श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

आत्मज्ञान

भाग 7-9 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 7-9 · अध्याय 6 / 14

आत्मज्ञान

[ 203 ] ☼ राग काफ़ड़ा, ताल मुगलई ☼ [ छान्दोग्योपनिषद् के एक श्लोक का भावार्थ ] कफ़स¹ एक था आईनों² से बना। लटकता गुले-ताज़ह³ मरकज़⁴ में था॥ 1॥ था फूल एक, पर अक्स⁵ हरतर्फ़ थे। थे माशूक़ सब बुलबुले-बन्दे⁶ के॥ 2॥ गुले-अक्स⁷ की तर्फ़ बुलबुल चली। चली थी न दम भर कि ठोकर लगी॥ 3॥ Notes: 1 पिंजरा, 2 शीशों, 3 ताज़ाह पुष्प, 4 बीच में, वा केन्द्र में, 5 प्रतिबिम्ब, क़ैद वा घिरा हुआ पक्षी (बुलबुल), 7 पुष्प का प्रतिबिम्ब।

जिसे फूल समझी थी साया ही था। यह झपटी तो तड़ शीशा सिर पर लगा॥ 4॥ जो दायें को झांकी वही गुल मिला। जो बायें को दौड़ी यही हाल था॥ 5॥ मुक़ाबल उड़ी मुँह की खाई वहाँ। जो नीचे गिरी चोट आई वहाँ॥ 6॥ क़फ़स के था हर सिम्ते¹ शीशा लगा। खिला फूल था वस्ते² में वाह वा॥ 7॥ उठा सिर को जिस आन³ पीछे मुड़ी। तो खन्दा⁴ था गुल आँख उससे लड़ी॥ 8॥ झिझकते लगी अब भी धोका न हो। है सचमुच का गुल तो फ़क़त⁵ नाम को॥ 9॥ चली आख़िरश⁶ करके दिल को दिलेर। मिला गुल, लगी इक न दम भर की देर॥ 10॥ मिला गुल, हुई मस्तो-दिलशाद थी। क़फ़स था न शीरो वह आज़ादे⁷ थी॥ 11॥ यही हाल इन्सान! तेरा हुआ। क़फ़स में है दुनिया के घेरा हुआ॥ 12॥ Notes: 1 प्रत्येक ओर, 2 मध्य, 3 जिस समय, 4 खिला हुआ, 5 केवल, 6 अन्त में, 7 स्वतंत्र, प्रसन्न।

भटकता है जिसके लिये दर बदर । वह आराम है कल्ब में जह्वागरै ॥ 13 ॥ [ 204 ] ❀ ग़ज़ल, राग पीलू ❀ पड़ी जो रही एक मुद्दतें ज़ख़्मी में । छुरी तेज़ आहनैं की मिट्टी ने खाई ॥ 1 ॥ करे काटना फाँसना किस तरह अब । ज़ख़्मी से थी निकली, ज़ख़्मी ने मिलाई ॥ 2 ॥ हुआ जब ज़ख़्मी ख़ुद यह लोहा तो बस फिर । न आतश रही सिर पै नैं चोट आई ॥ 3 ॥ छुरी है यह दिल, इसको रहने दो बे ख़ुद । यहाँ तक कि मिट जाय नामे-जुदाई ॥ 4 ॥ पड़ा ही रहे ज़ाते-मुतलक़ में बेख़ुद । ख़बर तक न लो, है इसी में भलाई ॥ 5 ॥ मेरा तेरा का चीरना फाड़ना सब । उड़े हो दुई की न मुतलक़ समाई ॥ 6 ॥ न ग़ुस्ला जलाये, मुनीवत की नै चोट । मिटे सब तअल्लुक़, खुदाई, खुदाई ॥ 7 ॥ Notes: 1 भीतर दिलमें, 2 प्रकाशमान, 3 समय, काज, 4 लोहा, 5 श्रम्, 6 नहीं, 7 तत्व स्वरूप, नितान्त अर्थात् किंचित् भी समाई न हो, 8 सम्बन्ध।

जिसे मान बैठे थे घर यार! भाई । वह घर से भुलाने की थी एक फाई ॥ 8 ॥ भुला घर को मंज़िलों में घर कर लिया जब । तो निज बादशाही की कर दी सफ़ाई ॥ 9 ॥ हवा के बगोलों से जब दिल को बाँधा । छुटी ना उमेदी की मुँह पर हवाई ॥ 10 ॥ केवल, मरदुमे-चश्मैं, सूरज, वते-आबैं । तअल्लुक़ की आलूदगी थी न राई ॥ 11 ॥ जो सच पूछो सैरो-तमाशा भी कब था । न थी दूसरी शय, न देखी दिखाई ॥ 12 ॥ थी दौलन की दुनिया में जिसकी दुहाई । जो खोला गिरहैं को तो पाई न पाई ॥ 13 ॥ किये हर सेहैं हालत के गरचिह नज़ारे । वले 'राम' तनहा था मुतलक़ अकाई ॥ 14 ॥ [ 205 ] ❀ राग तिलंग, ताल केरवा ❀ कहाँ जाऊँ! किसे छोड़ूँ? किसे ले लूँ! करूँ क्या मैं?। मैं इक तूफ़ाँ क़यामत का हूँ, पुर हैरत तमाशा मैं ॥ 1 ॥ Notes: 1 फाँस, बंधन वा फंद, 2 मार्ग, पड़ाव, 3 नेत्र की पुतली, 4 जल में रहनेवाली बतख़, 5 आलेप, लेश, 6 वस्तु, 7 शोर, पुकार, 8 गाँठ, 9 एक पैसे का तीसरा भाग, 10 तीनों अवस्था, 11 किंतु, 12 अकेला, 13 एकमेवाद्वितीयं, 14 आश्चर्य भरा दृश्य।

मैं बातन, मैं अज़ाँ, हेरो-जवर, चप-रास्त, पेशो-पस । जहाँ मैं, हर मक़ाँ मैं, ज़माँ हूँगा, सदा था मैं ॥ 2 ॥ नहीं कुछ जो नहीं मैं हूँ, इधर मैं हूँ, उधर मैं हूँ । मैं चाहूँ क्या? किसे ढूँढूँ! सभो में ताना वाना बाना मैं ॥ 3 ॥ वह वहरे-हुस्नो-खूबी हूँ, हुबाब है काफ़ और कैलाश । उड़ा इक मौज से क़तरा, बना तब मिहर आसा मैं ॥ 4 ॥ ज़रो-नेमतैं मेरी किरणों में धोका था सुराब ऐसा । तजल्ली नूर है मेरा कि 'राम' अहमद हूँ ऐसा मैं ॥ 5 ॥ [ 206 ] ❀ प्रश्न ❀ मेरा 'राम' आराम है किस जा! देखकर उसको जी करूँ ठण्डा । क्या वह इस इक शिला पै बैठा है! क्या वह महदूद और यकजा है? । जुमला मोतज़ि चाह क्या चाँदनी में गंगा है, दूध हीरों के रंग रंगा है। साफ़ बातन से आवे-सीमींबर, मीठी मीठी सुरों से गा गा कर। लुत्फ़े-रावी का आज लाती है, यूँ पता 'राम' का सुनाती है॥ Notes: 1 भीतर, 2 बाहर, प्रकट, 3 नीचे ऊपर, 4 बायें, दायें, 5 आगे, पीछे, 6 देश, 7 काल, 8 सुन्दरता का समुद्र, 9 बुलबुला, 10 कोह काफ़ के पर्वत से आशय है, 11 लहर, तरंग, 12 सूर्य जैसा, 13 धन दौलत, 14 मृगतृष्णा का जल, 15 तेजोमय प्रकाश, 16 स्थान, जगह, 17 चित्त, दिल, 18 परिच्छिन्न, 19 एक देशी, 20 भीतर से शुद्ध, 21 चाँदों की सूरतवाला जब, 22 दरिया का नाम है जो लाहौर में बहता है।

[ 207 ] ❀ उत्तर ❀ देखो मौजूद सब जगह है राम, माह बादल हुआ है उसका धाम । बल्कि है ठीक ठीक बात तो यह, उलमें है बूदो-बाशे-आलमे-सेह ॥ वह अमूरत है मूरती उसकी, किस तरह हो सके! कहाँ! कैसी! फ़ुल्लेशैडन मुहीत है आकाश, मूरती में न आ सके परकाश । जो है उस एक ही की मूरत है, जिस तरफ़ झाँकें उसकी सूरत है ॥ [ 208 ] ❀ राग तिलंग, ताल केरवा ❀ उत्तर स्वरूप प्रश्न मस्त ढूँढ़े है होके मतवाला, कुछ पता दो कहाँ है मतवाला । गड्डी करतो फिरे है गड़गड़गड़, "हाय गंगा का पाऊँ क्योंकर सड़!" मुख से घूँघट उठा के वह प्यारा, "खोजता है किधर गया प्यारा?" भाँग पी पी के भँग कहती है, "बूटी शिव की किधर गई है ये!" मस्ती पूछे है मस्त नैनों से, "है कहाँ पर वह नशा के होरे?" रात भर ताकता फिरा तारा, फाड़ आँखों को "है कहाँ तारा!" राम बन बन को छान थक हारा, "मेरा आराम" 'राम' है किस जा? Notes: 1 चाँद, 2 उसमें तीनों लोकों की स्थिति और आश्रय है, 3 समस्त वस्तुओं को घेरे हुए अर्थात् सर्वव्यापक, 4 मस्त, 5 स्थान, जगह।

[ 209 ] ❀ राग भैरवी, ताल पशतो ❀ एक प्यारे के पत्र का उत्तर सरोदो-रक्सो-शादी दम बदम, है, तअल्लुक़ दूर है और ग़म को रम है । अज़ब खूबी है, बेरँ-अज़-रक़म है, यक़ीनन जान तेरी ही क़सम है । मुबारक हो तबीयत का यह खिलना, यह रसभीनी अवस्था जामे-जम है । मुवास्क दे रहा है चाँद झुक कर, सलामों से कमर में उसकी ख़म है । पिये जाओ दमा दम जाम भरकर तुम्हारा आज लाखों पर क़लम है । गुलों से पुर हुआ है दामने-शौक़, फ़लक ख़ेमा है, कैवाँ पर अलम है । Notes: 1 राग-रंग, 2 नाच, 3 तमाशा, खुशी, 4 निरन्तर, 5 सोच, फिक्र, 6 दूर भागा हुआ, 7 वर्णन से बाहर, 8 निश्चय पूर्वक, 9 जमशेद बादशाह का प्याला जिससे मस्ती लाई जाती थी, 10 नमस्कारों, 11 कुबड़ापन, झुकाव, 12 (निजानन्द के) प्याले, 13 पुष्पों से, 14 जिज्ञासा का पहला अर्थात् तीव्र जिज्ञासा, 15 आकाश, 16 मण्डप, तम्बू, 17 शनि-तारा, 18 ध्वजा।

तेरे दीदों पै भूले से हो शबनम, कभी देखा सुना "सूरज पै नम है"! । रखें आगे को क्या क्या हम न उम्मेद, कि मारा गुर्ग-राम, पहिला क़दम है । दिखाया है प्रकृति ने नाच पूरा, सिले में उड़ गई, ऐ है सितम है । ग़लत गुफ़्तम, शिकायत की नहीं जा, मिली आ पुरुष में बदलो करम है । न कहता था तुम्हें क्या 'राम' पहिले! सबाहे-ईद आई, रात कम है । [ 210 ] ❀ राग शंकराभरण, ताल केरवा ❀ जाँ तू दिल दीयाँ चशमाँ खोलें, हू अल्लाहै, हू अल्लाहै बोलें । मैं मौला कि मारें चीख, अल्लाह शाह रग थीं नज़दीक ॥ 1 ॥ (1) यदि तू अपने दिल के नेत्र खोले तो ब्रह्मास्मि, ब्रह्मास्मि स्वतः बोलने लग पड़े और यों पुकार उठे कि "मैं ईश्वर हूँ" और "ईश्वर अपने गले की रग से भी अधिक समीप है" Notes: 1 नेत्रों, 2 शीतलता, उपडक, गीलापन, 3 चिन्ता का भेड़िया, 4 बदले में, 5 आश्चर्य है, ज़ुल्म है, 6 मैंने ग़लत कहा, 7 स्थान, जगह, 8 न्याय और दया (अर्थात् प्रकृति का अपने पुरुषमें लय होना ही ठीक न्याय और भगवत्-कृपा है), 9 आनन्द की प्रभात, 10 जब, 11 नेत्र, 12 मैं ब्रह्म हूँ, शिवोऽहम्।

जाम शराबे-वहदत वाला, पी पी हर दम रहो मतवाला । पी मैं वारी लाके ढीक, अल्लाह शाह रग थीं नज़दीक ॥ 2 ॥ गिरजा, तसवीह, जंजू तोड़ें, दीन दुनी वल्लों मुँह मोड़ें । ज़ात पाक नूँ ला न लीक, अल्लाह शाह रग थीं नज़दीक ॥ 3 ॥ जे तैनूँ राम मिलन दा चा, ला लै छाती लग्गा दा । नाम लोहा दा घरिया पीक, अल्लाह शाह रग थीं नज़दीक ॥ 5 ॥ (2) अद्वैतामृत रूपी शराब के प्याले को ऐ प्यारे! तू घड़ी घड़ी पी कर मस्त हो और एक घूँट में ही इसे पी डाल (और याद रख) कि ईश्वर अपने गले से भी अधिक समीप है। (3) मतभेद के जोश में आकर जो तू गिरजा, माला और यज्ञोपवीत तोड़ता है, उससे तू दीन और दुनिया से मुख फेरता है, अर्थात् तू लोक परलोक से गिरता है। ऐ प्यारे! अपने शुद्ध पवित्र स्वरूप को धब्बा मत लगा और याद रख कि ईश्वर गले से भी अधिक समीप है। (4) यदि तुझे राम भगवान् के मिलने की इच्छा वा जिज्ञासा है, तो दिल खोल कर वाज़ी लगा। (लोहा लोहे के बर्तन से कोई भिन्न नहीं है बल्कि) लोहा ही दूसरे रूप में आकर पीक आदि नामसे कहलाता है। इसी प्रकार, ईश्वर ही दूसरे रूपों में भिन्न भिन्न नाम से कहलाता है। और वह गले से भी अधिक समीप है। Notes: 1 प्याला, 2 अद्वैत रूपी शराब का, 3 एवंदम, 4 स्मरणी, 5 धर्म अथवा लोक परलोक की ओर से, 6 शुद्ध स्वरूप को, 7 धब्बा, 8 जिज्ञासा, शौक़, प्रेरणा।

न दुनिया दी ख़ेह उड़ा, हाहाकार न शोर मचा । छड्ड रोना, हस, गा ते गीत, अल्लाह शाह रग थीं नज़दीक ॥ 5 ॥ चुक सुट पर्दा दूई वाला, अख्याँ बिच्चों मैल छड्ड जाला । "तूं ही तूं" नहीं होर शरीक, अल्लाह शाह रग थीं नज़दीक ॥ 6 ॥ सुन सुन सुन लै 'राम' दुहाई, वे अन्ता क्यों अन्त है चाई । मालिकें कुल तूं, मंग न भीख, अल्लाह शाह रग थीं नज़दीक ॥ 7 ॥ (5) न तू संसार की राख उड़ा और न हाहाकार का शोर मचा, बल्कि इस रुदन को छोड़कर हँस और आनन्द से गीत गायन कर, और याद रख कि ईश्वर गले से भी अधिक समीप है। (6) हे प्यारे! पर्दा तू दूर फेंक और दिल के नेत्र के भीतर से मैल को बाहिर निकाल डाल (फिर तू देखेगा कि) सब "तू ही तू" वास्तव में है, और तेरे से भिन्न कोई नहीं है। और ईश्वर इस लिये गले से भी अधिक समीप है। तात्पर्य यह कि जब तक भीतर का नेत्र अर्थात् अन्तर दृष्टि नहीं खुलती, तब तक द्वैत दिखाई देता रहता है। और भीतरका नेत्र खुलते ही अथवा चित्त-बुद्धि के बाद आत्मसाक्षात्कार होने पर ही चारों ओर अपना एक आत्मा ही दिखाई देता है। और तब पता लगता है कि ईश्वर समीप से भी समीपतम है। (7) ऐ प्यारे! खूब कान लगाकर राम दुहाई (राम की पुकार) तू सुन, अनन्त होते हुए तू अन्तवान् होने की क्यों इच्छा करता है! तू वास्तव में सबका मालिक है, इसलिये भीख मत माँग (अर्थात् भिखारी मत बन) और ईश्वर तो गले से भी अधिक समीप है। Notes: 1 राख, 2 सकल संसार का स्वामी।

[ 211 ] ❀ परज, ताल चलन्त ❀ दरिया से हुबाब की है यह सदा । तुम और नहीं, हम और नहीं ॥ (टेक) मुझ को न समझ अपने से जुदा । तुम और नहीं, हम और नहीं ॥ 1 ॥ जब गुश्चा चमन में सुबह को खिला । झट कान में गुल के यह कहने लगा ॥ हाँ आज यह उक़दा है हम पै खुला । तुम और नहीं, हम और नहीं ॥ 2 ॥ आईनाँ मुक़ाबले-रुख जो रक्खा । झट बोल उठा यूँ अक्स उसका ॥ क्यों देख के हैरां यार हुआ । तुम और नहीं, हम और नहीं ॥ 3 ॥ दाने ने भला ख़िरमन से कहा । चुप रह इस जा नहीं चूनो-चरा ॥ वहदत की झलक कसरत में दिखा । तुम और नहीं, हम और नहीं ॥ 4 ॥ Notes: 1 बुलबुला, 2 आवाज़, 3 पुष्प-कली, 4 बाग़, 5 प्रातः, 6 भेद वा गुह्य रहस्य, 7 शीशा, दर्पण, 8 मुख के सामने, 9 प्रतिबिम्ब, 10 दानों का ढेर, 11 जगह, स्थान, 12 क्यों और कब, 13 एकत्व, 14 नानत्व।

नाशूत में आ के यही देखा । है मेरी ही ज़ात से नश्वो-नुमा ॥ जैसे पम्बा से तार का हो रिश्ता । तुम और नहीं, हम और नहीं ॥ 5 ॥ तू क्यों समझा मुझे ग़ैर बता । अपना रुख़े-ज़ेबा न हम से छिपा ॥ चिक़ पर्दा उठा, टुक सामने आ । तुम और नहीं, हम और नहीं ॥ 6 ॥ [ 212 ] भैरवी, ताल तीन है दैरो-हरम में वह जल्वा-कुनाँ । पर अपना तो रखता वह घर ही नहीं ॥ मैं देखूँ हूँ सब के है सिर पै घही । पर अपना तो रखता वह सर ही नहीं ॥ यह सितम है कि उसके हैं चश्म कहाँ? । पर ऐसी किसी की नज़र ही नहीं ॥ Notes: 1 जाग्रत अवस्था, 2 स्वरूप, निजात्मा, 3 पालना पोसना वा फलना फूलना, 4 रूई का गुफ़्फा, 5 सम्बन्ध, 6 अन्य, 7 सुन्दर मुख, 8 मन्दिर और मस्जिद, 9 प्रकाशमान, 10 आश्चर्य, ज़ुल्म, अन्याय, 11 नेत्र, 12 दृष्टि।

है नूर का उसके ज़हूर खिला । पर है वह कहाँ यह ख़बर ही नहीं ॥ कोई लाख तरह से भी मारे मुझे । पर मेरा तो कटता यह सर ही नहीं ॥ वह मकाँ है मेरा तन्हाई में यां । शम्सो-कुमर का गुज़र ही नहीं ॥ न तो आबो-हवा, न है आतिश यहां । कोई मेरे सिवा तो बशर ही नहीं ॥ दरे-दिल को हिला, कर दर्शन आ । कहीं करना तो पड़ता सफ़र ही नहीं ॥ जिस के क़ब्जे में है गंजे-वहदत का । कोई उससे तो दौलतवर ही नहीं ॥ [ 213 ] ग़ज़ल, राग जिला, संधोड़ा। अगर है शौक़ मिलने का अपस की रमज़ पाताजा । जला कर ख़ुद-नुमाई को भसम तन पै लगाता जा ॥ टेक ॥ Notes: 1 ज्योति, प्रकाश, 2 प्रकाश, तेज, 3 स्थान, जगह, 4 एकान्त, 5 सूर्य और चन्द्र, 6 जल और वायु, 7 अग्नि, 8 प्राणी, जीव, 9 हृदय या दिल के द्वार, 10 एकता का भण्डार, कोष, 11 धनी, 12 अपने आप की, 13 भेद, चुपड़ी, 14 अहंकार।

पकड़ कर हक़्क़ का झाड़ू, सफ़ा कर दिल के हुज़ड़े1 को । दूई2 की धूल को ले के, मुसल्ले3 पर उड़ाता जा ॥1॥ मुसल्ला फाड़, तसबीह4 तोड़, किताबां डाल पानी में । पकड़ कर दस्त5 मस्तों का, निजानन्द को तू पाता जा ॥2॥ अ० न जा मसजिद, न कर सिज्दा6, न रख रोज़ा, न मर भूखा । वुज़ू का फोड़ दे कूज़ा7, शराबे-शौक़8 पीता जा ॥3॥ अ० हमेशा खा, हमेशा पी, न ग़फ़लत से रहो इक दम । अपस तू ख़ुद ख़ुदा होके, ख़ुदा ख़ुद हो के रहता जा ॥4॥ अ० न हो मुल्ला, न हो क़ाज़ी, न ख़िल्अत9 पैहन शेखों का । नशे में सैर कर अपनी, ख़ुदी को तू जलाता जा ॥5॥ अ० कहे मनसूर सुन क़ाज़ी, निवाला10 कुफ़र का मत पी । अनलहक़़11 कहो सबूती12 से, तू यही कलमा पढ़ता जा ॥6॥ अ० [ 214 ] होली अब मोहे फिर फिर आवत हाँसी ॥ टेक सुख स्वरूप होय, सुख को ढूँढे, जल में मीन13 प्यासी ॥1॥ अ० Notes: 1 कोठरी, 2 द्वैत, 3 निमाज़ पढ़ने निमित्त जो कपड़ा आगे बिछाया जाता है, 4 माला जाप करने की, 5 हाथ, 6 बन्दगी, पूजा, 7 पूजा वा निमाज़ के समय मुँह धोने का प्याला, 8 ईश्वर जिज्ञासा की मद (शराब), 9 चोग़ा, लम्बा कोट शेख़ोंवाला, 10 घूँट, ग्रास, 11 शिवोऽहं, अहंब्रह्मास्ति, 12 पक्के दिल वा निश्चय से, 13 मछली।

सभी तो हैं आतम चेतन, अज1 अखंड2 अविनाशी3 । करत नहीं निश्चय स्वरूप का, भ्रजत मथुरा काशी ॥3॥ अ० क्षणभंगुरता4 देख जगत की फिर भी भारत उदासी । निर्भय राम5, राम कृपा से, काशी लख चौरासी ॥4॥ अ० [ 215 ] राग धनासरी, ताल दादरा जिस को हैं कहते ख़ुदा हम ही तो हैं । मालिके-अर्ज़-ओ-समा6 हम ही तो हैं ॥1॥ ताल्बाने-हक़्क़7 जिसे हैं ढूँढते । अर्श8 पर वह दिलरुवा9 हम ही तो हैं ॥2॥ तूर10 को सुरमा किया इक11 आम में । नूर12 मूसा को दिया हम ही तो हैं ॥3॥ तिशना-ए-दीदारे-लब13 के वास्ते । चश्मा-ए-आबे-बक़ा14 हम ही तो हैं ॥4॥ Notes: 1 जन्म रहित, 2 टुकड़ों रहित, 3 नाश रहित, 4 क्षण में नाश होने वाली वस्तु, 5 भय रहित, कवि का भी नाम है, 6 पृथ्वी और आकाश के स्वामी, 7 सचाई के जिज्ञासु (चाहने वाले), 8 आकाश, 9 माशूक़, प्यारा, 10 पर्वत का नाम, 11 बड़ी, 12 प्रकाश (अर्थात् जिस परमात्मा ने हज़रत मूसा को तूर पर्वत पर प्रकाश के रूप में दर्शन दिये वह हम ही हैं), 13 दर्शन के प्यासों की प्यास बुझाने के वास्ते, 14 स्वाश्रयत भ्रमण का शोध।

नारे में, माहे में, काफ़वे में सदा । मिहरे में जल्वानुमा1 हम ही तो हैं ॥5॥ बोस्ताने-नूर2 से बैहरे-ख़लील3 में । नार को गुलशन4 किया हम ही तो हैं ॥6॥ नूह की किश्ती को तूफ़ां से बचा । पार बेड़ा कर दिया, हम ही तो हैं ॥7॥ मदो-जन5, पीरो-जवां6, बैहशो-त्यूर7 । औलिया8-ओ-अंबिया9 हम ही तो हैं ॥8॥ ख़ाको-बादो-आवो-आतिश और ख़िला । जुमला मादर, जुमला मां, हम ही तो हैं ॥9॥ उक़्दह-ए-वहदत-पसन्दों के लिये । नाख़ुने-मुश्किल-कुशा हम ही तो हैं ॥10॥ मुर्ग़े-दिल वागे-जहां में जब कि यह । दामे-उलफ़त में फंसा, हम ही तो हैं ॥11॥ Notes: 1 अग्नि, 2 चाँद, 3 सितारे, 4 सूर्य, 5 प्रकट, भासमान, 6 प्रकाश स्वरूप के भाग से, 7 सच्चे आशिक़ के वास्ते, 8 बाग़ अर्थात् (जिस प्यारे ने बाग़ को बाग़ में बदल दिया वह हम ही तो हैं), 9 पैग़म्बर का नाम, 10 स्त्री-पुरुष, 11 युवा-बूढ़ा, 12 पशु और पक्षी, 13 अवतार, 14 नबी, 15 पृथिवी, वायु, जल, अग्नि और आकाश, 16 सब मुक़ामें (हममें), 17 और सब हम, 18 अद्वैत के मसलों (सिद्धांतों) को पसन्द करने वालों के लिये, 19 मुश्किल हल करने वाले साधन, 20 दिल का पक्षी, 21 प्रेम जाल।

कौन किस को सिर झुकाता अपने आप । जो झुका, जिसको झुका, हम ही तो हैं ॥12॥ [ 179 ] राग पर्ज, ताल केरवा ख़ुदाई कहता है जिस को आलमें । सो यह भी है इक ख़्याल मेरा ॥ बदलना सूरत हर एक ढब से । हर एक दम में है हाल मेरा ॥1॥ कहीं हूँ ज़ाहिर, कहीं हूँ मज़ाहरें । कहीं हूँ दीदे, और कहीं हूँ हैरतें ॥ नज़ार है मेरी, नसीब मुझ को । हुआ है मिलना मुहाल मेरा ॥2॥ तिलिस्में-इसरारे-गंजे-मखफ़ी5 । कहूं न सांने को अपने क्योंकर ॥ अयां हुआ हाले-हर दो आलमें । हुआ जो ज़ाहिर कमाल मेरा ॥3॥ हज़ावे-खुरशीद12, ज़ाने-मानी13 । हुआ ज़हूं-नमूदे14-सूरत ॥ Notes: 1 जगत, संसार, 2 तरीक़ा, 3 दृश्य की कान, विश्व, 4 दृष्टि, 5 आश्चर्य, 6 कठिन, 7 जादू, 8 गुह्य भण्डार के भेदों का जादू, 9 दिल, 10 ज़ाहिर, खुला, 11 दोनों लोकों का हाल, 12 सूर्य पर पर्दा, 13 अपना स्वरूप, 14 बाह्य नाम रूप का प्रकाश।

मिटा जो दुनिया से नामे-आदिम । हुआ है मुझको वसालें मेरा ॥4॥ हमेशा आँखों को बन्द रखना । जमाले-मानी का देखना है ॥ जो गोशे-कर है वह है समांअतें । जो वे जुबानी है क़ालें मेरा ॥5॥ अग्रस्तू, कालू वला की रमज़ें । न पूछ मुझ से वतन ! तू हरगिज़ ॥ हूं आप मशग़ूल, आप शार्मिळ । जवाब ख़ुद है, सवाल मेरा ॥6॥ [ 217 ] राग सँकोटी, ताल दादरा मैं न बन्दा, न ख़ुदा था, मुझे मालूम न था । दोनों हल्क़तें से जुदा था, मुझे मालूम न था ॥1॥ पंक्तिवार अर्थ । (1) यह मुझे मालूम नहीं था कि मैं न जीव हूँ न ईश्वर हूँ, और न मुझे यह मालूम था कि मैं इन दोनों उपाधियों से परे हूँ । Notes: 1 मेरा मिलाप, 2 अपने स्वरूप का दर्शन, 3 बन्द ज्ञान, 4 आवाज़ सुनना, 5 मेरा कथन, 6 सुक़ात (Socrates) और अफ़लातून के नाम, 7 गुह्य उपदेश, इशारे, 8 कवि की उपाधि, 9 प्रवृत्त, 10 प्रेरक व काम में लगाने वाला, 11 उपाधि, कारण।

शक्ले-हैरत हुई, आयिना-ए-दिल1 से दैदा । मानीये-शाने-सफ़ा2 था, मुझे मालूम न था ॥2॥ देखता था मैं जिसे हो के नदीदा3 हर सू । मेरी आँखों में छुपा था, मुझे मालूम न था ॥3॥ आप ही आप हूं यां तालिबो-मतलूबें है कौन । मैं जो आशिक़ हूं कहा था, मुझे मालूम न था ॥4॥ वजह मालूम हुई तुझ से न मिलने की सनम । मैं ही ख़ुद पर्दा बना था, मुझे मालूम न था ॥5॥ (2) दिल में (अन्तःकरण रूप दर्पण में) आश्चर्य जनक सूरतें प्रकट हुईं, मगर यह मुझे मालूम न था कि इन प्रकट गुणों वा रूपों का असली कारण या बिम्ब मैं ही हूँ । (3) जिस को मैं अव्यक्त वा अप्रगट देखता था, वह मेरी आँखों में छिपा हुआ है, यह मुझे मालूम न था । (4) सब कुछ मैं आप ही आप हूँ, जिज्ञासु और इच्छित पदार्थ मेरे बिना कोई नहीं, मैंने जो कहा था कि मैं आशिक़ अर्थात् इस पर आसक्त वा प्रेमी हूँ, यह मुझे मालूम न था । (5) ऐ प्यारे ! तुम से न मिलने का कारण जब मालूम हुआ तो पता लगा कि मैं ही स्वयं (इसमें) पर्दा बना हुआ था, पर यह मुझे मालूम न था । Notes: 1 दिल के शीशे, 2 शुद्ध गुणों का वास्तव स्वरूप अथवा प्रतिबिम्ब का असली बिम्ब, 3 अप्रकट, छिपा हुआ, 4 हर तरफ़, सब ओर, 5 जिज्ञासु और इच्छित पदार्थ, 6 प्रेमी, 7 ऐ प्यारे।

वाद मुद्दत जो हुआ वस्ल1, खुला राज़े-वतनैं । वासले-हक़ मैं सदा था, मुझे मालूम न था ॥6॥ [ 218 ] राग सँकोटी, ताल दादरा शमारू2 जल्वाकुनां था मुझे मालूम न था । } टेक साफ़ पर्दे में अयां3 था मुझे मालूम न था ॥ } गुल में, बुलबुल में, हर इक शान में, हर पत्ते में । जावजां4 उस का निशां था, मुझे मालूम न था ॥1॥ एक मुद्दत दैहरो-हरम7 में है ढूँढा नाहक़्क़ । वह दरे-क़ल्ब13 निहां14 था, मुझे मालूम न था ॥2॥ सच तो यह है कि सिवा ज़ात के जो कुछ था हयातें । वैह्म था, शक़ था, गुमां था, मुझे मालूम न था ॥3॥ (6) चिरकाल पश्चात् जब दर्शन हुए अर्थात् साक्षात्कार हुआ, तब अपने घर का भेद खुल गया, (वह यह) कि सत्य स्वरूप को मैं सदैव प्राप्त हुआ हुआ था, पर मुझे मालूम न था । Notes: 1 काल, 2 मेल, मुलाक़ात, 3 निज धाम का रहस्य, कवि से भी अभिप्राय है, 4 परमात्मा से अभेद, 5 दीपक की लाट (ज्योति), 6 प्रकाशमान, 7 ज़ाहिर, स्पष्ट, 8 पुष्प, 9 हर स्थान, 10 मंदिर, 11 मस्जद, 12 व्यर्थ, 13 दिल के भीतर, 14 छुपा हुआ, 15 स्वरूप वा आत्मा, 16 जीवित, प्राण रखता हुआ, 17 भ्रम।

है ग़ालत, हस्ति-प-मौहूम को जो समझे थे । हर वतन अपना जहां था, मुझे मालूम न था ॥4॥ [ 219 ] काफ़ी, ताल दादरा मालिके-हर दो जहान, मैं ही तो हूँ, मैं ही तो हूँ । ज़ाहिर-ओ-बातन समी, मैं ही तो हूँ, मैं ही तो हूँ ॥1॥ लज़्ज़ते दुनिया की मुझ को कुछ नहीं है आज़्तक । दोनों जहान की नेमतें, मैं ही तो हूँ, मैं ही तो हूँ ॥2॥ हक़े-दुनियां का मुझ ही में ख़्वाब था मिसले-ख़्याल । बेदारे हो देखा ज़रा, मैं ही तो हूँ, मैं ही तो हूँ ॥3॥ महज़ूबे इस्मो-जिस्म में था हस्ती-ओ-इदमो-सत्तर । पर्दहे-जहल उठ गयो, मैं ही तो हूँ, मैं ही तो हूँ ॥4॥ कुछ नहीं मुझ से सिवा, दुनियां, ख़ुदा, रहें तमाम । हर जुज़्व-ओ-कुल की असलीयत, मैं ही तो हूँ, मैं ही तो हूँ ॥5॥ वस्माप-उलफ़त मुझे हासिल हुआ ला-इन्तहा । मुझसे जुदा हरगिज़ नहीं, मैं ही तो हूँ, मैं ही तो हूँ ॥6॥ Notes: 1 कल्पित वस्तु, अपने कल्पित देह-प्राण, 2 देश, घर, यहाँ कवि के नाम से भी मुराद है, 3 देश, 4 दोनों लोकों का स्वामी, 5 बाहिर भीतर, 6 इच्छा, 7 पदार्थ, 8 जगत की सत्यता, 9 स्वप्न तत्, 10 जाग कर, 11 आवृत या ढका हुआ, 12 नाम रूप, 13 सच्चिदानंद, 14 अज्ञान का आवरण वा पर्दा, 15 जीवात्माएं, 16 व्यष्टि समष्टि, 17 प्रेम का स्रोत, 18 अनन्त।

उड़ गई जड़ से दूई, ख़ुवस्त हुई वहदानीयतें । मालूम है दानशे-जहां, मैं ही तो हूँ, मैं ही तो हूँ ॥7॥ आलमे-दुनिया में हर सू ताबां है मेरा ही नूर । मेहरो-माह में रौशनी, मैं ही तो हूँ, मैं ही तो हूँ ॥8॥ [ 220 ] राग काफ़ी, ताल ग़ज़ल मुझको देखो । मैं क्या हूँ, तन तन्हा आया हूँ । मतला-प-नूरे-ख़ुदा हूँ, तन तन्हा आया हूँ ॥1॥ मुझको आशिक़ कहो, माशूक़ कहो, इश्क़ कहो । जा-बजा जल्वानुमा हूँ, तन तन्हा आया हूँ ॥2॥ मैं ही मसजूदो-मलायक हूँ वशक्ले-आदम । मज़हरे-ख़ासे-ख़ुदा हूँ, तन तन्हा आया हूँ ॥3॥ तामकां अपना मकां है, सो तमाशा के लिये । मैं तो पर्दे में छुपा हूँ, तन तन्हा आया हूँ ॥4॥ Notes: 1 द्वैत, 2 अद्वैत, 3 लुप्त, 4 संसार की बुद्धि, 5 संसार, 6 हर तरफ़, 7 प्रकाशमान, 8 सूर्य-चाँद, 9 इच्छा, 10 ईश्वर के प्रकाश के प्रकट होने का स्थान (स्रोत), 11 प्रिया, 12 ज़ाहिर, प्रगट, 13 मैं देवताओं का पूजनीय हूँ, अर्थात् देवतागण मेरी उपासना करते हैं, 14 पुरुष के रूप में, 15 स्वयं ईश्वर के प्रगट होने का स्थान, 16 देश रहित।

हूं भी, हां भी अनलहक़्क़, है यह मंज़ाल अपनी । शम्से-इर्फ़ां की ज़िया हूँ, तन तन्हा आया हूँ ॥5॥ किस को ढूँढूं, किसे पावूं, मैं बताओ साहिब । आप में आप ही छुपा हूँ, तन तन्हा आया हूँ ॥6॥ [ 221 ] राग तिलंग, ताल केरवा मैं हूँ वह ज़ात नापैदा किनारो-मुतलक़ो-बेहद । कि जिस के समझने में अक़्ले-कुल भी तिफ़्ले-नादां है ॥1॥ कोई मुझको ख़ुदा माने, कोई भगवान जाने है । मेरी हर सिफ़त बनती है, मेरा हर नाम शायां है ॥2॥ कोई बुतख़ाना में पूजे, हरम में, कोई गिरजा में । मुझे बुतख़ाना-ओ-मसजिद कलीसा, तीनों यक्सां है ॥3॥ कोई सूरत मुझे माने, कोई मुतलक़ पहचाने है । कोई ख़ालिक़ पुकारे है, कोई कहता यह इन्सां है ॥4॥ Notes: 1 शिवोऽहं, अहम् ब्रह्मास्मि, "मैं ईश्वर हूँ", 2 ज्ञानरूपी सूर्य, 3 प्रकाश, 4 न उत्पन्न होने वाली वस्तु, 5 बिल्कुल सीमातीत वा अनन्त, 6 समष्टि बुद्धि, 7 मूर्ख बच्चा, 8 प्रकट, प्रकाशित, 9 सन्दिर, 10 काबा (मस्जिद), 11 गिरिजा घर, 12 सृष्टि का कर्ता।

मेरी हस्ती में यकताई दूई हरगिज़ नहीं बनती । सिवा मेरे न था होगा न है यह रमज़े-इर्फ़ां है ॥5॥ [ 222 ] राग बिधौरा, ताल दीपचंदी न दुश्मन है कोई अपना न साजन ही हमारे हैं । } टेक हमारी ज़ाते-मुतलक़ से हुए यह सब पसारे हैं ॥1॥ } न हम हैं देह मन बुद्धि, नहीं हम जीव नैं ईश्वर । बले इक कुन हमारी से बने यह रूप सारे हैं ॥2॥ हमारी ज़ाते-नूरानी, रहे इक हाल पर दायम । कि जिस की चमक से चमके यह मिहरो-माह सितारे हैं ॥3॥ हर इक हस्ती की है हस्ती हमारी ज़ात पर क़ायम । हमारी नज़र पड़ने से नज़र आते नज़ारे हैं ॥4॥ बरंगे-मुख़्तलिफ़ नामो-शकल जो दमक मारे है । हमारे तूर के शोले से उठते यह शरारे हैं ॥5॥ Notes: 1 अद्वैत, 2 द्वैत, 3 ज्ञानियों का संकेत, 4 मित्र, 5 आत्मा, शुद्ध स्वरूप, 6 नहीं, 7 किन्तु, 8 आज्ञा, हुकम, संकेत, 9 प्रकाश स्वरूप, 10 नित्य, 11 सूर्य और चाँद, 12 वस्तु, 13 अस्तित्व, वस्तुत्व, 14 नाना प्रकार के दृश्य पदार्थ, 15 नाना प्रकार के नाम और रूप, 16 चमके हैं, 17 अपने स्वरूप (आत्मा) के अग्नि रूपी पर्वत की, 18 ज्वाला, 19 शृंगारे।

[ 223 ] राग जंगला, ताल खुमाली बाग़े-जहां' के गुल' हैं, या ख़ार' हैं तो हम हैं। } टेक गर यार हैं तो हम हैं, अग़यार' हैं तो हम हैं॥1॥ } दरिया-ए-मार्फ़त' के देखा, तो हम हैं साहिल'। गर वार हैं तो हम हैं, गर पार हैं तो हम हैं॥2॥ वाबस्ता' है हमीं से, गर ज़बर' है वगर क़ुदरत'। मज़बूर हैं तो हम हैं, मुख़तार हैं तो हम हैं॥3॥ मेरा ही हुस्न'° जग में, हर चंद मौजज़न'' है। तिस पर भी तेरे तिश्ना-ए-दीदार'' हैं तो हम हैं॥4॥ फैला के दामे-उल्फ़त'' घिरते घिराते'' हम हैं। गर सैद'' हैं तो हम हैं, सय्याद'' हैं तो हम हैं॥5॥ अपना ही देखते हैं, हम बन्दोवस्त यारो। गर दाद'' हैं तो हम हैं, फ़र्याद हैं तो हम हैं॥6॥ Notes: 1 संसार रूपी बाग़ के, 2 फूल, 3 कांटा, 4 शत्रु, 5 आत्मज्ञान का दरिया (समुद्र), 6 तट (किनारा), 7 बन्धा हुआ है, संबन्ध रखता है, 8 जबरदस्ती, 9 और इख़्त्यार, ताक़त, बल, 10 सौन्दर्य, 11 लैहरें मार रहा है, 12 दर्शन के प्यासे, 13 मोहजाल, 14 फँसते फँसाते, 15 शिकार, 16 शिकारी, 17 न्याय वा न्यायालय।

[ 224 ] भैरवी ग़ज़ल। दिल को जब ग़ैरें से लफ़ा देखा। आप को अपना दिलरुबा' देखा॥1॥ } टेक पी लिया जामे बादहे-ए-वहृदत'। ख़ेशो-बेगाना' आशना' देखा॥2॥ जिस ने है ज़ात अपनी को जाना। आप को हक़' से कब जुदा देखा॥3॥ रमज़े-रहबर' की अपने जब समझा। न कोई ग़ैर' वा मासिवा देखा॥4॥ करके बाज़ार गर्म कसरतें' का। आप को अपने में छुपा देखा॥5॥ ग़ैर का इस्म'' गर्चि है मशहूर। न निशां उस का, न पता देखा॥6॥ जब से दर्शन है राम का पाया। ऐ राम! क्या कहूँ कि क्या देखा॥7॥ Notes: 1 दूसरे से, 2 माशूक़ (प्यारा), 3 प्याला, 4 अद्वैत रूपी मद (शराब), 5 अपना और पराया, 6 मित्र, 7 सत्य स्वरूप, 8 गुरु के संकेत, 9 अपने से अलग वा भिन्न न देखा, 10 नामत्व, 11 नाम।

[ 225 ] भैरवी ग़ज़ल यार को हम ने जा बजा' देखा। कहीं बन्दा कहीं ख़ुदा देखा॥1॥ सूरते-गुल' में खिलखिला के हँसा। शक्ले-बुलबुल' में चहचहा देखा॥2॥ कहीं है बादशाहे-तख़ते-निशीं'। कहीं कासा' लिये गदा' देखा॥3॥ कहीं आबद' बना, कहीं ज़ाहिद'। कहीं रिंदों' का पेशवा'' देखा॥4॥ करके दावा कहीं अनलहक़'' का। वर सरे-दार'' वह खिंचा देखा॥5॥ देखता आप है, सुने है आप। न कोई उस के मासिवा'' देखा॥6॥ बल्कि यह बोलना भी तकल्लुफ़'' है। हमने उसको सुना है या देखा॥7॥ Notes: 1 हर जगह, 2 पुष्प के रूप में, 3 बुलबुल के रूप में, 4 सिंहासन पर बैठा हुआ महाराजा, 5 भिक्षा का प्याला, खप्पर, 6 भिक्षु, फ़क़ीर, 7 पूजा पाठी, कर्मकाण्डी, 8 विरक्त, 9 बदमाश, शराबी, 10 नेता, सरदार, 11 मैं ख़ुदा हूँ (शिवोऽहं), 12 सूली के सिरे पर, 13 अन्य, भिन्न, 14 ज़्यादा, यूँ ही है।

[ 226 ] राग भैरवी, ताल तीन दिया अपनी ख़ुदी' को जो हमने उठा। वह जो परदा सा बीच में था न रहा'॥ रहे परदे में अब न वह परदा निशीं'। कोई दूसरा उस के सिवा न रहा॥1॥ न थी हाल की जब हमें अपनी ख़बर। रहे देखते औरों के ऐबो-हुनर'॥ पड़ी अपनी बुराईयों' पर जो नज़र'। तो निगाह' में कोई बुरा न रहा॥2॥ ज़फ़र' आदमी उस को न जानियेगा। गो' हो कैसा ही साहिबे-फ़ैज़ो-अ़का'॥ जिसे' पेश में याद-ए-ख़ुदा न रही। जिसे तैश' में ख़ौफ़े-ख़ुदा'' न रहा॥3॥ [ 227 ] राग शंकराभरण ताल दादरा। की करदा नी! की करदा, तुसी पुछोख़ां दिलबर की करदा (टेक) Notes: 1 अहंकार, 2 छुपकर परदे में बैठनेवाला या परदा ओढ़े हुए, 3 गुण-दोष, 4 दृष्टि, 5 कवि का नाम, 6 चाहे, यद्यपि, 7 समझदार, तीव्र बुद्धि और विचार वाला, 8 विषयानन्द, भोग विलास, 9 क्रोध, गुस्सा, 10 ईश्वर का भय।

इकसे घर विच वसदयां रसदयां, नहीं हुँदा विच परदा। की करदा०॥1 विच मसीत नमाज़ गुज़ारे, बुतख़ाने जा वड़दा। की करदा०॥2॥ आप इक्को, कई लाख घरां अंदर, मालिक हर घर घर दा। की करदा०॥3॥ मैं जितै वल्ल देखां, उत वल्ल ओही, हर इक दी संगत करदा की करदा॥4 पंक्तिवार अर्थ। ( 1 ) एकही घर में रहते हुए पर्दा नहीं हुआ करता, मगर मेरा स्वरूप मेरे दिल रूपी घर में रहते हुए परदे में छुपा है, इस लिये ऐ लोगो! तुम इस दिलबर (प्यारे आत्मा) को पूछो कि तू यह क्या लुकन छिप्पन खेल कर रहा है। ( 2 ) वह कहीं तो मसजिद में छुप कर बैठा रहता है और उस के आगे नमाज़ होती है। और कहीं मन्दिरों में वह दाखिल हुआ है जहाँ उस की पूजा हो रही है; इस लिये ऐ लोगो! तुम दिलबर को पूछो, कि वह क्या कर रहा है। ( 3 ) आप स्वयम् तो एक अद्वितीय है, मगर लाखों घरों ( दिलों ) के अन्दर प्रविष्ट हुआ हुआ हर एक घर का स्वामी बना हुआ है, इस लिए ऐ लोगो! तुम दर्याफ़्त करो कि यह दिलबर ( प्यारा ) क्या क्या कर रहा है। ( 4 ) जिधर मैं देखता हूँ उधर दिलबर ही नज़र आता है और हर एक के साथ वही ( मिला बैठा ) नज़र आता है। इस लिये ऐ लोगो! आप दर्याफ़त करो कि दिलबर ( ईश्वर ) यह क्या कर रहा है।

मूसा ते फ़रऔन बना के, दोइ होके क्यों लड़दा? की करदा०॥5॥ [ 228 ] राग खमाज, ताल दादरा बिना ज्ञान जीव कोई मुक्ति नहीं पावे॥ ( टेक ) चाहे धार माला चाहे बान्ध मृग छाला। चाहे तिलक छाप चाहे भस्म तू रमावे॥1॥ बिना० चाहे रच के मन्दिर मठ, पत्थरों के लावे ठठ। चाहे जड़ पदार्थों को सीस नित्य नवावे॥2॥ बिना० चाहे बजा गाल चाहे शंख और बजा घड़ियाल। चाहे ढप चाहे डौरू झांझ तू बजावे॥3॥ बिना ज्ञान० चाहे फिरे तू गया', प्रयाग, काशी में जा प्राण त्याग। चाहे गंगा यमुना चाहे सागर' में नहावे॥4॥ बिना ज्ञान० द्वारका अरु रामेश्वर, बद्रीनाथ पर्वत पर। चाहे जगन्नाथ में तू झूठो भात खावे॥5॥ बिना ज्ञान० ( 5 ) मुसलमानों में हज़रत मूसा और हज़रत फ़रऔन हुए हैं जिन में ख़ूब लड़ाई हुआ था, इन दोनों को बनाकर अर्थात् इस तरह से आप ही दो रूप होकर यह दिलबर क्यों लड़ता और लड़ाता है। इस लिये ऐ लोगो! आप दर्याफ़्त करो कि यह दिलबर क्या करता है। Notes: 1 तीर्थों के नाम हैं, 2 गंगा सागर।

चाहे जटा सीस बढ़ा, जोगी हो, चाहे कान फड़ा। चाहे यह पाखंड रूप लाख तू बनावे॥6॥ बिना ज्ञान० ज्ञानियों का कर ले संग, मूर्खों की तज दे भंग। फिर तुझे ठीक मुक्ति का साधन आवे॥ बिना ज्ञान० [ 229 ] राग खमाज, ताल दादरा मक्के गया गछ' मुक़्तदी नाहीं, जे' न मन्नो मुक़ाइये'। गया गयां कुछ ज्ञान न आवे, भावें' सौ सौ टुक्के लाईये। गया' गयां कुछ गति न होवे, भावें लख लख पिंड बट पाईये। प्रयाग गयां शान्ति न आवे, भावें बैह बैहू मूंड मुंडाईये। बृथाल दास जेहड़ों' वस्तु अन्दर होवे, ओहनूं' बाहर क्यों। कर पाईये॥1 [ 230 ] राग जिला, वा पीलू, ताल दीपचंदी क्या ख़ुदा को ढूँडता है यह बड़ी कुछ बात है ( टेक ) तू ख़ुदा है तू ख़ुदा है तू ख़ुदा की ज़ात' है॥1॥ क्या० Notes: 1 बात, धंधा, 2 आगर, 3 ख़तम करे, 4 चाहे, 5 तीर्थ का नाम है, 6 जौनसी, 7 उसको, 8 वास्तव स्वरूप।

क्या ख़ुदा को ढूँडता है सदा तो तेरे पास है। पास है पाता नहीं ज्यों फूलन में वास' है॥2॥ क्या० फिरे भूला एक मृग कस्तूरी वाकी पास है। पास है पाता नहीं, फिर फिर सूंघे घास है॥3॥ क्या० तुझ में है एक बोलता वह ही ख़ुदा तूं आप रे। है नारायण हृदय भीतर तूं तेरो तपास' रे॥4॥ क्या० [ 231 ] ठुमरी, राग जिला, कौंजोटी जहां देखत वहां रूप हमारो ( टेक ) जड़ चेतन को भेद न पेखत, आतम एक अखंड निहारो'। क्षिति' जल तेज पवन आकाशे, कारण सूक्षम स्थूल विचारो॥ज० नर नारी पशु पंछी भीतर, मुझ बिन कोई न जागनहारो। कीट पतंग पिशाच पदारथ, सरुवर तरुवर जंगल पहाड़ो॥ज० भैं-सव में सव ही मेरे महिं, नाम रूप निरंजन धारो। नाथ कृपा नरसिंह भयो अब, व्याप रह्यो हमसे जग सारो॥ज० [ 232 ] आत्म चेतन चमक रह्यो, कर निधड़क दीदारे॥ टेक. तूं परमानन्द आप है, झूठे हैं सुतदारे॥1॥आ० Notes: 1 सुगंध, खुशबू, 2 खोज, इमतिहान लेना, जाँचना, 3 देखो, 4 ज़मीन, पृथ्वी, 5 दर्शन, 6 स्त्री पुत्र।

चमड़ी में हित' जो करै, वही पूरे चमार। नाशवान जग देख के, समझत नाहिं गंवार॥2॥अ० दुर्लभ नर तन पाय के, क्यों न करत विचार। तन मंदर अद्भुत बनयो, तूं ठाकर सरदार॥3॥अ० विषयों में फंस फंस मरे, जान खोय बेकार। जो सुख चाहे तो त्याग दे, परधन अरु पर नार॥4॥अ० [ 233 ] राग भिंहाग, ताल दादरा मिकराज़े-मौज' दामने-दरया' कतर गयी। } टेक वहदत' का बुर्क़ा फट गया, सारी सतर' गयी॥ } दरया-ए-बेखुदी' पै जो बादे'-खुदी चली। कसरत' की मौज हो के वह सारे पसर' गयी॥1॥ Notes: 1 प्यार, 2 लैहर की कैंची, 3 दरया के पल्ले (चादर), 4 एकता का परदा, 5 भेद, परदा दूर होगया, 6 बे ख़ुदी (अहंकार रहित) के समुद्र अथवा धारा पर, 7 अहंकार रूपी वायु, 8 नानत्व की लैहर, 9 सर्वशोर फैल गयी, 10 नाम रूप, 11 कमीना, नीच, 12 नाम विहीनता, 13 निगुंखता, 14 इज़्ज़त।

जामा-ए-वजूद' पैहन के बाज़ारे दैहर' में। ज़ातो-सफ़ात' अपनी की सारी ख़बर गयी॥3॥ फ़रज़न्दो-ज़नो-माल' की महब्बत में होके ग़र्क़। इन्सान के वजूद' की सारी वक़्अत' गयी॥4॥ शहवत'-तमा'-ओ-ख़शम'-ओ-तकब्बर'' में आ फँसे। यकाई-ए-ज़ात'' की जो शर्म थी, उतर गई॥5॥ यह करलीया, यह करता हूँ, यह कल करूंगा मैं। इल फ़िकरो-इन्तज़ार में शामो-सहर'' गयी॥6॥ बाक़ी रही को दिल की सफ़ाई में सफ़' कर। आरायशे-वजूद'' में सारी गुज़र गई॥7॥ भूले थे देख दुन्या की चीज़ों को हम यहां। हादी'' ने इक तमांचा दीया होश फिर गई॥8॥ ग़फ़लत की नींद में जो तख़य्युन' की ख़्वाब थी। बेदार'' जब हुए तो न जाना किधर गयी॥9॥ Notes: 1 शारीरिक चोला (शरीर रूपी लिबास), 2 काल (समय) के बाज़ार में, 3 असली स्वरूप और उसके गुण, 4 पुत्र, स्त्री और धन, 5 चोला, शरीर, 6 इज़्ज़त, 7 विषय कामना, 8 लालच, 9 क्रोध, 10 अहंकार, 11 आत्मा की एकता, अभेदता वा अद्वितीयपन, 12 रात्री और दिन, 13 शरीर के सजाने में, 14 रास्ता बताने वाला, शिक्षा देने वाला गुरु, 15 बन्ध उपाधि वा कैद कर देनेवाला स्वप्न, 16 जाग्रत हुई।

माशूक़ की तालाश में फिरते थे दर बदर। नज़र आया बेनक़ाब', दुई की नज़र गयी॥10॥ दिलदार' का वसाल' हुआ दिल में जब हुसूल'। दिलदार ही नज़र पड़ा दीदा' जिधर गयी॥11॥ साक़ी' ने भर के जाम' दीया माफ़रत' का जब। दिस्तार' भूली, होश गया, यादे-सर'' गयी॥12॥ [ 234 ] ग़ज़ल भैरवी है लैहर एक आलम'' बैहरे-सरूर'' में। है बूदो'-बाश सारी उसके जहूर' में॥1॥ पंक्तिवार अर्थ। ( 1 ) दुनिया आनन्द के समुद्र में एक लैहर है और उस आनन्दघन समुद्र के भीतर में इस जहान का रहना सहना है। Notes: 1 जब द्वैत दृष्टि दूर हो गयी तो अपना असली स्वरूप बिना परदे के नज़र आगया, 2 प्रिय स्वरूप वा निज स्वरूप, 3 मिलाप, दर्शन, अर्थात् अनुभव, 4 प्राप्त, 5 दृष्टि, 6 (प्रेमी रूपी) शराब पिलाने वाला, 7 (प्रेम) पियाला, 8 आत्मक ज्ञान, 9 पगड़ी दुनिया की इज़्ज़त की, 10 सिर की याददाश्त, अर्थात् अपने शरीर की ख़बर भी लोप हो गयी, 11 जहान, 12 आनन्द का समुद्र, 13 रहन सहन।

मिट्टी है लहर जिस दम वह ही तो बहर है । हर बार सू' है शोला मत देख तूर' में ॥ 2 ॥ [ 235 ] राग भैरवी, ताल दादरा चादर से मौजें को, न छुरे चेहरा आवें का । खुरका हवाब' का न हो 'खुरका आब का ॥ अपना ही कुछ तसर्रुफ़े-अवहाम' है कि हम । चेहरा पे हक़' के डाले हैं परदा नक़ाब का ॥ आँखें जो मूँद लीं तो दोपहर में रात है । इस में क़सूर क्या है भला आफ़ताब' का ॥ किस काम की यह हस्ती-ए-मौहूम' कायनात ! सैराब" कब करे है धोका सुराब" का ॥ Notes: (2) जिस समय यह लहर मिट जाती है, उसी समय वही लहर समुद्र हो जाती है । चारों तरफ लाट है, पहाड़ में ही मत देख, अर्थात् चारों ओर प्रकाश है सिर्फ़ तूर के पहाड़ पर (जहाँ मूसा ने ख़ुदा की लाट देखी थी वहाँ पर) ही मत देख । 1 तरफ, 2 ख़ुदा का पहाड़, 3 तरंगें, 4 जल, 5 बुलबुल, 6 भ्रम पूर्ण श्रद्धास, 7 सत्य स्वरूप, 8 था, 9 ज्योति, प्रकाश, 10 बदला लेनेवाला, सर्व शक्तिमान, 11 क्रोध करने वाला, 12 क्यों कब से रहित, 13 नाना प्रकार, 14 कहा, हो और हो, गया, 15 देश काल रहित से देश काल रूप बन आया, 16 तब, 17 इतना ।

अपना हज़ाब' आप है तू ऐ मियाँ न्याज़' । उठने से तेरे होता है उठना हज़ाब का ॥ [ 236 ] ग़ज़ल हुन' मैं लखियाँ सोहना यार । } टेक जिस दे हुसन दा गरम बाज़ार ॥ } जद' अहद' अकल्ला' सी' न ज़ाहिर कोई तजल्ला' सी । न रब रसूल न अल्ला सी न जन्वार" सी न क़हार" ॥ 1॥ टेक बेचूं'' च बेचगूना सी वे शुभह, ते वे नमूना सी । न कोई रंग रूप नमूना सो हुन गूनाँ गूं'' हज़ार ॥ 2॥ टेक प्यारा पहन पोशाकां आया आदम अपना नाम धराया । अहद ते अहमद बन आया नबियां दा सरदार ॥ 3॥ टेक कुन कहा फैकुन'' कमाया वे चूनी'' से चून बनायो । अहद दे बिच मीम रलाया तां'' कीता पड़ा'' पसार ॥ 4॥ टेक तजूं मसीत तजूं बुतख़ाना वर्ती रहां न रोज़ह जाना । भुल गया वज़ू नमाज़ दोगाना तैं पर जां सुट्टां बलहार ॥ 5॥ टेक Notes: 1 परदा, 2 कवि का नाम है, 3 अब, 4 पहचाना, 5 जब, 6 अद्वैत, 7 एकमेव, 8 था, 9 ज्योति, प्रकाश, 10 बदला लेनेवाला, सर्व शक्तिमान, 11 क्रोध करने वाला, 12 क्यों कब से रहित, 13 नाना प्रकार, 14 कहा, हो और हो, गया, 15 देश काल रहित से देश काल रूप बन आया, 16 तब, 17 इतना ।

पीर पैग़म्बर उस दे वर्दे' उन्स मलायक' सजदह' करदे । सिर क़दमां" उत्ते धरदे सब से बड़ी सरकार ॥ 6॥ टेक जो कोई उस नूं लखना चाहे वाहज' वसीले लखिया न जाय । शाह इनायत' भेद बताये तां सब खुले असरार" ॥ 7॥ टेक [ 237 ] ग़ज़ल मेरी बुक्कल' दे विच चोर, नी मेरी बुक्कल दे विच चोर (टेक) कीन्हूं' कूक सुनावां नी ! मेरी बुक्कल दे विच चोर । चोरी चोरी निकल गया, जग विच पै गया शोर ॥ 1॥ टेक मुसलमान चितां तों चिड़दे, हिन्दू चिड़दे गोर । दोनों आपस दे विच लड़दे, पहो दोहांदी खोड़" ॥ 2॥ टेक कित रामदास कित फ़तहमहम्मद पहो क़दीमी" शोर । मिट गया जद दोहां दा झगड़ा, निकल पया कोई होर" ॥ 3॥ टेक पहो ही हुन तुसीं भी आखो, आप गुड़्ढी आप डोर । मैं दसनाहां तुसीं पकड़ लियाओ, बुल्हेशाह दा चोर ॥ 4॥ टेक Notes: 1 सेवक, 2 मनुष्य श्रगु देवता, 3 प्रणाम करते, 4 चरणों पर, 5 बिना, 6 कवि बुल्हाशाह के गुरु का नाम, 7 रहस्य, भेद, 8 बगल, 9 किसको, 10 बुरी आदत, 11 पुराना, 12 दूसरा ।

[ 238 ] ग़ज़ल मुँह आई बात न रहँदी है (टेक) झूठ आलों ते कुछ बचदा है सच आँखियां भांबड़ मचदा है । जो' दोहां गल्हां तों जचदा है जच जच के जिह्वा केहंदी है ॥1॥टेक इक लाज़म बात अदब दी है सानूं बात मालूमी सब दी है । हर हर विच सूरत रब दी है कहूं ज़ाहिर कहूं छुपंदी है ॥2॥टेक जिस पाया भेद कलन्दर दा राह खोजिया अपने अन्दर दा । सुख वासी है उस मंदिर दा जित्थे चढ़ दी है न लेहंदी है ॥3॥टेक पेथे' दुन्या विच अन्हेरा' है अते तिलकन बाज़ी वेढ़ा' है । अन्दर बड़ के देखो केढा' है बाहर ख़फ़तन पई ढूँढेंदी है ॥4॥टेक किते' नाज़ अदा दिखलाई दा किते हो रसूल मिलाई दा । किते आशक़ बन बन आईदा किते जान जुदाई सैहंदी है ॥5॥टेक जदों' ज़ाहिर होय नूर होरी जल गप पहाड़ कोह तूर होरी । तदों' दार चढ़े मंसूर होरी ओथे' शेखी सेंडी" न तेंडी" है ॥6॥टेक Notes: 1 कहूं, 2 चित्त, 3 अंधेरा, 4 तिलकने का मैदान, 5 कौन, 6 कहीं, 7 जब, 8 तब, 9 हमारी, 10 तुम्हारी ।

जे ज़ाहिर करां असरार' ताईं सब भुल्ल जावन तकरार ताईं । फिर मारन बुल्हे यार ताईं पेथे मख़फ़ी' गल सुहेंदी है ॥7॥टेक असां पढ़्या इल्म तहक़ीक़ी' है ओथे इक्को हरफ हक़ीक़ी है । होर झगड़ा सब वधीकी है ऐंवें रौला पा पा वेहंदी है ॥8॥टेक बुल्हाशाह असां थीं वखें नहीं विन शौह थीं दूजा कख' नहीं । पर वेखन वाली अख' नहीं ताहीं जाँ पई दुख सेहंदी है ॥9॥ [ 239 ] राग आसावरी, ताल तीन पास खड़ा नज़रों में न आवे, ऐसा राम हमारा रे है घट में घट की सब जाने, रहत खलक़ से न्यारा रे कोई ध्यावे पीर पैग़म्बर, कोई ठाकुरद्वारा रे जप तप संयम और व्रत सब कर कर सभे हारा रे गुरु गम से कोई लक्ष्य न पावे, कहत कवीर बिचारा रे [ 240 ] ठोकर खा खा ठाकुर डिट्ठा, ठाकुर ठीकर मांहि ॥ टेक Notes: 1 रहस्य, 2 गुप्त बात, 3 तत्व ज्ञान, 4 अलग पृथक, 5 एक तिनका, 6 देखनेवाली, 7 आँख ।

ठीकर भजदा टुट्दा सड़दा, ठाकर इक्कसे थांहि ॥ ठौर ठौर विच ठहरया ठाकर, ठाकर बाहर नांहि ॥ ठग ठीक ठाकर ही ठाकर, ठाकर ही जहां तहांहि ॥ ठाकर राम नचावे नाचे, बहु जांदा जहां तहांहि ॥ [ 241 ] ग़ज़ल अज़ो-समा' कहां तेरी वुसअत' को पा सके । मेरा ही है वह दिल कि जहां तू समा सके ॥1॥ वहदत' में तेरे हफ़े'-दुई' का न आ सके । आईना' क्या मजाल' तुझे मुँह दिखा सके ॥2॥ आसिद' ! नहीं यह काम तेरा, अपनी राह ले । उस का पयाम' दिल के सिवा कौन ला सके ॥3॥ गाफ़िल' ! ख़ुदा की याद को मत भूल ज़ीनहार' । अपने तईं भुला दे अगर तू भुला सके ॥4॥ Notes: 1 पृथिवी-आकाश 2 सीमा 3 अद्वैत 4 द्वैत का वहम 5 दर्पण 6 शक्ति 7 ईश्वर का सन्देशा लाने वाला, अभिप्राय पैग़म्बर से है 8 सन्देशा 9 ऐ अज्ञानी ! वे ख़बर

[ 242 ] ग़ज़ल कब लबासे-दुनयवी' में छिपते हैं रौशन-ज़मीर' । जामा-ए-फ़ानूस' में भी शोला' उरयां' ही रहा ॥1॥ सब को देखा उस से और उस को न देखा चूँ निगह' । वह रहा आँखों में और आँखों से पिनहां' ही रहा ॥2॥ मुझ में उस में रब्त' है गोया' बरंगे-बूए-गुल' । वह रहा आग़ोश'' में लेकिन गुरेज़ां'' ही रहा ॥3॥ दीनो-ईमां ढूँढना है ज़ौक़' क्या इस वक्त में । अब न कुछ दीन' हो रहा बाक़ी न ईमां' ही रहा ॥4॥ Notes: 1 भौतिक रूप, वा वेप 2 विवेकी वा अनुभवी मनुष्य 3 चिमनी के वेष वा उपाधि में 4 तेज, प्रकाश 5 नग्न, विद्यमान, प्रकट 6 दृष्टि के समान अर्थात् नेत्र वत् 7 छिपा हुआ, अविद्यमान 8 सम्बन्ध 9 मानो, जैसे 10 पुष्प के रंग और सुगन्ध में जैसे 11 बग़ल, समीप 12 भागा हुआ, दूर 13 कवि नाम है 14 विश्वास 15 धर्म ।