त्याग
( 269 ) ❧ काफी दीपचन्दी ❧ मेरा मन लगा फ़क़ीरी में (टेक) डंडा कूंडा लिया बगल में, चारों चक जागीरी में॥ मे॰ 1 मंग तंग के टुकड़ा खाँए, चाल चलें अमीरी में॥ मे॰ 2 जो सुख देखियो राम संगत में, नहीं है वज़ीरी में॥ मे॰ 3 [ 270 ] ❧ जंगल का जोगी (योगी) ❧ ❧ राग भैरवी, ताल तीन ❧ हर हर ओ3म्, हर हर ओ3म् (टेक) ❧ यह कविता सन् 1906 में टिहरी के वासिष्ठाश्रम के वन में उन दिनों वही थी जब राम से अन्त में अपना नाम देने का स्वभाव भी छूट गया था।
जंगल में जोगी बसता है, गह¹ रोता है गह हँसता है। दिल उसका कहीं न फँसता है, तन मन में चैन बरसता है॥ 1॥ हर हर ओम्, हर हर ओम् ख़ुश फिरता नंग मनंगा है, नैनों में बहती गंगा है। जो आ जाये सो चंगा है, मुख रंग भरा मन रंगा है॥ हर॰ 2 गाता मौला² मतवाला³ है, जब देखो भोला भाला है। मन मनका उसकी माला है, तन उस का एक शिवाला है॥ हर॰ 3 नहीं परवाह मरने जीने की, है याद न खाने पीने की। कुछ दिन की सुधि न महीने की, है पवन रुमाल पसीने की॥ हर॰ 4 पास इस के पंछी⁴ आते हैं, और दरया गीत सुनाते हैं। बादल अशनान कराते हैं, वृछ⁵ उसके रिश्ते नाते हैं॥ हर॰ 5 गुलनार⁶ शफ़क़⁷ वह रंग भरी, जोगी के आगे है जो खड़ी। जोगी की निगह⁸ हैरान् गैहरी, को तकती रह रह कर है परी॥ हर॰ 6 वह चाँद चटकता गुल⁹ जो खिला, इस मिहर¹⁰ की जोत से फूल झड़ा! फ़ब्वाह फ़रहत¹¹ का उछला, पुहार¹² का जग पर नूर पड़ा॥ हर॰ 7 Notes: 1 कभी, 2 ब्रह्मज्ञानी, आत्मवेता, 3 मस्त, 4 पक्षी, 5 वृक्ष, दरख़्त, 6 अनार के रंग वाली, 7 लाली जो आकाश में सूर्य के उदय व अस्त समय होती है, 8 दृष्टि, 9 पुष्प, 10 सूर्य, 11 खुशी, आनन्द, 12 बुझाड़, वाछड़।
[ 271 ] ❧ राग पीलू, ताल दीप चन्दी, वा राग भैरों, ताल झूल ❧ अल्वदा, मेरी रियाज़ी¹! अल्वदा। अल्वदा, ऐ प्यारी रावी²! अल्वदा॥ 1॥ अल्वदा, ऐ पहले-ख़ानों³! अल्वदा। अल्वदा, मासूमे-नादों⁴! अल्वदा॥ 2॥ अल्वदा, ऐ दोस्तो-दुशमन⁵! अल्वदा। अल्वदा, ऐ शीतो-ओशन⁶! अल्वदा॥ 3॥ अल्वदा, ऐ कुतबो-तद्रीस⁷! अल्वदा। अल्वदा, ऐ ख़ुबसो-तक़दीस⁸! अल्वदा॥ 4॥ अल्वदा, ऐ दिल⁹! ख़ुदा! ले अल्वदा। अल्वदा, राम! अल्वदा¹⁰, ऐ अल्वदा॥ 5॥ [ 272 ] † त्याग का फल [ महाभारत के कुछ श्लोकों का भावार्थ ] Notes: 1 रुख़सत हो, तुमे नमस्कार हो, 2 गणित शास्त्र, 3 रावी दरया का नाम है जो लाहौर में बहता है। 4 घर के लोगो, 5 नादान बच्चे, 6 मित्र-शत्रु, 7 सरदी गरमी, 8 पुस्तक और पाठशाला, 9 अच्छा, बुरा, 10 ऐ चित्त! तुमको भी रुख़सत हो, ऐ ख़ुदा (ईश्वर) तुम को भी रुख़सत (नमस्कार) हो, ऐ रुख़सत के शब्द तुम को भी रुख़सत हो। † यह कविता भी राम भगवान से सन् 1906 में उन दिनों में वही थी जब अन्तमें अपना नाम देना भी उन से छूट गया था।
राग भैरवी, ताल दादरा, या ❧ राग जंगला, ताल खुमाली, वा राग विहाग, ताल चलंत ❧ अपने मज़े की शातिर गुल¹ छोड़ ही दीये जब। रूए-ज़मीं के गुलशन² मेरे ही बन गये सब॥ 1॥ जितने ज़ुबाँ³ के रस थे कुल तर्क कर दिये जब। बस ज़ायक़े जहाँ⁴ के मेरे ही बन गये सब॥ 2॥ ख़ुद के लिये जो मुझ से दीदों⁵ की दीद⁶ छूटी। ख़ुद हुसन⁷ के तमाशे मेरे ही बन गये सब॥ 3॥ अपने लिये जो छोड़ी ख़्वाहश⁸ हवाख़ोरी⁹ की। बादे-सबा के झोंके मेरे ही बन गये सब॥ 4॥ निज¹⁰ की ग़रज़ से छोड़ा सुनने की आरज़ू¹¹ को। अब राग और बाजे मेरे ही बन गये सब॥ 5॥ जब बेहतरी के अपनी फ़िक्रो-ख़याल¹² छूटे। फ़िक्रो-ख़याले-रंगी¹³ मेरे ही बन गये सब॥ 6॥ आहा! अजब तमाशा, मेरा नहीं है कुछ भी। दावा नहीं ज़रा भी इस जिस्मो-इस्म¹⁴ पर ही॥ 7॥ यह दस्तो-पा¹⁵ है सब के, आँखें यह हैं तो सब की। दुन्या के जिस्म¹⁶ लेकिन, मेरे ही बन गये सब॥ 8॥ Notes: 1 पुष्प, फूल, 2 पृथिवी भर के बाग़, 3 जिह्वा, 4 संसार भर के, 5 नेत्रों की, 6 दृष्टि, 7 सौंदर्य, 8 इच्छा, 9 पवन वायु, 10 अपनी वा स्वार्थ दृष्टि से, 11 आशा, 12 शोक, चिन्ता, 13 आनन्द दायक या भाँति भाँति के विचार, 14 नाम रूप, 15 हाथ पैर, 16 शरीर।
[ 273 ] राग शंकराभरण, ताल खुमाली घर मिले उसे जो अपना घर खोवे है। जो घर रक्खे सो घर घर में रोवे है॥ टेक जो राज तजे, वह महाराज करे है। धन तजे तो फिर दौलत से घर भरे है॥ सुख तजे तो फिर औरों का दुःख हरे¹ है। जो जान तजे वह कमी नहीं मरे है॥ जो पलंग तजे वह फूलो पै सोवे है। जो घर रक्खे वह घर घर में रोवे है॥ 1॥ जो परदारा² को तजे, वह पावे रानी। अरु झूठ बचन दे त्याग, सिद्ध हो वाणी॥ जो दुर्बुद्धि को तजे, वही है ज्ञानी। मन से त्यागी हो, ऋद्धि³ मिले मन मानी॥ जो सर्व तजे उसी का सब कुछ होवे है। जो घर रक्खे सो घर घर में रोवे है॥ 2॥ जो इच्छा नहीं करे, वह इच्छा पावे। अरु स्वाद तजे फिर अमृत भोजन खावे॥ नहिं माँगे तो फल पावे जो मन भावे। है त्याग में तीनों लोक, वेद यही गावे॥ Notes: 1 दूर करे है, 2 दूसरे पुरुष की स्त्री, 3 ऋद्धि सिद्धि।
जो मैला होकर रहे, वह दिल धोवे है। जो घर रक्खे वह घर घर में रोवे है॥ 3॥ [ 274 ] लावनी, राग धनासरी, ताल खुमाली नहीं मिले हर धन त्यागे, नहीं मिले राम जान तजे। } टेक नारायण तो मिले उसी को, जो देह का अभिमान तजे॥ } सुत-दारा² या कुटुम्ब त्यागे, या अपना घर¹ बार तजे। नहीं मिले है प्रभु कदापि, जग का सब व्यवहार तजे॥ कंद मूल फल खाय रहे, और अन्न का भी आहार तजे। वस्त्र त्यागे नग्न हो रहे, और पराई नार तजे॥ तो भी हर नहीं मिले यह त्यागे, चाहे अपने प्राण तजे। नारायण तो मिले उसी को, जो देह का अभिमान तजे॥ 1॥ तजे पलङ्ग फूलों का और हीरे मोती लाल तजे। जात की इज्ज़त, नाम और तेज और कुल की सारी चाल तजे॥ वन में निशिदिन³ विचरे और दुनिया का जंजाल तजे। देह को अपनी चाहे जलावे, शरीर की भी खाल तजे॥ वह्याहान नहीं हो तौ भी, चाहे वह अपनी शान तजे। नारायण तो मिलो उसी को, जो देह का अभिमान तजे॥ 2॥ रहे मौन बोले नहीं मुखसे, अपनी सारी बात तजे। बालपन से योग ले चाहे तात⁴ तजे या मात तजे॥ Notes: 1 घर से अभिप्राय वही परिच्छिन्न घर वा अहंकार से है, 2 पुत्र स्त्री, 3 दिन रात, सदा, 4 पिता।
शिखा-सूत्र त्याग जो करदे और अपनी उत्तम ज़ात तजे। कभी जीव को न मारे और घात तजे अपघात¹ तजे॥ इतना तजे तो क्या होवे जो देह का नहीं गुमान तजे। नारायण तो मिले उसी को, जो देह का अभिमान तजे॥ 3॥ रहे रात दिन खड़ा न सोवे, पृथ्वी का भी शयन² तजे। कष्ट उठावे रहे बेचैन, सुख और सारी चैन तजे॥ मीठा होकर बोले सब से, कड़ुवे अपने बैन³ तजे। इतना त्यागे और देह अभिमान नहीं दिन रैन⁴ तजे॥ बनारसी उसे मिले नहीं हर, चाहे सकल जहान तजे। नारायण तो मिले उसी को, जो देह का अभिमान तजे॥ 4॥ ( 275 ) राग सोहनी, ताल ग़ज़ल फ़क़ीरी ख़ुदा को प्यारी है, अमीरी कौन बिचारी है। (टेक) बदन पर ख़ाक, सो है अक्सीरैं⁵, फ़क़ीरों की है यही जागीर। हाथ बाँधे हैं खड़े अमीर, बादशाह हो या हो वज़ीर। सदा यह सच हमारी है, गदा⁶ की ख़ुदा से यारी है॥ 1॥ है उन का नाम सुनो दरवेशाँ⁷, कोई नहीं पावे उन से पेश। ख़ुदा से मिले रहैं हमेश, कोई नहीं जाने उन का भेष। कभी तो गिरिया-ओ-ज़ारी⁸ है, कभी चश्मों⁹ में ख़ुमारी¹⁰ है॥ 2॥ Notes: 1 हत्या, धोखा, 2 सोना, विछौना, 3 शब्द, वाणी, वाक्य, 4 रात, 5 रसायन, सब से बढ़ कर दाह, 6 आवाज़, ध्वनि, 7 फ़क़ीर = फ़क़ीर, 8 रोना पीटना, 9 नेत्र, आँख, 10 मस्ती।
है उन का रुतवा बहुत बलन्द, ख़ुदा के तईं हुआ पसन्द। बादशाह से भी है दोचन्द, उन्हें मत बुरा कहो हर चंद। उन की दिल पर सवारी है, ऐसी कहीं नहीं तय्यारी है॥ 3॥ चीथड़े शाल से हैं आला¹, चश्म हरताल से हैं आला। चने भी दाल से हैं आला, चलन हर चाल से है आला। ज़ख़्म जो दिल पर कारी² है, वही ख़ुद मरहम विचारी है॥ 4॥ पाओं में पड़ा जो है छाला, वह है मोतयों से भी आला। हाथ में फूटा सा प्याला, जामे-जमशेद³ से भी आला। अगर कोई हफ़्त-हज़ारी⁴ है, वह भी उन का भिखारी है॥ 5॥ मकाँ लामकाँ⁵ फ़क़ीरों का, निशाँ बे निशाँ फ़क़ीरों का। फ़क़्र⁶ है निहाँ⁷ फ़क़ीरों का, ख़ुदा है ईमान फ़क़ीरों का। ताक़त सबर वह भारी⁸ है, मौत भी उन से हारी है॥ 6॥ बढ़ गये बात तो क्या परवाह, उतर गयी खाल तो क्या परवाह। आ गया माल तो क्या परवाह, हुए कंगाल तो क्या परवाह। ख़ुदा ही जनाब वारी है, फ़क़्र की यही क़रारी⁹ है॥ 7॥ Notes: 1 उत्तम, 2 सख़्त, भारी, 3 जमशेद बादशाह का प्याला, 4 एक पद वा ख़िताब होता है जिस से सात हज़ार सिपाहियों का अफ़सर अभिप्रेत है, 5 देश रहित, 6 त्याग दशा वा त्यागपन, 7 गुप्त, छुपा हुआ, गुह्य, 8 महान्, 9 स्थिति, धैर्य, निष्ठा।
[ 276 ] आनन्द भैरवी, ताल ग़ज़ल न ग़म दुन्या का है मुझ को, न दुन्या से किनारा¹ है। न लेना है, न देना है, न हीला² है, न चारा है॥1॥ न अपने से मुहब्बत है, न नफ़रत ग़ैरें से मुझ को। सभों को ज़ाते-हक़ देखूं, यही मेरा नज़ारा है॥2॥ न शाही में मैं शैदा हूं, गदाई में न ग़म मुझ को। जो मिल जावे सोई अच्छा, वही मेरा गुज़ारा है॥3॥ न कुफ्र इस्लाम से फ़ारिग़, न मिल्लत से ग़रज़ मुझ को। न हिन्दु गिबरो-मुसलिम हूं, सभों से पंथ न्योरा है॥4॥ [ 277 ] जोगी ( साधू ) का सच्चा रूप ( चरित्र ) ग़ज़ल प्यारे! क्या कहूं अहवालें की अपने परेशानी!। लगा ढलने मेरी आंखों से इक दिन ख़ुद ब ख़ुद पानी। यकायक आ पड़ी उस दम, मेरे दिल पर यह हैरानी। Notes: 1 पृथक्ता, उदासीनता, अलहदगी, 2 बहाना, 3 उपाय, दाग़, इलाज, 4 दूसरों से, 5 ब्रह्म स्वरूप, 6 आसक्त, मोहित, 7 फ़क़ीरी, 8 मत, मतान्तर, 9 आग पूजने वाला पारसी, 10 दशा, अवस्था।
कि जिस की हो रही है यह जो हर इक जां सनाख्वानी¹। किसी सूरत से उस को देखिये "कैसा है वह जानी³" ॥1॥ चढ़ा इस फ़िक्र का दरिया, भरा इस जोश में आकर। कि इक इक लहर उस की ने, ले उड़ाया हवा ऊपर। क़रारो-होशो-अक़्लो-सबरो-दानिश⁴ वह गये यकसर⁵। अकेला रह गया आजिज़, ग़रीबो-बेकसो-बेपर⁶। लगा रोने कि इस मुश्किल की हो अब कैसे आसानी! ॥2॥ यह सूरत थी, कि जी में इश्क़ ने यह बात ला डाली। मांगा थोड़ा सा गेरू और वही कफ़नी रंगा डाली। बिना मुद्रे गले के बीच सेली वरमाला डाली। लगा मुंह पर भबूत और शक्ल जोगी की बना डाली। हुआ अवधूत जोगी, जोगियों में आप गुरु-ज्ञानी॥3॥ उठाई चाह की झोली, प्याला चश्में का खप्पर। बना कर इश्क़ का कण्ठा, तलब का सिर पे रख चक्कर। मुण्डासा गेरुआ बांधा, रक्खा त्रिशूल कांधे पर। लगा जोगी हो फिरने ढूंढता उस यार को घर घर। दुकां बाज़ार-ओ-कूचा ढूंढने को दिल में फिर ठानी॥4॥ लगी थी दिल में इक आतिश, धूआं उठता था आहों का। तमाशे के लिये हलका बन्धा था साथ लोगों का। Notes: 1 जगह, देश, 2 स्तुति, 3 प्यारा, दिलवर, 4 स्थिरता, धैर्य, बुद्धि, सन्तोष और समझ, 5 इकट्ठे, एक साथ, 6 असहाय, अधीन और निर्बल वा लाचार, 7 दिल, 8 साधु वेष, कन्था, 9 इच्छा, 10 नेत्र, चक्षु, 11 जिज्ञासा, 12 सिर पर फ़क़ीरी पगड़ी, 13 भाग, 14 घेरा (पुरुषों का समूह), जमाव।
तलब थी यार की और गरम था वाज़ार बातों का। न कुछ सिर की ख़बर थी और न था कुछ होश-पाओं का। न कुछ भोजन का अन्देशा¹ न कुछ फ़िकरे-अमल²-पानी। फिर इस जोग का ठैहरा अजब कुछ आन कर नक़्शा। जो आया सामने मेरे, तो कहता उस से सुनता जा। "कहो प्यारे! हमारे यार को तुम ने कहीं देखा?"। जो कुछ मतलब की वह बोला, तो उससे और कुछ पूछा। वगैरै यूं ही लगा कहने, तो फिर देना अनाकानी³॥6॥ कभी माला ब कहता था, लगा कर जप से "ऐ माला। हुआ हूं जब से मैं जोगी, तू ही उस यार को बतला"। कभी घबरा के हंसता था, कभी ले ख्वांस रोता था। लबों से आह, आंखों से बहा पड़ता था दरिया सा। अजब जंजाल में चक्कर के डाले है परेशानी॥7॥ कोई कहता था "बाबाजी! इधर आओ, इधर बैठो। पड़े फिरते हो पैसे रात दिन, दुक बैठो, ससताओ। जो कुछ दरकार हो मेवा मिठाई हुक्म फ़रमाओ"। न कहना उस से "हो आओ", न कहना उससे "मत लाओ"। ख़बर हरगिज़ न थी कुछ उस घड़ी अपनी, न बेगानी⁴॥8॥ बड़ी दुविधा में था उस दम, कहां जाऊं? कहां देखूं?। किसे देखूं? किसे पूछूं? किधर जाऊं? कहां ढूंढू ढूंढू?। करूं तदबीर क्या! जिस से मैं उस दिलदार को पाऊं। Notes: 1 ख़याल, सोच, फ़िक्र, 2 भांग गांजे की चिन्ता को फ़िक्रे-अमल-पानी कहते हैं, 3 और अगर, 4 टाल मटोल करना, 5 दूसरे की।
निशां हरगिज़ न मिलता था, पड़ा फिरता था जूं मजनूं¹। अजब दरिया-प-हैरत की हुई थी आ के तुग़यानी²॥9॥ उसी को ढूंढता फिरता हुआ मस्जिद में जा पहुंचा। जो देखा वां भी है रोज़ो-नमाज़ों का ही इक चर्चा। कोई जुब्बे में अटका है, कोई दाढ़ी में है उलझा। तसल्ली कुछ न पाई जब, तो आख़िर वां से घबराया। चला रोता हुआ बाहर ब अहवाले-परेशानी॥10॥ यही दिल ने कहा "तुक मदरसे को झांकिए चल कर। भला शायद उसी में हो नज़र आजाये वह दिलबर"। गया जब वहां तो देखी, वाह वा! कुछ और भी बदतर³। किताबें खुल रही हैं, मच रहा है शोरो-गुल यकसर। हर इक मसले पे फ़ाज़िल कर रहे हैं बहसे-नफ़सानी॥11॥ चला जब वहां से घबरा कर, तो फिर यह आ गयी जी में। कि यह जगह तो देखी, अब चलो तुक दैर⁴ भी देखें। गया जब वां तो देखा मूर्ति और घंटों की झिंकारें। पुकारा तब तो रोकर "आह! किस पत्थर से सिर मारें?"। कहीं मिलता नहीं वह शोख़, काफ़िर दुश्मने-जानी॥12॥ कहा दिल ने कि "अब तुक तीर्थों की सैर भी कीजे। भला वह दिलरुबा⁵ शायद उसी जगह पै मिल जावे"। Notes: 1 मजनूं (आदर्श आशिक़) की तरह, 2 घटा, तूफ़ान, 3 वहां, 4 भोगा, लवादा, फ़क़ीरों का निवास, 5 परेशानी की अवस्था में, उद्विग्न, 6 और भी बुरी अवस्था, 7 व्यक्तिगत वाद विवाद, वा अपने अपने ख़याल पर झगड़ा, 8 चित्त, 9 मन्दिर, 10 प्यास, मांगना।
बहुत तीरथ मनाये और किये दर्शन भी बहुतेरे। तसल्ली कुछ न पाई तब तो हो लाचार फिर वां से। मुहब्बत छोड़ कर वस्ती की, ली राहे-बियाबानी¹॥13॥ गया जब दश्तो-सहरा² में, तो रोया आह! क्या करिये? कहां तक हिज़्र³ में उस शोख़ के रो रो के दिन भरिये? किधर जोइये, और किस के ऊपर आश्रय धरिये? यही बेहतर है अब तो डूबिये या ज़हर खा मरिये। भला जी जान के जाने में शायद आ मिले जानी॥14॥ रहा कितने दिनों रोता फिरा हर दश्त में नालां। ग़रीबो-बेकसो-तन्हा मुसाफ़िर बेवतन हैरान्। पहाड़ों से भी सिर पटका, फिरा शहरों में हो गिर्यां। फिरा भूला प्यासा ढूंढता दिलबर को सरगर्दां। न खाने को मिला दाना, न पीने को मिला पानी॥15॥ पड़ा था रेत में और धूप में सूरज से जलता था। लगी थीं दिल की आंखें यार से, और जी निकलता था। उसी के देखने के ध्यान में हर दम निकलता था। वले महबूब से कुछ हाय! मेरा बस न चलता था। पड़े बहते थे आंसू लालागूं⁴ लाले-बदख़्शानी⁵॥16॥ Notes: 1 जंगल का मार्ग, 2 वन और जंगल वा उजाड़, 3 विरह, वियोग, 4 रोते हुए, 5 रोता हुआ, रुदन करता हुआ, 6 परेशान्, हैरान्, अशान्त, 7 प्यारा माशूक़ (अन्तरात्मा), 8 लाल (सुर्ख) पुष्प की तरह, 9 बदख़्शां देश का जवाहर, हीरा।
जब इस अहवाल को पहुंचा, तो वह महबूब बे परवाह। वहीं सौ बेक़रारी से मेरी वालीन¹ पै आ पहुंचा। उठा कर सिर मेरा ज़ानू² पै अपने रख के फ़रमाया। कहा "हो देख लो जो देखना है अब मुझे इस जा³"। क्यां हैं इस घड़ी करते तेरे पै मेरे-पिन्हानी⁴॥17॥ यह सुन रख "पहले हम आशिक़ को अपने आज़माते हैं। 'जलाते हैं', 'सताते हैं', 'रुलाते हैं', 'बुलाते हैं'। हर इक अहवाल में जब खूब साबित⁵ उस को पाते हैं। उसी से आ के मिलते हैं, उसी को मुंह दिखाते हैं। उसे पूरा समझते हैं हम अपने ध्यान का ध्यानी"॥18॥ सदा महबूब की आई, ज्यूंहीं कानों में वां मेरे। बदन में आ गया जी और वहीं दुःख दर्द सब हुर्रे⁶। फिर आंखें खोल कर दिलबर के मुंह पर तुक नज़र करके। ज़मीनो-आस्मान⁷ चौदह तवक़⁸ के खुल गये परदे। मिटी इक आन में सब कुछ खराबी और परेशानी॥19॥ हुई जब आ के यकताई⁹, दुई¹⁰ का उठ गया परदा। जो कुछ वैहो-गुमां¹¹ थे, उड़ गये इक दम में हो पारा। नज़ीर उस दिन से हमने फिर जो देखा खूब हर इक जा। Notes: 1 सिरहाना, तकिया, 2 घुटने, 3 जगह, 4 प्रकट करना, खोल देना, 5 गुह्य, छुपा रहस्य, 6 पक्का, पुख्ता, ठीक, सच्चा, 7 आवाज़, 8 वहां; उस स्थान पर, 9 दूर हो गये, नष्ट हो गये, 10 पृथिवी और आकाश, 11 चौदह लोक, 12 अभेदता, 13 द्वैत, 14 धोखा और भ्रम, 15 पारा धातु जैसे हवा में रखने से धूप से उड़ जाता है, वैसे प्यारे के दर्शन के तेज से धोखा वा भ्रम इत्यादि सब दूर उड़ गये, 16 कवि का नाम।
वुही देखा, वुही समझा, वुही जाना, वुही पाया। बराबर हो गये हिन्दू मुसलमां गिबरो-नुसरानी¹॥20॥ [ 278 ] राग सोहनी, ताल दीचन्दी हर आने हंसी, हर आन ख़ुशी, हर वक़्त अमीरी है बाबा। जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए, फिर क्या दिलगीरी² है बाबा॥ (टेक) हैं आशिक़ और माशूक़³ जहां, वहां शाह वज़ीरी है बाबा। न रोना है, न धोना है, न दर्दे-असीरी⁴ है बाबा॥ दिन रात बहारें चोहलें हैं, अरु इश्क़-सफ़ीरी⁵ है बाबा। जो आशिक़ होय सो जाने है, यह भेद फ़क़ीरी है बाबा॥1॥हर॰ हैं चाह फ़क़त इक दिलबर की, फिर और किसी को चाह नहीं। इक राह उसी से रखते हैं, फिर और किसी से राह नहीं॥ यां जितना रंज-तरद्दुद है, हम एक से भी आगह⁶ नहीं। कुछ मरने का संदेह⁷ नहीं, कुछ जीने की परवाह नहीं॥2॥हर॰ कुछ ज़ुल्म नहीं, कुछ ज़ोर नहीं, कुछ दाद नहीं, फ़रयाद नहीं। कुछ क़ैद नहीं, कुछ बन्द नहीं, कुछ ज़वर नहीं, आज़ाद नहीं॥ शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं। हैं जितनी बातें दुन्या की, सब भूल गये, कुछ याद नहीं॥3॥हर॰ Notes: 1 पारसी लोग व ईसाई लोग, 2 समय, 3 उदासी, 4 प्रेमी और प्यारा दिलबर, 5 क़ैद होने का दर्द, 6 जैसे बुलबुल पक्षी पुष्पका प्रेमी (आशिक़) है और प्रेम में बोलता रहता है, ऐसेही अपने दिलबर के नाम रटनेवाला इश्क़ (प्रेम), 7 इस संसार में, 8 चिन्ता, 9 परिचित, सचेत, 10 डर, 11 न्याय, इन्साफ़, 12 सख्ती, मजबूरी।
जिस सिम्त नज़र भर देखे हैं, उस दिलबर की फुलवारी है। कहीं सब्ज़े की हरयाली है, कहीं फूलों की गुलकारी² है॥ दिन रात मग्न ख़ुश बैठे हैं, अरु आस³ उसी की भारी है। बस आप ही वह दातारी⁴ है, अरु आप ही वह भंडारी है॥4॥हर॰ नित्य इशरतें है, नित्य फ़रहतें है, नित्य राहतें है, नित्य शादी है। नित्य मेहरो-करम है दिलबर का, नित्य ख़ूबी ख़ूब मुरादी⁵ है॥ जब उमड़ा दरिया उलफ़त का, हर चार तरफ़ आबादी है। हर रात नयी इक शादी है, हर रोज़ मुबारिक-बादी है॥5॥हर॰ है तन तो गुल के रंग बना, अरु मुंह पर हर दम लाली है। जुज़ ऐशो-तरब कुछ और नहीं, जिस दिन से सुरत संभाली है॥ होठों में राग तमाशे का, अरु गत पर बजती ताली है। हर रोज़ बसन्त अरु होली है, और हर इक रात दिवाली है॥6॥हर॰ हम आशिक़ जिस सनम के हैं, वह दिलबर सबसे आला है॥ उस ने ही हम को जां बख़्शा, उस ने ही हमको पाला है॥ दिल अपना भोला भाला है, और इश्क़ बड़ा मतवाला है॥ क्या कहिये और नज़ीरे आगे! अब कौन समझने वाला है॥7॥हर॰ Notes: 1 तरफ़, ओर, 2 बेल बूटों को लगाना, 3 आशा, 4 सब कुछ देने वाला, सब का दाता, 5 विषयानन्द, रंग रलियां, 6 ख़ुशी, आनन्द, 7 आराम चैन, 8 आनन्द, ख़ुशी, 9 सर्वदा, हमेशा, 10 अनुग्रह और कृपा, 11 प्यारा, 12 आशापूर्ति सत्य संकल्प, 13 प्रेम, 14 बिना, सिवाय, 15 खुश दिली, आनन्द, राग रंग, 16 होश, 17 प्यारा, 18 उत्तम, 19 प्राण, ज़िन्दगी, 20 दृष्टान्त, मिसाल, कवि का नाम भी है।
[ 279 ] राग रमन कल्यान, ताल चलन्त न बाप बेटा, न दोस्त दुश्मन, न आशिक़ और सनम किसी के। अजब तरह की हुई फ़रागतें, न कोई हमारा, न हम किसी के॥टेक न कोई तालिब हुआ हमारा, न हम ने दिल से किसी को चाहा। न हम ने देखी ख़ुशी की लहरें, न ददों-ग़म से कभी कराहा। न हम ने बोया, न हमने काटा, न हमने जोता, न हमने गाहा। उठा जो दिल से भरम का पर्दा, तो उस के उठते ही फिर अहाहा॥1॥टेक यह बात कल की है जो हमारा, कोई था अपना, कोई बेगाना। कहें थे नाते, कहें थे पोते, कहें थे दादा, कहें थे नाना। किसी पै पटका, किसी पै कूटा, किसी पै पीसा, किसी पै छाना॥ उठा जो दिल से भरम का थाना, तो फिर जभी से यह हम ने जाना॥2॥टेक अभी हमारी बड़ी दुकान थी, अभी हमारा बड़ा कसब था। कहीं ख़ुशामद, कहीं दरामद, कहीं त्वाज़ो, कहीं अदब था। बड़ी थी ज़ात और बड़ी सफ़ात और बड़ा हसब और बड़ा नसब था। ख़ुदी के मिटते ही फिर जो देखा, न कुछ हसब था न कुछ नसब था॥3॥टेक Notes: 1 प्यारा, माशूक़, 2 फ़ुरसत, 3 जिज्ञासु, चाहने वाला, 4 नकारना, 5 देर, अस्तित्व, 6 अनेक सत्कार, 7 ख़ातिरदारी, 8 कुल, उच्च पद से भी अभिप्राय है, 9 कुल, ख़ान्दान, नसल, 10 अहंकार।
अभी यह ढब था किसी से लड़िये, किसी के पाओं पै जाके पड़िये। किसी से हक़ पर फ़िसाद करिये, किसी से नाहक़ लड़ाई लड़िये। अभी यह घुनें थी दिल अपने में "कहीं बिगड़िये, कहीं झगड़िये"। दुई के उठते ही फिर जो देखा, कि अब जो लड़िये तो किस से लड़िये॥4॥टेक [ 280 ] राग धनासरी, ताल धुमाली वाह वाह रे मौज फ़क़ीरां दी। (टेक) कभी चवावें चना चबीना, कभी लपट लें खीरां दी॥ वाह वाह रे॰1। कभी तो ओढ़ें शाल दुशाला, कभी गुदड़िया लीड़ां दी॥ वाह वाह रे॰2 कभी तो सोवें रंग महल में, कभी गली अहीरां दी॥ वाह वाह रे॰3। मंग तंग के टुकड़े खान्दे, चाल चलें अमीरां दी॥ वाह वाह रे॰4। Notes: 1 सच्चाई, 2 विचार, ख़याल, 3 की, 4 छोटी जाति के लोग।
[ 281 ] राग पहाड़ी, ताल दादरा। पूरे हैं वही मर्द जो हर हाल में ख़ुश हैं। (टेक) जो फ़क़र में पूरे हैं, वह हर हाल में ख़ुश हैं। हर काम में, हर दाम में, हर चाल में ख़ुश हैं॥ गर माल दिया यार ने, तो माल में ख़ुश हैं। बेज़र जो किया, तो उसी अहवाल में ख़ुश हैं। इफ़लासे में, इदबार में, अक़बाल में ख़ुश हैं॥ पूरे हैं वही मर्द जो हर हाल में ख़ुश हैं॥1॥ चेहरे पै है न मलाल न जिगर में असरे-ग़म। माथे पे कहीं चीन न, अब्रू में कहीं ख़म। शिक्वा न ज़ुबां पर, न कभी वहम हुई नम। ग़म में भी वही पेश, अलम में भी वही दम। हर बात, हर औक़ात, हर अफ़आल में ख़ुश हैं॥2॥पूरे॰ गर यार की मर्ज़ी हुई, सिर जोड़ के बैठे। घर बार छुड़ाया, तो वही छोड़ के बैठे। Notes: 1 त्याग, फ़क़ीरी, 2 मूल्य, स्थिति वा चाल, 3 निर्धन, ग़रीब, 4 अवस्था, हालत, 5 ग़रीबी, निर्धनता, 6 घर-बार के फ़िक्रों का भार, 7 ज़ात का प्रभाव, मान प्रतिष्ठा, 8 रंज, उदासी, 9 फ़िक्र, ग़म का प्रभाव, 10 बल, वट, त्योरी, 11 भ्रू, भृकुटि, 12 दिखावापन, तिरछापन, 13 उलाहना, शिकायत, 14 नेत्र, 15 भीगे हुए, आंसू भरना, अश्रुपात, 16 प्रसन्नता, ख़ुशदिली, 17 रंज, दशावस्था, 18 समय, काल, 19 काम।
मोड़ा बंन्है जिधर, 'वहीं मुँह मोड़ के बैठे। गुदड़ी जो सिलाई, तो वुही ओढ़ के बैठे। और शाल उढ़ाई, तो उसी शाल में खुश हैं॥3॥पूरे॰ गर उस ने दिया ग़म, तो उसी ग़म में रहे खुश। मातम जो दिया, तो उसी मातम में रहे खुश। खाने को मिला कम, तो उसी कम में रहे खुश। जिस तरह रक्खा उसने, उस हालम में रहे खुश। दुःख दर्द में, आफ़ातं में, जंजाल में खुश हैं॥4॥पूरे॰ जीने का न अन्दोह⁵ है, न मरने का ज़रा ग़म। यक्साँ है उन्हें ज़िन्दगी और मौत का आलम। वाक़्रिफ़ न बरस से, न महीने से वह इक दम। शव² की न मुसीबत, न कभी रोज़⁶ का मातम। दिन रात, घड़ी पहर, महो-साल⁷ में खुश हैं॥5॥पूरे॰ गर उसने उढ़ाया, तो लिया ओढ़-दोशाला⁸। कम्बल जो दिया तो वुही कांधे पे सँमाला। चादर जो उढ़ाई तो वुही हो गयी बाला। बंधवाई लंगोटी तो वुही हंस के कहा, "ला"। पोशाक में, दस्तार⁹ में, रूमाल में खुश है॥6॥पूरे॰ गर खाट बिछाने को मिली, खाट में सोये। दुकां में सुलाया, तो जा हाट में सोये। Notes: 1 रोना, पीटना, 2 अवस्था, हालत, 3 मुसीबत, दुख, विपत्ति, 4 ग़म, शोक, 5 रात्रि, 6 दिन, 7 मास और वर्ष, 8 सुन्दर वस्त्र, 9 सुन्दर, 10 ग्यानी।
रस्ते में कहा "सा", तो जा वाट में सोये। गर टाट बिछाने को दिया, टाट में सोये। और खाल बिछादी, तो उसी खाल में खुश हैं॥7॥पूरे॰ पानी जो मिला, पी लिया जिस तौर का पाया। रोटी जो मिली, तो किया रोटी में गुज़ारा। दी भूख, गर यार ने, तो भूख को मारा। दिल शाद रहे, करके कड़ाके पै कड़ाकी। और छाल चवाई¹, तो उसी छाल में खुश हैं॥8॥पूरे॰ गर उस ने कहा "सैर करो जा के जहाँ² की"। तो फिरने लगे जंगलो-वरै³ मार के झाँकी। कुछ दश्तो-वियाबां⁴ में ख़बर तन की न जां की। और फिर जो कहा "सैर करो हुस्ने-बुतां⁵ की"। तो चश्मो-रुखो-जुल्फो-ख़तो-ख़ाल में खुश हैं॥9॥पूरे॰ कुछ उन को तलब⁶ घर की, न बाहिर से उन्हें काम। तकिया की न ख़्वाहिश, न विस्तर से उन्हें काम। अस्थल⁷ की हवस दिल में, न मन्दिर से उन्हें काम। मुफ़्लिस⁸ से न मतलव, न तवंगर⁹ से उन्हें काम। मैदान में, वाज़ार में, चौपाल¹⁰ में खुश हैं॥10॥पूरे॰ Notes: 1 निराहार, 2 वन और देश वा बस्ती, 3 जंगल और उजाड़, 4 सुन्दर प्यारों की सुंदरता, 5 नेत्र, मुख, बांह और वज़ा क़तआ में, 6 आवश्यकता, जिज्ञासा, 7 फ़क़ीरों के रहने की जगह, (खानक़ाह,) 8 लालच, इच्छा, शौक़, 9 निर्धन, ग़रीब, 10 धनी, अमीर, 11 मंडप।
[ 281 ] राग बिलावल, ताल रूपक गर है फ़क़ीर तो तू न रख यहाँ किसी से मेल। न तूँ वड़ी न वेल¹, पड़ा अपने सिर पै खेल॥ (टेक) जितने तू देखता है यह फल फूल पात बेल। सब अपने अपने काम की हैं कर रहे झमेल। नाता है यां सो नाथ, जो रिश्ता² है सो नकेल। जो ग़म पड़े तो उसको तू अपने ही तन पर झेल॥1 गर है॰ जब तू हुआ फ़क़ीर, तो नाता किसी से क्या। छोड़ा कुटुम्ब तेरे फिर रहा रिश्ता किसी से क्या। मतलव भला फ़क़ीर को बावा किसी से क्या। दिलबर को अपने छोड़ के मिलना किसी से क्या॥2 गर है॰ तेरी न यह ज़मीन है, न तेरो यह आस्मान्। तेरा न घर, न बार, न तेरा यह जिस्मो-जाँ³। उस के सिवाय कि जिस पै हुआ तू फ़क़ीर याँ। कोई तेरा रफ़ीक़⁴, न साथी, न मिहरबान्॥3 गर है॰ Notes: 1 फ़क़ीर के पात्रोंके नाम हैं, 2 सम्बन्ध, 3 शरीर और प्राण, 4 मित्र, दोस्त।
यह उलफतें कि साथ तेरे आठ पहर हैं। यह उलफतें नहीं हैं, मेरी जां ! यह कहर¹ है। जितने यह शहर देखे हैं, जादू के शहर हैं। जितनी मिठाईयां हैं, मेरी जां ! यह ज़हर है॥4॥गर है॰ खूवां² के यह जो चांद से मुँह पर खिले हैं वाल। मारा है तेरे वास्ते सय्याद ने यह जाल। यह वाल वाल अब है तेरी जान का बवाल। फंसियो खुदा के वास्ते इस में न देख भाल॥5॥गर है॰ जिस का तू है फ़क़ीर, उसी को समझ तू यार। मांगे तो मांग उस से, क्या नक़द क्या उधार। देवे तो ले वही, जो न देवे तो दम न मार। इसके सिवा किसी से न रख अपना कारो-बार॥6॥गर है॰ क्या फ़ायदा अगर तू हुआ नाम को फ़क़ीर। हो कर फ़क़ीर तो भी रहा चाल में असीर³। पेला ही था तो फ़क़र को नाहक़ किया असीर। हम तो इसी लखुन के हैं क़ायल मियां नज़ीर⁸॥7॥गर है॰ [ 282 ] राग जंगला। गज मूल न आह्या, नाम धरापो फ़क़ीर॥टेक पंक्तिवार अर्थ। (टेक) फ़क़ीर (विरक्त) नाम धरा कर तुमे इन कामों से लज्जा नहीं आती। Notes: 1 ममताएं, स्नेह, 2 आपत्ति, ज़ुल्म, क्रोध, 3 खुन्दक मुख पुरुष वा स्त्री, 4 शिकारी, 5 दुःख, आपत्ति, 6 बैद, बद्द, 7 वाक्य, इक़रार, वादा, 8 कवि का नाम है।
रातीं रातीं बदियां करेंदा, दिन नूं सदावै धीर॥1॥ला॰ अपना भार चाय न सकदा, लोकां बधावे धीर॥2॥ला॰ कुड़म कुटुंब दी फाही फस्या, गलविच पा लिया लीर॥3॥ला॰ आखिर नतीजा मिलेगा प्यारे! रोवेगा नीरो-नीर॥4॥ला॰ [ 283 ] राग राम कली (पादशाही 10) रे मन ! ऐसो कर संन्यासा। (टेक) वन¹ से सदनें सबे कर समझो, मन हीं मांहि उदासा॥1॥ (1) रात के समय छुप कर तू बुराईयां करता है और दिन को महात्मा या गुरु कहलाता है, इस से तुझे लज्जा नहीं आती। (2) अपने अन्दर तो शोक व चिंता का इतना बोझ धरा हुआ है कि उसको तू उठा ही नहीं सकता, पर लोगों को धीरज दिला रहा है। इस बात से तुझे लज्जा नहीं आती। (3) कई तरह के चेलों का कुटुम्ब बनाकर आप तो उस में फंसा हुआ है और अपने गले में भगवे रंग के कपड़े पहिन कर अपने को संन्यासी वा त्यागी बता रहा है। (4) खैर, इन सारी करतूतों का तुझ को अन्त में खूब नतीजा मिलेगा और फिर फूट फूट तुझ को रोना पड़ेगा। Notes: 1 वन समान, 2 मन्दिर।
जत की जटा, योग के मज्जन, नेम के नाखन बढ़ायो। ज्ञान गुरु आत्मा उपदेशो. नाम बभूत लगायो॥2॥ अल्प अहार, स्वल्प सी निद्रा, दया, क्षमा, तन प्रीत। शील, सन्तोष, सदा निर्वाहियो¹, है वह त्रिगुणातीत॥3॥ काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, हठ, मोह न मन स्यों ल्यावे। तबहि आत्म-तत्व को दर्शे, परम पुरुष को पावे॥4॥ [ 284 ] राग वसन्त कत² जाइये रे, घर लागो रंग। मेरा चित्त न चले मन भयो पंग³॥1॥ एक दिवस मन भई उमंग। घस चन्दन चोआ बहु सुगंध॥ पूजन चाली ब्रह्म ठाईं⁴। सो ब्रह्म बतायो गुरु मनहीं मांहि॥ जहाँ जाइये तहाँ जल पखान⁵। तू पूर रह्यो है सब समान॥ वेद पुरान सब देखे जोई। जहाँ तौ जाइये, जौ इहाँ न होई॥ Notes: 1 धारण करना, 2 कहाँ, 3 पिंगला, 4 काशी में ब्रह्म मंदिर का नाम, 5 पत्थर की मूर्ति।
सतगुरु मैं बलिहारी तेरा। जिन सकल¹ बिकल² भ्रम काटे मेरा॥ रामानन्द स्वामी रमत³ ब्रह्म। गुरु का शब्द काटे कोट करम॥ [ 285 ] राग धनासरी (महल्ला 6) काहे रे वन खोजन जाई (टेक) सर्व निवासी, सदा अलेखा⁴, तोहि⁵ संग रहत सदाई॥1॥ पुष्प मध्य ज्यों वास बसत है, दर्पण मांहि ज्यों छाई। तैसे ही हर बसत निरन्तर, घट ही में खोजो भाई॥2॥ वाहिर भीतर एको मानो, यह गुरु ज्ञान बताई। जन नानक बिन आपा⁶ चीने, मिटे न भ्रम की काई॥3॥ Notes: 1 सारा, 2 व्याकुल करने वाला, 3 रम रहा है, 4 जो लख्या अर्थात् देखा न जाय, 5 तेरे साथ, 6 अपने आपको पहचाने बिना।