ज्ञानी
ज्ञानी की आभ्यन्तर दशा [ 243 ] राग भैरवी, ताल रूपक नसीमे-बहारी चमन' सब खिला । अभी छींटे दे देके वादल चला । गुलों' । बोसा'' लो चांदनी का मिला । जवांनाज़नी' इक सराबां' वाला । हुई खुशा, मिला तछलिया' क्या भला । करीव आई, घूरी हँसी खिलखिला । न जादू से लेकिन ज़रा वह हिला । निगह' से दिया काम' को झट जला । सकी जब न सूरज में दीवा जला । परी बन गई ख़ुद मुजस्सम'' हया । Notes: 1 बसन्त ऋतु की मन्द मन्द स्पन्द (ठण्डी वायू) 2 बाग़, 3 पुष्प, 4 चुम्बन, 5 युवा बाँकी स्त्री (कामिनी), 6 अति सुन्दर, 7 एकांत 8 दृष्टि 9 कामवृत्ति (विषय वासना) 10 लज्जावती अर्थात् जब ज्ञानी रूप सूर्य में वह कामिनी अपना विषय-वासना रूपी दीपक न जला सकी, अर्थात् जब ज्ञानवान उस कामिनी के सौंदर्य रूप फंदे में न आ सका, तब वह बाँकी कामिनी स्वयं अति लज्जित हो गई ।
कि सब हुस्नेकी जान मैं ही तो हूं । मेहर-ओ-माह' के प्राण मैं ही तो हूं ॥1 हज़ारों जमा पूजा सेवा को थे थे राजे चँवर मोरछल कर रहे । थे दीवान धोते क़दम' शौक़ से थे ख़िदमत में हाज़र मद्हख़्वां खड़े । ऋषी तुम हो अवतार सबसे बड़े यह सब देख बोला लगा कहकहे' । बड़ा ही नहीं बल्कि छोटा भी हूं । न महदूद' कीजियेगा सब मैं ही हूं ॥2॥ बुरे तौर थे लोग सब छेड़ते ठठोली से थे फब्तियाँ' घड़ रहे । तड़ातड़ तड़ातड़ वह पत्थर जड़े लहू के निशां सिरपै ढलपे' पड़े । पया पै थे ज़ख़्म और सद्में' कड़े थे दीदे' अजब मुस्कराहट' भरे । कि इस खेल की जान मैं ही तो हूं । यह लीला के भी प्राण मैं ही तो हूं ॥3॥ समय नीम शव, माहे' था जनवरी हिमालय की बर्फ़, स्याह रात थी । बर्फ की लगी उस घड़ी इक झड़ी थमी बर्फ़बारी'' तो आँधी चली । बदन की तो गत वेदमजनूँ सी थी पै दिल में थी ताक़त, लबों पर हँसी कि सर्दी की भी जान मैं ही तो हूं । अनसार'' के भी प्राण मैं ही तो हूं ॥4॥ Notes: 1 सौंदर्य 2 सूर्य चंद्र, 3 चरण, पाद, 4 स्तुति करने वाले, 5 हँसकर बोध, 6 परिच्छिन्न न कीजिएगा, 7 बातें बना रहे व हँसी उड़ा रहे, 8 दुख, 9 लगातार, निरन्तर, 10 कठोर चोट, 11 नेत्र, 12 प्रसन्नता भरे, हँसी परोये हुये, 13 अर्ध रात्रि, 14 मास, 15 वर्फ़ की वर्षा, 16 दशा, 17 पञ्चभूत जिन्हें फ़ारसी में चार तत्व कहते हैं ।
( 226 ) राम-वर्षा समय दोपहर माह था जून का जगह की जो पूछो, थे उस्तवा' । तमाज़तें ने लू की दिया सब जला हरारत' से था रेग' भी भूनता । बदन मोम सा था पिघलता पड़ा पै लबों से था ख़न्दा' परोया हुआ । कि गरमी की भी जान मैं ही तो हूं । अनासार के भी प्राण मैं ही तो हूं ॥5॥ बियाबान् तनहा लक़ोदक़' गज़ब इधर मेदां' ख़ाली उधर खुश्क लब । उठाई निगह सामने, पे अजब लड़ी आँख इक शेरे-गुर्रां' से तब । यह तेज़ी से घूरा, गया शेर दब जलाले'-जमाली था चितवन में अब । कि शेरों की भी जान मैं ही तो हूं । सभी ख़लक़' के प्राण मैं ही तो हूं ॥6॥ बला मंझधारा में किश्ती घिरी यह कहता था तूफां कि हूं आख़री । थपेड़ों से झटपट चढ़ां वह चिरी उधर बिजली भी वह गिरी वह गिरी । था थामे हुए बांस ज्यूं बांसरी तवस्समुम" में जुरअतें भरी थी निरी । कि तूफ़ां की भी जान मैं ही तो हूं । अनासार के भी प्राण मैं ही तो हूं ॥7॥ Notes: 1 पृथिवी का मध्य भाग जहाँ अति गरमी होती है, 2 गरमी, 3 धूप की तेज़ी से, 4 रेत, 5 हँसी परोई हुई, 6 बड़ा भारी भयानक सुनसान वन, 7 पेट, 8 विचारने वाला व घूरने वाला शेर, 9 निज़ानन्द का तेज, 10 दृष्टि, 11 सृष्टि, 12 यहाँ अभिप्राय बेड़ी को चलाने वाले चप्पे से है, 13 मुस्कराहट, हँसी, 14 दलेरी, उत्साह, शूर वीरता व निर्भयता ।
बदन दर्दों-पेचश से सीमाब' था तपे-सख़्तो-रेज़ां से बेताब' था । नशा ज्ञान का ज्यूं मयें-नाब था वह गाता था गोया मरज़ ख़्वाब था । मिटा जिस्म जो नक़्श बरआव था न बिगड़ा मेरा कुछ कि खुद आब था । जहां भरके अब दाने-ख़ूबां में हूं । मैं हूं 'राम' हर एक को जां में हूं ॥8॥ [ 244 ] ज्ञानी की दृष्टि राग कालिंगड़ा, ताल केरवा जो ख़ुदा को देखना हो, मैं तो देखता हूं तुमको । } टेक मैं तो देखता हूं तुम को, जो ख़ुदा को देखना हो ॥ } यह हिजाबे-लाजो-सामां, यह नक़ाबे-यासो-हिरमां । यह ग़लाफ़े-नंगो-नामूस, वह दमाग़े-दिलका फ़ानूस । वह मनो-शुमा' का पर्दा, वह लबासे-चुस्त' कर्दा । वह हया' की सब्ज़ काई, वह फ़नाह सियाह रज़ाई । यह लफ़ाफ़ा जामा' खुर्दा, यह उतार सितर'' मुझको । जो बरहना'' करके झांका, तो तुम हो सफ़ा ख़ुदा हो ॥1॥टेक॥ Notes: 1 पारे के समान क्षुब्ध (तड़प रहा) था, 2 तड़प रहा था, 3 सदृश, 4 अंगूर की शराब, 5 मानो, 6 जज़ पर चित्र के समान था, 7 सुन्दर देह में, 8 (वह साज़ और सामान का) पर्दा, 9 निराशा की श्राई व पर्दा, 10 लज्जा व मान अथवा लज्जा निर्लज्जता को पर्दा, 11 मैं, तू, 12 चुस्त करने वाला वस्त्र, 13 लज्जा, 14 वस्त्र, 15 चादर, 16 नग्न ।
ऐ नसीमे-शौक़¹ ! जा के, वह उड़ादे ज़ुल्फ़ रुख़² से । ऐ सवा-ए-इल्म³ ! जा कर, दे हटा वह ख्वावे⁴-चादर । अरे बादे-तुन्दमस्ती⁵ ! दे मिटा अबर⁶ की हस्ती । ऐ नज़ार के ज्ञान गोले, यह फ़सील झट गिरादे । कि हो जहलँ⁷ भस्म इक दम, जले वेह्म हो यह आलम⁸ । जो हो चार सू⁹ तरन्नुम¹⁰, कि हैं हम ख़ुदा, ख़ुदा हम ॥2॥ टेक न यह तेरा¹¹ में है ताक़त, न यह तोप में छियाक़त । न है वर्क़¹² में यह यारा, न है ज़ाहर ही का चारा । न यह कारे-तुन्द¹³ तूफ़ाँ, न है ज़ोर शेरे¹⁴-गुर्दाँ । कोई जज़्वह¹⁵ है न शहवत¹⁶, कोई ताना-ने¹⁷ शरारत । जो तुझे हलाने आयें जो तुझे हलाने आयें, तो हो राख भस्म हो जायें । वह ख़ुदाई¹⁸ दीदे खोलो, कि हों दूर सब बलायें ॥3॥ टेक वह पहाड़ी नाले चमचम, वह बहारी अबर छम छम । वह चमकते चाँद तारे, हैं तेरे ही रूप प्यारे । दिले-अन्दलीब¹⁹ में खूँ, रखे²⁰-गुल का रंगे-गुलगूँ²¹ । Notes: 1 जिज्ञासा की पवन, 2 आत्मस्वरूप के ऊपर से माया रूपी ज़ुल्फ वा काली पर हटा दे, 3 ऐ ज्ञान की वायू (झटक), 4 स्वप्न रूपी चादर, 5 ऐ निजानन्द की घटा, 6 (पदों रूपी) बादल, 7 अज्ञान, 8 संसार, 9 चारों ओर और 10 (आनन्द की) फुहार, मन्द मन्द वर्षा, 11 तलवार 12 बिजली, 13 भारी घटा का काम, 14 चिंघाड़ने वाला वा भयानक शेर, 15 चित्त की उमंग वा जोश, 16 विषय भोग वा विषय वासना, 17 न कोई 18 ब्रह्म दृष्टि या दिव्य नेत्र, 19 बुलबुल पक्षी का दिल, 20 पुष्प की मूरत, 21 लाल रक्त वा गुलाबी रंग ।
वह शफ़क़ के सुर्ख़ इशारे, हैं तेरे ही लाल पट्ठे । है तुम्हारा नाम तो 'राम' ज़रा घर को मुँह तो मोड़ो । कि रहीम, राम हो तुम, तुम ही तो खद ख़ुदा हो ।4॥ टेक [ 245 ] रौशनी की बातें अथवा ( जुनूने नूर ) राग देश, ताल धमार मैं पड़ा था पहलू³ में राम के, दोनों एक नींद में लेटे थे । मेरा सीना⁴ सीने पै उछल रहे था, मेरा साँस उसका तो साँस था ॥ आई चुपके चुपके से रौशनी¹, दिये बोसे⁵ दीदों⁶ पै नाज़² से । लम्बी पतली लाल सी उँगलियों से, ख़ुशी से गुदगुदा दिया ? ॥ कुछ तुमको आज दिखाऊँगी ( मैं दिखाऊँगी ) ऐसा कहके हाय सुला दिया । यह जगा दिया कि सुला दिया, जाने किस बला में फँसा दिया । ऐ छो ! क्या ही नक़्शा जमा दिया, कैसा रंग जादू रचा दिया ॥ Notes: 1 उदय अस्त के समय आकाश में जो लाली होती है, साँझ, 2 नखरे, नाज़ और अदा, 3 पास, एक ओर, समीप, 4 छाती, 5 चुम्बन, 6 नेत्र ।
चली निखर कर हमें साथ ले, करी सैर हाथों में हाथ दे । मचे खेल आँखों में आँख दे, गुले वलवला सा बपा दिया ॥ इक शोर गौगा उठा दिया, निज धाम को तो भुला दिया । मुँह राम से तो मुड़ा दिया, आरामे-जाँ को मिटा दिया ॥ थक हारकर झख मारकर, हर मूँ से बोला पुकार कर । अरी नाबकारहँ रौशनी ! अरी चकमाँ तूने भला दिया ॥ खन्दाँ ! किरणें तेरी सफ़ेद हैं, बालों में रंग भरे है तू । गुलगूना मुँह पै मले है तू, नटनी ने रूप बटा लिया ॥ रुख़ देखिये तो है फ़र्क़ तेरा, दिल गर्दशों से है शर्क़ तेरा । तू उड़ती धूआँ से धूल है, रथ राम ने जो चला दिया ॥ कहो किस जवानी के ज़ोर पर तूने हमको आ के उठा दिया । यूँ कहके क़िस्सा समेटकर, दिल जाँ में यार लपेट कर । फिर लम्बी तानों में पड़ गया, गोया ग़ैरे-राम जला दिया ॥ अभी रात भर भी न बीती थी कि हो रौशनी को हवा लगी । नये नज़ारे ठट्टारे से प्यार से, मेरे चश्मे-ख़ाना को वा किया ॥ Notes: 1 शोर, 2 हल चल, 3 शोर, हुल्लड़, धूम, 4 जीवन के चैन को, 5 बाल, रोम, 6 नाकारी, बेहूदा, नटखटी, 7 धोखा, 8 ऐ निर्लज्ज, 9 किरणों से अभिप्राय बाल हैं, 10 उबटना, 11 मुख, 12 पीला, मुरझाया हुआ, 13 काल चक्र से, 14 फटा हुआ, टूटा हुआ, 15 ऐसे, 16 मानो 17 राम से भिन्न को, 18 मेरे भीतर के नेत्र वा मेरी भीतरी दृष्टि 19 खोल दिया ।
कुछ आज तुमको दिखाऊँगी, ( मैं दिखाऊँगी ), ऐसा कहके हाय ! नचा दिया । कहूँ क्या ! जी ! भरे में आ गये, कैसा सब्ज़ बाग़ दिखा दिया ॥ लड़ भिड़ के आख़िर शाम को, कह अख़ीदा सब काम को । आग़ोश¹ में ले राम को, तन उसके मन में छिपा दिया ॥ लेकिन फिर आई रौशनी, लो ! दम दिलासा चल गया । फिर फिर वही शैतानियाँ, वैसी ही कारस्तानियाँ, हँसने में और खसने में फिर दिन भर को यूँ ही बिता दिया ॥ बेहूदा टाल मटोल, जों यारों का फिर उकता गया । हम सो गये जाग उट्ठे फिर, यूँ ही अलाहउज़लें ख़्यास, वादहँ न अपना रौशनी ने एक दिन ईफ़ा किया ॥ थकने न पाई रौशनी, मामूल पर हाज़र थी यह । उमरों पै उमरें हो गईं, इसका त्वातर दौर था ॥ किस धुन में सब इक़रार थे, क्यों दिन बदिन यह मदारे थे । किस बात के दर पै थी यह ? मस्तों-ख़राबे में थी यह ? यह तो मुद्दुस्मा न खुला, सदियों का क़ज़ा होगया ॥ Notes: 1 पेच, दांव, 2 बग़ल, 3 चालाकियाँ, 4 चित्त, 5 इत्यादि, 6 इक़रार, 7 पूरा किया, 8 निरन्तर, 9 टिकाव, ठहराव, 10 प्रेममद, आनन्दित, 11 रहस्य, 12 काल समय ।
हर बात जो, समझी अजब, पास जा देखा तो तब । ख़ाली सुहाना ढोल था, धोखा था कितना ग़ौल था ॥ सब गुह्नों-कर अशज़ार थे, चपे-रास्त सब अग़यार थे । सब यार दिल पर वार थे, और वे ठिकाना कार था ॥ अपना तो हर शर्ब रूठ जाना, रौशनी का फिर मनाना । आज और कल और रोज़ो-शब की क़ैद ही में तलमलाना, सब मेहनतें तो थीं फ़ज़ूल, और कार नाहमवार था ॥ वह रौशनी का साथ चलना, अपना न हरगिज़ उसको तकना । वह रौशनी के जी की हसरत, हमको न परवा वहिक नफ़रत, सूदो-ज़ियां बीमो-रज़ा की रगड़ कारे-ज़ार था ॥ यूँ हि रफ़ता रफ़ता पड़े कभी, कभी उठ खड़े थे मरे कमी । कमी शिक़्मे-मादर घर हुआ, कभी ज़न से बोसो-किनार था ॥ बढ़ना कमी, घटना कमी, महो-जज़र दुश्वार था । गर्ज़ इन्तज़ारी-कशाकशी, दिन रात सीनह-फ़िगार था ॥ क्या ज़िन्दगी यह है बगोले की तरह पेवाँ रहे ? और कोरे-सग वन कर शिकारे-बाद में हैराँ रहे ? Notes: 1 चालाक भूत वा शैतान, 2 गूँगे बहरे, 3 वृक्ष, 4 दायें वायें, 5 अन्य लोग, अनाम-पदार्थ, 6 रात्रि, 7 चित्त, 8 शोक, 9 लाभ-हानि, 10 भय-निर्भय, 11 युद्ध, 12 माता का पेट वा गर्भ, 13 स्त्री, 14 चुम्बन, प्यार, 15 घटाव-बढ़ाव, ऊँच-नीच, 16 खैंचा तानी, 17 घायल चित्त, 18 पेच खाती रहे, 19 अन्धा कुत्ता, 20 पवन के शिकार ।
लो आग़्ग़रश आया वह-दिन, इक़रार पूरा हो गया । सदियों की मंज़िल कट गई, सब कार पूरा हो गया ॥ हाँ ! रौशनी है सुर्ख़रू, तेरा वादह आज वफ़ा हुआ । तेरे सद्क़े सद्क़े मैं नाज़नी ! कुल भेदैं आज फिदा हुआ ॥ उमरों का उक़्दह हल हुआ, कुफ़लो-गिरह सब खुल गये । सब फ़ज़ो-तक़ी उड़ गई, पाप और शुभे सब धुल गये । सब ख्वावे-दुई मिट गया, दीदे अजब यह खुल गये ॥ ऐ रौशनी ! ऐ रौशनी ! ख़ुश हो मैं तेरा यार हूँ । खाविन्द घर वाला हूँ मैं, पुश्तो-पनाहे-सरकार हूँ ॥ वह राम जो मावूद था, साया था मेरे नूर का ॥ क्या रौशनी, क्या राम, इक शोलह है मेरे तूर का । इन आँसुओं के तार के सिहरे से चिहरा खिल उठा । क्या लुत्फ़ शादी मर्ग है, हर शै से शादी वाह ! वाह ! हाँ ! सुयद-हवाद, ऐ साँप, सग ! ऐ ज़ाग, माही, चील, गिद ! इस जिस्म से कर लो ज़ियाफ़त, पेट भर भर वाह ! वाह ॥ Notes: 1 पूरा, 2 झुरँडी खुल गई, मुश्किल हल हो गई, 3 ताला और गाँठ, 4 द्वैत रूपी स्वप्ना, 5 नेत्र, 6 पति, 7 शरणदाता, आश्रय, 8 पूज्नीय, 9 प्रकाश, 10 ज्वाला, 11 अग्नि का पर्वत, 12 प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु का आनन्द, 13 प्रत्येक पदार्थ, 14 प्रसन्न हो, 15 काग, 16 मच्छी ।
आनन्द के चश्मे के नाके पर यह जिस्म इक बन्द था । वह बह गया वन्दे-खुदा, दरया बहा है वाह ! वाह !! सब फ़र्ज़ क़र्ज़ और गर्ज़ के इमराज़ यकदम उड़ गये । हल फिर गया ज़ोरो-ज़बर पर और सुहागा वाह ! वाह !! दुन्या के दल बादल उठे थे, नज़ारे-ग़लत अन्दाज़ से । लो इक निगाह से चुक गया सारा सियापा वाह ! वाह !! तन नूर से भरपूर हो, मामूर हो, मसरूर हो । वह उड़ गया, जाता रहा, पुर नूर हो, काफूर हो ॥ अब शव कहाँ ! और दिन कहाँ ? फ़र्दो है नै इमरोज़ है । है इक सरूरे-लातग़य्यर, पेश है नै सोज़ है ॥ उठना कहाँ ! सोना कहाँ ? आना कहाँ ! जाना कहाँ ? मुझ बहरे-नूरो-सरूर में, खाना कहाँ ? पाना कहाँ ? मैं नूर हूँ, मैं नूर हूँ, मैं नूर का भी नूर हूँ । तारों में हूँ, सूर्य में हूँ, नज़दीक से नज़दीक हूँ और दूर से भी दूर हूँ ॥ मैं मादनो-मखज़न हूँ, मैं मस्वा हूँ चश्मए-नूर का । आरामगह, आरामदेह हूँ, रौशनी का नूर का ॥ Notes: 1 सुख, द्वार, 2 शरीर, 3 अहंकार रूपी बन्धन, 4 रोग, 5 ऊँच-नीच, बड़े,छोटे, 6 गलत ढंग से, 7 पूर्ण, 8 खुश, प्रसन्न, 9 कल, 10 आज, 11 विकार रहित आनन्द, 12 नहीं, 13 जलन, दुःख, 14 आनन्द और प्रकाश के समुद्र में, 15 खान और भण्डार, 16 निकास, 17 आराम का स्थान, 18 आराम देनेवाला ।
मेरी तजल्ली है यह नूरे-अक़्तलओ-नूरे-अनसरी । मुझ से दरख़शाँ है यह कुल अजरामे-चख़्रे-चम्बरी ॥ हाँ ! ऐ मुवारक रौशनी ! ऐ नूरे-जाँ ! ऐ प्यारी "मैं" । तू राम और मैं एक हैं, हाँ एक हैं, हाँ एक हैं ॥ हर चश्म, हर शै, हर बशर, हर फैहा, हर मफ़हूम में । नाज़र नज़र मंज़ूर मैं, आलिम हूँ मैं, मालूम मैं ॥ हर आँख मेरी आँख है, हर एक दिल है दिल मेरा । हाँ ! बुलबुलो-गुल, मिह्रो-माह की आँख में है तिल मेरा ॥ वहशत भरे आहू का दिल, शेरे-बबर का क़ैहर का । दिल आशक़े-वेदिल का प्यारे, यार का और दैहर का ॥ अमृत भरे स्वामी का दिल, और मार पुर अज़ ज़हर का । यह सब तजल्ली है मेरी, या लहर मेरे बहर का ॥ इक बुलबुला है मुझ में सब, ईजादे नौ, ईजादे नौ । है इक भँवर मुझ में यह मर्गे-नागहाँ और ज़ादे नौ ॥ Notes: 1 तेज, 2 बुद्धि का तेज, 3 पंच भौतिक तेज, 4 चमकीले, 5 तारा गण, 6 गोल आकाश वा आकाश मण्डल के, 7 प्राण के तेज, 8 चक्षु, 9 वस्तु, 10 जीव-जन्तु, 11 समझ, ज्ञान, 12 समझा हुआ, ज्ञात, 13 दृष्टा, दर्शन दृश्य, 14 ज्ञानी, 15 सूर्य-चाँद, 16 घबराहट भरे, 17 मृग, 18 आफ़त का, 19 काल का, 20 ज़हरीले साँप का, 21 प्रकाश, 22 नई ईजाद, 23 नई उन्नति, 24 अचानक मृत्यु, 25 नई उत्पत्ति ।
सोये पड़े बच्चे को वह जाली उठाकर घूरना । आहिस्ता से मक्खी उड़ाना, तिफ़ल का वह बसूरना ॥ वह दो बजे शब को शफ़ाखाना में तिहानह मरीज़ को । उठ कर पिलाना सोडावाटर, काट अपनी नींद को ॥ वह मस्त हो नंगे नहाना, कूद पड़ना गड्ढे में । छींटे उड़ाना, गुल मचाना, गोते खाना रज्जे में ॥ वह माँ से लड़ना, ज़िद में अड़ना, मचलना, पड़ी रगड़ना । वालिद से पिटना और चिल्लाते हुए आँखों को मलना ॥ कालेज के साइंस रूम में, गैसों से शीशे फोड़ना । बारूद और गोलों से सफ़ दर सफ़ सिपाहें तोड़ना ॥ इन सब चालों में हम ही हैं, यह मैं ही हूँ, यह हम ही हैं । गर्मी का मौसम, सुबह-दम, साअत है दो या तीन का । खिड़की में दीवा देखते हो टमटमाता टीन का ! ॥ दीवे पे परवाने हैं गिरते, बेखुदी में बार बार । बेचारह लड़का कर रहा है इल्म पर जाँ को निसार ॥ बेचारे तालिबे-इल्म के चहरे की ज़र्दी है मेरी । बेनोइन्द लम्बे साँस और आहों की सर्दी है मेरी ॥ इन सब चालों में हम ही हैं, यह मैं ही हूँ, यह हम ही हैं । Notes: 1 बच्चा, 2 प्यासा, 3 पंक्तिवार, 4 बड़ी, 5 विद्या, 6 विद्यार्थी ।
है लहलहाता खेत, पुरवा चल रही है ठुम ठुमक । गाढ़े की धोती, लाल चीरा चौधरी की लट लटक ॥ जोदो-उवानी ! मस्त, अलगोज़ा बजाना उछलना । मुगदर घुमाना, कुश्ती लड़ना, पिछड़ना और कुचलना ॥ छकड़ा लदा है वोझ से, हिचकोले खाता बार बार । वह टाँग एर धर राँग पड़ना, वोझ ऊपर हो सवार ॥ शिद्दत की गर्मी, चील अंडे के समय, सरे-दोपहर । जा खेत में हल का चलाना, अंग में हो तरबतर ॥ और सर पै लोटा छाछ का, कुछ रोटियाँ, कुछ साग धर । भत्ता उठा कुत्ते को ले, औरत का आना पँठ कर ॥ इन सब चालों में हम ही हैं, यह मैं ही हूँ, यह हम ही हैं । दुलहन का दिल से पास आना, ऊपर से हकना, झिझक जाना । शामो-हया का इशक़ के चुहलाल में रह रह के आना ॥ वह माहे-गुलरू के गले में डाल बाहें प्यार से । ठण्डे चश्मों के किनारे, बोलद-वाज़ों यार से ॥ हाँ ! और वह चुपके से छिप कर, आड़ में अशजार के । बेदाम खुफ़िया पुलिस बनना, राम की सरकार के ॥ Notes: 1 अत्यन्त गर्मी, 2 पसीने से मुराद है, 3 स्त्री, 4 चन्द्रमुख प्रिया, 5 चुम्बन का लेना, 6 वृक्ष ।
इन सब चालों में हम ही हैं, यह मैं ही हूँ, यह हम हा ह । यह सब तमाशे हैं मेरे, यह सब मेरी करतूत है ॥ वह इस तरफ खा खा के मरना, उस तरफ फाकों से गुम । वह बिलवलाना जेल में, जंगल में फिरना सुम बकुम ॥ और वह गद्दैले कुर्सियाँ, तकिये बिछौने, वग्गियाँ । सब मादरे-सुस्ती बवासीरो-ज़ुकाम और हिचकियाँ ॥ यह सब तमाशे हैं मेरे, यह सब मेरी करतूत है । वह रेल में या तार घर में, महल कुँवारिनखीन में । रूस, अफ़्रीका, ईरां में, जापान में या चीन में ॥ सिसकना, दुखड़े सुनाना, खून बहाना ज़ार ज़ार । वह खिलखिलाना कहकहों और चहचहों में बार बार ॥ वह वक़ पर बारश न लाना, हिन्द में या सिन्ध । फिर राम को गाली सुनाना, तंग होकर हिन्द में ॥ वह धूप से सब को मिसाले-मुर्ग बिरयाँ भूनना । बादल की साढ़ी को किनारी चान्दनी से गूँदना ॥ चुप होके खानी गालियाँ, साले से उस शिशुपाल से । खुश हो सलीबो-दार पर, चढ़ना मुबारक हाल से ॥ Notes: 1 बहरे (बोले) और गूँगे, 2 भूने हुए पक्षी के सदृश, 3 इस सा व्यक्ति से कृष्ण भगवान् का गाली खाना अभिप्रेत है, 4 सूली ।
यह कुल तमाशे हैं मेरे, यह सब मेरी करतूत है । इन सब चालों में हम ही हैं, यह मैं ही हूँ, यह हम ही हैं ॥ मोहताज़¹ के, बीमार के, पापी के और नादार² के । हमलब-ओ-हमबग़ल³ हूँ, हमराज़⁴ हूँ बेयार का ॥ सुनसान शब⁵ दर्या किनारे हैं खड़े डटकर तो हम । और क़ैदे-तख़्तो-ताज में गर हैं पड़े जकड़े तो हम ॥ सस्ते से सस्ते हैं तो हम, महँगे से महँगे हैं तो हम । ताज़ा से ताज़ा हैं तो हम, सब से पुराने हैं तो हम ॥ वाहिद⁶ हूँ, मुझ को मेरा ही सिजदा⁷ सलाम है । मेरी नमस्ते मुझ को है और राम राम है ॥ जानते हो ? आशिक़-ओ-माशूक़⁸ जब होते हैं एक । वे बेशुबहा⁹ मेरी ही छाती पर वहम सोते हैं नेक ॥ पुण्य में और पाप में, हर बाल साँस और माँस में । दूर कर आँखों से परदा, देख जल्वा¹⁰ ख़ास में ॥ कुछ सुना तुम ने ! अजब चालें मेरी चालाकियाँ । वे हिजाबाना¹¹ कश्फ़े¹², लाधड़क बेबाकियाँ¹³ ॥ Notes: 1 भूखा, 2 निर्धन, 3 नितान्त समीप, 4 भेद जानने वाला, 5 रात्रि, 6 अद्वैत, एक अकेला, 7 सुनना, प्रणाम, 8 प्रेमी और प्रिया, उपासक और उपास्य, 9 निःसन्देह, 10 एकत्र, 11 दर्शन, 12 पड़ों रहित करामात, 13 निर्भयता, निडरपना ।
हाँ, करोड़ों ऐब, जुर्म, अफ़आले-नेक¹, अमाले-ज़िश्त² मुझ में मुत्तसव्विर³ हैं दोज़ख, मैकदह⁴, मस्जिद, बहिश्त ॥ मार देना, झूठ बकना, चोर-यारी और सितम⁵ । कुल जहाँ के ऐब रिन्दाना⁶ पड़े करते हैं हम ॥ ऐ ज़मीन् के बादशाहो ! पण्डितो, परहेज़गारो⁷ ! ऐ पुलिस ! ऐ मुद्दई, हाकिम, वकील, ऐ मेरे यारो ! लो बता देते हैं तुम को राज़े-ख़ुफ़िया⁸ आज हम । अपने मुँह से आप ही इक़रार ख़ुद करते हैं हम ॥ "ख्वाह चोरी से कि यारी से सब खपा लेता हूँ मैं । सब की मलकीयत को, मक़बूज़ात⁹ को और शान को" ॥ यह सितम, यारो ! कि हरगिज़ भी तो सह सकता नहीं । ग़ैरे-ख़ुद¹⁰ के ज़िक्र को, या नाम को, कि निशान को ॥ खुदकुशी¹¹ करते हैं सब क़ानून, तनक़ीह-ओ-जरह । दूर ही से देख पाते हैं जो मुझ तूफ़ान को ॥ कुल जहाँ बस एक खर्राटा है मस्ती में मेरा । ऐ ग़ज़ब¹²! सच कर दिखाता हूँ मैं इस बोहतान¹³ को ॥ Notes: 1 पुण्य कर्म, 2 पाप कर्म, 3 कल्पित, 4 शराब खाना, 5 अत्याचार, ज़ुल्म, 6 निर्भय वा निःशंक होकर, 7 व्रत और तप करने वाले, 8 गुह्य, भेद, 9 अधिकार, संपत्ति, 10 अपने से अतिरिक्त वा भिन्न, 11 आत्मघात, 12 आश्चर्य, 13 झूठ ।
क्या मज़ा हो, लो भला दौड़ो, मुझे पकड़ो, मुझे पकड़ो, मुझे पकड़ो कोई । रिन्दमस्तों का शहनशाह हूँ मुझे पकड़ो, मुझे पकड़ो, मुझे पकड़ो कोई ॥ सीनाज़ोरी¹ और चोरी, छेड़-छाड़, अठखेलियाँ । चुटकियाँ सीना में भरता हूँ, मुझे पकड़ो कोई ॥ खा के माखन, दिल चुराकर, वह गया, मैं वह गया । मार कर मैं हाथ हाथों पर यह जाता हूँ, मुझे पकड़ो कोई ॥ रात दिन छुप कर तुम्हारे द्वार में बैठा हूँ मैं । बाँसुरी में गा बुलाता हूँ, मुझे पकड़ो कोई ॥ आऊँगा, लो उड़ा दीजियेगा मेरे जिस्म² को । नाम मिट जाने से मिलता हूँ, मुझे पकड़ो कोई ॥ दस्तो-पा³, गोशो-दीदा⁴, मिस्ले-दस्ताना⁵ उतार । हुलिया सूरत को मिटाता हूँ, मुझे पकड़ो कोई ॥ साँप जैसे केंचली को, फेंक नामो-निशाँ⁶ को । वे खिलहा⁷ के वश में आता हूँ, मुझे पकड़ो कोई । नठ गया, वह नठ गया ! नठ कर भला जाऊँ कहाँ । मुँह तो फेरो ! यह खड़ा हूँ, लो ! मुझे पकड़ो कोई ॥ Notes: 1 ज़बर दस्ती, 2 शरीर, 3 हाथ पाँव, 4 कान और आँख, 5 दस्ताना की तरह, 6 लज्जा और निर्लज्जा, 7 हथ्यार रहित ।
आते आते मुझ तलक, मैं ही तो तुम हो जाओगे । आप को जकड़ो ! अगर चाहो मुझे पकड़ो कोई ॥ आतशे-सोज़ा¹ हूँ, मुझ में पुण्य क्या और पाप क्या । कौन पकड़ेगा मुझे ? और हाँ ! मेरा पकड़ेगा क्या ? ॥ [ 246 ] ज्ञानी की ललकार ( अर्थात् दुन्या की छत पर से ललकार ) ⚝ 10 राग आनन्द भैरवी, ताल धमाली ⚝ बादशाह दुन्या के हैं मोहरें मेरी शतरंज के । दिललगी की चाल हैं सब रंग सुलह-ओ-जंग के ॥ रक़्से-शादी² से मेरे जब काँप उठती है ज़मीन् । देख कर मैं खिलखिलाता क़हक़हाता³ हूँ वहीं ॥ खुश खड़ा दुन्या की छत पर हूँ तमाशा देखता । गाह⁴ बगाह देता लगा हूँ, वैहड़ियों⁵ की सी सदा⁶ ॥ Notes: 1 सब कुछ जलादेने वाली अग्नि, 2 प्रसन्नता के नृत्य से, 3 खिल कर हँसना, 4 कभी कभी, 5 वनचरों, 6 आवाज़, घोषणा ।
ऐ मुकाली¹ रेल गाड़ी ! उड़ गई । ऐ सिर² जली । ऐ खरे-दउज़ाल³! नथरा वाज़ीयों में जू⁴ परी ॥ भोले भाले आदमी भर भर के लम्बे पेट में । ले डकारें⁵ लोटती है रेत में या खेत में ॥ छोड़ धोका वाज़ीयाँ और साफ़ कह, सच मुच बता । मंज़िले-मक़सूद⁶ तक कोई हुआ तुझ से रसाँ⁷ ॥ पेट में तेरे पड़ा जो वह गया ! लो वह गया ! । लैक⁸ हाय ! मंज़िले-मक़सूद पीछे रह गया ॥ ऐ जवान् बाबू ! यह गरमी क्यों ? ज़रा थमकर चलो । वेग हो कर हाथ में सरपट न यूँ जल्दी करो ॥ दौड़ते क्या हो बराते-नूर⁹ के मिलने को तुम ! । वह न बाहर है, ज़रा पीछे हटो, अंदर¹⁰ को तुम ॥ क्यों हो मुजरम¹¹ । पेहकारों की खुशामद में पड़े ? यह कचैहरी वह नहीं, तुमको रिहाई¹² दे सके ॥ Notes: 1 काले मुखवाली, 2 जले हुए सिरवाली अर्थात् सिर से धुआँ निकालने वाली, 3 एक गधा को कहते हैं जो हज़रत ईसा के शत्रु के तले रहता था और जिस का पेट अत्यन्त लम्बा था और बाक़ी अंग बहुत छोटे, सो रेल को उस गधे के दृष्टान्त से दर्शाया है, 4 परी के समान, 5 सीटी अथवा चीख से अभिप्राय है, 6 अन्तिम लक्ष्य स्थान, वा असली घर, 7 पहुँचा, 8 किन्तु, 9 तेज के पुंज या प्रकाश के विवाह में, 10 भीतर, 11 अपराधि, 12 छुटकारा, मुक्ति ।
पहन कर पोशाक गैहने बुर्क़ा ओढ़े नाज़¹ से । चोरी चोरी गुलबदन² मिलने चली है यार से ॥ ऐ मुहब्बत से भरी ! ऐ प्यारी बीबी ख़ूबरू³ ! । चौंक मत, घबरा नहीं, सुन कर मेरी ललकार⁴ को ॥ निकल भागा दिल तेरा, पैरों से बढ़ कर दौड़ में । दिल हरम⁵ है यार का, साकन⁶ हो, गिर नैं⁷ दौड़ में ॥ हो खड़ी जा ! बुर्क़ा जामा और बदन तक दे उतार । बेहया हो, एक दम में, लो अभी मिलता है यार ॥ दौड़ क़ासद⁸ ! पर लगा कर, उड़ मेरी जाँ ! पेच खाकर । हर दिलो-हर जाँ⁹ में जाकर, बैठ जम कर घर बना कर ॥ "मैं खुदा हूँ", "मैं खुदा हूँ" राज़¹⁰ जाँ में फूँक दे । हर रगो-रेशे¹¹ में घुस कर मस्ती-ओ-मुल¹² ठोंक दे ॥ गैरबीनी-गैरदानी¹³ और गुलामी बंदगी ( को ) । मार गोलो दे धड़ा धड़, एक ही एक फूँक दे ॥ Notes: 1 नखरे से, 2 पुष्प के बदन वाली, अति कीमत, यहाँ वृति से अभिप्राय है, 3 अति सुंदर, 4 आवाज़, ध्वनि, 5 मन्दिर, 6 नहीं, 7 स्थित, 8 सन्देशा ले जाने वाला, 9 प्रत्येक चित्त और प्राण में, 10 गुह्य भेद, रहस्य, 11 प्रत्येक नस और पट्ठे में, 12 सत्ती (निजानन्द) और शराब (ज्ञानामृत), 13 द्वैत दृष्टि, द्वैत भावना ।
रौशनी¹ पर कर सवारी, आँख से कर नूर-वारी । हर दिलो-दीदा² में जा झंडा अलफ़³ का ठोंक दे ॥ [ 247 ] ज्ञानी का गंगा-स्नान ⚝ राग जंगला, ताल तीन ⚝ गंगा ! तैंहीं⁴ सद⁵ बलिहारे⁶ जाऊँ (टेक) हाड चाम सब वार के फेंकूं । यहीं फूल पताशे लाऊँ ॥1॥ गंगा० मन तेरे बन्दरन को दे दूँ । बुद्धि धारा में बहाऊँ ॥2॥ गंगा० चित्त तेरी मछली चव जावें । अहंकृ⁷ गिर-गुहा⁸ में दबाऊँ ॥3॥ गंगा० पाप पुण्य सभी सुलगा कर । यह तेरी जोत जगाऊँ ॥4॥ गंगा० तुझ में पहूँ तो तू बन जाऊँ । ऐसी डुबकी लगाऊँ ॥5॥ गंगा० Notes: 1 नेत्र से आनन्द रूपी प्रकाश की वर्षा, 2 प्रत्येक दिल और नेत्र, 3 यों तो मुराद अद्वैत के फंडा से है, पर रसाला अलफ़ (मासिक पत्र) जो ब्रह्मलीन स्वामी राम ने गृहस्थाश्रम के समय केवल अद्वैत प्रतिपादन करने निमित्त निकाला था, उस से भी अभिप्राय है, 4 तुझ पर, 5 सौ बार, 6 सदक़े जाऊँ, क़ुर्बान जाऊँ, 7 अहंकार, 8 पर्वत की गुफा ।
पण्डे जल थल पवन दशों-दिक्¹ । अपने रूप बनाऊँ ॥6॥ गंगा० रमण करूँ सत्² धारा माँहि । नहीं तो नाम न राम धराऊँ ॥7॥ गंगा० [ 248 ] राम की गंगा-स्तुति ⚝ राग सिन्धड़ा, ताल तीन ⚝ नदीयाँ दी सरदार ! गंगा रानी ! । छींटे जल दे दे न बहार, गंगा रानी ! ॥ सानू³ रख जिन्दड़ी दे नाल⁴, गंगा रानी । कदे⁵ वार, कदे पार, गंगा रानी ! ॥ सौ सौ घोटे गिन गिन मार, गंगा रानी ! । तेरीयां लैहराँ राम अस्वार, गंगा रानी ! । [ 249 ] कश्मीर में अमर नाथ की यात्रा (1) पहाड़ों की सैर ⚝ राग पहाड़ी, ताल चलन्त ⚝ पहाड़ों का यूँ लम्बी तानें यह सोना⁶ । वह गुफ़ाओं दरख़्तों⁷ का दोशाला⁸ होना ॥ Notes: 1 दशों ओर अर्थात् सर्व ओर, 2 सप्त धारा वा सत्य की धारा, 3 हमें, 4 अवश्य, 5 कभी, 6 बेखबर सोना, 7 घने, 8 पोशाक ओढ़े हुए अर्थात् सरसब्ज़ ।
वह दामन¹ में सज्जा क्या मख़मल बिछौना । नदी का बिछौने की ज़ालर परोना ॥ यह राहत-मुजस्सम² है, यह आराम मैं हूँ । कहाँ कोहो-दरया³, यहाँ मैं ही मैं हूँ ॥1॥ (2) पर्वत पर बादल और वर्षा यह पर्वत की छाती पै बादल⁴ का फिरना । वह दम भर में अब्रों⁵ से पर्वत का घिरना ॥ गरजना, चमकना, कड़कना, निखरना । छमाछम, छमाछम, यह बूँदों का गिरना ॥ अक्से-फ़लक⁶ का वह हँसना, यह रोना । मेरे ही लिये है फ़क़त⁷ जान खोना ॥2॥ (3) कोसों तक क़ुदरती गुलज़ार का चले जाना रंगा रंग के फूल हर चार सूँ⁸ शिगुफ़्ता⁹ यह वादी¹⁰ का रंगीं¹¹ गुलों¹² से लहकना । फ़ज़ा¹³ का यह बू से सिरापा¹⁴ महकना ॥ यह बुलबुल-सा¹⁵ खंदाँ-लबों¹⁶ का चहकना । वह आवाज़ो-नय¹⁷ का हर-सू¹⁸ लपकना ॥ Notes: 1 पर्वत की तलहटी, किनारह, पर्वत तलेटी का जंगल, मैदान, 2 शान्तमूर्ति वा शान्तस्वरूप, 3 पर्वत और दरया, 4 बादल, 5 बादल साफ होना, 6 आकाश की दुल्हन, मुराद इंद्र से है, 7 केवल, 8 चारों ओर, 9 खिले हुए, 10 घाटी, 11 भाँति भाँति के, 12 पुष्पों, 13 खुला मैदान, 14 सिर से पाँव तक अर्थात् एक सिरे से दूसरे सिरे तक सुगंधि देना, 15 बुलबुल पक्षी के सदृश समान, 16 खिड़े हुए हँसते हुए होंठ, 17 बाँसुरी के आवाज़, 18 सर्व ओर ।
गुलों की यह कसरत¹, इरम²-रुख़³ है । यह मेरी ही रंगत है, मेरी ही बू है ॥3॥ (4) एक और दिलकश मुक़ाम जो जू और चश्मा⁴ है, नग़मा-सरा⁵ है । किस अन्दाज़⁶ से आब⁷ बल खा रहा है ॥ यह तख्यों पै तख्ते हैं, रेशम बिछा है । सुहाना⁸ समा, मन लुभाना⁹ समा है ॥ जिधर देखता हूँ, जहाँ देखता हूँ । मैं अपनी ही ताब¹⁰ और शाँ¹¹ देखता हूँ ॥4॥ (5) झरनों की बहार नहीं चादरें, नाचती सीम-तन¹² हैं । यह आवाज़ ! पाज़ेब¹³ हैं नारा-ज़न¹⁴ हैं ॥ Notes: 1 अधिकता, 2 स्वर्ग का बाग़, 3 सामने, 4 नैहर, 5 आवाज़ दे रहा है, बोलता है, 6 ढंग, 7 जल, 8 दिलपसंद, 9 मन को मोह लेने वाला, 10 चमक, दमक, प्रकाश, तेज़, 11 दबदबा, वैभव, मान, शक्ल, सूरत, 12 चाँदी के बदन वाली ( अर्थात् यह जल की धारा नहीं बल्कि सफेद शरीर वाली चादरें हैं जो नाच कर रही है ), 13 पाओं का एक ज़ेवर होता है जो चलते समय सुन्दर आवाज़ देता है, 14 आवाज़ दे रही वा शोर कर रही हैं ।
फुहारों¹ के दाने, क़मर²-फ़िगन हैं । सफ़ाई आहा ! रूए-मह³ पुर-शिकन हैं ॥ सबा⁴ हूँ मैं, गुल चूमता, बोसा लेता । मैं शमशाद⁵ हूँ, झूम कर दाद⁶ देता ॥5॥ (6) क़ुदरती महफ़िल मेरे सामने एक महफ़िल सजी है । है सब सीम-सर⁷ पीर⁸, पुर-सब्ज़⁹ जी¹⁰ है ॥ शज़र¹¹ क्या है, मीना¹² पै मीना धरी है । न झरनों का झरना है, क़ुलक़ुल¹³ लगी है ॥ लुढ़ाये यह शीशे कि बह निकली नैहरें¹⁵ । है मस्ती-मुजस्सम¹⁴ यह, या अपनी लैहरें ॥6॥ (7) श्रीनगर से अनन्त नाग को किश्ती में जाना रवाँ¹⁶ आबे-दरया है, क़श्ती दवाँ¹⁷ है । सत्रां¹⁸ नुज़हत-आगीं¹⁹, सुबहदम²⁰-वज़ाँ²¹ है ॥ Notes: 1 एक प्रकार का मोती है, मुराद यह है कि फुहारों जो अपनी बूँदें बाहर फैंक रही हैं वह मानो अति सुन्दर मोती बाहर डाल रही हैं, 2 चन्द्र मुख, 3 बल डाले हुए हैं (अर्थात् चंद्र भी इस सफ़ाई से ईर्ष्या वा लज्जा कर रहा है), 4 प्रातःकाल की आनन्द दायक वायु, 5 सरू वृक्ष को कहते हैं, 6 सराहना करता उच्चर देता, 7 चाँदी के सिरवाले अर्थात् सफेद बाल वा सिरवाले, अभिप्राय बर्फ के पर्वतों से है, 8 वृद्ध, 9 हरा भरा, प्रसन्न, 10 चित्त, 11 वृक्ष, 12 एक प्रकार का हरे (सब्ज़) रंग का पत्थर, 13 सुराही या बोतल से जल निकालते समय जो शब्द होता है, 14 निजानन्द स्वरूप, 15 चल रहा है, 16 दरया का बल, 17 भाग रही अर्थात् बह रही है, 18 प्रातःकाल की पवन, 19 तरोताज़गी से भरी हुई शुद्ध पवित्र वायु, 20 प्रातःकाल, 21 बाँधे रही है, अर्थात् प्रातःकाल की वायु तरोताज़गी से भरी हुई सरसर चल रही है ।
यह लैहरों पै सूरज का जल्वा¹ अयाँ² है। बलन्दी पै बरफ इक तजल्ली-फशाँ³ है॥ ज़हूर⁴ अपने ही नूर⁵ का तूर⁶ पर है। पदीद⁷ अपनी ही दीद⁸ कुल⁹ बैहरो-बर¹⁰ है॥ 7॥ ( 8 ) झील डल में इर्द गिर्द के पर्वतों का प्रतिविम्ब पड़ना, वायु से जल का हिलना, और इसी कारण से वायु के झकोरों से बड़े भारी पर्वतों का हिलते दिखाई देना डलकता है डल¹¹, दीदा¹²-प महल्ला सा। धड़कता है दिल आयीना¹³ पुर सफा का॥ हिलाता है कोहों¹⁴ को सदमा¹⁵ हवा का। खिले हैं कँवल फूल, है इक वला¹⁶ का॥ यह सूरज की किरणों के चप्पे लगे हैं। अजब नाओ भी हम हैं, खुद खे¹⁷ रहे हैं॥ 8॥ ( 9 ) श्री अमर नाथ की चढ़ाई चढ़ाई मुसीबत¹⁸, उतरना यह मुश्कल। फिसलनी बरफ तिस पे आफत यह बादल॥ Notes: 1 प्रकाश, तेज, 2 प्रकट. भासमान, 3 चमक मार रही है, 4 प्रकाश दृश्य, 5 तेज, 6 पर्वत से मुराद है, 7 दृश्य, सृष्टि, 8 दृष्टि, 9 समस्त, 10 पृथ्वि और समुद्र वा जल थल, 11 सरोवर का नाम, 12 चन्द्र मुख प्रिया के नेत्र समान, 13 शुद्ध साफ शीशे की तरह, 14 पर्वतों, 15 चोट, टक्कर, 16 चला रहे हैं, ठेल रहे हैं, 17 कष्ट भरी, कठिनता पूर्ण।
क़यामत¹ यह सरदी कि बचना है मुहाल²। यह बू बूटियों की, कि घबरा गया दिल॥ यह दिल लेना, जाँ लेना, किसकी अदा³ है ?। मेरी जाँ की जाँ, जिस पै शोख़ी फ़िदा⁴ है॥ 9॥ ( 10 ) पर्वत पर पूर्णिमा की रात्रि अजब लुत्फ़⁵ है कोह⁶ पर चाँदना का। यह नेचर⁷ ने ओढ़ा है जाली दुपट्टा॥ दिखाता है आधा, छिपाता है आधा। दुपट्टे ने जोबन कीया है दोबाला॥ नशे में जवानी के माशूक़े-नेचर। है लिपटी इस राम से मस्त हो ज़र॥ 10॥ ( 11 ) अमर नाथ का अति विशाल खुदाई हाल¹² जिसे लोग गुफा कहते हैं बरफ जिस में सुस्ती है जड़ता है, लाशे¹³। अमर-लिंग इस्तादा¹⁴ चेतन की जा¹⁵ है॥ मिलो यार, हुआ वस्ल¹⁶, सब फासला¹⁷ ते। यही रूप दायम¹⁸ अमर-नाथ का है॥ Notes: 1 अत्यन्त भारी, 2 झूठ अर्थात् असम्भव, 3 नखरा, काम, वारे, सदक़े है, 4 आनन्द, 5 पर्वत, 6 कुदरत, प्रकृति, 7 सौंदर्य, 10 यौवन, 11 प्रकृति (कुदरत) रूपी प्रिया, 12 बड़ा खुला कमरा, 13 कुछ चीज़ नहीं, वस्तु मात्र, 14 खड़ा हुआ, 15 स्थान, स्थिति है, 16 मिलाप, मेल, भेंटना, 17 सब अंतर, फ़र्क़ दूर हुआ, मिट गया, 18 नित्य सर्वदा रहनेवाला।
वह आये उपासक, तख़य्युन¹ मिटा सब। रहा राम² ही राम "मैं" "तू" मिटा जब॥ [ 250 ] निवास-स्थान की रात्रि ❀ राग आसा, ताल दादरा ❀ अर्थात् उत्तराखंड में गंगातट पर एकांत निवास स्थान की प्रथम रात्रि रात का वक़्त³ है वियाबाँ⁴ है। खुश-वज़ा⁵ पर्वतों में मैदाँ है॥ 1॥ आस्माँ⁶ का बतायें क्या हम हाल। मोतियों से भरा हुआ है थाल॥ 2॥ चाँद है मोतियों में लाल धरा। अबर⁷ है थाल पर रुमाल पड़ा॥ 3॥ Notes: 1 भेद भाव, उपाधि, अन्तर, क़ैद, परिच्छिन्नता, 2 ईश्वर, कवि के नाम से भी मुराद है, 3 समय, 4 मैदान, 5 उत्तम बनावट वा ढंग, वाले पर्वत, 6 आकाश, 7 बादल। * स्वामी राम जब अपने कुटुम्ब के साथ उत्तराखंड में पहुँचे, वहाँ रियासत टिहरी की राजधानी के समीप गंगातट पर एक सुन्दर एकांत स्थान ( सेठ मुरलीधर का बागीचा ) पाया, जिसे राम ने एकांत निवासार्थ चुना, उस स्थान पर प्रथम रात्रि के समय की शोभा राम वर्णन करते हैं।
सिर पर अपने उठा के ऐसा थाल। रक़्स¹ करती है नेचर-खुशहाल² ॥ 4॥ वाद³ को क्या मज़े की सूझी है। राम के दिल की बात बूझी है॥ 5॥ पास जो बह रही है गंगा जी। अबख़रे⁴ उस के लद लदाते ही॥ 6॥ ला रही है लपक कर राम के पास। क्या ही ठंडक भरी है गंगा-बास⁵?॥ 7॥ फ़ख़रे-खिदमत⁶ ले बाद है खुरसंद⁷। जा मिली बादलों से हो के बलन्द॥ 8॥ अब तो अठखेलियाँ ही करती है। दामने-अबर⁸ को लो उलटती है॥ 9॥ लो उड़ाया वह पर्दा-ए, हमाल। आस्माँ दिखाया है माला माल॥ 10॥ शाद⁹ नेचर¹⁰ है जगमगाती है। आँख हर चार सू¹¹ फिरती है॥ 11॥ Notes: 1 नाचती है, 2 सुखी, वा सुख स्वरूप प्रकृति, 3 वायु, 4 जलकी भाप, धूआँ, 5 गंगा जलकी सुगंध, 6 सेवा के मान से, 7 प्रसन्न, खुश, 8 बादल का पर्दा, किनारा, सिरा, 9 खुश, प्रसन्न, 10 प्रकृति, 11 चारों ओर।
क्या कहूँ चाँदनी में गंगा है। दूध हीरों के रंग रंगा है॥ 12॥ वाह ! जंगल में आज है मंगल¹। सैर कर इस तरफ की चल ! चल ! चल!॥ 13॥ [ 251 ] निवास स्थान की बहार ( ऋतु इत्यादि ) का वर्णन ❀ राग आसा, ताल दादरा ❀ आ देख ले बहार कि कैसी बहार है ( टेक ) गंगा का है किनार², अजब सब्ज़ा-ज़ार³ है। बादल की है बहार हवा खुशगवार⁴ है॥ क्या खुशनुमा पहाड़ पै वह चश्मा⁵-सार है। गंगा ध्वनी सुरीली है, क्या लुत्फ़⁶-दार है॥ आ० 1 बाहर निगाह⁷ कीजिये तो गुलज़ार है खिला। अंदर सकूँ⁸ की तो भला हद कहाँ दिला⁹॥ कालिज क़दीम का यह सरे-मू¹⁰ नहीं हिला। पढ़ाता मारफ़त¹¹ का सबक़ मेरा यार है॥ आ० 2 Notes: 1 आनन्द, 2 तट, किनारा, 3 मनोहर, आनन्द दायक, 4 रमनीय, 5 धारा बहती है, 6 आनन्द दायक, 7 दृष्टि, 8 आनन्द, 9 ऐ दिल, 10 बाल चींका नहीं हुआ ( अर्थात् बढ़ाना बंद नहीं हुआ ) 11 आत्मज्ञान।
वक़्ते-सुबहे-ईद तमाशा ल्यार है। गलगूना¹ मुँह पै मल के खड़ा गुलज़ार² है॥ शाहे-फ़लक³ से या जो हुई आँखचार⁴ है। मारे शरम के चेहरा बना सुरख-नार⁵ है॥ आ० 3 क़तरे हैं ओस के कि दुरों⁶ की क़तार है। किरणों की उन में, वल⁷ वे, नज़ाकत⁸ यह तार है॥ मुर्ग़ाने-खुश-नवाँ⁹, तुम्हें काहे की आर¹⁰ है। गाओ बजाओ, शब¹¹ का मिटा दिल से बार¹² है॥ आ० 4 माशूक़¹³ क़द दरख़तों पै बेलों का हार है। नै नै ग़लत है, ज़ुल्फ़ का पेचाँ¹⁵ यह मार¹⁶ है॥ वाह वा ! सजे सजाये हैं, कैसा शृंगार है। अशजार¹⁷ में चमकता है, खुश आबशार¹⁸ है॥ आ० 5 अशजार सिर हिलाते हैं, क्या मस्त वार है। हर रंग के गुलों से चमन लाला-ज़ार¹⁹ है॥ भँवरे जो गूँजते हैं, पड़े तार नगार²⁰ है। आनन्द से भरी यह सदा²¹ आवाज़²² है॥ आ० 6 Notes: 1 आनन्द की प्रातःकाल का समय, 2 उबटना, (उगाल), 3 फूल जैसी गालों (कपोलों) वाला प्यारा, 4 सूर्य, 5 परस्पर दर्शन, परस्पर मेल, 6 भाग की तरह लाल, 7 मोतियों, 8 बहिश्त, 9 कोमलता, वा नाज़ुक सा धागा, 10 अच्छा गानेवाले पक्षी, 11 शरम, लज्जा, 12 रात्रि, 13 बोझ (अर्थात् रात गयी और प्रातःकाल हुआ), 14 प्रेम मूर्ति वा प्यारी के क़द समान, 15 नहीं, नहीं, 16 पेचदार, 17 साँप, 18 दरख़तों, 19 भरना, 20 सुरख रंग, 21 सुनैहरी रंग जिन के परों पर होते हैं, 22 ध्वनि वा आवाज़।
गंगा के रू-सफ़ा¹ से फिसलती न ग़र नज़र²। लैहरों पे अक्स³ मिहर⁴ का क्यों बेक़रार⁵ है॥ विष्णु के शिव के घर का असासा⁶ यह गंग है। यहाँ मौसमे-ख़िज़ाँ⁷ में भी फ़सले-बहार⁸ है॥ आ० 7 साक़ी⁹ वह मैं¹⁰ पिलाता है, तुशीं¹¹ को हार है! वाह क्या मज़े का खाने को ग़म का शिकार है॥ दिलदारे¹²-खुश-अदा तो सदा हमकनार¹³ है। दर्शन शराबे-नाब¹⁴, सखुन¹⁵ दिल के पार है॥ आ० 8 मस्ती मुदाम¹⁶-कार, यही रोज़गार है। गुलबीन्¹⁷ निगाह¹⁸ पड़ते ही फिर किस का ख़ार¹⁹ है॥ क्यों ग़म से तू निज़ार²⁰ है क्यों दिलफ़गार²¹ है। जब राम क़ल्ब²² में तेरे खुद यारे-ग़ार²³ है॥ आ० 9 [ 252 ] ज्ञानी का घर ( वा महफ़िल ) ❀ राग पहाड़ी, ताल धुमाली ❀ सिर पर आकाश का मंडल है, धरती पै सुहानी²⁴ मखमल है। दिन को सूरज की महफ़ल है, शब²⁵ को तारों की सभा बावा॥ Notes: 1 शुद्ध रूप, 2 अगर, 3 दृष्टि, 4 प्रतिबिम्ब, साया, 5 सूर्य, 6 चंचल, अस्थिर, 7 संपत्ति, माल, 8 ज्येष्ठ आषाढ़ की रीति जब पत्ते भरने लगते हैं, 9 वसंत ऋतु, 10 आनंद रूपी शराब पिलानेवाला, अर्थात् ब्रह्मवित गुरू, 11 प्रेमसंद, 12 खटाई अर्थात् विषय-वासना, 13 अच्छे नखरे टखरे करनेवाला प्यारा, 14 साथ, 15 श्रंगूर की शराब, 16 बात चीत, 17 नित्य रहनेवाली, 18 पुष्प (गुण) देखनेवाली, 19 दृष्टि, 20 काँटा (अवगुण), 21 दुवला पतला, दुर्बल, 22 घायल चित्त, ज़खमी दिल, 23 अंतःकरण, 24 भरकायार अर्थात् सच्चा प्यारा व अन्तर्यामी, 25 दिल को भानेवाली, 26 रात।
जब झूम के यहाँ घन¹ आते हैं, मस्ती का रंग जमाते हैं। चश्मे तंबूर² बजाते हैं, गाती है मल्हार³ हवा बावा॥ याँ पंछी मिल कर गाते हैं, पीतम⁴ के संदेस सुनाते हैं। याँ रूप अनूप दिखाते हैं, फल फूल और वर्षे-झा⁵ बावा॥ घन⁶ दौलत आनी जानी है, यह दुन्या राम कहानी है। यह आलम आलम-फ़ानी है, वाक़ी है ज़ाते-खुदा⁷ बावा॥ [ 253 ] ज्ञानी को स्वप्न। घर में घर कर ❀ राग कल्याण, ताल तीन ❀ कल ख़्वाब एक देखा, मैं काम कर रहा था। बैलों को हाँकता था, और हल चला रहा था॥ मेहनत से सेर⁸ होकर, बर्ज़ाश⁹ से शेर होकर। यह जी में अपने आई, "वस यार अब चलो घर"॥ घर के लिये थी मेहनत, घर के लिये थे बाहर। झट पट स्नान करके, पोशाक कर के दर पर॥ Notes: 1 बादलों के समूह, 2 वह राग जिस के गाने से बेपर्दा हो, 3 प्यारे, 4 घास की पत्ती, 5 नाशवान् जगत्, 6 सत्यस्वरूप परमात्म-देव, 7 रज कर, तृप्त, 8 वित्त।
घर की तरफ मैं लपका, पाँ¹ शौक़ से उठा कर। तेज़ी से डग² बढ़ाकर, जल्दी में गड़बड़ा³ कर॥ कि लो घौड़ धूप ही ने, यह मचा दिया तहय्युर⁴। वह ख़्वाब⁵ छट उड़ाया, यह पाओं घर में आया॥ बेदार⁶ ख़ुद को पाया, ले यार घर में घर कर। सुपने के घर को दौड़ा, घर जागने में आया॥ क्या ख़ूब था तमाशा, यह ख़्वाब कैसा आया। बन बन में राम ढूँडा, मैं राम ख़ुद बन आया॥ मैं घर जो खोजता था, मेरा ही था वह साया। अब सब घरों का हूँ घर, ऐ राम ! घर में घर कर॥ [ 254 ] ज्ञानी की सैर ( 1 ) ❀ राग बिहाग, ताल तीन ❀ मैं सैर करने निकला, ओढ़े अबर⁷ की चादर। पर्वत में चल रहा था, हवा के बाज़ुओं⁸ पर॥ मतवाला झूमता था, हर तरफ घूमता था। झरने नदी-ओ-नाले, पहचान कर पुकारे॥ Notes: 1 पाँव, 2 क़दम, पग, 3 हैरानगी, हलचल, व्याकुलता, आश्चर्य, 4 स्वप्न, 5 जागा हुआ, 6 बादल, 7 पंख, पर, 8 मस्त।
नेचर¹ से गूँज उट्ठी, बस वेद की ध्वनी² की। "तत्त्वमसि, त्वमसि", तू ही है जान सब की॥ यह नज़ारा³ प्यारा प्यारा, तेरा ही है पसारा⁴। जो कुछ भी हम बने हैं, यह रूप बस तो तू है॥ सीनों में फिर हमारे, है मुनक़्क़स⁵ तो तू है। जो कुछ भी हम बने हैं, यह रूप बस तो तू है॥ यह सुन जो मैं ने झाँका, नीचे को सीधा वाँका। हर आबशारों⁶-चश्मा, गुलो-वर्ग⁷ का ख़ुशमा॥ अलवाने-नौ दर नौ⁸, अशख़ासे-जिन्स⁹ हर नौ। हर रंग में तो मैं था, हर संग¹⁰ में तो मैं था॥ माँ¹¹ ममता¹² की मारी, जाती है वारी न्यारी। शौहर¹³ को पाके दुलहन¹⁴, सौंपे है अपना तन मन॥ मुद्दत का बिछ्छड़ा बच्चा, रोता है माँ को मिलता। वे इख़्तयार मेरा, दिलो-जाँ बह ही निकला॥ वह गदाज़ो-फ़रहत आमेज़¹⁶, वह दर्दे-दिल दिलावेज़¹⁷। पुर सोज़¹⁸ राहते-जाँ¹⁹, लज़्ज़त भरे वह अरमाँ²⁰॥ Notes: 1 प्रकृति, क़ुदरत, 2 वह (वह) तू है, तू है, 3 दृश्य, 4 फैलाओ, तेरी ही है यह सृष्टि, 5 प्रतिबिम्बित, 6 झरना, 7 पुष्प और पत्ते का जादू, 8 प्रकार प्रकारके, भाँति-भाँति के रंग, 9 पदार्थ, 10 हर तरह के, 11 पत्थर अथवा साथी, 12 माता, 13 मोह, 14 पति, 15 पत्नी, 16 दिल का आनन्दमय पिघलना, 17 दिलपसन्द दर्द, अर्थात् वह दुख जो दिल को भावे, 18 प्रभाव पूर्ण, 19 ज़िन्दगी का आराम, 20 अफ़सोस, अफ़सोस, पछतावा।
वह निकले जेबे-दिल¹ से, बसले-रवाँ² में बदले। मेह बरसा मोतियों का, तूफ़ान आँसुओं का, झिम! झिम!! झिम! [ 255 ] ज्ञानी की सैर ( 2 ) ❀ राग कल्याण, ताल तीन ❀ यह सैर क्या है अजब अनोखा, कि राम मुझ में मैं राम में हूँ। और सूरत अजब है जलवा³ कि राम मुझ में, मैं राम में हूँ॥1॥ मुर्क़्क़ाए-हुस्नो-दुश्क़⁴ हूँ मैं, मुझी में राज़ो-न्याज़⁵ सब हैं। हूँ अपनी सूरत पै आप शैदा⁶, कि राम मुझ में, मैं राम में हूँ॥2॥ ज़माना आयीना⁷ राम का है, हर एक सूरत से है वह पैदा। लो चश्मे-हक़्क़बीं⁸ खुली तो देखा, कि राम मुझ में, मैं राम में हूँ॥3॥ वह मुझ से हर रंग में मिला है, कि गुल से वू भी कभी जुदा है! हुस्नो-दयो-का है तमाशा, कि राम मुझ में, मैं राम में हूँ॥4॥ Notes: 1 दिल की जेब अर्थात् हृदय की कोठड़ी से, 2 वह सब (दर्द इत्यादि) निजानन्द का अनुभव में बदल गये, अर्थात् वह सब दुख दर्द आत्म-साक्षात्कार में बदल गये, 3 दर्शन, ज़ाहर, प्रकट, 4 सुन्दरता और प्रेम की पुस्तक ज़खीरा, 5 गुह्य रहस्य और प्रेम वा मिलाप की इच्छा, 6 आशक़, आसक्त, 7 आईना, दर्पण, सत्यदृष्टि का नेत्र, 8 बुलबुला और दरया।
सबब बताऊँ मैं बज़द' का क्या ? है क्या जो दरपदों' देखता हूँ । सदा' यह हर साज़ से है पैदा, कि राम मुझ में, मैं राम में हूँ ॥5॥ बला है दिल में मेरे वह दिलबर, है आयीना मैं खुद आयीना-गर' । अजब तहय्युर' हुआ यह कैसा ! कि यार मुझ में, मैं यार में हूँ ॥6॥ मुक़ाम पूछो तो लामकाँ' था. न राम ही था न मैं वहाँ था । लिया जो करवट तो होश आया, कि राम मुझ में, मैं राम में हूँ ॥7॥ अललत्वातर' है पाक़ जल्वा, कि दिल्ह वना तूरे-वक़्ते-सीना' । तड़प के दिल यूँ पुकार उठ्ठा, कि राम मुझ में, मैं राम में हूँ ॥8॥ जहाज़ दरया में और दरया जहाज़ में भी तो देखिये आज । यह निस्बत' क़ायम' है राम दरया, है राम मुझमें, मैं राम में हूँ ॥9॥ [ 256 ] ज्ञानी के वाह्याभ्यन्तर वर्षा (यह कविता रियासत टिहरी के वासिष्ठाश्रम अर्थात् बहून वन में उन दिनों लिखी गई थी जबकि राम से अन्तमें अपना नाम देना भी छूट गया था) ॥ राग विहाग, ताल दादरा ॥ "चार तरफ़ से अब्र' की वाह ! उठी थी क्या घटा ।। बिजली की जगमगाहटें, राढ़' रहा था कड़कड़ा ॥1॥ Notes: 1 अत्यन्तानंद, विस्मय, 2 पदों के पीछे, 3 ध्वनि, आवाज़, 4 शहर बनानेवाला, सिकन्दर से अभिप्राय है, 5 आश्चर्य, 6 देश रहित, 7 लगातार, निरन्तर, 8 शुद्ध दर्शन, 9 भीतर की बिजली का अग्नि-पर्वत, 10 शरीर, 11 नैका नांशो 12, 1 बिजली की कड़क।
बरसे था मेंह भी झूम-झूम, छाजो उमड़' उमड़ पड़ा । झोंके हवा के ले गये होश-बदन' को वह उड़ा ॥2॥ हर रगे-जाँ में नूर था, नग़मा' था ज़ोर शोर का । अब्र-बरो से था सिवाय दिल में सरूर' बरसता ॥3॥ आबे-हार्ते की झड़ी, ज़ोर जो रोज़ो-शबँ पड़ी । फ़िकरो-ख़याल' बह गये, टूटी दुई' की झोंपड़ी ॥4॥ [ 257 ] राम से मुबारक बादी ॥ राग भैरवी, ताल चलन्त ॥ नज़र आया है हर सू महे-जमाल अपना मुबारक' हो । "वह मैं हूँ" इस खुशी में दिल का भर आना मुबारक हो ॥1॥ यह उर्यानी' रुखे-सुरशीद' की खुद पर्दा हायल' थी । हुआ अब फ़ाश' पर्दा, सितरें' उड़ जाना मुबारक हो ॥2॥ Notes: 1 मतलब इस मुहावरे का यह है कि बड़े ज़ोर से वर्षा हुई, 2 शरीर के होश, 3 प्राण के नस नस में, 4 आवाज़, 5 आनन्द, 6 अमृत वर्षा, 7 दिन रात जो ज़ोर से पड़ी, 8 चिन्ता और शोक, 9 द्वैत की झोंपड़ी जो दिल में स्थित थी सब बह गयी, 10 हर तरफ, 11 चन्द्रमुख या चन्द्र जैसा सौन्दर्य, 12 विधाई, खुशी, 13 नंगा पन, स्पष्ट प्रकट होना, 14 सूर्य-मुख अर्थात् अपने प्रकाश स्वरूप आत्मा की, 15 ढके हुए।
यह जिस्मो-हस्म का काँटा जो बे ढब सा खटकता था । खलिश' सब मिट गई, काँटा निकल जाना मुबारक हो ॥2॥ तमसख़र' से ख़ूप थे क़ैद् साढ़े तीन हाथों में । भले' अब खुसते-फ़िकरो-तख़य्युल' से भी बढ़ जाना मुबारक हो ॥4॥ अजब तसखीरे-आलमगीर' लाई सल्तनते-आली' । महो-माहीं' का फ़रमाँ को बजा' लाना मुबारक हो ॥5॥ न ख़दशा' हर्ज़ का मुतलक़', न अंदेशा-खलल' बाकी । फुरेरे' का बलंदी पर यह लैहराना मुबारक हो ॥6॥ तज़ल्लक़' से बरी' होना हरफ़े'-राम की मानन्द' । हर एक पैहलू' से नुकहे-दाग़' मिट जाना मुबारक हो ॥7॥ [ 258 ] ज्ञानी का आशीर्वाद ॥ राग भैरवी, ताल दादरा ॥ बदले है कोई आन' में अब रंगे-ज़माना' ( टेक ) आता है अमन' जाता है अब जंगे-ज़माना' ॥1॥ Notes: 1 नाम और रूप, 2 खटका, खटड़ा, चोट, 3 छटे से, हँसी से, 4 किन्तु, 5 फिकर और ख़्याल अर्थात् सोच विचार की सीमा वा अन्दाज़, 6 समस्त संसार को जीतने वाली विजय, 7 भारी राज्य, 8 चन्द्र-सूर्य वा लोक परलोक, 9 आज्ञा, 10 आज्ञा मानना, 11 डर, 12 बिल्कुल, निःसन्त, 13 फसाद, वा बिगाड़ का फिक्र, 14 फंदा, 15 सम्बन्ध वा आसक्ति, 16 मुक्त, निरासक्त, 17 राम के वरण, (र, आ, म), 18 सदृश, 19 तरफ, 20 बिन्दु का, 21 घड़ी, 22 समय का रंग ढंग, 23 सुख-चैन, 24 युद्ध का समय।
पे जैहूल' ! चलो, दर्द उड़ो, दूर हटो हसद' । कमज़ोरी मरो हूब, बस पे नंगे-ज़माना' ॥2॥ ग़म दूर, मिटा रश्क', न गुस्सा, न तमश्शा । पलटेगा घड़ी पल में नया ढंगे-ज़माना ॥3॥ आज़ाद है, आज़ाद है, आज़ाद है हर एक । दिलशाद' है क्या ख़ूब उड़ा तंगे-ज़माना' ॥4॥ "लो' काठ की हँडिया से निभे भी तो कहाँ तक । अग्नि तो जला ज्ञान की दे संगे-ज़माना" ॥5॥ आती है जहाँ में शाहे-मशर्क़' की सवारी । मिटता है सियाही का अभी रंगे-ज़माना' ॥6॥ वह ही जो इधर ख़ार' उधर है गुले-ख़न्दाँ' । हो दंग जो यूँ जान ले नैरंगे-ज़माना' ॥7॥ देता है तुम्हें राम भरा जाम', यह पी लो । सुनवायेगा आहंग' नये-चंगे-ज़माना" ॥8॥ Notes: 1 अविद्या, 2 ईर्ष्या, 3 निर्लज्जता का समय, 4 ईर्ष्या, हूब, 5 प्रसन्न चित्त, 6 समय की तंगी, सुदीबत, 7 काठ की हंडिया को अग्नि पर रखने से क्या लाभ होगा. यदि कुछ जलाना चाहते हो तो ज्ञानाग्नि पर समय का ग़म रूपी पत्थर रख कर उसे फूँक दो, 8 सूर्य, ज्ञान के सूर्य से तात्पर्य है, 9 समय का कलंक, दाग़, ज़ंगार, अज्ञान, 10 काँटा, 11 खिड़ा हुआ पुष्प, 12 समय की विचित्रता, 13 निजानन्द की मस्ती का वा प्रेम का प्याला, 14 स्वर, 15 समय के बाजे का।
[ 259 ] बीमारी में राम की अवस्था ॥ राग भैरवी, ताल त्रुल ॥ वाह वा, ऐ तप व रेज़श ! वाह वा । हव्वाज़ा', ऐ ददों-पेचश ! वाह वा ॥1॥ ऐ बलाये-नागहानी' ! वाह वा । बैद्कम', ऐ मर्गे-जवानी' ! वाह वा ॥2॥ यह मँवर, यह क़ैहर' बरपा ! वाह वा । क़ैहरे-मिहरे-राम' में क्या वाह वा ॥3॥ खाँड का कुत्ता गधा चूश बिला' । मुँह में डालो, ज़ायक़ा' है खाँड का ॥4॥ पगड़ी, पाजामा, दुपट्टा, अंगरखा । गौर से देखा तो सब कुछ सूत था ॥5॥ दामनी तोड़ी व माला को घड़ा । पर निगाहे-हक़' में है वही तिला' ॥6॥ Notes: 1 बहुत अच्छा. बहुत ख़ूब, 2 अनायास आने वाली आफ़त, 3 तुझे स्वागत हो, 4 तरुणाई अर्थात् युवावस्था में मृत्यु, 5 ईश्वरीय क़ोप वा रोष, 6 सूर्य रूपी राम के समुद्र में, अर्थात् राम के प्रकाश स्वरूप सिन्धु में यह सब नाम रूप प्रपंच मानो भँवर और लहरें हैं, 7 बिजली का पुष्प, 8 स्वाद, 9 तत्सदृशि, 10 स्वर्ण, सोना।
मोत्याबिन्द दिल की आँखों से हटा । मज़ों-सहिते, ऐने राहते-राम था ॥7॥ [ 260 ] राम का नाच ॥ राग नट-नारायण, ताल दीपचंदी ॥ नाचूँ मैं नटराज रे ! नाचूँ मैं महाराज ! ( टेक ) सूरज नाचूँ, तारे नाचूँ, नाचूँ वन महताबें रे ! ॥1॥ नाचूँ॰ तन तेरे में मन हो नाचूँ, नाचूँ नाड़ी नाड़ रे ! ॥2॥ नाचूँ॰ बादर नाचूँ, वायु नाचूँ, नाचूँ नदी अरु नावें रे ! ॥3॥ नाचूँ॰ ज़र्रे-ज़र्रे नाचूँ, समुद्र नाचूँ, नाचूँ मोघरा काज रे ! ॥4॥ नाचूँ॰ मधुआ लब बदमस्ती वाला, नाचूँ पी पी आज रे ! ॥5॥ नाचूँ॰ घर लागो रंग, रंग घर लागो, नाचूँ पापा दाज रे ! ॥6॥ नाचूँ॰ राग गीत सब होवत हरदम, नाचूँ पूरा साज रे ! ॥7॥ नाचूँ॰ राम ही नाचत, राम ही बाजत, नाचूँ हो निलाज रे ! ॥8॥ नाचूँ॰ Notes: 1 रोग और निरोग, 2 ठीक, निश्चय पूर्वक, 3 राम की शान्त दशा, आनन्दावस्था, 4 चाँद, 5 वादल, 6 जहाज़, बेड़ी, किश्ती, 7 परमाणु, अणु,
[ 261 ] ज्ञानी की होरी ॥ रागनी जै जैवन्ती, ताल चाचर, वा एमन कल्याण, ताल चलन्त ॥ खा रहा हूँ मैं रंग भर भर, तरह तरह की यह सारी दुन्या । वेह' खूब होली मचा रखी थी, पै अब तो हो ली' यह सारी दुन्या ॥1॥ मैं साँस लेता हूँ रंग खुलते हैं, चाहूँ दम में अभी उड़ा दूँ । अजब तमाशा है रंग रलियाँ, है खेल जादू यह सारी दुन्या ॥2॥ पड़ा हूँ मस्ती में पाँों-बेलुद, न पैरैं आया चला न ठैहरा । नशे में खर्राटा सा लीया था, जो शोर बरपा है सारी दुन्या ॥3॥ भरी है खूबी हर एक खराबी में, ज़र्ह ज़र्ह है मिहरैं आसा । लड़ाई शिकवे में भी मज़े हैं, यह ख़्वाब चोखी है सारी दुन्या ॥4॥ लफ़ाफ़ा देखा जो लम्बा चौड़ा, हुआ तहय्युर, कि क्या ही होगा । जो फाड़ देखा, ओहो ! कहूँ क्या ! हुई ही कब थी यह सारी दुन्या ॥5॥ यह राम सुनियेगा क्या कहानी, शुरु न इसका, ख़तम न हो यह । जो सत्य पूछो ! है रामैं ही राम ॥ यह मैहज़' धोखा है सारी दुन्या ॥6॥ Notes: 1 क्या ख़ूब, 2 हो गई, ख़तम हो गई, 3 दूसरा, अन्य, 4 सूर्य जैसा,
[ 262 ] ज्ञानी की उदारता और बेपरवाही राग पीलू, ताल दीपचंदी न है कुछ तमन्ना' न कुछ जुस्तजू' है । कि वहदत' में साक़ी' न साग़र' न बू है ॥1॥ मिली दिल को आँख जमी माफ़र्त' की । जिधर देवता हूँ सनम' रूबरू है ॥2॥ गुलिस्ताँ में जा कर हर एक गुलँ' को देखा । तो मेरी ही रंगत-ओ-मेरी ही बू है ॥3॥ मेरा तेरा उठा हुए एक ही सब । रही कुछ न हसरत' न कुछ आर्ज़ू' है ॥4॥ [ 263 ] ज्ञानी का प्रण ॥ राग जंगला, ताल चलन्त ॥ हम रूखे टूकड़े खायँगे । भारत पर वारे जायँगे Notes: 1 इच्छा, 2 जिज्ञासा, 3 एकता, 4 आनन्द रूपी शराब पिलाने वाला, 5 पियाला, 6 आत्म-ज्ञान की, 7 प्यारा (अपना स्वरूप) 8 सन्मुख, 9 बाग़ 10 पुष्प 11 शोक, अफ़सोस, 12 आशा, स्पृहा।
हम सूखे चने चबायँगे । भारत की बात बनायँगे ॥ हम नंगे उम्र बितायँगे । भारत पर जान मिटायँगे ॥ सूलों पर दौड़े जायँगे । काँटों को राह बनायँगे ॥ हम दर दर धक्के खायँगे । आनंद की झलक दिखायँगे ॥ सब रिश्ते नाते तोड़ेंगे । दिल इक आत्म-संग जोड़ेंगे ॥ सब विषयों से मुँह मोड़ेंगे । सिर सब पापों का फोड़ेंगे ॥ [ 264 ] ज्ञानी का निश्चय-व-हिम्मत ॥ राग परज, ताल ग़ज़ल ॥ गर्चि कुतवँ जगह से टले तो टल जाये । गर्चि बैहरँ भी जुगनू' की दुम से जल जाये ॥ हिमालय बादँ' की ठोकर से गो फिसल जाये । और आफ़ताबें' भी झलके-अरूजँ' ढ़लँ जाये ॥ अगर न-साहबे-हिम्मत' का हौसला टूटे । कभी न भूले से अपनी जबीं' पर बल आये ॥ Notes: 1 ध्रुव तारा, 2 समुद्र, 3 रात को चमकने वाला कीड़ा जो उड़ता भी है, 4 वायु, 5 सूर्य, 6 सूर्य उदय (चढ़ने) से पहिले, 7 ध्वस्त हो जाय, 8 हिम्मत वाला पुरुष, धैर्यवान, 9 पेशानी, मस्तक।
[ 265 ] ज्ञानी की अभेदता का स्वरूप ॥ ग़ज़ल ॥ बन के गेसूप' ढले-हस्ती पे निखर जाता हूँ । शानहे'-मौजे'-सर सर से सँवर जाता हूँ ॥1॥ सैर करता हुआ जिस दम लबे-जू' आता हूँ । वालियाँ नहर को गिरदाब' की पहनाता हूँ ॥2॥ † यह कविता श्री स्वामी राम ने अपने एकान्त स्थान वासिष्ठाश्रम से लिख कर रावलपिंडी की सनातन धर्म सभा को उन के पत्र के उत्तर में भेजी थी जो तत्पश्चात् अनेक पत्रों में प्रकाशित हुई, इसके लक्ष्यार्थ गूढ़ होने से प्रत्येक पद का भावार्थ दिया जाता है:— ( 1 ) अस्तित्व वा वस्तु के मुख पर मैं ज़ुल्फ़ अर्थात् तम रूपी पर्दों बनकर बिखर जाता हूँ, और उस ज़ुल्फ़ को वायु रूपी तरंग की कंघी से सँवारे जाता हूँ, अर्थात् उस तम या ज़ुल्फ़ को मैं इच्छा रूपी घटा की सर सर ध्वनि करती हुई लहर की कंघी से सँवारता हूँ वा उस के अंग में फिरता हूँ । ( 2 ) टहलता हुआ जिस समय मैं नहर के तट पर आता हूँ, तो मैं भँवर की बालियाँ नहर को पहनाता हूँ, अर्थात् नहर में जो भँवर पड़ते हैं वह भी मेरे ही कारण से होते हैं । Notes: 1 ज़ुल्फ़, सिर का बाल, 2 कंघी, 3 तरंग, 4 नहर का तट, 5 भँवर।
सर प सज्जा क खड़ हो के कहा 'कुम' मैं ने । गुँचे-गुल' को दिया ज़ौक़े-तवस्सुम' मैं ने ॥3॥ है मुझे दामने-कोह' सार में सुनने का मज़ा । आवशारों' के वह ख़ुशनग़मह' तरानहँ' की सदा ॥4॥ वह सरे-कोह' से थम थम के उतरना मेरा । गह मशरक़' कभी मग़रब' को यह फिरना मेरा ॥5॥ हर घड़ी पल में नया रूप बदलना मेरा । जामहे-सूरते-नौ' पहन निकलना मेरा ॥6॥ हाथ पर दूध की ठलिया को उठाते आना । गह हँसते हुए गह आँखें दिखाते आना ॥7॥ ( 3 ) हरयाली पर खड़े होकर जो मैं ने 'कुम' कहा अर्थात् 'यह हो' ऐसी आज्ञा जब मैंने दी, तो उस समय पुष्प की कली को खिड़ने का आनन्द दिया । अर्थात् पुष्पकी कली भी मेरी उपस्थितिसे मेरे संकेत पर खिलने लग गई । ( 4 ) मुझे पर्वत की तलहटी पर झरनों के सुन्दर राग और सुरों के सुनने का बहुत स्वाद वा आनन्द आता है । ( 5 ) वह झरनों के रूप में पर्वत की चोटी से मेरा थम थम के उतरना, और कभी पूर्व और कभी पश्चिम की ओर मेरा इस प्रकार फिरना । ( 6 ) प्रति घड़ी और पल में मेरा नया नया रूप बदलना और ( झरनों के रूप ) नये नये रूप के वस्त्र पहन कर मेरा निकलना । ( 7 ) कभी दूध की ठलिया हाथ पर उठाते आना, कभी हँसते हुए और कभी आँखें दिखाते आना । Notes: 1 ईश्वराज्ञा, कहा, ऐसा हो, 2 पुष्प की कली 3 खिड़ने का आनन्द, 4 पर्वत की तलहटी, 5 झरना, 6 सुन्दर ध्वनि, 7 सुर, आलाप, 8 आवाज़, 9 पर्वत की चोटी, 10 कभी, 11 पूर्व 12 पश्चिम, 13 नये रूप का वस्त्र।
दौड़ते दूर से वह अश्रु¹ बहाते आना। और थम थम के उतरते हुए गाते आना॥ 8॥ कौन कह सकता है क्या मेरा निशाँ, मेरा पता। हश्र² ढ़ाती है यह अलबेली³ ख़रामी⁴ की अदा॥ 9॥ मुझ से चलने में न होगा कोई ग़ाफ़िल बढ़ कर। गिर पड़े हैं मेरे दामन⁵ की गिरह खुलके गुहर⁶॥ 10॥ (8) दौड़ कर दूर से अश्रुपात करते आना और धीमे धीमे नीचे उतरते हुए गाते आना। (9) मेरे इन पारस्परिक भिन्न और नाना रूपों को देख कर कौन मेरा, ठीक ठीक निशान वा पता दे सकता है बल्कि मेरी यह अश्वबलल्ली (बच्चों की सी) चाल क़्यामत ढ़ाती अर्थात् प्रलय लाती है। (10) चलने में मुझ से बढ़ कर कोई भी आलसी वा सुस्त न होगा (अर्थात् मैं नितान्त अचल हूँ) और मेरा चलना मानो ऐसा है कि जैसे मेरे वस्त्र के पल्ले में जो मोती बँधे हुए थे उस पल्ले की गाँठ के खुल जाने से मोतियों का गिर पड़ना। तात्पर्य यह कि मैं स्वयं तो चलने का कोई संकल्प न करता हूँ और न रखता हूँ, अलबत किसी के अदृष्ट उदय होने पर मेरे भीतर यदि फुरना उठ जाय और उस फुरने से मेरे अचल रहने की गाँठ खुल जाय, तो मैं मोतियों के गिरने के समान चल भी जाता हूँ। Notes: 1 अश्रु, 2 क़्यामत ढ़ाती है अर्थात् प्रलय लाती है, 3 अश्वबलल्ली चाल वा बच्चों की सी चाल, 4 नखरा, 5 पल्ला, 6 मोती।
[ 266 ] ज्ञानी की समदृष्टि राग सोरठ (महल्ला 1) जो नर दुःख में दुःख नहीं माने। (टेक) सुख स्नेह अरु भय नहीं जाकै, कञ्चन माटी माने॥ 1॥ नहिं निन्दा नहिं उस्तति जाकै, लोभ मोह अभिमाना। हर्ष शोक से रहे न्यारो, नाहिं मान अपमाना॥ 2॥ आशा, मनशा, सकल त्यागे, जग से रहे निराशा। काम क्रोध जेहि परसे¹ नाहिं, तैं² घट ब्रह्म निवासा॥ 3॥ गुरु कृपा जेहि³ नर को कीनी, तेहि⁴ यह जुगतै⁵ पिछानी। नानक लीन भयो गोबिंद स्यों, ज्यों पानी संग पानी॥ 4॥ [ 267 ] मुक्त के चिन्ह राग गौड़ी वा धनासरी, ताल खुमाली (महल्ला 1) साधो! राम शरण विश्रामा। (टेक) वेद पुराण पढ़े को यह गुण, सिमरे हरि को नामा॥ 1॥ लोभ मोह माया ममता पुनि, अरु विषयन की सेवा। हर्ष शोक परसे⁶ जाहि नाहीं, सो मूरत है देवा॥ 2॥ Notes: 1 स्पर्श करे, 2 उस, 3 जिह, 4 तिसने, 5 यक्ति, 6 जिसे स्पर्श न करे।
स्वर्ग नरक अमृत विष, ये सब, त्यों कञ्चन अरु पैसा। उस्तति निन्दा यह सम जाकै, लोभ मोह पुनि तैसा॥ 3॥ दुःख सुख यह बाँधे जाहि नाहीं, तैं तुम जानो ज्ञानी। नानक मुक्त तांहि तुम मानो, यह विधि को जो प्राणी॥ 4। [ 268 ] ज्ञानी की व्यापक दृष्टि ग़ज़ल, राग पीलू जिधर देखता हूँ, जहाँ देखता हूँ। मैं अपना ही जल्वह¹ अयाँ² देखता हूँ॥ 1॥ न तन देखता हूँ, न जाँ देखता हूँ! ख़ुद ही को निहाँ³ और अयाँ⁴ देखता हूँ॥ 2॥ यह जो कुछ कि पैदा है सब ही तो मैं हूँ। मैं कुल बहरे-हस्ती⁵ इक शाँ देखता हूँ॥ 3॥ अगर कोई अपने बिना जगत जाने। तो उस को मैं धोखा⁶ रसाँ⁷ देखता हूँ॥ 4॥ मैं अब कहूँ किस से यह राज़े-हक़ीक़तें। यह आलम⁸ सरापा गुमाँ⁹ देखता हूँ॥ 5॥ Notes: 1 प्रकाश, विभूति, 2 प्रकट, व्यक्त, 3 गुप्त, छुपा हुआ, अव्यक्त, 4 स्पष्ट, प्रकट, व्यक्त, 5 अस्तित्व का समुद्र, 6 धोखा खाया हुआ, 7 असली रहस्य, भेद, 8 समस्त संसार, 9 भ्रम मात्र, भ्रम रूप।