देखा न शबे जो यार को नूरे-दयों से कार क्या। मुर्दह की क़बरे-तारे को आवो-गियाह से कार क्या ॥ 1 ॥ अच्छी है आहे-सर्द ही, ख़ूब है रंगे-ज़र्द ही। ठीक है दिल में दर्द ही, हम को दवा से कार क्या ॥ 2 ॥ Notes: (3) पाँव का काँटा निकालने का जो नाख़ुनगीर होता है ऐसा नाख़ुन रूपी गुरु स्वयं आकर तेरे हृदय की ग्रन्थी खोल देगा। परन्तु पहिले तेरे जिज्ञासा रूपी पाँव में कोई छाला (तीव्र इच्छा) तो हो जिसके दूर करने के लिये काँटे की ज़रूरत पड़ती है। पंक्तिवार अर्थ। (1) रात को जब अपना प्यारा नहीं देखा तो प्रकाश की ज्योति या दिन के प्रकाश से क्या मतलब ? अर्थात् जब इस अज्ञान रूपी माया के परदे में अपना स्वरूप अनुभव नहीं कर सके, तो यह भौतिक प्रकाश किस काम का ! और इसी प्रकार मरे हुए प्राणी की अन्धेरी क़बर (समाधि) पर जल और घास किस काम का ? (2) उस (निजस्वरूप) के देखने के लिये जो चित्त से सर्द वहूँ उठ रही हैं वे उत्तम हैं, जो रंग पीला पड़ रहा है वह अच्छा है, और दिलमें जो पीड़ा उठ रहा है वह सब ठीक है। ऐसी दशा में औषधि से क्या प्रयोजन ? 1 हृदय-ग्रन्थि, रहस्य, 2 खोल देगा, 3 जिज्ञासा रूपी पाँव में, 4 रात, 5 दिन का प्रकाश या प्रकाश की ज्योति, 6 अन्धेरी क़ब्र, 7 जल घास, 8 क्या मतलब।

चाहे कोई भला कहे, ख़्वाह पड़ा बुरा कहे। पल्ला छुटा जो जिस्म से, बीमो-रजा से कार क्या ॥ 3 ॥ अहसक़-कोर ही को है, वलफ़ते-मासिवाये-हक़। काचा प-दिल में यह जनौं, वूए-वफ़ा से कार क्या ॥ 4 ॥ नेकी बदी खुशी ग़मी ज़ीनहूँ थीं वामे-यारैं का। ज़ीनह जिलादो अब यहाँ पाँयों-वियां से कार क्या ॥ 5 ॥ इतना लिहाज़ कर लिया, दुनिया तिरा परे भी हट। नाचूँ हूँ साथ राम के शमों-हया से कार क्या ॥ 6 ॥ Notes: (3) चाहे कोई अच्छा कहे और चाहे कोई बुरा कहे। इस शरीर से हमारा सन्बन्ध वा पल्ला जब छूट गया तो अब भय और आशासे क्या मतलब ? (4) आत्म-ज्ञान से विमुख वा भीतरी-नेत्र-विहीन (ऐसे अन्धे) को ही अपने प्यारे से इतर अर्थात् अनात्म पदार्थों से प्रीति होती है, हाय ! हृदय रूपी मन्दिर में यह व्यभिचार, ऐसे व्यभिचारी को वफ़ा की गन्ध (प्रतिज्ञा पूर्ति) से क्या मतलब ? (5) पुण्य-पाप, सुख-दुःख, ये सब अपने प्यारे (स्वरूप) की छत पर चढ़ने की सीढ़ी थे। पर इस सीढ़ी को जला दो, क्योंकि आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में ऐसी सीढ़ी से क्या प्रयोजन ! अथवा जब साक्षात्कार हो गया तो उस अवस्था से नीचे उतारने वाली सीढ़ी से अब क्या मतलब ? (6) ऐ दुनिया ! तेरा इतना लिहाज़ (सन्मान) तो कर लिया, अर्थात् हम से परे हट। अब तो हम अपने प्यारे (राम) के साथ नाच रहे हैं, अब संसार की लज्जा और अपयश से क्या मतलब ? 1 भय और आशा, 2 अन्धे व अज्ञानी को, 3 आनात्म पदार्थ से प्रीति, 4 हृदय रूपी मन्दिर, 5 व्यभिचार, 6 सीढ़ी, 7 अपने प्यारे की छत पर चढ़ने की, 8 पौड़ियाँ से या सीढ़ी से क्या मतलब।

[ 179 ] राग पहाड़ी, ताल चलन्त फ़ना है सब के लिये मुझ पे कुछ नहीं मौक़ूफ़। यही है फ़िक्र कि अकेला रहेगा तू वाक़ी ॥ 1 ॥ कूएँ में क़ैद हुए जबकि हज़रते-यूसुफ़। रही न इश्क़ मज़ाज़ी की आबरू बाक़ी ॥ 2 ॥ ज़वहें करे है परों को तो खोल दे सय्याद। कि रह न जाय तड़पने की आज़ू बाक़ी ॥ 3 ॥ गले लिपट के जो सोया वह रात को गुलरुख़। तो भीनी भीनी महीनों रही है बू बाक़ी ॥ 4 ॥ लगा न रहने दे झगड़े को यार तू बाक़ी। हक़े न हाथ है जब तक रगे-गलू बाक़ी ॥ 5 ॥ [ 180 ] करनी का ढंग निराला है, करनी का ढंग निराला है। टेक। कोई दिगम्बर, कोई पीतम्बर, कोई पहने शाल दुशाला है॥ Notes: 1 नाश, अन्त, 2 क़तल करना, हलाल करना, मारना, 3 शिकारी, यहाँ प्रीतम प्यारे से मतलब है, 4 पुष्पवत् सुन्दर प्यारा, 5 गले की रग व नाड़ी।

कोई अवधूत, कोई संन्यासी, कोई गड़रिया ग्वाला है। कोई अन्धा कोई लूला लंगड़ा, कोई गोरा कोई काला है॥ कोई भूखा प्यासा व्याकुल है, कोई मद पी पी मतवालो है। कोई मदकी भंगों चरसी है, कोई पीवे प्रेम-प्याला है॥ जब तक फिरे न मन का मनका, क्या तसबीह क्या माला है। निस दिन भजे जो हरि को 'अमीचंद', सोई करनी वाला है॥ [ 181 ] प्रभु ! तुम कैसे दीन दयाल ( टेक ) मीन रहे पानी के भीतर, पशु फिरें धरती के ऊपर। पक्षी उड़ें हवा के अन्दर, सब के तुम रखवाल ॥ 1 ॥ अजगर नहीं किसी के चाकर, पंछी काम करें नहीं मिल कर। मनुष्य जाति का तुम पर निर्भर, सब के तुम प्रति पाल ॥ 2 ॥ चार पदारथ के तुम दायक, प्रतिपालक, सब विधि सहायक। हे स्वामी नायकन के नायक ! तुम सम कौन कृपाल ॥ 3 ॥ दया दृष्टि करुणा निधि कीजे, माया मोह कपट हर लीजे। भक्ति दान मेहर को दीजे, होय अत्यन्त निहाल ॥ 4 ॥

[ 182 ] राग माँझ (महल्ला 5) हरि को नाम सदा सुख दाई। ( टेक ) जा को सिमर अजामल उधरयो, गणिका हूँ गति पाई ॥ 1 ॥ पंचाली को राज सभा में राम नाम सुधि आई। ताको दुःख हरयो करुणामय, अपनी पैज बढ़ाई ॥ 2 ॥ जे नर यश-कृपा-निधि गायो, ता को भयो सहाई। कहो नानक मैं यही भरोसे, गही आन शरणाई ॥ 3 ॥ [ 183 ] राग कानड़ा (महल्ला 5) बिसर गई सब तातँ पराई, जब ते साधसंगत मैं पाई ॥ 1 ॥ ना कोई वैरी. नहीं बेगाना, सकल संग हम को बन आई ॥ 2 ॥ जो प्रभु कीनो, सो भलँ मान्यो, यह सुमति साधु ते पाई ॥ 3 ॥ सब में रम रह्या प्रभु एके, पेख पेख नानक विगसाई ॥ 4 ॥ [ 184 ] राग सारंग (मुहल्ला 5) ठाकुर तुम शरणाई आया ( टेक ) उतर गया मेरे मन का संशय, जव से दर्शन पाया ॥ 1 ॥ Notes: 1 कल्याण को प्राप्त हुआ, तरा, 2 वेश्या का नाम, 3 द्रौपदी, 4 कीर्ति महिमा, 5 पकड़ी, ग्रहण की, 6 उस प्रभु की, 7 इच्छा पराई, 8 भला, अच्छा, 9 आनन्द हुआ।

अन बोलत मेरी विरथा जानी, अपना नाम जपाया। दुःख नाठे सुख सहज समाये, अनन्द अनन्द गुणगाया ॥ 2 ॥ बाँह पकड़ कढ़ लीनो अपने, गृह अन्ध कूप से माया। कहो नानक गुरु बन्धन काटे, विछरत आन मिलाया ॥ 3 ॥ [ 185 ] राग वसन्त (महल्ला 1) माई ! मैं धन पायो हरि नाम ( टेक ) मन मेरो धावनैं से छूटियो, कर बैठो विश्राम ॥ 1 ॥ माया ममता तन से भागी, उपज्यो निर्मल ज्ञान। लोभ मोह यह परसैं न साके, गही भक्ति भगवान ॥ 2 ॥ जन्म जन्म का संशय चूका, रत्न नाम जब पाया। तृष्णा सकल विनासी मन से, निज सुखमाँहि समाया ॥ 3 ॥ जाको होत दयाल कृपा निधि, सो गोबिंद गुण गावे। कहो नानक यह विधिं की सपें, कोऊ गुरमुख पावे ॥ 5 ॥ [ 186 ] राग बिलावल (महल्ला 1) प्रभुजी तू मेरे प्राण अधारे ( टेक ) नमस्कार डन्डौत बंदना, अनिक वार जाऊँ वारे ॥ 1 ॥ Notes: 1 दशा, 2 भागे, 3 दौड़ने, भटकने, 4 स्पर्श न कर सके, 5 ग्रहण की, 6 सारी, 7 इस प्रकार की, 8 सम्पत्ति, 9 प्राण का आधार, 10 अनेक वार।

उठत बैठत सोवत जागत, यह मन तुझे चितारे। सुख दुःख इस मन की विरथा तुझ ही आगे सारे ॥ 2 ॥ तूं मेरी ओटैं बल बुध धन तुम्ही, तुम ही मेरे परवारे। जो तुम करो सोई भलँ हमरे, पेख नानक सुख चरणारें ॥ 3 ॥ [ 187 ] राग सूही (महल्ला 2) कोई आन मिलावे जी, मेरा प्रीतम प्यारा। हौं तिस पै आप वचाईं ॥ दर्शन हरि-देखन के ताईं ॥ 1 ॥ ( टेक ) कृपा करे ताँ सतगुरु मेले॥ हर हर नाम ध्याई ॥ 2 ॥ जे सुख दें ताँ तुझे अराधों। दुःख भी तुझे ध्याई ॥ 3 ॥ जे मुख दे ताँ इतें ही राजी। दुःख विच सुख मनाई ॥ 4 ॥ तन मन काट काट सब अर्पों। विच अग्नि आप जलाई ॥ 5 ॥ Notes: 1 चिन्तन करता रहे, 2 कहानी, गाथा दशा, 3 खोले, सुनावे, 4 आश्रय, 5 भला, कल्याण, 6 देख, 7 तुम्हारे चरणों में, 8 मैं, 9 अर्पण करूँ, 10 इसमें भी।

रखो फेरी, पानी होवाँ¹। जो दैवे सो खाई॥ 6॥ नानक गरीब ढह² पया द्वारे। हरि मेल लेहो, बड़ियाई³॥ 7॥ [ 188 ] (महल्ला 1) चित्त चरण कमल का आश्रा, चित्त चरण कमल संग जोड़िये। मन लोचे⁴ धुरिआइयाँ, गुरशब्दी यह मन होड़िये⁵॥ बांह जिन्हां दी पकड़िये, सिर⁶ दीजे बांह न छोड़िये। गुरु तेगबहादर बोलिया, घर पैये⁷ धर्म न छोड़िये॥ [ 189 ] राग रामकळी (महल्ला 1) साधो! कौन जुगत⁸ अब कीजे। (टेक) जाते⁹ दुर्मति सकल विनासे, राम भक्ति मन भीजे¹⁰॥ 1॥ मन माया में उरझ रह्यो है, बूझे ना कछु ज्ञाना। कौन नाम जग¹¹ जाके¹² सिमरे, पावे पद निरवाना॥ 2॥ Notes: 1 पानी भरूँ, 2 गिर पड़ा, 3 महानता, 4 सोचे, देखे, 5 लगाइये, 6 सिर, 7 अर्पण करे, गिर पड़े, 8 युक्ति, उपाय, 9 जिससे, 10 मन भीग जाय अर्थात् भक्तिमय हो जाव, 11 जगत, 12 जिसके।

भये दयाल कृपाल सन्त जन, तब यह बात बताई। सर्व धर्म मानो तैंहि कीये, जहि प्रभु कीर्ति गाई॥ 3॥ राम नाम नर निशि वासुर¹ में, निमष² एक बरधारे³। जम को त्रास मिटे नानक तैंहि, अपनो जन्म संवारे॥ 4॥ [ 190 ] राग सोरठ (महल्ला 1) प्राणी! कौन उपाय करे। (टेक) जाते भाजि राम की पावे, जम को त्रास⁴ हरे॥ 1॥ कौन कर्म, विद्या कहो कैसी, धर्म कौन पुनि⁵ करे। कौन नाम गुरु जाके सिमरे, भव सागर को तरे॥ 2॥ कलु में एक नाम कृपा निधि, जांहि⁶ जपे गति पावे। और धर्म ताके सम नाहि, यह विधि वेद बतावे॥ 3॥ सुख दुःख रहत सदा निलेंपी, जा को कहत गुसाईं⁷। सो तुम ही में बसे निरन्तर, नानक दर्पण न्याईं⁸॥ 4॥ [ 191 ] हरि की गति नहीं कोई जाने। (टेक) योगी, यती, तपी, पच हारे, अरु बहु लोग स्याने॥ 1॥ Notes: 1 दिनरात, 2 पलक मात्र, 3 हृदय में धारणा करे, 4 भय, 5 क्रमकर, 6 जिससे, 7 भय, 8 कलियुग

अपनी माया आप पसारे, आपे देखनहारा। नाना रूप धरे बहु रंगी, सब से रहत न्यारा॥ 2॥ हरि० अमित, अपार, अलख, निरंजन, जिन सब जगत भरमाया। सकल भरम त्यज नानक, मैं तो चरण ताहि चित्त लाया॥ 3॥ [ 192 ] ऊधो! सो मूरत हम देखी। (टेक) शिव सनकादिक सकल मुनि दुर्लभ, ब्रह्मा¹ इन्द्र नहिं पेखी॥ 1॥ खोजत फिरत जुगो जुग योगी, योग युक्ति से न्यारी। सिद्ध समाधि सकत नहिं दर्शी, मोहिनी मूरत प्यारी॥ 2॥ निगम अगम हो विमल यश गावें, रहत सदा दरबारी। तिलभर पारावार² नहिं पावें, कह कह नेति³ पुकारी॥ 3॥ नाथ, यति और योगी, जंगम, ढूँढ रहे बन माहीं। वेप धरे धरती भ्रम हारे, तिनहूँ⁴ दर्शी नाहीं॥ 4॥ सो हम घर घर नाच नचाई, तनक तनक दधि⁵ देखे। रामदास हम रति श्यामरंग, जाहो योग घर ले के॥ 5॥ [ 193 ] ऊधो! कर्मन की गति न्यारी। (टेक) सर्व नदियाँ जल भर भर वहियाँ, सागर किस विधि खारी⁶॥ 1॥ Notes: 1 ब्रह्मा इन्द्र आदि, 2 पता, अन्त, 3 यह नहीं, यह नहीं, इस प्रकारका वाक्य जो उपनिषदों में आया है, उससे यहाँ अभिप्राय है, 4 उन्हों भी दर्शन नहीं हुए, 5 दही, 6 मीठे जलकी सब नदियां तो समुद्रमें गिरती हैं पर समुद्र कैसा खारी है।

उज्वल पंख दिये बगुले को, कोयल² कित¹ गुणकारी। सुन्दर नयन मृगा को दीने, वन वन फिरत उजारी³॥ 2॥ मूरख मूरख राजे कर दीने, पंडित फिरैं भिखारी। सूरदास⁴! प्रभु मिलवे की आशा, छिन छिन वीतत भारी॥ 3॥ [ 194 ] सब दिन होत न एक समान। (टेक) इक दिन राजा हरिश्चन्द्र की सम्पति मेरु⁵ समान। इक दिन जाय श्वपच⁶ गृह सेवत, अम्बर हरत⁷ मशान⁸॥ 1॥ इक दिन राजा राज युधिष्ठिर, अनुचर श्रीभगवान्⁹। इक दिन द्रौपदी नग्न होत है, वीर दुःशासन तान॥ 2॥ इक दिन सीता रुदन करत है, महा विपत¹⁰ उद्यान। इक दिन राम चन्द्र मिल दोऊ, विचरत पुष्प विमान॥ 3॥ परकटत है पूर्व की करनी, त्यज मन शोक अजान! सूरदास गुण कहाँ लग वर्णौं, विधि¹¹ के अनक प्रमाण॥ 4॥ Notes: 1 किस कारण, 2 काली है, 3 उजाड़ वनों में वह फिरता है, 4 कवि सूरदास से अभिप्राय है, 5 मेरु पर्वत, 6 भक्तिके घर सेवक, 7 वस्त्र उतारता है, 8 शमशान में, 9 एक दिन राजा युधिष्ठिर के अनुचर श्रीकृष्ण भगवान् थे, 10 बड़े भय और विपत्ति पूर्ण वन, 11 जिस विधि भाग्य में लिखा है उस विधि के अनक प्रमाण हैं।

[ 195 ] प्रभु! तुमरी गति कहत न आवे। (टेक) ज्यों गूंगा मीठे फल का रस अन्तर्गत ही खावे॥ 1॥ परम स्वाद सब ही जो निरन्तर, अमित¹ तोषै² उपजावे। मन वाणी को अगम अगोचर, सो जाने जो पावे॥ 2॥ रूप रेख गुण जाति जुगति विन, निरालम्ब मन ध्यावे। सब विधि अगम विचार ही ताते, सूरदास क्या गावे॥ 3॥ [ 196 ] प्रभु जी! मन मायावश कीनो। (टेक) लाभ हानि कछु समझत नाहीं, ज्यों पतंग तन दीनो॥ 1॥ गृह दीपक, मन तेल, तूल³ तिय⁴, सुत⁵ ज्वाला अतिज़ोर। मैं मति हीन मरम नहीं जानों, पड़ों अधिक गिरि दौड़⁶॥ 2॥ बहुतकँ⁷ दिवस भये या जग में, भ्रमत फिरे मतिहीन। सूर श्याम सुन्दर जो सिमरे, क्यों होवे गतिदीन॥ 3॥ [ 197 ] अब मोरी राखो लाज हरी! (टेक) तुम जानत सब अन्तर्यामी, करनी कछु न करी॥ 1॥ Notes: 1 अगाध, अनन्त, 2 तुष्टि, सन्तोष, 3 रुई की बत्ती, 4 स्त्री, 5 पुत्र, 6 दौड़ दौड़ कर उस ओर अधिक गिर पड़ता हूँ, 7 बहुत से।

अवगुण मों¹ सों बिसरत नाहीं, पल छिन घड़ी घड़ी। जग प्रपंच की पोट बांध कर, अपने सीस धरी॥ 2॥ दारा धन सुत मोह समुन्दर, सुध बुध सब बिसरी। सूर पतित को बेग² उबारो, नठ्या³ जात भरी॥ 3॥ सोई अब कीजिये दीन दयाल। (टेक) जाते मैं क्षण चरण न छोड़ूं, करुणासागर भक्ति रिसाल॥ 1॥ इन्द्रिय अजितें, बुद्धि विषयारतें⁴, मन की दिन दिन उलटी चाल। काम, क्रोध, मद, लोभ, महाभयं, निशदिन नाथ भ्रमित बेहाल॥ 2॥ योग, यज्ञ, जप, तप, तीर्थ, व्रत, इन में एक हू अंग⁵ न भाळ। कहा करूं, कैहूँ⁶ भाँत रिझाऊं, तुम को हे कृपाल॥ 3॥ तुम समर्थ सर्वज्ञ कृपानिधि, अशरण शरण हरन जग जाल। कृपा निधान सूर की यह गति, कासों⁷ कहे कृपण यह काल॥ 4॥ [ 199 ] प्रभु जी! मेरे अवगुण चित न धरो। (टेक) समदर्शी प्रभु नाम तिहारो⁸, चाहो तो पार करो॥ 1॥ Notes: 1 मुझसे, 2 संसार समुद्र के वेग से अभी मुझे तारो, अथवा संसार समुद्र से जल्दी तारो, 3 जीती नहीं गई, 4 प्रबल, विषयों में फंसी हुई, 5 एक भी साधन रुप अंग अपने भाग्य में नहीं आया, जन्ममरण, 6 भाग्य, कृपाल, जलाट, 7 किस रीति से, 8 आपका।

इक नदिया, इक नाले कहावत, मैलो ही नीर¹ भरो। जब मिल कर एक भई वर्णता², सुरसरि³ नाम पड़ो॥ 2॥ इक लोहा पूजा में राखो, इक गृह वधिक⁴ पड़ो। गुण अवगुण पारस नहीं जाने, कञ्चन करत खरो॥ 3॥ यह माया भ्रम जाल निवारो, सूर⁵ श्यामें लगरो। शव की वेर प्रभु मोको भी तारो, नहीं प्रण जात टरो⁶॥ 4॥ [ 200 ] जिनके हृदय हरि नाम बसे, तिन और का नाम लिया न लिया। जिनके मन प्रभु के रंग रंगे, तिन तन का वस्त्र सिया न सिया॥ 1॥ जिनके घर एक सुपूत जिया⁷, तिन लाख कुपूत जिया न जिया। जिनके द्वारे पर गंग बहे, तिन कूप का नीर⁸ पिया न पिया॥ 2॥ जिन बात करी परमार्थ की, तिन हाथ से दान दिया न दिया। तुलसी जिन चरण गहे⁹ हरि के, तिन अन्य देव सिया न सिया॥ 3॥ [ 201 ] राग खमाच, ताल ठुमरी तुहीं है, मैं नाहीं वे लजनां¹⁰! तुहीं है, मैं नाहीं (टेक) जां¹¹ लोवां, तां¹² तू नाले¹³ सोवें, जां वछ्ला¹⁴, तां तू राही¹⁵॥ तू01 Notes: 1 जल, 2 एक रंगी, 3 गंगा, 4 कसाई, 5 कवि का नाम, 6 टूटे जाता है, 7 जन्म लिया, 8 जल, 9 पकड़े या चरण सेवा की, 10 ऐ प्यारे, 11 जब, 12 तब, 13 साथ, 14 जब चलने लगूं, 15 तब तू रास्ते में साथ होता है।

जां बोला तां तू नाले बोलें, चुप करां, मन गाँहीं¹॥ तू० 2 सहक² सहक के मिलिया दिलबर, जिंदड़ी³ घोल गंवाई॥ तू० 3 [ 202 ] राग सोहनी जो दिल को तुम पर मिटा चुके हैं, मज़ाके-उल्फ़त⁴ उठा चुके हैं। वह अपनी हस्ती⁵ मिटा चुके हैं, ख़ुदा को ख़ुद ही में पा चुके हैं॥ 1॥ न सूये-काबा⁶ झुकाते हैं सर, न जाते हैं बुतकदा⁷ के दर⁸ पर। उन्हें हैं दैरो-हरम⁹ बराबर, जो तुम को क़िबला¹⁰ बना चुके हैं॥ 2॥ न हमसे प्यारे! छुड़ाओ दामान, न देखो बारी-वहारी-रिज़वां¹¹। कब उनको प्यारे हैं हूरो-गिलमां¹², जो तुम को प्यारा बना चुके हैं॥ 3॥ सुना रही है यह दिल की मस्ती, मिटा के अपना वजूदे-हस्ती¹³। Notes: 1 चुप होऊँ तो तू मन भीतर होता है, 2 तड़प तड़प के, 3 जान, उसी के पाने में या समर्पने में खो दी, 4 प्रेम का स्वाद, छुटफ़ वा प्रेमानन्द, 5 जीवन, अस्तित्व, 6 काबा (ईश्वर के घर) की ओर, 7 मन्दिर, 8 द्वार, 9 मन्दिर, मसजिद, 10 काबा वा इष्टदेव, 11 पहला, 12 स्वर्ग, 13 अप्सराओं और दास (लौंडे), 14 जीवन या प्राण की स्थिति।

मरेंगे यारो! तलब¹ में हक़² की, जो नामे-तालिब³ लिखा चुके हैं॥ 4॥ न बोल सकते थे कुछ ज़ुबां से, न याद उनको है जिस्मो-जां⁴ से। गुज़र गये हैं वह हर मकां से, जो उसके कूचे⁵ में आ चुके हैं॥ 5॥ गर और अपना भला जो चाहो, यह राम अपने से कह सुनाओ। भला रखो या बुरा बनाओ, तुम्हारे अब हम कहा चुके हैं॥ 6॥ Notes: 1 जिज्ञासा, 2 सत्य स्वरूप, अपने प्यारे की, 3 जिज्ञासु का नाम, 4 बेहद-प्राण, 5 स्थान, हद, सीमा।